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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

५४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३

५४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३

प्रणिधिं प्रेषयामास हयारिस्तु शचीपतिम्।<br>स सन्देशहरं शीघ्रमाहूयोवाच दैत्यराट् ॥ ९<br><br>गच्छ वीर महाबाहो दूतत्वं कुरु मेऽनघ ।<br>ब्रूहि शक्रं दिवं गत्वा निःशङ्कः सुरसन्निधौ ॥ १०<br><br>मुञ्च स्वर्गं सहस्राक्ष यथेष्टं गच्छ मा चिरम्।<br>सेवां वा कुरु देवेश महिषस्य महात्मनः ॥ ११महिषासुरने इन्द्रके पास अपना एक दूत भेजा। उस दैत्यराजने दूतको बुलाकर उससे कहा—हे वीर! जाओ, हे महाबाहो! तुम मेरा दूतकार्य करो। हे अनघ! तुम निडर होकर स्वर्गमें देवताओंके पास जाकर वहाँ इन्द्रसे कहो—हे सहस्राक्ष! तुम स्वर्ग छोड़ दो और अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहो, शीघ्र चले जाओ। अथवा हे देवेश! महान् महिषासुरकी सेवा करो॥ ९-११॥
स त्वां संरक्षयेन्नूनं राजा शरणमागतम्।<br>तस्मात्त्वं शरणं याहि महिषस्य शचीपते ॥ १२यदि तुम राजा महिषासुरकी शरणागति स्वीकार कर लो तो वे तुम्हारी रक्षा अवश्य करेंगे। अतएव हे इन्द्र! तुम महिषासुरकी शरणमें चले जाओ ॥ १२ ॥
नोचेद्वज्रं गृहाणाशु युद्धाय बलसूदन।<br>पूर्वैर्जितोऽसि चास्माकं जानामि तव पौरुषम् ॥ १३अन्यथा हे बलसूदन! युद्धके लिये शीघ्र ही अपना वज्र उठा लो। हमारे पूर्वजोंने तुम्हें पराजित किया है, अतएव हम तुम्हारा पुरुषार्थ जानते हैं॥ १३॥
अहल्याजार विज्ञातं बलं ते सुरसङ्घप ।<br>युध्यस्व व्रज वा कामं यत्र ते रमते मनः ॥ १४अहल्याके साथ अनाचार करनेवाले तथा देवसमुदायके अधिपति हे इन्द्र! मैं तुम्हारे बलसे भलीभाँति परिचित हूँ। तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा जहाँ तुम्हारा मन करे, वहाँ चले जाओ ॥ १४॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शक्रः क्रोधसमन्वितः ।<br>उवाच तं नृपश्रेष्ठ स्मितपूर्वं वचस्तदा ॥ १५<br><br>न जानेऽहं सुमन्दात्मन् यतस्त्वं मददर्पितः।<br>चिकित्सां संकरिष्यामि रोगस्यास्य प्रभोस्तव ॥ १६<br><br>अतः परं करिष्यामि मूलस्यास्य निर्मूलनम् ।<br>गच्छ दूत तथा ब्रूहि तस्याग्रे मम भाषितम् ॥ १७**व्यासजी बोले—**हे नृपश्रेष्ठ! दूतका वचन सुनकर इन्द्र कुपित हो उठे; फिर भी उन्होंने मुसकराकर दूतसे कहा—हे मन्दबुद्धि! मैं यह नहीं जान पा रहा हूँ कि तुम अभिमानके मदमें इतना चूर क्यों हो गये हो! मैं तुम्हारे स्वामी महिषासुरके अभिमानरूपी इस रोगकी चिकित्सा अवश्य करूँगा। इसके बाद मैं इस रोगको जड़से नष्ट कर दूँगा। हे दूत! अब तुम जाओ और उस महिषासुरसे मेरी कही गयी बात बता दो। शिष्टजनोंको चाहिये कि दूतोंका वध न करें, अतः मैं तुम्हें छोड़ दे रहा हूँ॥ १५-१७\frac{१}{२}॥
शिष्टैर्दूता न हन्तव्यास्तस्मात्त्वां विसृजाम्यहम् ।<br>युद्धेच्छा चेत्समागच्छ त्वरितो महिषीसुत ॥ १८[वहाँ जाकर मेरी तरफसे उससे कह देना—]<br>हे महिषीपुत्र! यदि तुम्हारी युद्ध करनेकी इच्छा हो तो शीघ्र आ जाओ।
हयारे त्वद्बलं ज्ञातं तृणादस्त्वं जडाकृतिः ।<br>शृङ्गायोस्ते करिष्यामि सुदृढं च शरासनम् ॥ १९हे महिषासुर! तुम तो घास खानेवाले जड प्रकृतिके जीव हो। अतः मुझे तुम्हारा बल ज्ञात है। मैं तुम्हारी सींगोंसे एक सुदृढ़ धनुष बनाऊँगा।
दर्पः शृङ्गबलात्तेऽस्ति विदितं कारणं मया ।<br>विषाणे ते परिच्छिद्य संहरिष्यामि तद् बलम् ॥ २०तुम्हारे अभिमानका कारण मुझे विदित है। तुम्हें अपनी सींगोंके बलपर गर्व है, अतएव तुम्हारी सींगोंको काटकर मैं उस अभिमानबलको समाप्त कर
अ० ३ ]पञ्चम स्कन्ध५४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यद् बलेनातिपूर्णस्त्वं जातोऽसि बलदर्पितः।<br>कुशलस्त्वं तदाघाते न युद्धे महिषाधम॥ २१दूँगा। हे महिषाधम! जिन सींगोंके बलपर तुम गर्वोन्मत्त हो तथा अपनेको सर्वसमर्थ समझते हो, केवल उन्हींसे आघात करनेमें तुम कुशल हो; युद्ध करनेमें तुम दक्ष नहीं हो सकते॥ १८-२१॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्तोऽसौ सुरेन्द्रेण स दूतस्त्वरितो गतः।<br>जगाम महिषं मत्तं प्रणम्य प्रत्युवाच ह॥ २२व्यासजी बोले—देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर वह दूत तत्काल वहाँसे चल दिया। वह उन्मत्त महिषासुरके पास पहुँचा और उसे प्रणाम करके कहने लगा—॥ २२॥
दूत उवाच<br>राजन्देवाधिपः कामं न त्वां विगणयत्यसौ।<br>मन्यते स्वबलं पूर्णं देवसैन्यसमावृतः॥ २३दूत बोला—हे राजन्! वह देवराज इन्द्र आपको कुछ भी नहीं समझ रहा है। देवसेनासे सम्पन्न होनेके कारण वह अपनेको पूर्ण बलवान् मानता है॥ २३॥
यदुक्तं तेन मूर्खेण कथमन्यद् ब्रवीम्यहम्।<br>प्रियं सत्यं च वक्तव्यं भृत्येन पुरतः प्रभोः॥ २४उस मूर्खने जो कुछ कहा है, उसके अतिरिक्त दूसरी बात मैं कैसे कहूँ? सेवकको अपने स्वामीके समक्ष सत्य तथा प्रिय वाणी बोलनी चाहिये॥ २४॥
प्रियं सत्यं च वक्तव्यं प्रभोरग्रे शुभेच्छुना।<br>इति नीतिर्महाराज जागर्ति शुभकारिणी॥ २५कल्याणकी इच्छा रखनेवाले सेवकको अपने स्वामीके आगे सदा सत्य तथा प्रिय वचन बोलना चाहिये। हे महाराज! यही नीति संसारमें सदासे कल्याणप्रद होती आयी है॥ २५॥
केवलं चेत्प्रियं ब्रूयान्न ते कार्यं भविष्यति।<br>परुषं च न वक्तव्यं कदाचिच्छुभमिच्छता॥ २६किंतु यदि केवल प्रिय लगनेवाली बात ही कहूँ तो इससे आपका कार्य सिद्ध नहीं होगा। साथ ही अपना कल्याण चाहनेवाले सेवकको अपने स्वामीसे कठोर बात कभी नहीं कहनी चाहिये॥ २६॥
यथा रिपुमुखाद्वाचः प्रसरन्ति विषोपमाः।<br>तथा भृत्यमुखान्नाथ निःसरन्ति कथं गिरः॥ २७हे नाथ! शत्रुके मुखसे जिस तरहकी विषतुल्य बातें निकलती हैं, उस तरहकी बातें सेवकके मुखसे कैसे निकल सकती हैं?॥ २७॥
यादृशानीह वाक्यानि तेनोक्तानि महीपते।<br>तादृशानि न मे जिह्वा वक्तुमर्हति कर्हिचित्॥ २८हे पृथ्‍वीपते! इन्द्रने जिस प्रकारके वाक्य बोले हैं, उन्हें कह सकनेमें मेरी जिह्वा कभी भी समर्थ नहीं है॥ २८॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हेतुगर्भं तृणाशनः।<br>भृशं कोपपरीतात्मा बभूव महिषासुरः॥ २९व्यासजी बोले—उस दूतका रहस्यपूर्ण वचन सुनकर घास खानेवाले महिषासुरका मन पूर्णरूपसे क्रोधके वशीभूत हो गया॥ २९॥
समाहूयाब्रवीद्दैत्यान्क्रोधसंरक्तलोचनः ।<br>लाङ्गूलं पृष्ठदेशे च कृत्वा मूत्रं परित्यजन्॥ ३०<br><br>भो भो दैत्याः सुरेन्द्रोऽसौ युद्धकामोऽस्ति सर्वथा।<br>बलोद्योगं कुरुध्वं वै जेतव्योऽसौ सुराधमः॥ ३१सभी दैत्योंको बुलाकर क्रोधके मारे लाल आँखोंवाला महिषासुर अपनी पूँछ पीठपर रख करके मूत्र त्याग करते हुए उनसे कहने लगा—हे दैत्यो! वह इन्द्र निश्चय ही युद्ध करना चाहता है। अतः तुमलोग सेना संगठित करो। हमें उस देवाधमको जीतना है॥ ३०-३१॥