देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १२] द्वितीय स्कन्ध २३७
अ० १२] द्वितीय स्कन्ध २३७
| दासीभावमपाकर्तुं गरुडोऽपि महाबलः।<br>उवाह तां सपुत्रां वै सिन्धोः पारं जगाम ह॥ २५ | भावसे मुक्ति दिलानेके उद्देश्यसे कद्रूको उसके पुत्रोंसहित अपनी पीठपर बैठाकर सागरके उस पार ले गये॥ २४-२५॥ |
| गत्वा तां गरुडः प्राह ब्रूहि मातर्नमोऽस्तु ते।<br>कथं मुच्येत मे माता दासीभावादसंशयम्॥ २६ | वहाँ जाकर गरुडने कद्रूसे कहा—हे जननि! आपको बार-बार प्रणाम है। अब आप मुझे यह बतायें कि मेरी माता दासीभावसे निश्चित ही कैसे मुक्त होंगी ?॥ २६॥ |
| कद्रुरुवाच<br>अमृतं देवलोकात्त्वं बलादानीय मे सुतान्।<br>समर्पय सुताद्याशु मातरं मोचयाबलाम्॥ २७ | कद्रू बोली—हे पुत्र! तुम स्वर्गलोकसे बलपूर्वक अमृत लाकर मेरे पुत्रोंको दे दो और शीघ्र ही अपनी अबला माताको मुक्त करा लो॥ २७॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्तः प्रययौ शीघ्रमिन्द्रलोकं महाबलः।<br>कृत्वा युद्धं जहाराशु सुधाकुम्भं खगोत्तमः॥ २८ | व्यासजी बोले—कद्रूके ऐसा कहनेपर पक्षिश्रेष्ठ महाबली गरुड उसी समय इन्द्रलोक गये और देवताओंसे युद्ध करके उन्होंने सुधा-कलश छीन लिया। अमृत लाकर उन्होंने उसे अपनी विमाता कद्रूको अर्पण कर दिया और उन्होंने विनताको दासीभावसे निःसन्देह मुक्त करा लिया॥ २८-२९॥ |
| समानीयामृतं मात्रे वैनतेयः समर्पयत्।<br>मोचिता विनता तेन दासीभावादसंशयम्॥ २९ | |
| अमृतं सञ्जहारेन्द्रः स्नातुं सर्पा यदा गताः।<br>दासीभावाद्धिनिर्मुक्ता विनता विपतेर्बलात्॥ ३० | जब सभी सर्प स्नान करनेके लिये चले गये, तब इन्द्रने अमृत चुरा लिया। इस प्रकार गरुडके प्रतापसे विनता दासीभावसे छूट गयी॥ ३०॥ |
| तत्रास्तीर्णाः कुशास्तैस्तु लीढाः पन्नगनामकैः।<br>द्विजिव्हास्ते सुसम्पन्नाः कुशाग्रस्पर्शमात्रतः॥ ३१ | अमृतघटके पास कुश बिछे हुए थे, जिन्हें सर्प अपनी जिह्वासे चाटने लगे। तब कुशके अग्रभागके स्पर्शमात्रसे ही वे दो जीभवाले हो गये॥ ३१॥ |
| मात्रा शप्ताश्च ये नागा वासुकिप्रमुखाः शुचा।<br>ब्रह्माणं शरणं गत्वा ते होचुः शापजं भयम्॥ ३२ | जिन सर्पोंको उनकी माताने शाप दिया था, वे वासुकिआदि नाग चिन्तित होकर ब्रह्माजीके पास गये और उन्होंने अपने शाप-जनित भयकी बात बतायी। ब्रह्माजीने उनसे कहा—जरत्कारु नामके एक महामुनि हैं, तुमलोग उन्हींके नामवाली वासुकिनागकी बहन जरत्कारुको उन्हें अर्पित कर दो। उस कन्यासे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तुमलोगोंका रक्षक होगा। वह ‘आस्तीक’—इस नामवाला होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३२–३४॥ |
| तानाह भगवान्ब्रह्मा जरत्कारुर्महामुनिः।<br>वासुकेर्भगिनीं तस्मै अर्पयध्वं सनामिकाम्॥ ३३ | |
| तस्यां यो जायते पुत्रः स वस्त्राता भविष्यति।<br>आस्तीक इति नामासौ भविता नात्र संशयः॥ ३४ | |
| वासुकिस्तु तदाकर्ण्य वचनं ब्रह्मणः शिवम्।<br>वनं गत्वा सुतां तस्मै ददौ विनयपूर्वकम्॥ ३५ | ब्रह्माजीका वह कल्याणकारी वचन सुनकर वासुकिने वनमें जाकर अपनी बहन उन्हें विनयपूर्वक समर्पित कर दी॥ ३५॥ |
| २३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनामां तां मुनिर्ज्ञात्वा जरत्कारुरुवाच तम्।<br>अप्रियं मे यदा कुर्यात्तदा तां सन्त्यजाम्यहम्॥ ३६ | जरत्कारुमुनिने उसे अपने ही समान नामवाली जानकर उनसे कहा—जब भी यह मेरा अप्रिय करेगी, तब मैं इसका परित्याग कर दूँगा॥ ३६॥ |
| वाग्बन्धं तादृशं कृत्वा मुनिर्जग्राह तां स्वयं।<br>दत्त्वा च वासुकिः कामं भवनं स्वं जगाम ह॥ ३७ | वैसी प्रतिज्ञा करके जरत्कारुमुनिने उस जरत्कारुको पत्नीरूपसे ग्रहण कर लिया। वासुकिनाग भी अपनी बहन उन्हें प्रदानकर आनन्दपूर्वक अपने घर लौट गये॥ ३७॥ |
| कृत्वा पर्णकुटीं शुभ्रां जरत्कारुर्महावने।<br>तया सह सुखं प्राप रममाणः परन्तप॥ ३८ | हे परन्तप! मुनि जरत्कारु उस महावनमें सुन्दर पर्णकुटी बनाकर उसके साथ रमण करते हुए सुख भोगने लगे॥ ३८॥ |
| एकदा भोजनं कृत्वा सुप्तोऽसौ मुनिसत्तमः।<br>भगिनी वासुकेस्तत्र संस्थिता वरवर्णिनी॥ ३९<br><br>न सम्बोधयितव्योऽहं त्वया कान्ते कथञ्चन।<br>इत्युक्त्वा तु गतो निद्रां मुनिस्तां सुदतीं तदा॥ ४० | एक समय मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु भोजन करके विश्राम कर रहे थे, वासुकिकी बहन सुन्दरी जरत्कारु भी वहीं बैठी हुई थी। [मुनिने उससे कहा] हे कान्ते! तुम मुझे किसी भी प्रकार जगाना मत—उस सुन्दर दाँतोंवालीसे ऐसा कहकर वे मुनि सो गये॥ ३९-४०॥ |
| रविरस्तगिरिं प्राप्तः सन्ध्याकाल उपस्थिते।<br>किं करोमि न मे शान्तिस्त्यजेन्मां बोधितः पुनः॥ ४१<br><br>धर्मलोपभयाद्भीता जरत्कारुरचिन्तयत्।<br>नोचेत्प्रबोधयाम्येनं सन्ध्याकालो वृथा व्रजेत्॥ ४२ | सूर्य अस्ताचलको प्राप्त हो गये थे। सन्ध्या-वन्दनका समय उपस्थित हो जानेपर धर्मलोपके भयसे डरी हुई जरत्कारु सोचने लगी—मैं क्या करूँ? मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। यदि मैं इन्हें जगाती हूँ तो ये मेरा परित्याग कर देंगे और यदि नहीं जगाती हूँ तो यह सन्ध्याकाल व्यर्थ ही चला जायगा॥ ४१-४२॥ |
| धर्मनाशाद्वरं त्यागस्तथापि मरणं ध्रुवम्।<br>धर्महानिर्नराणां हि नरकाय भवेत्पुनः॥ ४३<br><br>इति सञ्चिन्त्य सा बाला तं मुनिं प्रत्यबोधयत्।<br>सन्ध्याकालोऽपि सञ्जात उत्तिष्ठोत्तिष्ठ सुव्रत॥ ४४ | धर्मनाशकी अपेक्षा त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि मृत्यु तो निश्चित है ही। धर्मके नष्ट होनेपर मनुष्योंको निश्चित ही नरकमें जाना पड़ता है—ऐसा निश्चय करके उस स्त्रीने उन मुनिको जगाया और कहा—हे सुव्रत! उठिये, उठिये, अब सन्ध्याकाल भी उपस्थित हो गया है॥ ४३-४४॥ |
| उत्थितोऽसौ मुनिः कोपात्तामुवाच व्रजाम्यहम्।<br>त्वं तु भ्रातृगृहं याहि निद्राविच्छेदकारिणी॥ ४५ | जगनेपर मुनि जरत्कारुने क्रोधित होकर उससे कहा—अब मैं जा रहा हूँ और मेरी निद्रामें विघ्न डालनेवाली तुम अपने भाई वासुकिके घर चली जाओ॥ ४५॥ |
| अ० १२ ] | द्वितीय स्कन्ध | २३९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वेपमानाब्रवीद्वाक्यमित्युक्ता मुनिना तदा।<br>भ्रात्रा दत्ता यदर्थं तत्कथं स्यादमितप्रभ॥ ४६ | मुनिके ऐसा कहनेपर भयसे काँपती हुई उसने कहा—हे महातेजस्वी! मेरे भाईने जिस प्रयोजनसे मुझे आपको सौंपा था, वह प्रयोजन अब कैसे सिद्ध होगा?॥ ४६॥ |
| मुनिः प्राह जरत्कारुं तदस्तीति निराकुलः।<br>गता सा मुनिना त्यक्ता वासुकेः सदनं तदा॥ ४७ | तदनन्तर मुनिने शान्तचित्त होकर जरत्कारुसे कहा—‘वह तो है ही।’ इसके बाद मुनिके द्वारा परित्यक्त वह कन्या वासुकिके घर चली गयी॥ ४७॥ |
| पृष्टा भ्रात्राब्रवीद्वाक्यं यथोक्तं पतिना तदा।<br>अस्तीत्युक्त्वा च हित्वा मां गतोऽसौ मुनिसत्तमः॥ ४८ | भाई वासुकिके पूछनेपर उसने पतिद्वारा कही गयी बात उनसे यथावत् कह दी और [वह यह भी बोली कि] ‘अस्ति’—ऐसा कहकर वे मुनिश्रेष्ठ मुझको छोड़कर चले गये॥ ४८॥ |
| वासुकिस्तु तदाकर्ण्य सत्यावाङ्मुनिरित्युत।<br>विश्वासं च परं कृत्वा भगिनीं तां समाश्रयत्॥ ४९ | यह सुनकर वासुकिने सोचा कि मुनि सत्यवादी हैं; तत्पश्चात् पूर्ण विश्वास करके उन्होंने अपनी उस बहनको अपने यहाँ आश्रय प्रदान किया॥ ४९॥ |
| ततः कालेन कियता जातोऽसौ मुनिबालकः।<br>आस्तीक इति नामासौ विख्यातः कुरुसत्तम॥ ५० | हे कुरुश्रेष्ठ! कुछ समय बाद मुनिबालक उत्पन्न हुआ और वह आस्तीक नामसे विख्यात हुआ॥ ५०॥ |
| तेनायं रक्षितो यज्ञस्तव पार्थिवसत्तम।<br>मातृपक्षस्य रक्षार्थं मुनिना भावितात्मना॥ ५१ | हे नृपश्रेष्ठ! पवित्र आत्मावाले उन्हीं आस्तीक-मुनिने अपने मातृ-पक्षकी रक्षाके लिये आपका सर्पयज्ञ रुकवाया है॥ ५१॥ |
| भव्यं कृतं महाराज मानितोऽयं त्वया मुनिः।<br>यायावरकुलोत्पन्नो वासुकेर्भगिनीसुतः॥ ५२ | हे महाराज! यायावर वंशमें उत्पन्न और वासुकिकी बहनके पुत्र आस्तीकका आपने सम्मान किया, यह तो बड़ा ही उत्तम कार्य किया है॥ ५२॥ |
| स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो भारतं सकलं श्रुतम्।<br>दानानि बहु दत्तानि पूजिता मुनयस्तथा॥ ५३<br><br>कृतेन सुकृतेनापि न पिता स्वर्गतिं गतः।<br>पावितं न कुलं कृत्स्नं त्वया भूपतिसत्तम॥ ५४<br><br>देव्याश्चायतनं भूप विस्तीर्णं कुरु भक्तितः।<br>येन वै सकला सिद्धिस्तव स्याज्जनमेजय॥ ५५ | हे महाबाहो! आपका कल्याण हो। आपने सम्पूर्ण महाभारत सुना, नानाविध दान दिये और मुनिजनोंकी पूजा की। हे भूपश्रेष्ठ! आपके द्वारा इतना महान् पुण्यकार्य किये जानेपर भी आपके पिता स्वर्गको प्राप्त नहीं हुए और न आपका सम्पूर्ण कुल ही पवित्र हो सका। अतः हे महाराज जनमेजय! आप भक्तिभावसे युक्त होकर देवी भगवतीके एक विशाल मन्दिरका निर्माण कराइये, जिसके द्वारा आप समस्त सिद्धिको प्राप्त कर लेंगे॥ ५३—५५॥ |
| पूजिता परया भक्त्या शिवा सकलदा सदा।<br>कुलवृद्धिं करोत्येव राज्यं च सुस्थिरं सदा॥ ५६ | सर्वस्व प्रदान करनेवाली भगवती दुर्गा परम श्रद्धापूर्वक पूजित होनेपर सदा वंश-वृद्धि करती हैं तथा राज्यको सदा स्थिरता प्रदान करती हैं॥ ५६॥ |
| २४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| देवीमखं विधानेन कृत्वा पार्थिवसत्तम।<br>श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं परमं शृणु॥ ५७ | हे भूपश्रेष्ठ! विधि-विधानके साथ देवीयज्ञ करके आप श्रीमद्देवीभागवत नामक महापुराणका श्रवण कीजिये॥ ५७॥ |
| त्वामहं श्रावयिष्यामि कथां परमपावनीम्।<br>संसारतारिणीं दिव्यां नानारससमाहृताम्॥ ५८ | अत्यन्त पुनीत, भवसागरसे पार उतारनेवाली, अलौकिक तथा विविध रसोंसे सम्पृक्त उस कथाको मैं आपको सुनाऊँगा॥ ५८॥ |
| न श्रोतव्यं परं चास्मात्पुराणाद्विद्यते भुवि।<br>नाराध्यं विद्यते राजन्देवीपादाम्बुजादृते॥ ५९ | हे राजन्! सम्पूर्ण संसारमें इस पुराणसे बढ़कर अन्य कुछ भी श्रवणीय नहीं है और भगवतीके चरणारविन्दके अतिरिक्त अन्य कुछ भी आराधनीय नहीं है॥ ५९॥ |
| ते सभाग्याः कृतप्रज्ञा धन्यास्ते नृपसत्तम।<br>येषां चित्ते सदा देवी वसति प्रेमसंकुले॥ ६० | हे नृपश्रेष्ठ! जिनके प्रेमपूरित हृदयमें सदा भगवती विराजमान रहती हैं; वे ही सौभाग्यशाली, ज्ञानवान् एवं धन्य हैं॥ ६०॥ |
| सुदुःखितास्ते दृश्यन्ते भुवि भारत भारते।<br>नाराधिता महामाया यैर्जनैश्च सदाम्बिका॥ ६१ | हे भारत! इस भारतभूमिपर वे ही लोग सदा दुःखी दिखायी देते हैं, जिन्होंने कभी भी महामाया अम्बिकाकी आराधना नहीं की है॥ ६१॥ |
| ब्रह्मादयः सुराः सर्वे यदाराधनतत्पराः।<br>वर्तन्ते सर्वदा राजंस्तां न सेवेत को जनः॥ ६२ | हे राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता भी जिन भगवतीकी आराधनामें सर्वदा लीन रहते हैं, उनकी आराधना भला कौन मनुष्य नहीं करेगा?॥ ६२॥ |
| य इदं शृणुयान्नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात्।<br>भगवत्या समाख्यातं विष्णवे यदनुत्तमम्॥ ६३ | जो मनुष्य इस पुराणका नित्य श्रवण करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। स्वयं भगवतीने भगवान् विष्णुके समक्ष इस अतिश्रेष्ठ पुराणका वर्णन किया था॥ ६३॥ |
| तेन श्रुतेन ते राजंश्चित्ते शान्तिर्भविष्यति।<br>पितॄणां चाक्षयः स्वर्गः पुराणश्रवणाद्भवेत्॥ ६४ | हे राजन्! इस पुराणके श्रवणसे आपके चित्तको परम शान्ति प्राप्त होगी और आपके पितरोंको अक्षय स्वर्ग प्राप्त होगा॥ ६४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे श्रोतॄप्रवक्तृप्रसङ्गो नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥