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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished889 pages

५१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

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५१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

| निशीथे देवकी तत्र वसुदेवमुवाच ह।<br>किं करोमि महाराज प्रसवावसरो मम॥ १५<br><br>बहवो रक्षपालाश्च तिष्ठन्त्यत्र भयानकाः।<br>नन्दपत्न्या मया सार्धं कृतोऽस्ति समयः पुरा॥ १६<br><br>प्रेषितव्यस्त्वया पुत्रो मन्दिरे मम मानिनि।<br>पालयिष्याम्यहं तत्र तवातिमनसा किल॥ १७<br><br>अपत्यं ते प्रदास्यामि कंसस्य प्रत्ययाय वै।<br>किं कर्तव्यं प्रभो चात्र विषमे समुपस्थिते॥ १८<br><br>व्यत्ययः सन्ततेः शौरे कथं कर्तुं क्षमो भवेः।<br>दूरे तिष्ठस्व कान्ताद्य लज्जा मेऽतिदुरत्यया॥ १९<br><br>परावृत्य मुखं स्वामिन्नन्यथा किं करोम्यहम्।<br>इत्युक्त्वा तं महाभागं देवकी देवसम्मतम्॥ २० | तत्पश्चात् मध्यरात्रिमें देवकीने वसुदेवजीसे कहा—महाराज! मेरे प्रसवका समय आ गया है, अब मैं क्या करूँ ? ॥ १५ ॥<br><br>यहाँपर बहुतसे भयंकर रक्षक नियुक्त हैं। यहाँ आनेके पूर्व नन्दकी पत्नी यशोदासे मेरी यह बात निश्चित हुई थी। [उन्होंने कहा था—] ‘हे मानिनि ! तुम अपने पुत्रको मेरे घर भेज देना, मैं मन लगाकर तुम्हारे पुत्रका पालन-पोषण करूँगी। कंसको विश्वास दिलानेके लिये मैं तुम्हें इसके बदले अपनी सन्तान दे दूँगी।' अतः हे प्रभो ! इस विषम परिस्थितिमें अब हमें क्या करना चाहिये ? हे शूरतनय ! आप इन दोनों सन्तानोंकी अदला-बदली करनेमें कैसे समर्थ हो सकेंगे? हे कान्त ! आप अपना मुख फेरकर मुझसे दूर होकर बैठिये; क्योंकि दुस्तर लज्जाके कारण मैं संकोचमें पड़ रही हूँ। हे स्वामिन् ! इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ विशेष कर ही क्या सकती हूँ॥ १६—१९ १/२ ॥ |
| बालकं सुषुवे तत्र निशीथे परमाद्भुतम्।<br>तं दृष्ट्वा विस्मयं प्राप देवकी बालकं शुभम् ॥ २१ | देवतुल्य महाभाग वसुदेवसे ऐसा कहकर देवकीने उसी अर्धरात्रिकी शुभ वेलामें एक परम अद्भुत बालकको जन्म दिया। उस सुन्दर बालकको देखकर देवकीको महान् आश्चर्य हुआ॥ २०—२१॥ |
| पतिं प्राह महाभागा हर्षोत्फुल्लकलेवरा।<br>पश्य पुत्रमुखं कान्त दुर्लभं हि तव प्रभो॥ २२<br><br>अद्यैनं कालरूपोऽसौ घातयिष्यति भ्रातृजः।<br>वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा तमादाय करे सुतम्॥ २३<br><br>अपश्यच्चाननं तस्य सुतस्याद्भुतकर्मणः।<br>वीक्ष्य पुत्रमुखं शौरिश्चिन्ताविष्टो बभूव ह ॥ २४ | [पुत्रप्राप्तिके कारण] हर्षातिरेकसे प्रफुल्लित अंग-प्रत्यंगोंवाली महाभागा देवकीने पतिसे कहा— हे कान्त ! अपने पुत्रका मुख तो देख लीजिये; क्योंकि हे प्रभो ! इसका दर्शन आपके लिये फिर सर्वथा दुर्लभ हो जायगा। कालरूपी मेरा भाई कंस आज ही इसका वध कर डालेगा। तब 'ठीक है'—ऐसा कहकर वसुदेवजी उस पुत्रको अपने हाथोंमें लेकर अद्भुत कर्मशाली अपने उस पुत्रका मुख निहारने लगे। तत्पश्चात् अपने पुत्रका मुख देखकर वसुदेवजी इस चिन्तासे आकुल हो गये कि मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे इस बालकके लिये मुझे विषाद न हो ॥ २२—२४ १/२ ॥ |
| किं करोमि कथं न स्याद्दुःखमस्य कृते मम।<br>एवं चिन्तातुरे तस्मिन्वागुवाचाशरीरिणी ॥ २५<br><br>वसुदेवं समाभाष्य गगने विशदाक्षरा।<br>वसुदेव गृहीत्वैनं गोकुलं नय सत्वरः ॥ २६<br><br>रक्षपालास्तथा सर्वे मया निद्राविमोहिताः।<br>विवृतानि कृतान्यष्ट कपाटानि च शृङ्खलाः ॥ २७<br>मुक्त्वैनं नन्दगेहे त्वं योगमायां समानय। | वसुदेवजीके इस प्रकार चिन्तामग्न होनेपर उन्हें सम्बोधित करके आकाशमें स्पष्ट शब्दोंमें आकाश-वाणी हुई—हे वसुदेव ! तुम इस बालकको लेकर तत्काल गोकुल पहुँचा दो। सभी रक्षकगण मेरे द्वारा निद्रासे अचेत कर दिये गये हैं, आठों फाटकोंको खोल दिया गया है तथा जंजीरें तोड़ दी गयी हैं। इस बालकको नन्दके घर छोड़कर वहाँसे तुम योगमायाको उठा लाओ ॥ २५—२७ १/२ ॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 17 B

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अ० २३ ] चतुर्थ स्कन्ध ५१५

संस्कृतहिन्दी
श्रुत्वैवं वसुदेवस्तु तस्मिन्कारागृहे गतः ॥ २८<br>विवृतं द्वारमालोक्य बभूव तरसा नृप ।<br>तमादाय ययावाशु द्वारपालैरलक्षितः ॥ २९यह वाणी सुनकर उस कारागृहमें निरुद्ध वसुदेवजी बाहरकी ओर गये। हे राजन्! इस प्रकार वसुदेवजी फाटकोंको खुला हुआ देखकर बड़ी शीघ्रतापूर्वक उस बालकको लेकर द्वारपालोंकी दृष्टिसे बचते हुए तत्काल कारागारसे निकल पड़े॥ २८-२९॥
कालिन्दीतटमासाद्य पूरं दृष्ट्वा सुनिश्चितम् ।<br>तदैव कटिदघ्नी सा बभूवाशु सरिद्वरा ॥ ३०यमुनाके किनारे पहुँचकर उन्होंने देखा कि इस पारसे उस पार अगाध जल आप्लावित हो रहा है। उनका गोकुल जाना भी सुनिश्चित था। उनके जलमें उतरते ही नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाजीमें कमरभर पानी हो गया॥ ३०॥
योगमायाप्रभावेण ततारानकदुन्दुभिः ।<br>गत्वा तु गोकुलं शौरिर्निशीथे निर्जने पथि ॥ ३१<br>नन्दद्वारे स्थितः पश्यन्विभूतिं पशुसंज्ञिताम् ।योगमायाके प्रभावसे वसुदेवजीने सहजतापूर्वक यमुनाजीको पार कर लिया और वे उस आधी रातमें सुनसान मार्गपर चलते हुए गोकुलमें पहुँचकर नन्दके द्वारपर विपुल गौ-सम्पदा देखते हुए वहाँ स्थित हो गये॥ ३१ १/२॥
तदैव तत्र सञ्जाता यशोदा गर्भसम्भवा ॥ ३२<br>योगमायांशजा देवी त्रिगुणा दिव्यरूपिणी ।<br>जातां तां बालिकां दिव्यां गृहीत्वा करपङ्कजे ॥ ३३<br>तत्रागत्य ददौ देवी सैरन्ध्रीरूपधारिणी ।<br>वसुदेवः सुतं दत्त्वा सैरन्ध्रीकरपङ्कजे ॥ ३४<br>तामादाय ययौ शीघ्रं बालिकां मुदिताशयः ।उसी समय योगमायाके अंशसे जायमान दिव्यरूपमयी त्रिगुणात्मिका भगवतीने यशोदाके गर्भसे अवतार लिया था। तदनन्तर सैरन्ध्रीका रूप धारण करके स्वयं भगवतीने उत्पन्न उस अलौकिक बालिकाको अपने करकमलमें ग्रहण करके वहाँ जाकर वसुदेवजीको दे दिया। वसुदेवजी भी अपने पुत्रको देवीरूपा सैरन्ध्रीके करकमलमें रखकर योगमायास्वरूपा उस बालिकाको लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे तत्काल चल पड़े॥ ३२—३४ १/२॥
कारागारे ततो गत्वा देवक्याः शयने सुताम् ॥ ३५<br>निःक्षिप्य संस्थितः पार्श्वे चिन्ताविष्टो भयातुरः ।कारागारमें पहुँचकर उन्होंने देवकीकी शय्यापर बालिकाको लिटा दिया और भय तथा चिन्तासे युक्त होकर वे पासहीमें एक ओर जाकर बैठ गये॥ ३५ १/२॥
रुरोद सुस्वरं कन्या तदैवागतसंज्ञकाः ॥ ३६<br>उत्तस्थुः सेवका राज्ञः श्रुत्वा तद्रुदितं निशि ।<br>तमूचुर्भूपतिं गत्वा त्वरितास्तेऽतिविह्वलाः ॥ ३७<br>देवक्याश्च सुतो जातः शीघ्रमेहि महामते ।इतनेमें कन्याने उच्च स्वरमें रोना आरम्भ किया। तब प्रसवकालको सूचित करनेके लिये नियुक्त कंसके सेवकगण रातमें रोनेकी वह ध्वनि सुनकर जाग पड़े। आनन्दसे विह्वल वे सेवक तत्काल उसी समय जाकर राजासे बोले—हे महामते! देवकीका पुत्र उत्पन्न हो गया, आप शीघ्र चलिये॥ ३६-३७ १/२॥
तदाकर्ण्य वचस्तेषां शीघ्रं भोजपतिर्ययौ ॥ ३८<br>प्रावृतं द्वारमालोक्य वसुदेवमथाह्वयत् ।उनका यह वचन सुनते ही भोजपति कंस तत्काल जा पहुँचा और वहाँपर दरवाजा खुला हुआ देखकर कंसने वसुदेवजीको बुलवाया॥ ३८ १/२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—17 C