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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० १५ ] चतुर्थ स्कन्ध ४७५

अ० १५ ] चतुर्थ स्कन्ध ४७५

मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वत्तः सर्वमिदं विश्वं स्थावरं जङ्गमं तथा।<br>अन्ये निमित्तमात्रास्ते कर्तारस्तव निर्मिताः॥ ३५यह स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण विश्व आपसे ही उत्पन्न हुआ है। जो दूसरे कर्ता हैं, वे तो निमित्तमात्र हैं; क्योंकि वे भी आपके बनाये हुए हैं॥ ३५॥
नमो देवि महामाये सर्वेषां जननी स्मृता।<br>को भेदस्तव देवेषु दैत्येषु स्वकृतेषु च॥ ३६हे देवि! आपको नमस्कार है। हे महामाये! आप सभी प्राणियोंकी जननी कही गयी हैं। स्वयं आपके ही द्वारा बनाये गये देवताओं और दैत्योंमें आपका यह कैसा भेदभाव !॥ ३६॥
मातुः पुत्रेषु को भेदोऽप्यशुभेषु शुभेषु च।<br>तथैव देवेष्वस्मासु न कर्तव्यस्त्वयाधुना॥ ३७पुत्र अच्छे हों अथवा बुरे, उनमें माताका कैसा भेदभाव ? उसी प्रकार देवताओं और हम दैत्योंमें आपको इस समय भेदभाव नहीं करना चाहिये॥ ३७॥
यादृशास्तादृशा मातः सुतास्ते दानवाः किल।<br>यतस्त्वं विश्वजननी पुराणेषु प्रकीर्तिता॥ ३८हे माता! दानव चाहे जिस किसी भी प्रकारके हों, किंतु वे आपके ही पुत्र हैं; क्योंकि आप पुराणोंमें विश्वजननी बतायी गयी हैं॥ ३८॥
तेऽपि स्वार्थपरा नूनं यथैव वयमप्युत।<br>नान्तरं दैत्यसुरयोर्भेदोऽयं मोहसम्भवः॥ ३९वे देवता भी तो निश्चितरूपसे वैसे ही स्वार्थी हैं जैसे हम दैत्यगण। देवताओं और दैत्योंमें अन्तर नहीं है। यह भेद केवल मोहजनित है॥ ३९॥
धनदारादिभोगेषु वयं सक्ता दिवानिशम्।<br>तथैव देवा देवेशि को भेदोऽसुरदेवयोः॥ ४०जैसे हमलोग धन, स्त्री आदिके भोगोंमें दिन-रात आसक्त रहते हैं, वैसे ही देवता भी तो [विषय-भोगोंमें लीन] रहते हैं। अतः हे देवेश्वरि! असुरों और देवताओंमें भेद कैसा ?॥ ४०॥
तेऽपि कश्यपदायादा वयं तत्सम्भवाः किल।<br>कुतो विरोधसम्भूतिर्जाता मातस्तवाधुना॥ ४१वे भी कश्यपजीकी संतान हैं और हम भी उन्हीं कश्यपजीसे उत्पन्न हुए हैं। हे माता! ऐसी स्थितिमें हमारे प्रति आपके मनमें यह विरोधभाव कैसे उत्पन्न हो गया ?॥ ४१॥
न तथा विहितं मातस्त्वयि सर्वसमुद्भवे।<br>साम्यतैव त्वया स्थाप्या देवेष्वस्मासु चैव हि॥ ४२हे माता! जब सबकी उत्पत्तिमें आप ही मूल कारण हैं, तो इस प्रकार भेद करना आपके लिये उचित नहीं है। देवताओं तथा हम दैत्योंमें आपको समान व्यवहार रखना चाहिये॥ ४२॥
गुणव्यतिकरात्सर्वे समुत्पन्नाः सुरासुराः।<br>गुणान्विता भवेयुस्ते कथं देहभृतोऽमराः॥ ४३गुणोंसे सम्बन्ध होनेके कारण ही सम्पूर्ण देवता तथा दैत्य उत्पन्न हुए हैं। तब गुणोंसे युक्त केवल वे देहधारी देवता ही आपके प्रिय क्यों हैं?॥ ४३॥
कामः क्रोधश्च लोभश्च सर्वदेहेषु संस्थिताः।<br>वर्तन्ते सर्वदा तस्मात् कोऽविरोधी भवेज्जनः॥ ४४काम, क्रोध और लोभ सभी प्राणियोंके भीतर सदा विद्यमान रहते हैं। अतः कौन व्यक्ति विरोधभावसे शून्य रह सकता है?॥ ४४॥
४७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १५

| त्वया मिथो विरोधोऽयं कल्पितः किल कौतुकात् ।<br>मन्यामहे विभेदेन नूनं युद्धदिदृक्षया ॥ ४५<br><br>अन्यथा खलु भ्रातॄणां विरोधः कीदृशोऽनघे ।<br>त्वं चेनेच्छसि चामुण्डे वीक्षितुं कलहं किल ॥ ४६ | मैं तो समझता हूँ कि अपने विनोदके लिये आपने ही युद्ध देखनेकी इच्छासे निश्चय ही [हम दैत्यों तथा देवताओंके बीच] भेद उत्पन्न करके परस्पर यह विरोधभाव पैदा कर दिया है। अन्यथा हे अनघे! भाइयोंमें परस्पर विरोध कैसा ? हे चामुण्डे! यदि आप [दैत्यों तथा देवताओंमें] कलह देखना न चाहतीं तो यह विरोधभाव नहीं होता॥ ४५-४६॥ |
| जानामि धर्मं धर्मज्ञे वेद्मि चाहं शतक्रतुम् ।<br>तथापि कलहोऽस्माकं भोगार्थं देवि सर्वदा ॥ ४७ | हे धर्मज्ञे! मैं धर्मको जानता हूँ और इन्द्रको भी भलीभाँति जानता हूँ, तथापि हे देवि! भोगके लिये हमलोगोंके बीच कलह सदासे होता रहा है॥ ४७॥ |
| एकः कोऽपि न शास्तास्ति संसारे त्वां विनाम्बिके ।<br>स्पृहावतस्तु कः कर्तुं क्षमते वचनं बुधः ॥ ४८<br><br>देवासुरैरयं सिन्धुर्मथितः समये क्वचित् ।<br>विष्णुना विहितो भेदः सुधारत्नच्छलेन वै ॥ ४९ | हे अम्बिके! आपके अतिरिक्त संसारमें कोई भी एक शासक नहीं है। कौन बुद्धिमान् प्राणी किसी लोभीकी बातपर विश्वास करेगा ? किसी समयकी बात है देवताओं और असुरोंने मिलकर इस समुद्रका मन्थन किया। किंतु विष्णुने अमृतरत्नके विभाजनमें छलपूर्वक देवताओं और असुरोंमें भेदभाव किया॥ ४८-४९॥ |
| त्वयासौ कल्पितः शौरिः पालकत्वे जगद्गुरुः ।<br>तेन लक्ष्मीः स्वयं लोभाद् गृहीतामरसुन्दरी ॥ ५० | आपने पालन-कार्यके लिये विष्णुको जगद्गुरु बनाया है, किंतु उन्होंने लोभवश दिव्य सुन्दरी लक्ष्मीको स्वयं अपना लिया॥ ५०॥ |
| ऐरावतस्तथेन्द्रेण पारिजातोऽथ कामधुक् ।<br>उच्चैःश्रवाः सुरैः सर्वं गृहीतं वैष्णवेच्छया ॥ ५१ | उसी प्रकार विष्णुकी ही इच्छासे इन्द्रने ऐरावत हाथी, पारिजात, कामधेनु तथा उच्चैःश्रवा घोड़ेको ले लिया तथा अन्य देवताओंने शेष सब कुछ ग्रहण कर लिया॥ ५१॥ |
| अनयं तादृशं कृत्वा जाता देवास्तु साधवः ।<br>(अन्यायिनः सुरा नूनं पश्य त्वं धर्मलक्षणम् ।)<br>संस्थापिताः सुरा नूनं विष्णुना बहुमानिना ॥ ५२<br><br>नूनं दैत्याः पराभूवन्पश्य त्वं धर्मलक्षणम् ।<br>क्व धर्मः कीदृशो धर्मः क्व कार्यं क्व च साधुता ॥ ५३ | इस प्रकारका अन्याय करके देवता साधु बन गये! (यदि आप धर्मका लक्षण देखें तो उससे ज्ञात हो जायगा कि देवता निश्चितरूपसे अन्यायी हैं।) महाभिमानी विष्णुने ऐसे अन्यायी देवताओंको उच्च स्थानोंपर प्रतिष्ठित किया। इसके विपरीत दैत्यगण पराभूत हुए; अब आप ही धर्मका लक्षण देख लीजिये। धर्म कहाँ है, धर्मका स्वरूप कैसा है, कैसा कार्य हुआ है और साधुता कहाँ है? ॥ ५२-५३॥ |
| कथयामि च कस्याग्रे सिद्धं मैमांसिकं मतम् ।<br>तार्किका युक्तिवादज्ञा विधिज्ञा वेदवादकाः ॥ ५४ | अब मैं किसके आगे अपनी बात कहूँ? मीमांसक मत तो प्रसिद्ध ही है। [मीमांसक निरीश्वर-वादका समर्थन करते हैं] नैयायिक विद्वान् युक्तिवादके ज्ञाता और वैदिक विद्वान् विधिके ज्ञाता कहे गये हैं। |

अ० १५ ]चतुर्थ स्कन्ध४७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उक्ताः सकर्तृकं विश्वं विवदन्ते जडात्मकाः।<br>कर्ता भवति चेदस्मिन्संसारे वितते किल ॥ ५५<br><br>विरोधः कीदृशस्तत्र चैककर्मणि वै मिथः।<br>वेदे नैकमतिः कस्माच्छास्त्रेष्वपि तथा पुनः ॥ ५६<br><br>नैकवाक्यं वचस्तेषामपि वेदविदां पुनः।<br>यतः स्वार्थपरं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ५७<br><br>निःस्पृहः कोऽपि संसारे न भवेन्न भविष्यति।कुछ लोग विश्वको सकर्तृक मानते हैं। [उनमें कुछ लोग विश्वका रचयिता ‘पुरुष’ को और कुछ लोग ‘प्रकृति’ को बताते हैं] जड़वादी लोग इससे विपरीत प्रकारकी बात करते हैं। यदि इस विस्तृत संसारमें कोई एक कर्ता होता तो एक ही कर्मके विषयमें लोगोंमें परस्पर विरोध कैसे होता ? वेदमें एक मत नहीं है और उसी प्रकार शास्त्रोंमें भी मतैक्य नहीं है। उन वेदविदोंके वचनमें भी एकवाक्यता नहीं है; क्योंकि यह समस्त स्थावर-जंगमात्मक जगत् ही स्वार्थपरायण है। संसारमें कोई भी न तो निःस्पृह हुआ है और न होगा॥ ५४—५७ १/२ ॥
शशिनाथ गुरोर्भार्या हृता ज्ञात्वा बलादपि ॥ ५८<br><br>गौतमस्य तथेन्द्रेण जानता धर्मनिश्चयम्।<br>गुरुणानुजभार्या च भुक्ता गर्भवती बलात् ॥ ५९<br><br>शप्तो गर्भगतो बालः कृतश्चान्धस्तथा पुनः।चन्द्रमाने जान-बूझकर अपने गुरु बृहस्पतिकी भार्याका बलपूर्वक हरण कर लिया। उसी प्रकार धर्मका निर्णय जानते हुए भी इन्द्रने महर्षि गौतमकी पत्नीके साथ अनाचार किया। देवगुरु बृहस्पतिने अपने छोटे भाईकी गर्भवती भार्याके साथ रमण किया और गर्भस्थ शिशुको शाप दे दिया तथा उसे अन्धा बना दिया॥ ५८-५९ १/२ ॥
विष्णुना च शिरश्छिन्नं राहोश्चक्रेण वै बलात् ॥ ६०<br><br>अपराधं विना कामं तदा सत्त्ववताम्बिके।<br>पौत्रो धर्मवतां शूरः सत्यव्रतपरायणः ॥ ६१<br><br>यज्वा दानपतिः शान्तः सर्वज्ञः सर्वपूजकः।<br>कृत्वाथ वामनं रूपं हरिणा छलवेदिना ॥ ६२<br><br>वञ्चितोऽसौ बलिः सर्वं हृतं राज्यं पुरा किल।<br>तथापि देवान्धर्मस्थान्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ६३<br><br>वदन्ति चाटुवादांश्च धर्मवादाञ्जयं गताः।<br>एवं ज्ञात्वा जगन्मातर्यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६४<br><br>शरणा दानवाः सर्वे जहि वा रक्ष वा पुनः।हे अम्बिके! सत्त्व-सम्पन्न होते हुए भी विष्णुने बलपूर्वक सुदर्शनचक्रसे निरपराध राहुका सिर काट लिया। मेरा पौत्र बलि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, वीर, सत्यव्रतमें संलग्न रहनेवाला, यज्ञकर्ता, महादानी, शान्त, सर्वज्ञ तथा सबका सम्मान करनेवाला था। पूर्वकालमें कपटज्ञानी विष्णुने वामनका रूप धारण करके उस बलिके साथ भी छल किया और उसका सारा राज्य छीन लिया। फिर भी विद्वान् लोग देवताओंको धर्मनिष्ठ कहते हैं और चाटुकारितापूर्ण वचन बोलते हैं कि धर्मवादी होनेके कारण ही देवता विजयको प्राप्त हुए। हे जगज्जननि! यह सब सोच-समझकर आप जैसा चाहें, वैसा करें। सभी दानव आपकी शरणमें हैं, अब आप उनका संहार करें अथवा उनकी रक्षा करें॥ ६०—६४ १/२ ॥
श्रीदेव्युवाच<br>सर्वे गच्छत पातालं तत्र वासं यथेप्सितम् ॥ ६५<br><br>कुरुध्वं दानवाः सर्वे निर्भया गतमन्यवः।<br>कालः प्रतीक्ष्यो युष्माभिः कारणं स शुभेऽशुभे ॥ ६६श्रीदेवी बोलीं— हे दानवो! तुम सबलोग पाताल चले जाओ और वहाँपर निर्भय तथा शोकरहित होकर इच्छानुसार निवास करो। अभी तुमलोगोंको समयकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। वह काल ही अच्छे या बुरे कार्यमें कारण बनता है॥ ६५-६६॥
४७८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६
सुनिर्वैदपराणां हि सुखं सर्वत्र सर्वदा।<br>त्रैलोक्यस्य च राज्येऽपि न सुखं लोभचेतसाम्॥ ६७<br><br>कृतेऽपि न सुखं पूर्णं सस्पृहाणां फलैरपि।<br>तस्मात्त्यक्त्वा महीमेतां प्रयान्त्वद्य महीतलम्॥ ६८<br><br>ममाज्ञां पुरतः कृत्वा सर्वे विगतकल्मषाः।परम सन्तोषी लोगोंको सभी जगह सदा सुख-ही-सुख है, किंतु लोभयुक्त मनवाले लोगोंको तीनों लोकोंका राज्य मिल जानेपर भी सुख नहीं प्राप्त होता। सत्ययुगमें भी नानाविध भोगोंके रहते प्रबल कामनावाले लोगोंका सुख कभी पूरा नहीं हुआ। अतः सभी दैत्य मेरी आज्ञा मानकर इस पृथ्वीको छोड़कर अभी पातालमें चले जायँ और वहाँ निष्पाप होकर रहें॥ ६७-६८ १/२॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्यास्तथेत्युक्त्वा रसातलं॥ ६९<br><br>प्रणम्य दानवाः सर्वे गताः शक्त्याभिरक्षिताः।<br>अन्तर्दधे ततो देवी देवाः स्वभुवनं गताः॥ ७०<br><br>त्यक्त्वा वैरं स्थिताः सर्वे ते तदा देवदानवाः।व्यासजी बोले— भगवतीका यह वचन सुनकर सभी दानवोंने 'ठीक है'—ऐसा कहकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी शक्तिसे रक्षित होकर वे वहाँसे चल पड़े। तत्पश्चात् भगवती अन्तर्धान हो गयीं और देवता अपने-अपने लोक चले गये। उस समय सभी देवता तथा दानव वैर-भाव छोड़कर रहने लगे॥ ६९-७० १/२॥
एतदाख्यानमखिलं यः शृणोति वदत्यथ॥ ७१<br>सर्वदुःखविनिर्मुक्तः प्रयाति पदमुत्तमम्॥ ७२जो मनुष्य इस सम्पूर्ण कथानकको सुनता अथवा कहता है, वह सभी दुःखोंसे मुक्त होकर परमपद प्राप्त कर लेता है॥ ७१-७२॥
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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवीकथनेन<br>दानवानां रसातलं प्रति गमनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥


अथ षोडशोऽध्यायः

भगवान् श्रीहरिके विविध अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन

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जनमेजय उवाच<br>भृगुशापान्मुनिश्रेष्ठ हरेरद्भुतकर्मणः।<br>अवताराः कथं जाताः कस्मिन्मन्वन्तरे विभो॥ १<br><br>विस्तराद्वद धर्मज्ञ अवतारकथां हरेः।<br>पापनाशकरीं ब्रह्मञ्छ्रुतां सर्वसुखावहाम्॥ २जनमेजय बोले— हे मुनिश्रेष्ठ! हे विभो! अद्भुत चरित्रवाले भगवान् विष्णुने भृगुके शापसे किस मन्वन्तरमें किस प्रकार अवतार ग्रहण किये। हे धर्मज्ञ! हे ब्रह्मन्! श्रवण करनेपर समस्त सुख सुलभ करानेवाली तथा पापोंका नाश कर देनेवाली भगवान् विष्णुकी अवतार-कथाका विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १-२॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि अवतारान् हरेर्यथा।<br>यस्मिन्मन्वन्तरे जाता युगे यस्मिन्नराधिप॥ ३<br><br>येन रूपेण यत्कार्यं कृतं नारायणेन वै।<br>तत्सर्वं नृप वक्ष्यामि संक्षेपेण तवाधुना॥ ४व्यासजी बोले— हे राजन्! हे नराधिप! जिस मन्वन्तर तथा जिस युगमें जैसे-जैसे भगवान् विष्णुके अवतार हुए हैं, उन अवतारोंको मैं बता रहा हूँ, आप सुनें। हे नृप! भगवान् नारायणने जिस रूपसे जो कार्य किया, वह सब मैं आपको इस समय संक्षेपमें बताता हूँ॥ ३-४॥
धर्मस्यैवावतारोऽभूच्चाक्षुषे मनुसम्भवे।<br>नरनारायणौ धर्मपुत्रौ ख्यातौ महीतले॥ ५चाक्षुष मन्वन्तरमें साक्षात् विष्णुका धर्मावतार हुआ था। उस समय वे धर्मपुत्र होकर नर-नारायण नामसे धरातलपर विख्यात हुए॥ ५॥
अ० १६ ]चतुर्थ स्कन्ध४७९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथ वैवस्वताख्येऽस्मिन्द्वितीये तु युगे पुनः।<br>दत्तात्रेयावतारोऽत्रेः पुत्रत्वमगमद्धरिः॥ ६इस वैवस्वत मन्वन्तरके दूसरे चतुर्युगमें भगवान्‌का दत्तात्रेयावतार हुआ। वे भगवान् श्रीहरि महर्षि अत्रिके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए॥ ६॥
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्त्रयोऽमी देवसत्तमाः।<br>पुत्रत्वमगमन्देवास्तस्यात्रेर्भार्यया वृताः॥ ७उन अत्रिमुनिकी भार्या अनसूयाकी प्रार्थनापर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश—ये तीनों महान् देवता उनके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए॥ ७॥
अनसूयात्रिपत्नी च सतीनामुत्तमा सती।<br>यया सम्प्रार्थिता देवाः पुत्रत्वमगमंस्त्रयः॥ ८अत्रिकी पत्नी साध्वी अनसूया सती स्त्रियोंमें श्रेष्ठ थीं, जिनके सम्यक् रूपसे प्रार्थना करनेपर वे तीनों देवता उनके पुत्ररूपमें अवतरित हुए॥ ८॥
ब्रह्माभूत्सोमरूपस्तु दत्तात्रेयो हरिः स्वयम्।<br>दुर्वासा रुद्ररूपोऽसौ पुत्रत्वं ते प्रपेदिरे॥ ९उनमें ब्रह्माजी सोम (चन्द्रमा)-रूपमें, साक्षात् विष्णु दत्तात्रेयके रूपमें और शंकरजी दुर्वासाके रूपमें उनके यहाँ पुत्रत्वको प्राप्त हुए॥ ९॥
नृसिंहस्यावतारस्तु देवकार्यार्थसिद्धये।<br>चतुर्थे तु युगे जातो द्विधारूपो मनोहरः॥ १०<br><br>हिरण्यकशिपोः सम्यग्वधाय भगवान् हरिः।<br>चक्रे रूपं नारसिंहं देवानां विस्मयप्रदम्॥ ११देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये चौथे चतुर्युगमें दो प्रकारके रूपोंवाला मनोहर नृसिंहावतार हुआ। भगवान् श्रीविष्णुने उस समय हिरण्यकशिपुका सम्यक् वध करनेके लिये ही देवताओंको भी चकित कर देनेवाला नारसंहरूप धारण किया था॥ १०-११॥
बलेर्नियमनार्थाय श्रेष्ठे त्रेतायुगे तथा।<br>चकार रूपं भगवान् वामनं कश्यपान्मुनेः॥ १२<br><br>छलयित्वा मखे भूपं राज्यं तस्य जहार ह।<br>पाताले स्थापयामास बलिं वामनरूपधृक्॥ १३भगवान् विष्णुने दैत्यराज बलिका शमन करनेके उद्देश्यसे उत्तम त्रेतायुगमें कश्यपमुनिके यहाँ वामनरूपसे अवतार धारण किया था। उन वामनरूपधारी विष्णुने यज्ञमें राजा बलिको छलकर उनका राज्य हर लिया और उन्हें पातालमें स्थापित कर दिया॥ १२-१३॥
युगे चैकोनविंशेऽथ त्रेताख्ये भगवान् हरिः।<br>जमदग्निसुतो जातो रामो नाम महाबलः॥ १४उन्नीसवें चतुर्युगके त्रेता नामक युगमें भगवान् विष्णु महर्षि जमदग्निके परशुराम नामक महाबली पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए॥ १४॥
क्षत्रियान्तकरः श्रीमान्सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>दत्तान्मेदिनीं कृत्स्नां कश्यपाय महात्मने॥ १५क्षत्रियोंका नाश कर डालनेवाले उन प्रतापी, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय परशुरामने सम्पूर्ण पृथ्वी [क्षत्रियोंसे छीनकर] महात्मा कश्यपको दे दी थी॥ १५॥
यो वै परशुरामाख्यो हरेरद्भुतकर्मणः।<br>अवतारस्तु राजेन्द्र कथितः पापनाशनः॥ १६हे राजेन्द्र! मैंने अद्भुत कर्मवाले भगवान् विष्णुके पापनाशक 'परशुराम' नामक अवतारका यह वर्णन कर दिया॥ १६॥
त्रेतायुगे रघोर्वंशे रामो दशरथात्मजः।<br>नरनारायणांशौ द्वौ जातौ भुवि महाबलौ॥ १७भगवान् विष्णुने त्रेतायुगमें रघुके वंशमें दशरथपुत्र रामके रूपमें अवतार धारण किया था। इसी प्रकार अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें साक्षात् नर तथा नारायणके अंशसे कल्याणप्रद तथा महाबली अर्जुन