देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 846 of 889
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अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रुत्वा तद्वचनं वीरो मन्त्रं जग्राह सत्वरः॥ २०<br>दत्तात्रेयाद्दैवयोगात्प्राप्ताज्ज्ञानिवराच्छुभात् ।<br>योगेश्वरीमहामन्त्रं त्रिलोकीतिलकाभिधम्॥ २१ | उसका यह वचन सुनकर एकवीरने वहाँपर दैवयोगसे पधारे हुए पुण्यात्मा तथा ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ दत्तात्रेयजीसे त्रिलोकीका तिलक कहे जानेवाले योगेश्वरीके महामन्त्रको उसी क्षण ग्रहण कर लिया॥ २०-२१॥ |
| तेन सर्वज्ञता जाता सर्वान्तश्चारिता तथा।<br>तया सह जगामाशु पुरं तस्य सुदुर्गमम्॥ २२ | उस मन्त्रके प्रभावसे एकवीरको सब कुछ जानने तथा सर्वत्र गमनकी क्षमता प्राप्त हो गयी। इसके बाद वे यशोवतीके साथ कालकेतुके दुर्गम नगरके लिये शीघ्र प्रस्थित हुए॥ २२॥ |
| रक्षितं राक्षसैर्घोरैः पातालमिव पन्नगैः।<br>यशोवत्या च सैन्येन महता संयुतो नृपः॥ २३ | वह नगर राक्षसोंद्वारा इस प्रकार सुरक्षित था, जैसे सर्पोंद्वारा पातालकी निरन्तर सुरक्षा होती रहती है। कालकेतुके ऐसे नगरमें अब यशोवती तथा विशाल सेनाके साथ राजा एकवीर आ गये॥ २३॥ |
| तमायान्तं समालोक्य दूतास्तस्य भयातुराः।<br>क्रोशन्तोऽभिययुः पार्श्वं कालकेतोस्तरस्विनः॥ २४ | एकवीरको आते देखकर कालकेतुके दूत भयसे व्यग्र हो गये और चीखते-चिल्लाते हुए बड़ी तेजीसे भागकर उसके पास पहुँचे॥ २४॥ |
| तमूचुः सहसा मत्वा राक्षसं काममोहितम्।<br>एकावलीसमीपस्थं कुर्वन्तं विनयान्बहून्॥ २५ | उस समय एकावलीके पास बैठकर अनेकविध विनती कर रहे कालकेतुको अत्यन्त काममोहित समझकर दूत एकाएक उससे कहने लगे॥ २५॥ |
| दूता ऊचुः<br>राजन् यशोवती नारी कामिन्याः सहचारिणी।<br>आयाति सह सैन्येन राजपुत्रेण संयुता॥ २६ | **दूतोंने कहा—**हे राजन्! इस कामिनीकी सहचारिणी जो यशोवती नामकी स्त्री है, वह एक राजकुमारके साथ विशाल सेना लेकर आ रही है॥ २६॥ |
| जयन्तो वा महाराज कार्तिकेयोऽथवा नु किम्।<br>आगच्छति बलोन्मत्तो वाहिनीसहितः किल॥ २७ | हे महाराज! पता नहीं, वह जयन्त है अथवा कार्तिकेय। बलके अभिमानसे मत्त वह राजकुमार सेनाके साथ चला आ रहा है॥ २७॥ |
| संयत्तो भव राजेन्द्र संग्रामः समुपस्थितः।<br>देवपुत्रेण युध्यस्व त्यज वा कमलेक्षणाम्॥ २८ | हे राजेन्द्र! अब आप सावधान हो जाइये; क्योंकि युद्धकी स्थिति सामने आ गयी है। अब आप या तो इस देवपुत्रके साथ युद्ध कीजिये अथवा इस कमलनयनीको मुक्त कर दीजिये॥ २८॥ |
| इतो दूरेऽस्ति सैन्यं तद्योजनत्रयमात्रतः।<br>सज्जो भव महीपाल दुन्दुभिं घोषयाशु वै॥ २९ | उसकी सेना यहाँसे मात्र तीन योजनकी दूरीपर है। अतएव हे राजन्! अब आप तैयार हो जाइये और रण-दुंदुभी बजानेकी तुरंत आज्ञा दीजिये॥ २९॥ |
| व्यास उवाच<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा राक्षसः क्रोधमूर्च्छितः।<br>राक्षसान्प्रेरयामास सायुधान्सबलान्बहून्॥ ३०<br>गच्छध्वं राक्षसाः सर्वे सम्मुखाः शस्त्रपाणयः। | **व्यासजी बोले—**दूतोंके मुखसे वैसी बात सुनकर कालकेतु क्रोधसे मूर्च्छित हो गया। उसने अपने सभी बलवान् तथा शस्त्रधारी राक्षसोंको उत्साहित करते हुए कहा—हे राक्षसो! तुम सब हाथोंमें शस्त्र लेकर शत्रुके सामने जाओ॥ ३० १/२॥ |