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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
६३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०
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६३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अन्तर्हितायां च तदा भवान्यां<br>चक्रुश्च किं देवपुरोगमास्ते।<br>देव्याश्चरित्रं परमं पवित्रं<br>दुरापमेवाल्पपुण्यैर्नराणाम् ॥ २ | सुनते हुए भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। [अब आप बतायें] भगवतीके अन्तर्धान हो जानेपर उन प्रधान देवताओंने क्या किया? देवीका यह परम पावन चरित्र मनुष्योंके अल्प पुण्योंसे प्राप्त हो सकना सर्वथा दुर्लभ ही है॥ १-२॥ |
| कस्तृप्तिमाप्नोति कथामृतेन<br>भिन्नोऽल्पभाग्यात्पटुकर्णरन्ध्रः।<br>पीतेन येनामरतां प्रयाति<br>धिक्तान्नरान् ये न पिबन्ति सादरम्॥ ३ | अल्पभाग्यवाले मनुष्यको छोड़कर भगवतीके कथाश्रवणमें सदा तत्पर कर्णपुटवाला ऐसा कौन होगा जो देवीके कथामृतसे तृप्ति प्राप्त कर लेता है? जिस कथामृतका पान करनेसे मनुष्य अमरत्व प्राप्त कर लेता है, उसे जो आदरपूर्वक नहीं पीते, उन मनुष्योंको धिक्कार है॥ ३॥ |
| लीलाचरित्रं जगदम्बिकाया<br>रक्षान्वितं देवमहामुनीनाम्।<br>संसारवार्धेस्तरणं नराणां<br>कथं कृतज्ञा हि परित्यजेयुः॥ ४ | भगवती जगदम्बाका लीलाचरित्र देवताओं और बड़े-बड़े मुनियोंके लिये भी रक्षाका परम साधन है। [यह लीलाचरित्र] मनुष्योंको संसारसागरसे पार करनेके लिये एक नौका है। कृतज्ञजन उस चरित्रको भला कैसे त्याग सकते हैं?॥ ४॥ |
| मुक्ताश्च ये चैव मुमुक्षवश्च<br>संसारिणो रोगयुताश्च केचित्।<br>तेषां सदा श्रोत्रपुटैश्च पेयं<br>सर्वार्थदं वेदविदो वदन्ति॥ ५<br><br>तथा विशेषेण मुने नृपाणां<br>धर्मार्थकामेषु सदा रतानाम्।<br>मुक्ताश्च यस्मात्खलु तत्पिबन्ति<br>कथं न पेयं रहितैश्च तेभ्यः॥ ६ | जीवन्मुक्त तथा मोक्षकी कामना करनेवाले अथवा रोगग्रस्त जो कोई भी सांसारिक प्राणी हों, उन सबको चाहिये कि वे अपने कर्णपुटसे भगवतीके इस सर्वार्थदायक कथामृतका पान करते रहें—ऐसा वेदवेत्ता कहते हैं। हे मुने! धर्म, अर्थ और काममें तत्पर राजाओंको तो विशेष रूपसे कथामृतका पान करना चाहिये। जब मुक्त प्राणीतक उस कथामृतका पान करते हैं, तब मुक्तिसे वंचित जन इसका पान क्यों न करें!॥ ५-६॥ |
| यैः पूजिता पूर्वभवे भवानी<br>सत्कुन्दपुष्पैरथ चम्पकैश्च।<br>बैल्वैर्दलैस्ते भुवि भोगयुक्ता<br>नृपा भवन्तीत्यनुमेयमेवम्॥ ७ | यह अनुमान करना चाहिये कि जिन लोगोंने अपने पूर्वजन्ममें सुन्दर कुन्दपुष्पों, चम्पाके पुष्पों तथा बिल्वपत्रोंसे भगवतीका पूजन किया है, वे ही इस जन्ममें भूतलपर भोग तथा ऐश्वर्यसे सम्पन्न राजा होते हैं॥ ७॥ |
| ये भक्तिहीनाः समवाप्य देहं<br>तं मानुषं भारतभूमिभागे।<br>यैरार्चिता ते धनधान्यहीना<br>रोगान्विताः सन्ततिवर्जिताश्च॥ ८ | जो मनुष्य [पवित्र] भारत-भूभागमें यह मानवशरीर पाकर भी भगवतीकी भक्तिसे रहित हैं तथा जिन्होंने उनकी आराधना नहीं की, वे सदा धन-धान्यसे हीन, रोगग्रस्त और निःसन्तान रहते हैं; साध् |
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| अ० २० ] | पञ्चम स्कन्ध | ६३७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भ्रमन्ति नित्यं किल दासभूता<br>आज्ञाकराः केवलभारवाहाः।<br>दिवानिशं स्वार्थपराः कदापि<br>नैवाप्नुवन्त्योदरपूर्तिमात्रम् ॥ ९ | ही वे लोग दूसरोंके दास बनकर निरन्तर घूमते रहते हैं और आज्ञाकारी होकर दूसरोंका भार ढोया करते हैं। वे दिन-रात स्वार्थसाधनमें लगे रहते हैं, फिर भी उन्हें अपना पेट भरनेतकके लिये अन्न कभी नहीं मिलता॥ ८-९॥ |
| अन्धाश्च मूका बधिराश्च खञ्जाः<br>कुष्ठान्विता ये भुवि दुःखभाजः।<br>तत्रानुमानं कविभिर्विधेयं<br>नाराधिता तैः सततं भवानी॥ १० | इस संसारमें जो लोग अन्धे, गूँगे, बहरे, लूले और कोढ़ीके रूपमें कष्ट भोग रहे हैं, उनके विषयमें विद्वानोंको यह अनुमान कर लेना चाहिये कि उन्होंने भगवतीकी निरन्तर आराधना नहीं की है॥ १०॥ |
| ये राजभोगान्वितऋद्धिपूर्णाः<br>संसेव्यमाना बहुभिर्मनुष्यैः।<br>दृश्यन्ति ये वा विभवैः समेता-<br>स्तैः पूजिताम्बेत्यनुमेयमेव॥ ११ | जो लोग राजोचित भोगसे युक्त, ऐश्वर्यसे सम्पन्न, अनेक मनुष्योंसे सेवित और वैभवशाली दिखायी पड़ते हैं, उनके विषयमें यह अनुमान लगाना चाहिये कि उन्होंने अवश्य ही जगदम्बाकी उपासना की है॥ ११॥ |
| तस्मात्सत्यवतीसूनो देव्याश्चरितमुत्तमम्।<br>कथयस्व कृपां कृत्वा दयावानसि साम्प्रतम्॥ १२ | अतएव हे सत्यवतीनन्दन! अब आप कृपा करके भगवतीके उत्तम चरित्रका वर्णन कीजिये; आप बड़े दयालु हैं॥ १२॥ |
| हत्वा तं महिषं पापं स्तुता सम्पूजिता सुरैः।<br>क्व गता सा महालक्ष्मीः सर्वतेजःसमुद्भवा॥ १३ | उस पापी महिषासुरका वध करनेके पश्चात् देवताओंसे भलीभाँति पूजित होकर सभी देवताओंके तेजसे प्रादुर्भूत वे भगवती महालक्ष्मी कहाँ चली गयीं?॥ १३॥ |
| कथितं ते महाभाग गतान्तर्धानमाशु सा।<br>स्वर्गे वा मृत्युलोके वा संस्थिता भुवनेश्वरी॥ १४<br><br>लयं गता वा तत्रैव वैकुण्ठे वा समाश्रिता।<br>अथवा हेमशैले सा तत्त्वतो मे वदाधुना॥ १५ | हे महाभाग! आपने अभी कहा है कि वे तुरंत अन्तर्धान हो गयीं। स्वर्गलोक अथवा मृत्युलोक किस जगह वे भगवती भुवनेश्वरी प्रतिष्ठित हुईं? वे वहींपर विलीन हो गयीं या वैकुण्ठधाममें विराजने लगीं अथवा वे सुमेरुपर्वतपर विराजमान हुईं, अब आप मुझे यह सब यथार्थरूपमें बतायें॥ १४-१५॥ |
| व्यास उवाच<br>पूर्वं मया ते कथितं मणिद्वीपं मनोहरम्।<br>क्रीडास्थानं सदा देव्या वल्लभं परमं स्मृतम्॥ १६<br><br>यत्र ब्रह्मा हरिः स्थाणुः स्त्रीभावं ते प्रपेदिरे।<br>पुरुषत्वं पुनः प्राप्य स्वानि कार्याणि चक्रिरे॥ १७<br><br>यः सुधासिन्धुमध्येऽस्ति द्वीपः परमशोभनः।<br>नानारूपैः सदा तत्र विहारं कुरुतेऽम्बिका॥ १८ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इसके पहले मैं आपसे रमणीय मणिद्वीपका वर्णन कर चुका हूँ। वह भगवतीका क्रीडास्थल है तथा उनके लिये सदा परम प्रिय बतलाया गया है। जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्त्रीरूपमें परिणत हो गये थे और पुनः पुरुषत्व पाकर वे अपने-अपने कार्योंमें संलग्न हो गये। वह परम सुन्दर द्वीप सुधासागरके मध्यमें विराजमान है। भगवती जगदम्बा वहाँ अनेक रूपोंमें सदा विहार करती रहती हैं॥ १६-१८॥ |
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| ६३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्तुता सम्पूजिता देवैः सा तत्रैव गता शिवा।<br>यत्र संक्रीडते नित्यं मायाशक्तिः सनातनी॥ १९ | [महिषासुरके वधके पश्चात्] देवताओंसे स्तुत तथा भलीभाँति पूजित होकर वे सनातनी मायाशक्ति भगवती शिवा उसी मणिद्वीपमें चली गयीं, जहाँ वे निरन्तर विहार करती रहती हैं॥ १९॥ |
| देवास्तां निर्गतां वीक्ष्य देवीं सर्वेश्वरीं तथा।<br>रविवंशोद्भवं चक्रुर्भूपालं महाबलम्॥ २०<br><br>अयोध्याधिपतिं वीरं शत्रुघ्नं नाम पार्थिवम्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नं महिषस्यासने शुभे॥ २१<br><br>दत्त्वा राज्यं तदा तस्मै देवा इन्द्रपुरोगमाः।<br>स्वकीयैर्वाहनैः सर्वे जग्मुः स्वान्यालयानि ते॥ २२ | उन सर्वेश्वरी भगवतीको अन्तर्हित देखकर देवताओंने सूर्यवंशमें उत्पन्न, महाबली एवं सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न अयोध्याधिपति शत्रुघ्न नामक पराक्रमी राजाको महिषासुरके सुन्दर आसनपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार इन्द्र आदि सभी प्रधान देवता शत्रुघ्नको राज्य प्रदान करके अपने-अपने वाहनोंसे अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ २०-२२॥ |
| गतेषु तेषु देवेषु पृथिव्यां पृथिवीपते।<br>धर्मराज्यं बभूवाथ प्रजाश्च सुखितास्तथा॥ २३<br><br>पर्जन्यः कालवर्षी च धरा धान्यगुणावृता।<br>पादपाः फलपुष्पाढ्या बभूवुः सुखदाः सदा॥ २४ | हे भूपते! उन देवताओंके चले जानेपर पृथ्वीपर धर्मराज्य स्थापित हो गया और प्रजाएँ सुखी हो गयीं। मेघ उचित समयपर जल बरसाते थे और पृथ्वीपर उत्तम धान्य उत्पन्न होते थे। वृक्ष फलों तथा फूलोंसे सदा लदे रहते थे और वे लोगोंके लिये बड़े सुखदायक हो गये॥ २३-२४॥ |
| गावश्च क्षीरसम्पन्ना घटोध्न्यः कामदा नृणाम्।<br>नद्यः सुमार्गाः स्वच्छाः शीतोदाः खगसंयुताः॥ २५ | घड़ेके समान थनवाली दुधारू गौएँ मनुष्योंको उनकी इच्छाके अनुसार दूध दिया करती थीं। स्वच्छ एवं शीतल जलवाली नदियाँ सुगमतापूर्वक बहती थीं और पक्षियोंसे सुशोभित रहती थीं॥ २५॥ |
| ब्राह्मणा वेदतत्त्वाश्च यज्ञकर्मरतास्तथा।<br>क्षत्रिया धर्मसंयुक्ता दानाध्ययनतत्पराः॥ २६<br><br>शस्त्रविद्यारता नित्यं प्रजारक्षणतत्पराः।<br>न्यायदण्डधराः सर्वे राजानः शमसंयुताः॥ २७ | ब्राह्मण वेदतत्त्वोंके ज्ञाता हो गये और यज्ञकर्ममें प्रवृत्त रहने लगे। क्षत्रिय धर्मभावनासे ओतप्रोत हो गये और सदा दान तथा अध्ययनमें तत्पर रहने लगे। सभी राजा शस्त्रविद्या प्राप्त करनेमें संलग्न हो गये, वे सदा प्रजाओंकी रक्षा करने लगे, उनका दण्ड-विधान न्यायके अनुसार चलने लगा और वे शान्तिगुणसे सम्पन्न हो गये॥ २६-२७॥ |
| अविरोधस्तु भूतानां सर्वेषां सम्बभूव ह।<br>आकरा धनदा नॄणां व्रजा गोयूथसंयुताः॥ २८ | सभी प्राणियोंमें परस्पर मेल-जोल रहने लगा, खानोंसे मनुष्योंको अपार धन प्राप्त होने लगा और गोशालाएँ गोसमुदायसे सम्पन्न हो गयीं॥ २८॥ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम।<br>देवीभक्तिपराः सर्वे सम्बभूवुर्धरातले॥ २९ | हे नृपश्रेष्ठ! उस समय धरातलपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये सब-के-सब देवीकी भक्तिमें संलग्न हो गये॥ २९॥ |
| सर्वत्र यज्ञयूपाश्च मण्डपाश्च मनोहराः।<br>मखैः पूर्णा धराश्चासन् ब्राह्मणैः क्षत्रियैः कृतैः॥ ३० | सर्वत्र मनोहर यज्ञमण्डप तथा यज्ञयूप दृष्टिगोचर होते थे। ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंद्वारा सम्पन्न किये गये यज्ञोंसे सारी पृथ्वी सुशोभित होने लगी॥ ३०॥ |