देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
८५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६
८५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्माविष्णुस्तथा रुद्रः सनकः कपिलस्तथा।<br>मायया वेष्टिताः सर्वे भ्रमन्ति भववर्त्मनि ॥ ३ | ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सनक तथा कपिल—ये सभी मायाके वशवर्ती होकर संसार-मार्गमें निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं॥ ३॥ |
| ज्ञानिनं मां जनो वेत्ति भ्रान्तोऽहं सर्वलोकवत्।<br>शृणु मे पूर्ववृत्तान्तं प्रब्रवीमि सुनिश्चितम्॥ ४ | लोग मुझे ज्ञानी समझते हैं, किंतु मैं भी एक बार सभी लोगोंकी भाँति भ्रमित हो गया था। मैं अपना पूर्व वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनिये॥ ४॥ |
| दुःखं मया यथा पूर्वमनुभूतं महत्तरम्।<br>स्वकृतेन च मोहेन भार्यार्थे वासवीसुत॥ ५ | हे व्यासजी! स्त्री-प्राप्तिके लिये अपने द्वारा स्वयं उत्पन्न किये गये मोहके कारण मुझे पूर्वकालमें महान् कष्टका अनुभव करना पड़ा था॥ ५॥ |
| एकदा पर्वतश्चाहं देवलोकान्महीतलाम्।<br>प्राप्तौ विलोकनार्थाय भारतं खण्डमुत्तमम्॥ ६ | एक बार मैं तथा पर्वतमुनि उत्तम भारतवर्षको देखनेके लिये देवलोकसे पृथ्वीलोकपर आये थे॥ ६॥ |
| भ्रमन्तौ सहितावुर्व्यां पश्यन्तौ तीर्थमण्डलम्।<br>पावनानि च स्थानानि मुनीनामाश्रमाञ्छुभान् ॥ ७ | विभिन्न तीर्थों, पवित्र स्थानों तथा मुनियोंके पावन आश्रमोंको देखते हुए हम दोनों साथ-साथ पृथ्वीतलपर विचरण करने लगे॥ ७॥ |
| शपथं देवलोकात्तु कृत्वा पूर्वं परस्परम्।<br>चलितौ समयं चेमं सम्मन्त्र्य निश्चयेन वै॥ ८<br><br>चित्तवृत्तिस्तु वक्तव्या यादृशी यस्य जायते।<br>शुभा वाप्यशुभा वापि न गोप्तव्या कदाचन॥ ९ | देवलोकसे प्रस्थान करते समय हम दोनोंने आपसमें निश्चयपूर्वक सोच-विचारकर यह प्रतिज्ञा की थी कि जिसके मनमें जैसा भी पवित्र अथवा अपवित्र भाव उत्पन्न होगा, वह उसे कभी गोपनीय नहीं रखेगा॥ ८-९॥ |
| भोजनेच्छा धनेच्छापि रतीच्छा वा भवेदपि।<br>यादृशी यस्य चित्ते तु कथनीया परस्परम्॥ १० | भोजनकी इच्छा, धनकी इच्छा अथवा काम-विषयक इच्छा—इनमेंसे जिस तरहकी भी इच्छा जिसके मनमें होगी, एक-दूसरेको बता दी जानी चाहिये॥ १०॥ |
| इत्यावां समयं कृत्वा स्वर्गाद्भूलोकमागतौ।<br>एकचित्तौ मुनीभूतौ विचरन्तौ यथेच्छया॥ ११ | ऐसी प्रतिज्ञा करके हम दोनों स्वर्गलोकसे पृथ्वीतलपर आये और एकचित्त होकर मुनिरूपमें इच्छापूर्वक विचरण करने लगे॥ ११॥ |
| एवं भ्रमन्तौ लोकेऽस्मिन्ग्रीष्मान्ते समुपागते।<br>सञ्जयस्य पुरं रम्यं सम्प्राप्तौ नृपतेः पुनः॥ १२ | इस प्रकार इस लोकमें विचरण करते हुए हम दोनों ग्रीष्म ऋतुके समाप्त हो जानेपर राजा संजयके सुरम्य नगरमें पहुँचे॥ १२॥ |
| तेन सम्पूजितौ भक्त्या राज्ञा सम्मानितौ भृशम्।<br>स्थितौ तत्र गृहे तस्य चातुर्मास्यं महात्मनः॥ १३ | राजा संजयने हम दोनोंकी भक्तिपूर्वक पूजा की तथा अत्यधिक सम्मान दिया। महान् आत्मावाले उन्हीं संजयके भवनमें रहकर हम दोनों अपना चातुर्मास्य व्यतीत करने लगे॥ १३॥ |
| वार्षिकाश्चतुरो मासा दुर्गमाः पथि सर्वदा।<br>तस्मादेकत्र विबुधैः स्थातव्यमिति निश्चयः॥ १४ | वर्षाकालके चार महीने मार्गमें बहुत कष्टकारक होते हैं, अतएव विज्ञजनोंको उस अवधिमें एक ही स्थानपर रहना चाहिये—ऐसा सिद्धान्त है॥ १४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 28 D
अ० २६] षष्ठ स्कन्ध ८५३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अष्टौ मासांस्तु प्रवसेत्सदा कार्यवशाद् द्विजः।<br>वर्षाकाले न गन्तव्यं प्रवासे सुखमिच्छता॥ १५ | द्विजको चाहिये कि वह आठ महीनेतक अपने कार्यवश देशान्तरमें प्रवास करे, किंतु सुख चाहनेवाले पुरुषको वर्षाकालमें प्रवासके लिये नहीं जाना चाहिये॥ १५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा सञ्जयस्य गृहे तदा।<br>संस्थितौ मानितौ राज्ञा कृतातिथ्यौ महात्मना॥ १६ | ऐसा सोचकर हम दोनों राजा संजयके भवनमें ठहर गये और उन महात्मा नरेशने हमलोगोंका सम्मानपूर्वक आतिथ्य किया॥ १६॥ |
| दमयन्तीति विख्याता तस्य पुत्री महीपतेः।<br>आज्ञाप्ता परिचर्यार्थं सुदती सुन्दरी भृशम्॥ १७ | उन राजा संजयकी परम सुन्दरी तथा मनोहर दाँतोंवाली दमयन्ती नामसे विख्यात एक कन्या थी; उन्होंने उसे हमलोगोंकी सेवाके लिये आदेश दे दिया॥ १७॥ |
| विवेकज्ञा विशालाक्षी राजपुत्री कृतोद्यमा।<br>सेवनं सर्वकाले च व्यदधादुभयोरपि॥ १८ | विवेकका ज्ञान रखनेवाली तथा उद्यमी स्वभाववाली वह विशालनयना राजकुमारी सभी समय हम दोनोंकी सेवा करती रहती थी॥ १८॥ |
| स्नानार्थमुदकं काले भोजनं मृष्टमायतम्।<br>मुखवासं तथा चान्यं यदिष्टं तद्ददाति सा॥ १९ | वह हमारे स्नानके लिये जल, पर्याप्त मधुर भोजन, मुख-शुद्धिके लिये सुगन्धित गन्ध-द्रव्य तथा और भी जो हमारा अभीष्ट रहता, उसे समयसे हमलोगोंको दिया करती थी॥ १९॥ |
| मनोऽभिलषितान्कामानुभयोरपि कन्यका।<br>व्यजनासनशय्यादीन्वाञ्छितानप्यकल्पयत् ॥ २० | वह कन्या हम दोनोंकी मनोभिलषित वस्तुएँ उपस्थित किया करती थी। वह व्यजन (पंखा), आसन तथा शय्या आदि मनोवांछित सामग्रियोंको उपलब्ध कराती रहती थी॥ २०॥ |
| एवं संसेव्यमानौ तु स्थितौ राज्ञो गृहे किल।<br>वेदाध्ययनसंशीलावावां वेदव्रते रतौ॥ २१ | इस प्रकार उसके द्वारा सेवित होते हुए हम दोनों राजा संजयके भवनमें रहने लगे। वेदाध्ययनके स्वभाववाले हम दोनों मुनि सदा वेदव्रतमें संलग्न रहते थे॥ २१॥ |
| अहं वीणां करे कृत्वा साधयित्वा स्वरोत्तमम्।<br>गायत्रं साम सुस्वादमगां कर्णरसायनम्॥ २२ | मैं हाथमें वीणा धारणकर उत्तम स्वरकी साधना करके कानोंके लिये रसायनस्वरूप अत्यन्त मधुर गायत्र-सामका गान करता रहता था॥ २२॥ |
| राजपुत्री तु तच्छ्रुत्वा सामगानं मनोहरम्।<br>बभूव मयि रागाढ्या प्रीतियुक्ता विशारदा॥ २३ | मनोहर सामगान सुनकर वह विदुषी राजकुमारी मेरे प्रति अनुरागयुक्त तथा प्रीतिमय हो गयी॥ २३॥ |
| दिने दिनेऽनुरागोऽस्या मयि वृद्धिं गतः परः।<br>ममापि प्रीतियुक्तायां मनो जातं स्पृहापरम्॥ २४ | मेरे प्रति उस राजकुमारीका अनुराग दिनोदिन बढ़ता ही चला गया और मुझमें प्रेम-भाव रखनेवाली उस कन्याके प्रति मेरा भी मन अत्यन्त आसक्त हो उठा॥ २४॥ |
| मम तस्य च सा कन्या भोजनादिषु कर्हिचित्।<br>अकरोदन्तरं किञ्चित्सेवाभेदं रसान्विता॥ २५ | मुझपर विशेष अनुराग रखनेवाली वह राजकुमारी मेरे तथा उस पर्वतमुनिके लिये किये जानेवाले भोजनादिके प्रबन्धमें तथा सेवाकार्यमें कुछ भेदभाव करने लगी॥ २५॥ |
| ८५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ |
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| स्नानायोष्णजलं मह्यं पर्वताय च शीतलम्।<br>दधि मह्यं तथा तक्रं पर्वतायाप्यकल्पयत्॥ २६ | स्नानके लिये मुझे उष्ण जल तथा पर्वतमुनिके लिये शीतल जल और इसी प्रकार मेरे लिये दही तथा पर्वतमुनिके लिये मट्ठेकी व्यवस्था करती थी॥ २६॥ |
| शयनास्तरणं शुभ्रं मदर्थे पर्यकल्पयत्।<br>प्रीत्या परमया यद्वत्पर्वताय न तादृशम्॥ २७ | वह मेरे लिये अत्यन्त प्रेमपूर्वक जैसा धवल आस्तरण (बिछौना) बिछाती थी, वैसा पर्वतके लिये नहीं॥ २७॥ |
| विलोकयति मां प्रेम्णा सुन्दरी न च पर्वतम्।<br>ततोऽस्यास्तादृशं दृष्ट्वा पर्वतः प्रेमकारणम्॥ २८<br><br>मनसा चिन्तयामास किमेतदिति विस्मितः।<br>पप्रच्छ मां रहः सम्यग्ब्रूहि नारद सर्वथा॥ २९<br><br>राजपुत्री त्वयि प्रेम करोति मुदिता भृशम्।<br>ददाति भक्ष्यभोज्यानि स्नेहयुक्ता समन्ततः॥ ३०<br><br>न तथा मयि भेदोऽत्र सन्देहं जनयत्यसौ।<br>मन्यते त्वां पतिं कर्तुं सर्वथा सञ्जयात्मजा॥ ३१ | वह सुन्दरी मुझे अत्यन्त प्रेमपूर्ण भावसे देखती थी, किंतु पर्वतमुनिको नहीं। तब मुनि पर्वत उस प्रकारका प्रेम-भेद देखकर मन-ही-मन विस्मित होकर सोचने लगे कि ऐसा क्यों हो रहा है? एकान्तमें उन्होंने मुझसे पूछा—हे नारद! मुझे भलीभाँति बताइये, यह राजकुमारी अत्यन्त प्रसन्न होकर आपसे अत्यधिक प्रेम करती है और स्नेहयुक्त होकर आपको नानाविध भोज्य-पदार्थ देती है, किंतु वैसा मेरे साथ नहीं करती है; यह भेद-भाव मेरे मनमें सन्देह उत्पन्न कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजा संजयकी पुत्री आपको निश्चय ही पति बनाना चाहती है॥ २८-३१॥ |
| तवापि तादृशं भावं जानामि लक्षणैरहम्।<br>नेत्रवक्त्रविकारैश्च ज्ञायते प्रीतिकारणम्॥ ३२ | आपकी चेष्टाओंसे आपका भी वैसा ही भाव मुझे परिलक्षित हो रहा है; क्योंकि नेत्र तथा मुखके विकारोंसे प्रेमके कारणका पता चल जाता है॥ ३२॥ |
| सत्यं वद न ते मिथ्या वक्तव्यं वचनं मुने।<br>स्वर्गतः समयं कृत्वा चलितौ संस्मराधुना॥ ३३ | हे मुने! सच-सच कहिये। मिथ्या वचन मत बोलिये। स्वर्गसे प्रस्थान करते समय हम दोनोंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे इस समय याद कीजिये॥ ३३॥ |
| नारद उवाच<br>पृष्टोऽहं पर्वतेनेदं कारणं तु हठाद्यदा।<br>तदाहं ह्रीसमाक्रान्तः सञ्जातश्चाब्रुवं पुनः॥ ३४<br><br>पर्वतैषा विशालाक्षी पतिं मां कर्तुमुद्यता।<br>ममापि मानसो भावो वर्ततेऽस्यां विशेषतः॥ ३५ | **नारदजी बोले—**जब पर्वतमुनिने हठपूर्वक इसका कारण मुझसे पूछा तब मैं अत्यन्त लज्जित हो गया और पुनः बोला—हे पर्वत! विशाल नयनोंवाली यह राजकुमारी मुझे पति बनानेके लिये उद्यत है और उसके प्रति मेरे भी मनमें विशेष अनुराग भाव उत्पन्न हो गया है॥ ३४-३५॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं पर्वतः कोपसंयुतः।<br>मामुवाच मुनिर्वाक्यं धिग्धिगिति पुनः पुनः॥ ३६<br><br>प्रथमं शपथान्कृत्वा वञ्चितोऽहं त्वया यतः।<br>भव वानरवक्त्रस्त्वं शापाच्च मम मित्रध्रुक्॥ ३७ | मेरा यह सत्य वचन सुनकर पर्वतमुनि कुपित हो उठे और उन्होंने मुझसे कहा, ‘तुम्हें बार-बार धिक्कार है; क्योंकि प्रतिज्ञा करके पहले तुमने मुझे धोखा दिया है, अतएव हे मित्रद्रोही! मेरे शापसे तुम अभी बन्दरके मुखवाले हो जाओ’॥ ३६-३७॥ |
| इति शप्तस्तु तेनाहं कुपितेन महात्मना।<br>सहसा ह्यभवं क्रूरः शाखामृगमुखस्तदा॥ ३८ | उस कुपित महात्मा पर्वतके ऐसा शाप देते ही मैं तत्काल भयंकर बन्दरकी मुखाकृतिवाला हो गया॥ ३८॥ |
| अ० २६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मयापि न कृता तस्मिन्क्षमा तु भगिनीसुते।<br>सोऽपि शप्तोऽतिकोपाद्वै मा स्वर्गे ते गतिः किल॥ ३९ | तब मैंने भी अपने उस भगिनीपुत्र (भांजे) पर्वतको क्षमा नहीं किया। मैंने भी क्रोध करके उसे शाप दे दिया कि तुम भी अबसे स्वर्गके अधिकारी नहीं रहोगे॥ ३९॥ |
| स्वल्पेऽपराधे यस्मान्मां शप्तवानसि पर्वत।<br>तस्मात्तवापि मन्दात्मन् मृत्युलोके स्थितिः किल॥ ४० | हे मन्दात्मन् पर्वत! क्योंकि मेरे छोटे-से अपराधके लिये तुमने मुझे ऐसा शाप दिया है, अतएव तुम्हारा भी अब मृत्युलोकमें निवास होगा॥ ४०॥ |
| पर्वतस्तु गतस्तस्मान्नगराद्विग्मना भृशम्।<br>अहं वानरवक्त्रस्तु सञ्जातस्तत्क्षणादपि॥ ४१ | इसके बाद पर्वतमुनि अत्यन्त उदास मनसे उस नगरसे निकल पड़े और मैं भी उसी समयसे बन्दरके मुखवाला हो गया॥ ४१॥ |
| दृष्ट्वा मां वानरं क्रूरं राजपुत्री विलक्षणा।<br>विमनातीव सञ्जाता वीणाश्रवणलालसा॥ ४२ | वीणा सुननेकी उत्कट अभिलाषा रखनेवाली वह परम विलक्षण राजकुमारी मुझे भयंकर बन्दरके रूपमें देखकर अत्यन्त उदास मनवाली हो गयी॥ ४२॥ |
| व्यास उवाच<br>ततः किमभवद् ब्रह्मन् कथं शापान्निवर्तितः।<br>मानुषास्यः पुनर्जातो भवान्ब्रूहि यथाविधि॥ ४३ | व्यासजी बोले— हे ब्रह्मन्! तत्पश्चात् क्या हुआ, आपको शापसे छुटकारा कैसे मिला तथा आप पुनः मानवकी मुखाकृतिवाले किस प्रकार हुए? ये सभी बातें भलीभाँति बताइये॥ ४३॥ |
| पर्वतः क्व गतो भूयः सङ्गमो युवयोरभूत्।<br>कदा कुत्र कथं सर्वं विस्तरेण वदस्व ह॥ ४४ | पर्वतमुनि कहाँ चले गये? आप दोनोंका पुनर्मिलन कब, कहाँ और कैसे हुआ? यह सब विस्तारपूर्वक बताइये॥ ४४॥ |
| नारद उवाच<br>किं ब्रवीमि महाभाग मायायाश्चरितं महत्।<br>दुःखितोऽहं भृशं तत्र पर्वते रुषिते गते॥ ४५ | नारदजी बोले— हे महाभाग! क्या कहूँ? मायाकी गति बड़ी विचित्र होती है। पर्वतमुनिके कुपित होकर चले जानेके पश्चात् मैं अत्यन्त दुःखित हो गया॥ ४५॥ |
| पुनः सेवापरात्यर्थं राजपुत्री ममाभवत्।<br>गतेऽथ पर्वते कामं स्थितस्तत्रैव सद्मनि॥ ४६ | पर्वतमुनिके चले जानेपर मैं उसी भवनमें ठहरा रहा और वह राजकुमारी मेरी सेवामें पुनः तत्पर हो गयी॥ ४६॥ |
| अहं दुःखान्वितो दीनस्तथा वानरवन्मुखः।<br>विशेषेण तु चित्तार्तः किं मे स्यादिति चिन्तयन्॥ ४७ | वानरके समान मुख हो जानेके कारण मैं दुःखी तथा उदास रहने लगा। अब मेरा क्या होगा? ऐसा सोच-सोचकर मैं विशेष चिन्तासे व्याकुल हो गया था॥ ४७॥ |
| सञ्जयोऽथ सुतां दृष्ट्वा किञ्चित्प्रकटयौवनाम्।<br>विवाहार्थे राजसुतामपृच्छत्सचिवं तदा॥ ४८ | अपनी पुत्री राजकुमारी दमयन्तीको कुछ-कुछ प्रकट यौवनवाली देखकर उसके विवाहके सम्बन्धमें राजा संजयने मन्त्रीसे पूछा— |
| विवाहकालः सम्प्राप्तः सुताया मम साम्प्रतम्।<br>योग्यं वरं मम ब्रूहि राजपुत्रं सुसम्मतम्॥ ४९<br>रूपौदार्यगुणैर्युक्तं शूरं सुकुलसम्भवम्। | अब मेरी पुत्रीका विवाह-योग्य समय हो गया है। अतएव योग्य वरके रूपमें कोई ऐसा राजकुमार आप मुझे बतलाइये, जो रूप-उदारता-गुण आदिसे सम्पन्न, |
| ८५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ |
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| विवाहं विधिवत्पुत्र्याः करोमि किल साम्प्रतम्॥ ५० | पराक्रमी, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा सभीके लिये श्रेष्ठ हो। उसके साथ मैं अपनी पुत्रीका विधिवत् विवाह अभी कर दूँगा॥ ४८—५०॥ |
| प्रधानस्त्वब्रवीद्राजन् राजपुत्रा ह्यनेकशः।<br>वर्तन्ते भुवि पुत्र्यास्ते योग्याः सर्वगुणान्विताः॥ ५१ | इसपर प्रधान सचिवने कहा—हे राजन्! आपकी कन्याके अनुरूप बहुतसे योग्य तथा सर्वगुणसम्पन्न राजकुमार इस पृथ्वीपर विद्यमान हैं॥ ५१॥ |
| यस्मिन् रुचिस्ते राजेन्द्र समाहूय नृपात्मजम्।<br>देहि कन्यां धनं भूरि हस्त्यश्वरथसंयुतम्॥ ५२ | हे राजेन्द्र! जिसमें आपकी रुचि हो, उस राजपुत्रको बुलाकर बहुत-से हाथी, घोड़े, रथ और धनसहित अपनी कन्या उसे प्रदान कर दीजिये॥ ५२॥ |
| नारद उवाच<br>पितुश्चिकीर्षितं ज्ञात्वा दमयन्ती तदा नृपम्।<br>धात्र्या मुखेन वाक्यज्ञा तमुवाच रहः स्थितम्॥ ५३ | नारदजी बोले—बातचीतमें परम कुशल दमयन्तीने पिताका अभिप्राय समझकर अपनी धायके मुखसे एकान्तमें स्थित राजासे कहलाया॥ ५३॥ |
| धात्र्युवाच<br>दमयन्ती महाराज पुत्री ते मामथाब्रवीत्।<br>पितरं ब्रूहि धात्रेयि वचनान्मे सुखान्वितम्॥ ५४ | धात्रीने कहा—हे महाराज! आपकी पुत्री दमयन्तीने मुझसे ऐसा कहा है—हे धात्रेयि! तुम मेरे वचनसे मेरे पिताजीसे यह सुखकर बात कह दो— |
| मया वृतोऽथ मेधावी नारदो महतीयुतः।<br>नादमोहितया कामं नान्यः कोऽपि प्रियो मम॥ ५५ | नादसे मोहित मैं महती वीणा धारण करनेवाले प्रतिभासम्पन्न नारदका वरण कर चुकी हूँ; अन्य कोई भी मुझे प्रिय नहीं है॥ ५४-५५॥ |
| कुरु मे वाञ्छितं तात विवाहं मुनिना सह।<br>नान्यं वरिष्ये धर्मज्ञ नारदं तु पतिं विना॥ ५६ | हे तात! आप मेरी इच्छाके अनुरूप मुनिके साथ मेरा विवाह कर दीजिये। हे धर्मज्ञ! मैं नारदको छोड़कर किसी दूसरेको अपना पति नहीं बनाऊँगी॥ ५६॥ |
| मग्नाहं नादसिन्धौ वै नक्रहीने रसात्मके।<br>अक्षारे सुखसम्पूर्णे तिमिङ्गिलविवर्जिते॥ ५७ | अब मैं घड़ियाल तथा भयंकर मत्स्य आदि जन्तुओंसे शून्य, खारेपनसे रहित, सुखसे परिपूर्ण एवं रसमय नादसिन्धुमें निमग्न हो गयी हूँ॥ ५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे दमयन्तीविवाहप्रस्ताववर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥
अथ सप्तविंशोऽध्यायः
वानरमुख नारदसे दमयन्तीका विवाह, नारद तथा पर्वतका परस्पर शापमोचन
| नारद उवाच<br>तत्पुत्र्या वचनं श्रुत्वा राजा धात्रीमुखात्ततः।<br>भार्यां प्रोवाच कैकेयीं समीपस्थां सुलोचनाम्॥ १ | नारदजी बोले—धात्रीके मुखसे अपनी कन्याका वह वचन सुनकर राजा संजय पास ही बैठी सुन्दर नेत्रोंवाली अपनी भार्या कैकेयीसे कहने लगे—॥ १॥ |
| राजोवाच<br>यदुक्तं वचनं कान्ते धात्र्या तत्तु त्वया श्रुतम्।<br>वृतोऽयं नारदः कामं मुनिर्वानरवक्त्रभाक्॥ २ | राजा बोले—हे प्रिये! धात्रीने जो बात कही है, वह तो तुमने सुन ही ली। बन्दरके समान मुखवाले नारदमुनिका उसने वरण कर लिया है॥ २॥ |
| किमिदं चिन्तितं पुत्र्या बुद्धिहीनं विचेष्टितम्।<br>कथमस्मै मया देया कन्या हरिमुखाय सा॥ ३ | पुत्रीने यह कैसा मूर्खतापूर्ण कार्य सोच लिया। इस वानरमुख मुनिको मैं अपनी कन्या कैसे दे दूँ?॥ ३॥ |
| अ० २७ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| क्वासौ भिक्षुः कुरूपः क्व दमयन्ती ममात्मजा।<br>विपरीतमिदं कार्यं न विधेयं कदाचन॥ ४ | कहाँ भिक्षाटन करनेवाला यह कुरूप भिक्षुक और कहाँ मेरी पुत्री दमयन्ती! ऐसा विपरीत सम्बन्ध कभी नहीं करना चाहिये॥ ४॥ |
| तामेकान्ते सुकेशान्ते निवारय हठात्सुताम्।<br>युक्त्या मुनिरतां मुग्धां शास्त्रवृद्धानुसारया॥ ५ | हे सुन्दर केशोंवाली! तुम मुनिपर आसक्त अपनी उस भोली पुत्रीको एकान्तमें शास्त्रों तथा वृद्ध पुरुषोंके मर्यादित वचन बतलाकर युक्तिपूर्वक इस हठसे मुक्त करो॥ ५॥ |
| इति भर्तृवचः श्रुत्वा जननी तामथाब्रवीत्।<br>क्व ते रूपं मुनिः क्वासौ वानरास्योऽधनः पुनः॥ ६ | पतिकी बात सुनकर माताने उस कन्यासे कहा—कहाँ तुम्हारा ऐसा रूप और कहाँ वह धनहीन वानरमुख मुनि!॥ ६॥ |
| कथं मोहमवाप्तासि भिक्षुके चतुरा पुनः।<br>लताकोमलदेहा त्वं भस्मरूक्षतनुस्त्वयम्॥ ७ | तुम लताके समान कोमल देहवाली हो और यह मुनि भस्म लगानेके कारण कठोर देहवाला है; तुम बुद्धिमान् होकर भी उस भिक्षुकपर मोहित क्यों हो गयी हो?॥ ७॥ |
| वार्ता वानरवक्त्रेण कथं युक्ता तवानघे।<br>का प्रीतिः कुत्सिते पुंसि भविष्यति शुचिस्मिते॥ ८ | हे अनघे! वानरके समान मुखवाले इस मुनिके साथ तुम्हारा वार्तालाप कैसे उचित होगा? हे पवित्र मुसकानवाली! इस निन्दित पुरुषपर तुम्हारी कौन-सी प्रीति हो सकेगी?॥ ८॥ |
| वरस्ते राजपुत्रोऽस्तु मा कुरु त्वं वृथा हठम्।<br>पिता ते दुःखमाप्नोति श्रुत्वा धात्रीमुखाद्वचः॥ ९ | तुम्हारा वर तो कोई राजकुमार होना चाहिये, तुम व्यर्थ हठ मत करो। धात्रीके मुखसे ऐसी बात सुनकर तुम्हारे पिताजीको बहुत दुःख हुआ है॥ ९॥ |
| लग्नां बब्बूलवृक्षेण कोमलां मालतीलताम्।<br>दृष्ट्वा कस्य मनः खेदं चतुरस्य न गच्छति॥ १०<br><br>दासेरकाय ताम्बूलीदलानि कोमलानि कः।<br>ददाति भक्षणार्थाय मूर्खोऽपि धरणीतले॥ ११ | बबूलके वृक्षसे लिपटी हुई कोमल मालती लताको देखकर किस बुद्धिमान् व्यक्तिका मन दुःखित नहीं होगा? इस पृथ्वीतलपर ऐसा कौन मूर्ख होगा जो खानेके लिये ऊँटको कोमल पानके पत्ते देगा?॥ १०-११॥ |
| वीक्ष्य त्वां करसंलग्नां नारदस्य समीपतः।<br>विवाहे वर्तमाने तु कस्य चेतो न दह्यति॥ १२ | विवाह होते समय नारदके पास बैठकर तुम्हें उसका हाथ पकड़े हुए देखकर किसका हृदय नहीं जल उठेगा?॥ १२॥ |
| कुमुखेन समं वार्ता न रुचिं जनयत्यतः।<br>आमृतेस्तु कथं कालः क्षपितव्यस्त्वयामुना॥ १३ | इस कुत्सित मुखवालेके साथ बात करनेमें कोई रुचि भी तो नहीं उत्पन्न होगी; फिर इसके साथ तुम मृत्युपर्यन्त अपना समय कैसे व्यतीत करोगी?॥ १३॥ |
| नारद उवाच<br>इति मातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती भृशातुरा।<br>मातरं प्राह तन्वङ्गी मयि सा कृतनिश्चया॥ १४<br><br>किं मुखेन च रूपेण मूर्खस्य च धनेन किम्।<br>किं राज्येनाविदग्धस्य रसमार्गाविदोऽस्य च॥ १५ | **नारदजी बोले—**माताकी यह बात सुनकर मेरे प्रति दृढ़ निश्चयवाली उस कोमलांगी दमयन्तीने अत्यन्त व्याकुलतापूर्वक अपनी मातासे कहा—रसमार्गसे अनभिज्ञ तथा कलाज्ञानसे रहित मूर्ख राजकुमारके सुन्दर मुख, रूप, धन तथा राज्यसे मेरा क्या प्रयोजन?॥ १४-१५॥ |
| ८५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हरिण्योऽपि वने धन्या या नादेन विमोहिताः।<br>मातः प्राणान्प्रयच्छन्ति धिङ्मूर्खान्मानुषान्भुवि ॥ १६ | हे माता! वनमें रहनेवाली वे हरिणियाँ धन्य हैं जो नादसे मोहित होकर अपने प्राण भी दे देती हैं, किंतु इस भूलोकमें रहनेवाले उन मूर्ख मनुष्योंको धिक्कार है, जो मधुर स्वरसे प्रेम नहीं करते हैं! ॥ १६॥ |
| नारदो वेत्ति यां विद्यां मातः सप्तस्वरात्मिकाम्।<br>तृतीयः कोऽपि नो वेद शिवादन्यः पुमान्किल ॥ १७ | हे माता! नारदजी जिस सप्तस्वरमयी विद्याको जानते हैं, उसे भगवान् शंकरको छोड़कर तीसरा अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं जानता है॥ १७॥ |
| मूर्खेण सह संवासो मरणं तत्क्षणे क्षणे।<br>रूपवान्धनवांस्त्याज्यो गुणहीनो नरः सदा ॥ १८<br><br>धिङ्मैत्रीं मूर्खभूपाले वृथा गर्वसमन्विते।<br>गुणज्ञे भिक्षुके श्रेष्ठा वचनात्सुखदायिनी ॥ १९<br><br>स्वरज्ञो ग्रामवित्कामं मूर्च्छनाज्ञानभेदभाक्।<br>दुर्लभः पुरुषश्चाष्टरसज्ञो दुर्बलोऽपि वै ॥ २०<br><br>यथा नयति कैलासं गङ्गा चैव सरस्वती।<br>तथा नयति कैलासं स्वरज्ञानविशारदः ॥ २१<br><br>स्वरमानं तु यो वेद स देवो मानुषोऽपि सन्।<br>सप्तभेदं न यो वेद स पशुः सुरराडपि ॥ २२<br><br>मूर्च्छनातानमार्गं तु श्रुत्वा मोदं न याति यः।<br>स पशुः सर्वथा ज्ञेयो हरिणाः पशवो न हि ॥ २३ | मूर्खके साथ रहना प्रतिक्षण मृत्युके समान होता है। अतएव सुन्दर रूपसे सम्पन्न तथा सम्पत्तिशाली होते हुए भी गुणरहित पुरुषको सर्वदाके लिये त्याग देना चाहिये। व्यर्थ गर्व करनेवाले मूर्ख राजाकी मित्रताको धिक्कार है; वचनोंसे सुख प्रदान करनेवाली गुणवान् भिक्षुककी मित्रता श्रेष्ठ है। स्वरका ज्ञाता, ग्रामोंकी पूरी जानकारी रखनेवाला, मूर्च्छनाके भेदोंको सम्यक् प्रकारसे समझनेवाला तथा आठों रसोंको जाननेवाला दुर्बल पुरुष भी इस संसारमें दुर्लभ है। जिस प्रकार गंगा तथा सरस्वती नदियाँ कैलास ले जाती हैं, उसी प्रकार स्वरज्ञानमें अत्यन्त प्रवीण पुरुष शिवलोक पहुँचा देता है। जो व्यक्ति स्वरके प्रमाणको जानता है, वह मनुष्य होता हुआ भी देवता है, किंतु जो स्वरोंके सप्तभेदका ज्ञान नहीं रखता, वह पशुके समान होता है, चाहे इन्द्र ही क्यों न हो। मूर्च्छना तथा तानमार्गको सुनकर जो आह्लादित नहीं होता, उसे साक्षात् पशु समझना चाहिये, बल्कि [स्वरप्रेमी] हरिणोंको पशु नहीं समझना चाहिये ॥ १८–२३॥ |
| वरं विषधरः सर्पः श्रुत्वा नादं मनोहरम्।<br>अश्रोत्रोऽपि मुदं याति धिक्सकर्णांश्च मानवान् ॥ २४ | विषधर सर्प श्रेष्ठ है; क्योंकि वह कान न होनेपर भी मनोहर नाद सुनकर प्रफुल्लित हो जाता है, किंतु उन मनुष्योंको धिक्कार है, जो कर्णयुक्त रहनेपर भी नाद सुनकर आनन्दित नहीं होते ॥ २४॥ |
| बालोऽपि सुस्वरं गेयं श्रुत्वा मुदितमानसः।<br>जायते किन्तु ते वृद्धा न जानन्ति धिगस्तु तान् ॥ २५ | मधुर स्वरसे गाये गये गीतको सुनकर बालक भी प्रसन्नचित्त हो जाता है, किंतु जो वृद्ध गानके रहस्यको नहीं जानते, उन्हें धिक्कार है ॥ २५॥ |
| पिता मे किं न जानाति नारदस्य गुणान् बहून्।<br>द्वितीयः सामगो नास्ति त्रिषु लोकेषु तत्समः ॥ २६<br><br>तस्मादसौ मया नूनं वृतः पूर्वं समागमात्।<br>पश्चाच्छापवशाज्जातो वानरास्यो गुणाकरः ॥ २७ | क्या मेरे पिताजी नारदके बहुतसे गुणोंको नहीं जानते? तीनों लोकोंमें उनके समान साम-गान करनेवाला दूसरा कोई भी नहीं है। अतः नारदसे प्रेम हो जानेके कारण मैंने पहलेसे ही इनका वरण कर लिया है। गुणोंके निधान ये नारद शापवश बादमें वानरके समान मुखवाले हो गये ॥ २६-२७॥ |
| अ० २७ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| किन्नरा न प्रियाः कस्य भवन्ति तुरगाननाः।<br>गानविद्यासमायुक्ताः किं मुखेन वरेण ह॥ २८ | अश्वके समान मुखवाले किन्नर गानविद्यासे सम्पन्न होनेके कारण किसको प्रिय नहीं होते, किसीके सुन्दर मुखसे क्या प्रयोजन ? ॥ २८ ॥ |
| पितरं ब्रूहि मे मातर्वृतोऽयं मुनिसत्तमः।<br>तस्मात्त्वमाग्रहं त्यक्त्वा देहि तस्मै च मां मुदा॥ २९ | हे माता! आप मेरे पिताजीसे कह दें कि मैं मुनिश्रेष्ठ नारदका वरण कर चुकी हूँ; अतएव हठ छोड़कर आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे उन्हीं नारदको सौंप दें॥ २९॥ |
| नारद उवाच<br>इति पुत्र्या वचः श्रुत्वा राज्ञी राज्ञे न्यवेदयत्।<br>आग्रहं सुन्दरी ज्ञात्वा सुताया नारदे मुनौ॥ ३०<br>विवाहं कुरु राजेन्द्र दमयन्त्याः शुभे दिने।<br>मुनिना स च सर्वज्ञो वृतोऽसौ मनसानया॥ ३१ | नारदजी बोले—पुत्रीकी बात सुनकर तथा नारद-मुनिमें उसका अनुराग जानकर परम सुन्दरी रानीने राजासे कहा—हे राजेन्द्र! अब आप किसी शुभ दिनमें नारद-मुनिके साथ दमयन्तीका विवाह कर दीजिये; क्योंकि वह मन-ही-मन उन्हीं सर्वज्ञ मुनिका वरण कर चुकी है॥ ३०-३१॥ |
| नारद उवाच<br>इति सञ्चोदितो राज्ञा सञ्जयः पृथिवीपतिः।<br>चकार विधिवत्सर्वं विधिं वैवाहिकं ततः॥ ३२ | नारदजी बोले—इस प्रकार रानी कैकेयीके प्रेरित करनेपर राजा संजयने विधि-विधानसे समस्त वैवाहिक क्रिया सम्पन्न की॥ ३२॥ |
| एवं दारग्रहं कृत्वा वानरास्यः परन्तप।<br>स्थितस्तत्रैव मनसा दह्यमानेन चान्वहम्॥ ३३ | हे परन्तप! इस तरह विवाह हो जानेके पश्चात् वानरके समान मुखवाला मैं अत्यन्त दुःखी मनसे वहीं रहने लगा॥ ३३॥ |
| यदागच्छद्राजसुता सेवार्थं मम सन्निधौ।<br>अभवं दुःखसन्तप्तस्तदाहं वानराननः॥ ३४ | जब राजकुमारी दमयन्ती सेवाके लिये मेरे पास आती थी तब वानरसद्दश मुखवाला मैं दुःखसे पीड़ित हो उठता था॥ ३४॥ |
| दमयन्ती तु मां वीक्ष्य प्रफुल्लवदनाम्बुजा।<br>शोकं वानरवक्त्रत्वान्न चकार कदाचन॥ ३५ | किंतु खिले हुए कमलके समान मुखवाली दमयन्ती मुझे देखकर मेरी वानर मुखाकृतिके लिये कभी भी शोक नहीं करती थी॥ ३५॥ |
| एवं गच्छति काले तु सहसा पर्वतो मुनिः।<br>कुर्वंस्तीर्थान्यनेकानि द्रष्टुं मां समुपागतः॥ ३६ | इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए पर्वतमुनि मुझसे मिलनेके लिये अकस्मात् मेरे पास आये॥ ३६॥ |
| मयातिमानितः प्रेम्णा पूजितश्च यथाविधि।<br>आसीन आसने दिव्ये वीक्ष्य मां दुःखितो ह्यभूत्॥ ३७ | मैंने प्रेमपूर्वक उनका पर्याप्त सम्मान किया तथा विधिवत् पूजा की। दिव्य आसनपर विराजमान मुनि पर्वत मुझे देखकर अत्यन्त दुःखित हो उठे॥ ३७॥ |
| कृतदारं वानरास्यं दीनं चिन्तातुरं भृशम्।<br>दयावान्मामुवाचेदं पर्वतो मातुलं कृशम्॥ ३८ | वानरमुख होनेके कारण विवाह करके अत्यन्त दयनीय, दुर्बल तथा चिन्तायुक्त दशाको प्राप्त मुझ अपने मामासे पर्वतमुनिने यह वचन कहा॥ ३८॥ |
| मया नारद कोपात्त्वं शप्तोऽसि मुनिसत्तम।<br>निष्कृतिं तस्य शापस्य करोम्यद्य निशामय॥ ३९ | हे मुनिश्रेष्ठ नारद! क्रोधमें आकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया था, किंतु मैं आज उस शापका निवारण करता हूँ, सुनो॥ ३९॥ |
| ८६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भव त्वं चारुवदनो मम पुण्येन नारद।<br>दृष्ट्वा राजसुतां चित्ते कृपा जाता ममाधुना ॥ ४० | हे नारद! अब तुम मेरे पुण्यके प्रभावसे सुन्दर मुखवाले हो जाओ; क्योंकि इस समय राजकुमारीको देखकर मेरे मनमें करुणाभाव उत्पन्न हो गया है ॥ ४० ॥ |
| नारद उवाच<br>मयापि प्रवणं चित्तं कृत्वा श्रुत्वास्य भाषितम्।<br>अनुग्रहः कृतः सद्यस्तस्य शापस्य तत्क्षणात् ॥ ४१<br>भागिनेय तवाप्यस्तु गमनं सुरसद्मनि।<br>शापस्यानुग्रहः कामं कृतोऽयं पर्वताधुना ॥ ४२ | नारदजी बोले—उनकी बात सुनकर मैंने भी अपने मनको विनययुक्त करके उसी क्षण [अपने द्वारा उन्हें प्रदत्त] शापका मार्जन कर दिया। [मैंने कहा—] हे भागिनेय पर्वत! मैं तुम्हें मुक्त कर दे रहा हूँ। अब देवलोकमें तुम्हारा भी गमन हो; यह मैंने शापका विमोचन कर दिया ॥ ४१-४२ ॥ |
| नारद उवाच<br>जातोऽहं चारुवदनो वचनात्तस्य पश्यतः।<br>राजपुत्री तु सन्तुष्टा मातरं प्राह सत्वरम् ॥ ४३<br>मातस्ते सुमुखो जातो जामाता च महाद्युतिः।<br>वचनात्पर्वतस्याद्य मुक्तशापो मुनेर्भूत् ॥ ४४ | नारदजी बोले—पर्वतमुनिके वचनानुसार उनके देखते-देखते मैं सुन्दर मुखवाला हो गया। इससे राजकुमारी बहुत प्रसन्न हो गयी और शीघ्र ही मातासे बोली—हे माता! तुम्हारे परम तेजस्वी जामाता नारद अब सुन्दर मुखवाले हो गये हैं। मुनि पर्वतके वचनसे अब वे शापसे मुक्त हो चुके हैं ॥ ४३-४४ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञ्या कथितं तत्तु राजनि।<br>ययौ द्रष्टुं मुनिं तत्र सञ्जयः प्रीतिमांस्तदा ॥ ४५ | दमयन्तीकी बात सुनकर रानीने उसे राजासे कहा। तब प्रीतियुक्त होकर राजा संजय मुनिको देखनेके लिये वहाँ गये ॥ ४५ ॥ |
| धनं समर्पितं राज्ञा सन्तुष्टेन तदा महत्।<br>मह्यं च भागिनेयाय पारिबर्हं महात्मना ॥ ४६ | तब सन्तुष्ट हुए महात्मा राजाने मुझे तथा भागिनेय पर्वतको बहुत सारा धन एवं उपहार-सामग्री प्रदान की ॥ ४६ ॥ |
| एतत्ते सर्वमाख्यातं वर्तनं यत्पुरातनम्।<br>मायाया बलमाहात्म्यं ह्यनुभूतं यथा मया ॥ ४७ | जैसा मैंने मायाके बलकी महिमाका अनुभव किया है और जो पुरातन वृत्तान्त है, वह सब मैंने आपको बता दिया ॥ ४७ ॥ |
| संसारेऽस्मिन्महाभाग मायागुणकृतेऽनृते।<br>तनुभृत्तु सुखी नास्ति न भूतो न भविष्यति ॥ ४८ | हे महाभाग! मायाके गुणोंसे विरचित इस मिथ्या जगत्में कोई भी जीव न सुखी रहा है, न सुखी है और न तो सुखी रहेगा ॥ ४८ ॥ |
| कामक्रोधौ तथा लोभो मत्सरो ममता तथा।<br>अहङ्कारो मदः केन जिताः सर्वे महाबलाः ॥ ४९ | काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, ममता, अहंकार और मद—इन महाशक्तिशाली विषयोंको कौन जीत सका है ? ॥ ४९ ॥ |
| सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्रय इमे किल।<br>कारणं प्राणिनां देहसम्भवे सर्वथा मुने ॥ ५० | हे मुने! सत्त्व, रज तथा तम—ये तीनों गुण ही प्राणियोंकी देहोत्पत्तिमें सर्वथा कारण होते हैं ॥ ५० ॥ |
| कस्मिंश्चित्समये व्यास वनेऽहं विष्णुना सह।<br>गच्छन्हास्यविनोदेन स्त्रीभावं गमितः क्षणात् ॥ ५१ | हे व्यासजी! किसी समय भगवान् विष्णुके साथ वनमें जाता हुआ मैं परस्पर हास-परिहासमें सहसा स्त्रीभावको प्राप्त हो गया ॥ ५१ ॥ |
| राजपत्नीत्वमापन्नो मायाबलविमोहितः।<br>पुत्राः प्रसूता बहवो गेहे तस्य नृपस्य ह ॥ ५२ | मायाके प्रभावसे विमोहित होकर मैं राजाकी पत्नी बन गया और उस राजाके भवनमें रहकर मैंने अनेक पुत्र उत्पन्न किये ॥ ५२ ॥ |