देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 832 of 889
Read in context| अ० २० ] | षष्ठ स्कन्ध | ८२३ |
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| माता रमा त्वां तनुजं मदर्थे<br>त्यक्त्वा गता सा हरिणा समेता।<br>धन्या तु सा या प्रहसन्तमाङ्के<br>कृत्वा सुतं त्वां मुदितानना स्यात्॥ ४३<br>त्वमेव संसारसमुद्रनौका-<br>रूपः कृतः पुत्र लक्ष्मीधरेण।<br>इत्येवमुक्त्वा नृपतिः सुतं तं<br>मुदा समादाय ययौ गृहाय॥ ४४ | लक्ष्मीजी तुम्हारी जननी हैं; तुझ पुत्रको मेरे लिये छोड़कर वे भगवान् विष्णुके साथ वैकुण्ठ चली गयी हैं। अब वह माता धन्य होगी, जो तुझ-जैसे हँसते हुए पुत्रको अपनी गोदमें लेकर आनन्द प्राप्त करेगी। हे पुत्र! मेरे लिये संसारसागरको पार करनेके लिये तुम नौकास्वरूप हो, जिसे साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने उत्पन्न किया है। ऐसा कहकर राजा हरिवर्मा प्रसन्नतापूर्वक उस पुत्रको लेकर अपने घरकी ओर चले गये॥ ४३-४४॥ |
| पुरीसमीपे नृपमागतं त-<br>माकर्ण्य सर्वे सचिवास्तु राज्ञः।<br>ययुः समीपं नृपतेश्च लोकाः<br>सोपायनास्ते सपुरोहिताश्च॥ ४५ | राजा नगरके समीप आ गये हैं—ऐसा सुनकर राजाके सभी सचिव तथा उनके प्रजावर्ग पुरोहितोंके साथ समस्त उपहार-सामग्री लेकर उनके पास पहुँच गये॥ ४५॥ |
| बन्दीजना गायनकाश्च सूताः<br>समाययुः सम्मुखमाशु राज्ञः।<br>नृपः पुरं प्राप्य पुरः समागतं<br>जनं समाश्वास्य वाक्यैश्च दृष्ट्या॥ ४६<br>सम्पूजितः पौरजनेन राजा<br>विवेश पुत्रेण युतो नगर्याम्।<br>मार्गेषु लाजैः कुसुमैः समन्ता-<br>द्विकीर्यमाणो नृपतिर्जगाम॥ ४७ | सूत, बंदीजन तथा गायकगण भी राजाके सामने उनका यशोगान करते हुए शीघ्र ही आ गये। नगरमें आकर राजा हरिवर्मा अपने सम्मुख उपस्थित लोगोंको [स्नेहभरी] दृष्टि तथा [मधुर] वचनोंसे आश्वस्त करके नगरवासियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर पुत्रके साथ नगरीमें प्रविष्ट हुए। नगरमें जाते समय रास्तेभर राजाके ऊपर लाजा तथा फूलोंकी वर्षा की जा रही थी॥ ४६-४७॥ |
| गृहं समृद्धं सचिवैः समेतः<br>सुतं समादाय मुदा कराभ्याम्।<br>राज्ञ्यै ददौ चाथ सुतं मनोज्ञं<br>सद्यःप्रसूतं च मनोभवाभम्॥ ४८ | सचिवोंके साथ अपने समृद्धिशाली महलमें पहुँचनेपर राजाने हर्षपूर्वक कामदेवके तुल्य कान्तिमान् तथा मनोहर नवजात पुत्रको दोनों हाथोंमें लेकर रानीको दे दिया॥ ४८॥ |
| राज्ञी गृहीत्वाभिनवं तनूजं<br>पप्रच्छ राजानमनिन्दिता सा।<br>राजन् कुतश्चैष सुतः सुजन्मा<br>प्राप्तस्त्वया मन्मथतुल्यरूपः॥ ४९<br>केनैष दत्तः कथयाशु कान्त<br>चेतो मदीयं प्रहृतं सुतेन।<br>नृपस्तदोवाच मुदान्वितोऽसौ<br>प्रिये रमेशेन सुतो हि मह्यम्॥ ५०<br>लोलाक्षि दत्तः कमलासमुत्थो<br>जनार्दनांशोऽयमहीनमत्त्वः।<br>सा तं गृहीत्वा मुदमाप राज्ञी<br>राजा चकारोत्सवमद्भुतं च॥ ५१ | उस बालकको गोदमें लेकर पुण्यात्मा रानीने राजासे पूछा—हे राजन्! कामदेवके समान सुन्दर तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न इस पुत्रको आपने कहाँसे प्राप्त किया? हे कान्त! आप शीघ्र बताइये कि किसने आपको यह बालक दिया है? इस पुत्रने अपने सौन्दर्यसे मेरे मनको वशीभूत कर लिया है। तब राजाने बड़ी प्रसन्नताके साथ कहा—हे प्रिये! हे चंचल नेत्रोंवाली! लक्ष्मीजीसे उत्पन्न तथा भगवान् जनार्दनका अंशस्वरूप यह महान् शक्तिशाली पुत्र मुझे स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने ही दिया है। उस पुत्रको लेकर रानी परम आनन्दित हुई और राजाने अद्भुत उत्सव मनाया॥ ४९-५१॥ |