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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० १३] चतुर्थ स्कन्ध ४६३
पृष्ठ 472स्थायी लिंक
अ० १३] चतुर्थ स्कन्ध ४६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शर्वो ब्रह्मा हरिश्चेति इन्द्राद्या ये सुरास्तथा ॥ २७<br><br>मुनयश्च विनिर्मायैः स्वायुषो विचरन्ति हि।<br>निशावसाने सञ्जाते जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २८<br><br>म्रियते नात्र सन्देहो नृप किञ्चित्कदापि च।<br>स्वायुषोऽन्ते पद्माद्याः क्षयमृच्छन्ति पार्थिव ॥ २९<br><br>प्रभवन्ति पुनर्विष्णुहरशक्रादयः सुराः। | ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र आदि जो देवता तथा मुनिगण हैं—वे भी अपनी आयुके परिमाणकालतक ही जीवित रहते हैं। हे राजन्! अन्तकाल आनेपर स्थावर-जंगमात्मक यह जगत् भी विनष्ट हो जाता है, इसमें कभी भी कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिये। हे भूपाल! अपनी आयुका अन्त हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र आदि देवता भी विनष्ट हो जाते हैं और [सृष्टिकाल आनेपर] पुनः ये उत्पन्न भी हो जाते हैं॥ २७—२९ १/२॥ |
| तस्मात्कामादिकान्भावान्देहवान्प्रतिपद्यते ॥ ३०<br><br>नात्र ते विस्मयः कार्यः कदाचिदपि पार्थिव।<br>संसारोऽयं तु सन्दिग्धः कामक्रोधादिभिर्नृप ॥ ३१<br><br>दुर्लभस्तद्विनिर्मुक्तः पुरुषः परमार्थवित्। | अतएव देहधारी प्राणी काम आदि भावोंसे ग्रस्त हो ही जाता है; हे राजन्! इस विषयमें आपको कभी भी विस्मय नहीं करना चाहिये। हे राजन्! यह संसार तो काम, क्रोध आदिसे ओतप्रोत है। इनसे पूर्णतः मुक्त तथा परम तत्त्वको जाननेवाला पुरुष दुर्लभ है॥ ३०—३१ १/२॥ |
| यो बिभेतीह संसारे स दारान्न करोत्यपि ॥ ३२<br><br>विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो विचरत्यविशङ्कितः।<br>तस्माद् बृहस्पतेर्भार्या शशिना लम्भिता पुनः ॥ ३३<br><br>गुरुणा लम्भिता भार्या तथा भ्रातुर्यवीयसः।<br>एवं संसारचक्रेऽस्मिन् रागलोभादिभिर्वृतः ॥ ३४<br><br>गार्हस्थ्यञ्च समास्थाय कथं मुक्तो भवेन्नरः। | जो इस संसारमें [काम, क्रोध आदि विकारोंसे] डरता है, वह विवाह नहीं करता। वह समस्त प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त होकर निर्भीकतापूर्वक विचरता है। इसके विपरीत संसारसे आबद्ध रहनेके कारण ही बृहस्पतिकी पत्नीको चन्द्रमाने रख लिया था और देवगुरु बृहस्पतिने अपने छोटे भाईकी पत्नीको अपना लिया था। इस प्रकार इस संसार-चक्रमें राग, लोभ आदिसे जकड़ा हुआ मनुष्य गृहस्थीमें आसक्त रहकर भला मुक्त कैसे हो सकता है?॥ ३२—३४ १/२॥ |
| तस्मात्सर्वप्रयत्नेन हित्वा संसारसारताम् ॥ ३५<br><br>आराधयेन्महेशानीं सच्चिदानन्दरूपिणीम्।<br>तन्मायागुणतश्छन्नं जगदेतच्चराचरम् ॥ ३६<br><br>भ्रमत्युन्मत्तवत्सर्वं मदिरामत्तवन्नृप। | अतः पूर्ण प्रयत्नके साथ संसारमें आसक्तिका त्याग करके सच्चिदानन्दस्वरूपिणी भगवती महेश्वरीकी आराधना करनी चाहिये। हे राजन्! यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उन्हींके मायारूपी गुणसे आच्छादित होकर उन्मत्त तथा मदिरापान करके मतवाले मनुष्यकी भाँति चक्कर काटता रहता है॥ ३५—३६ १/२॥ |
| तस्या आराधनैनैव गुणान्सर्वान्विमृद्य च ॥ ३७<br><br>मुक्तिं भजेत मतिमान्नान्यः पन्थास्त्वितः परः।<br>आराधिता महेशानी न यावत्कुरुते कृपाम् ॥ ३८<br><br>तावद्द्रवेत्सुखं कस्मात्कोऽन्योऽस्ति दयया युतः।<br>करुणासागरामेतां भजेत्तस्मादमायया ॥ ३९<br><br>यस्यास्तु भजनेनैव जीवन्मुक्तत्वमश्नुते। | उन्हींकी आराधनाके द्वारा [सत्त्व आदि] सभी गुणोंको पराभूत करके बुद्धिमान् मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकता है, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है। आराधित होकर महेश्वरी जबतक कृपा नहीं करतीं, तबतक सुख कैसे हो सकता है? उनके सदृश दयावान् दूसरा कौन है? अतः निष्कपट भावसे करुणासागर भगवतीकी आराधना करनी चाहिये, जिनके भजनसे मनुष्य जीते-जी मुक्ति प्राप्त कर सकता है॥ ३७—३९ १/२॥ |
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| ४६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य सेविता न महेश्वरी ॥ ४०<br><br>निःश्रेणिकाग्रात्पतिता अध इत्येव विद्महे ।<br>अहङ्कारावृतं विश्वं गुणत्रयसमन्वितम् ॥ ४१<br><br>असत्येनापि सम्बद्धं मुच्यते कथमन्यथा ।<br>हित्वा सर्वं ततः सर्वैः संसेव्या भुवनेश्वरी ॥ ४२ | दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर जिसने उन महेश्वरीकी उपासना नहीं की, वह मानो अन्तिम सीढ़ीसे फिसलकर गिर गया—मैं तो यही धारणा रखता हूँ। सम्पूर्ण विश्व अहंकारसे आच्छादित है, तीनों गुणोंसे युक्त है तथा असत्यसे बँधा हुआ है, तब प्राणी मुक्त कैसे हो सकता है? अतः सब कुछ छोड़कर सभी लोगोंको भगवती भुवनेश्वरीकी उपासना करनी चाहिये॥ ४०—४२॥ |
| राजोवाच<br>किं कृतं गुरुणा तत्र काव्यरूपधरेण च ।<br>कदा शुक्रः समायातस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ४३ | राजा बोले—हे पितामह! शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिने वहाँ दैत्योंके पास पहुँचकर क्या किया और शुक्राचार्य पुनः कब लौटे? वह हमें बताइये॥ ४३॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यत्कृतं गुरुणा तदा ।<br>कृत्वा काव्यस्वरूपञ्च प्रच्छन्नेन महात्मना ॥ ४४ | व्यासजी बोले—हे राजन्! तब गोपनीय ढंगसे शुक्राचार्यका स्वरूप बनाकर देवगुरुने जो कुछ किया, वह मैं बताता हूँ, आप सुनिये॥ ४४॥ |
| गुरुणा बोधिता दैत्या मत्वा काव्यं स्वकं गुरुम् ।<br>विश्वासं परमं कृत्वा बभूवुस्तन्मयास्तदा ॥ ४५ | देवगुरु बृहस्पतिने दैत्योंको बोध प्रदान किया। तब शुक्राचार्यको अपना गुरु समझकर और उनपर पूर्ण विश्वास करके सभी दैत्य उन्हींके कथनानुसार व्यवहार करने लगे॥ ४५॥ |
| विद्यार्थं शरणं प्राप्ता भृगुं मत्वातिमौहिताः ।<br>गुरुणा विप्रलब्धास्ते लोभात्को वा न मुह्यति ॥ ४६ | अत्यधिक मोहितचित्त वे दैत्य बृहस्पतिको शुक्राचार्य समझकर विद्याप्राप्तिके लिये उनके शरणागत हुए। देवगुरु बृहस्पतिने भी उन्हें बहुत ठगा। [यह सत्य है कि] लोभसे कौन-सा प्राणी मोहमें नहीं पड़ जाता॥ ४६॥ |
| दशवर्षात्मके काले सम्पूर्णसमये तदा ।<br>जयन्त्या सह क्रीडित्वा काव्यो याज्यानचिन्तयत् ॥ ४७<br><br>आशया मम मार्गं ते पश्यन्तः संस्थिताः किल ।<br>गत्वा तान्वै प्रपश्येऽहं याज्यानतिभयातुरान् ॥ ४८<br><br>मा देवेभ्यो भयं तेषां मद्भक्तानां भवेदिति ।<br>सञ्चिन्त्य बुद्धिमास्थाय जयन्तीं प्रत्युवाच ह ॥ ४९<br><br>देवानेवोपसंयान्ति पुत्रा मे चारुलोचने ।<br>समयस्तेऽद्य सम्पूर्णो जातोऽयं दशवार्षिकः ॥ ५०<br><br>तस्माद् गच्छाम्यहं देवि द्रष्टुं याज्यान्सुमध्यमे ।<br>पुनरेवागमिष्यामि तवान्तिकमनुद्रुतः ॥ ५१ | तब जयन्तीके साथ क्रीडा करते-करते निर्धारित प्रतिज्ञासम्बन्धी दस वर्षकी अवधि पूर्ण हो जानेपर शुक्राचार्य अपने यजमानोंके विषयमें विचार करने लगे कि मेरी राह देखते हुए वे आशान्वित हो बैठे होंगे। अतः अब मैं चलकर अपने उन अत्यन्त भयभीत यजमानोंको देखूँ। कहीं ऐसा न हो कि मेरे उन भक्तोंके सम्मुख देवताओंसे कोई भय उत्पन्न हो गया हो॥ ४७-४८ ½॥<br><br>यह सोचकर अपनी बुद्धि स्थिर करके उन्होंने जयन्तीसे कहा—हे सुनयने! मेरे पुत्रसदृश दैत्यगण देवताओंके पास कालक्षेप कर रहे हैं। प्रतिज्ञानुसार तुम्हारे साथ रहनेका दस वर्षका समय पूरा हो चुका है, अतः हे देवि! अब मैं अपने यजमानोंसे मिलने जा रहा हूँ। हे सुमध्यमे! मैं पुनः तुम्हारे पास शीघ्र ही लौट आऊँगा॥ ४९—५१॥ |