देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १५] चतुर्थ स्कन्ध ४७१
अ० १५] चतुर्थ स्कन्ध ४७१
| तथाहं खररूपेण संस्थितः कालयोगतः।<br>यथा त्वं कमले लीनः संस्थितो ब्रह्महत्यया ॥ ५४<br><br>पीडितश्च तथा ह्यद्य स्थितोऽहं खररूपधृक्।<br>दैवाधीनस्य किं दुःखं किं सुखं पाकशासन ॥ ५५<br><br>कालः करोति वै नूनं यदिच्छति यथा तथा।<br><br>भार्गव उवाच<br>इति तौ बलिदेवेशौ कृत्वा संविदमुत्तमाम् ॥ ५६<br><br>प्रबोधं प्राप्तुः कामं यथास्थानञ्च जग्मतुः।<br>इत्येतत्ते समाख्याता मया दैवबलिष्ठता ॥ ५७<br><br>दैवाधीनं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ५८ | रूप धारण किया था, उसी प्रकार मैं भी समयके फेरसे गर्दभरूपसे स्थित हूँ। जिस प्रकार तुम ब्रह्महत्यासे दुःखी होकर कमलमें छिपकर पड़े रहे, उसी तरह मैं भी आज गर्दभका रूप धारण करके स्थित हूँ। हे पाकशासन! दैवके अधीन रहनेवालोंको क्या दुःख और क्या सुख? दैव जिस रूपमें जो चाहता है, वैसा निश्चितरूपसे करता है॥ ५२—५५ १/२॥<br><br>शुक्राचार्य बोले— इस प्रकार बलि और देवराज इन्द्रने परस्पर उत्तम बातें करके परम सन्तुष्टि प्राप्त की और इसके बाद वे अपने-अपने स्थानको चले गये। यह मैंने तुमसे प्रारब्धकी बलवत्ताका भलीभाँति वर्णन कर दिया। देवताओं, असुरों और मानवोंसे युक्त सम्पूर्ण जगत् दैवके अधीन है॥ ५६—५८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादेन शुक्रकोपसान्त्वनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
### अथ पञ्चदशोऽध्यायः
#### देवता और दैत्योंके युद्धमें दैत्योंकी विजय, इन्द्रद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीका प्रकट होकर दैत्योंके पास जाना, प्रह्लादद्वारा भगवतीकी स्तुति, देवीके आदेशसे दैत्योंका पातालगमन
| _व्यास उवाच_<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा भार्गवस्य महात्मनः।<br>प्रह्लादस्तु सुसंहृष्टो बभूव नृपनन्दनः॥ १<br><br>ज्ञात्वा दैवं बलिष्ठञ्च प्रह्लादस्तानुवाच ह।<br>कृतेऽपि युद्धे न जयो भविष्यति कदाचन ॥ २<br><br>तदा ते जयिनः प्रोचुर्दानवा मदगर्विताः।<br>संग्रामस्तु प्रकर्तव्यो दैवं किं न विदामहे॥ ३<br><br>निरुद्यमानां दैवं हि प्रधानमसुराधिप।<br>केन दृष्टं क्व वा दृष्टं कीदृशं केन निर्मितम्॥ ४<br><br>तस्माद्युद्धं करिष्यामो बलमास्थाय साम्प्रतम्।<br>भवाग्रे दैत्यवर्य त्वं सर्वज्ञोऽसि महामते॥ ५ | **व्यासजी बोले—** उन महात्मा शुक्राचार्यका यह वचन सुनकर राजकुमार प्रह्लाद अत्यन्त हर्षित हुए। प्रारब्धको बलवान् मानकर प्रह्लादने उन दैत्योंसे कहा—युद्ध करनेपर भी विजय कभी नहीं होगी॥ १-२॥<br><br>तदनन्तर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले उन दानवोंने अभिमानसे चूर होकर कहा—हमें तो निश्चितरूपसे संग्राम करना चाहिये। दैव क्या है! इसे हमलोग नहीं जानते। हे दानवेश्वर! उद्यमरहित लोगोंके लिये ही दैव प्रधान होता है। दैवको किसने देखा है, कहाँ देखा है, दैव कैसा है और उसे किसने बनाया है! अतएव अब हमलोग बलका आश्रय लेकर युद्ध करेंगे। हे दैत्यश्रेष्ठ! हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं, आप केवल हमारे आगे रहें॥ ३—५॥ |
| ४७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| इत्युक्तस्तैस्तदा राजन् प्रह्लादः प्रबलारिहा।<br>सेनानीश्च तदा भूत्वा देवान्युद्धे समाह्वयत्॥ ६ | हे राजन्! तब उन दैत्योंके ऐसा कहनेपर महाबली शत्रुओंको भी मार डालनेवाले प्रह्लादने उनका सेनाध्यक्ष बनकर देवताओंको युद्धके लिये ललकारा॥ ६॥ |
| तेऽपि तत्रासुरान्दृष्ट्वा संग्रामे समुपस्थितान्।<br>सर्वे सम्भृतसम्भारा देवास्तान्समयोधयन्॥ ७ | दैत्योंको समरांगणमें डटे हुए देखकर उन सभी देवताओंने भी अपनी पूरी तैयारी कर ली और वे उनके साथ युद्ध करने लगे॥ ७॥ |
| संग्रामस्तु तदा घोरः शक्रप्रह्लादयोरभूत्।<br>पूर्णं वर्षशतं तत्र मुनीनां विस्मयावहः॥ ८ | तदनन्तर इन्द्र और प्रह्लादका वह भीषण संग्राम पूरे सौ वर्षोंतक होता रहा। वह युद्ध मुनियोंको विस्मित कर देनेवाला था॥ ८॥ |
| वर्तमाने महायुद्धे शुक्रेण प्रतिपालिताः।<br>जयमापुस्तदा दैत्याः प्रह्लादप्रमुखा नृप॥ ९ | हे राजन्! शुक्राचार्यके द्वारा संरक्षित प्रह्लाद आदि प्रधान दैत्योंने उस हो रहे महायुद्धमें विजय प्राप्त की॥ ९॥ |
| तदैवेन्द्रो गुरोर्वाक्यात्सर्वदुःखविनाशिनीम्।<br>संस्मार मनसा देवीं मुक्तिदां परमां शिवाम्॥ १० | तब इन्द्रने गुरु बृहस्पतिके वचनानुसार सम्पूर्ण दुःखोंको दूर करनेवाली, मुक्ति देनेवाली तथा परम कल्याणस्वरूपिणी भगवतीका मन-ही-मन स्मरण किया॥ १०॥ |
| इन्द्र उवाच | इन्द्र बोले— |
| जय देवि महामाये शूलधारिणि चाम्बिके।<br>शङ्खचक्रगदापद्मखड्गहस्तेऽभयप्रदे ॥ ११ | हे महामाये! हे शूलधारिणि! हे अम्बिके! हे शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा खड्गसे सुशोभित हाथोंवाली! हे अभय प्रदान करनेवाली! हे देवि! आपकी जय हो॥ ११॥ |
| नमस्ते भुवनेशानि शक्तिदर्शननायिके।<br>दशतत्त्वात्मिके मातर्महाबिन्दुस्वरूपिणि॥ १२ | हे भुवनेश्वरि! हे शक्ति! हे शाक्तादि छः दर्शनोंकी नायिकास्वरूपिणि! हे दस तत्त्वोंकी अधिष्ठातृदेवि! हे महाबिन्दुस्वरूपिणि! हे माता! आपको नमस्कार है॥ १२॥ |
| महाकुण्डलिनीरूपे सच्चिदानन्दरूपिणि।<br>प्राणाग्निहोत्रविद्ये ते नमो दीपशिखात्मिके॥ १३<br><br>पञ्चकोशान्तरगते पुच्छब्रह्मस्वरूपिणि।<br>आनन्दकलिके मातः सर्वोपनिषदर्चिते॥ १४ | हे महाकुण्डलिनीस्वरूपे! हे सच्चिदानन्दरूपिणि! हे प्राणाग्निहोत्रविद्ये! हे दीपशिखात्मिके! हे [अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय] पंचकोशोंमें सदा विराजमान रहनेवाली! हे पुच्छब्रह्मस्वरूपिणि! हे आनन्दकलिके! सभी उपनिषदोंद्वारा स्तुत हे माता! आपको नमस्कार है॥ १३-१४॥ |
| मातः प्रसीद सुमुखि भव हीनसत्त्वां-<br>स्त्रायस्व नो जननि दैत्यपराजितान् वै।<br>त्वं देवि नः शरणदा भुवने प्रमाणा<br>शक्तासि दुःखशमनेऽखिलवीर्ययुक्ते॥ १५ | हे माता! आप हमपर प्रसन्न होनेकी कृपा करें और प्रफुल्लित मुखमण्डलवाली हो जायें। हे जननि! दैत्योंसे पराजित हम निर्बलोंकी रक्षा कीजिये। हे देवि! एकमात्र आप ही हमें शरण प्रदान करनेवाली हैं; आप संसारमें प्रमाणस्वरूपा हैं। हे समस्त पराक्रमोंसे युक्त भगवति! हमलोगोंका दुःख दूर करनेमें आप पूर्ण समर्थ हैं॥ १५॥ |
| अ० १५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४७३ |
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| ध्यायन्ति येऽपि सुखिनो नितरां भवन्ति<br>दुःखान्विताविगतशोकभयास्तथान्ये ।<br>मोक्षार्थिनो विगतमानविमुक्तसङ्गाः<br>संसारवारिधिजलं प्रतरन्ति सन्तः ॥ १६ | जो भी आपका ध्यान करते हैं, वे परम सुखी हो जाते हैं; और [आपकी उपासना न करनेवाले] दूसरे लोग दुःखी तथा शोक और भयसे युक्त रहते हैं। मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले अहंकारशून्य तथा आसक्तिरहित संतलोग संसार-सागरके असीम जलको पार कर लेते हैं ॥ १६ ॥ |
| त्वं देवि विश्वजननि प्रथितप्रभावा<br>संरक्षणार्थमुदितार्तिहरप्रतापा ।<br>संहर्तुमेतदखिलं किल कालरूपा<br>को वेत्ति तेऽम्ब चरितं ननु मन्दबुद्धिः ॥ १७ | हे देवि ! हे विश्वजननि ! आप विस्तृत प्रभाववाली हैं। भक्तोंकी रक्षाके लिये आप प्रकट हो जाती हैं। आप भक्तजनोंका दुःख दूर करनेमें समर्थप्रतापवाली हैं। इस सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेके लिये आप कालस्वरूपिणी हैं। हे अम्ब ! कौन मन्दबुद्धि प्राणी आपका चरित्र जान सकता है ? ॥ १७ ॥ |
| ब्रह्मा हरश्च हरिदश्वरथो हरिश्च<br>इन्द्रो यमोऽथ वरुणोऽग्निसमीरणौ च ।<br>ज्ञातुं क्षमा न मुनयोऽपि महानुभावा<br>यस्याः प्रभावमतुलं निगमागमाश्च ॥ १८ | ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, इन्द्र, यम, वरुण, अग्नि, वायु, निगम, आगम तथा महातपस्वी मुनिगण भी आपकी अनुपम महिमाको जाननेमें समर्थ नहीं हैं ॥ १८ ॥ |
| धन्यास्त एव तव भक्तिपरा महान्तः<br>संसारदुःखरहिताः सुखसिन्धुमग्नाः ।<br>ये भक्तिभावरहिता न कदापि दुःखा-<br>म्भोधिं जनिष्यतरङ्गमुमे तरन्ति ॥ १९ | हे उमे ! जो आपकी भक्तिमें तत्पर हैं, वे ही परम धन्य हैं और सांसारिक दुःखोंसे मुक्त होकर सुखके समुद्रमें डूबे रहते हैं; किंतु जो लोग आपकी भक्तिभावनासे वंचित हैं, वे जन्म-मरणरूपी तरंगोंवाले दुःखमय भवसागरको कभी भी पार नहीं कर सकते ॥ १९ ॥ |
| ये वीज्यमानाः सितचामरैश्च<br>क्रीडन्ति धन्याः शिबिकाधिरूढाः ।<br>तैः पूजिता त्वं किल पूर्वदेहे<br>नानोपहारैरिति चिन्तयामि ॥ २० | जिन भाग्यशाली लोगोंके ऊपर स्वच्छ चँवर डुलाये जा रहे हैं, जो हास-विलासका सुख भोग रहे हैं तथा जो सुन्दर यानोंपर सवारी कर रहे हैं—उनके विषयमें मैं तो यही सोचता हूँ कि उन्होंने पूर्वजन्ममें अनेकविध पूजनोपचारोंसे निश्चय ही आपकी पूजा की है ॥ २० ॥ |
| ये पूज्यमाना वरवारणस्था<br>विलासिनीवृन्दविलासयुक्ताः ।<br>सामन्तैश्चोपनतैर्व्रजन्ति<br>मन्ये हि तैस्त्वं किल पूजितासि ॥ २१ | पूजित होते हुए जो लोग उत्तम हाथियोंपर विराजमान रहते हैं, जो रमणियोंके साथ आमोद-प्रमोदमें संलग्न हैं और जो विनम्र सामंतोंके साथ चलते हैं, मैं मानता हूँ कि उन्होंने अवश्य आपकी पूजा की है ॥ २१ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता मघवता देवी विश्वेश्वरी तदा ।<br>प्रादुर्बभूव तरसा सिंहारूढा चतुर्भुजा ॥ २२<br>शङ्खचक्रगदापद्मानिबिभ्रती चारुलोचना ।<br>रक्ताम्बरधरा देवी दिव्यमाल्यविभूषणा ॥ २३ | **व्यासजी बोले—**तब इन्द्रके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती विश्वेश्वरी तुरंत प्रकट हो गयीं। उस समय वे सिंहपर बैठी हुई थीं; वे चार भुजाओंसे युक्त थीं; उन्होंने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कर रखा था; उनके नेत्र सुन्दर थे; वे लाल वस्त्र पहने हुए थीं और वे देवी दिव्य मालाओंसे विभूषित थीं ॥ २२-२३ ॥ |
| ४७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| तानुवाच सुरान्देवी प्रसन्नवदना गिरा।<br>भयं त्यजन्तु भो देवाः शं विधास्ये किलाधुना ॥ २४ | प्रसन्न मुखमण्डलवाली भगवतीने उन देवताओंसे कहा—हे देवताओ! आपलोग भयका त्याग कर दें, अब मैं आपलोगोंका कल्याण अवश्य करूँगी ॥ २४ ॥ |
| इत्युक्त्वा सा तदा देवी सिंहारूढातिसुन्दरी।<br>जगाम तरसा तत्र यत्र दैत्या मदान्विताः ॥ २५ | तब ऐसा कहकर सिंहपर सवार वे परम सुन्दर भगवती तुरंत वहाँ चल पड़ीं, जहाँ अभिमानी दानव विद्यमान थे ॥ २५ ॥ |
| प्रह्लादप्रमुखाः सर्वे दृष्ट्वा देवीं पुरःस्थिताम्।<br>ऊचुः परस्परं भीताः किं कर्तव्यमितस्तदा ॥ २६ | प्रह्लाद आदि सभी प्रमुख दानव भगवतीको सामने स्थित देखकर भयभीत हो आपसमें कहने लगे कि अब हमें क्या करना चाहिये ? ॥ २६ ॥ |
| देवं नारायणं चात्र सम्प्राप्ता चण्डिका किल।<br>महिषान्तकरी नूनं चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ २७ | सम्भवतः यह चण्डिका भगवान् नारायणसे मिलकर यहाँ आयी है। इसीने महिषासुरका वध किया था तथा चण्ड-मुण्डका विनाश किया था। |
| निहनिष्यति नः सर्वानम्बिका नात्र संशयः।<br>वक्रदृष्ट्या यया पूर्वं निहतौ मधुकैटभौ ॥ २८ | जिसने पूर्वकालमें अपनी वक्रदृष्टिसे मधु-कैटभका संहार कर डाला था, वह अम्बिका हम सबको अवश्य मार डालेगी ॥ २७-२८ ॥ |
| एवं चिन्तातुरान्वीक्ष्य प्रह्लादस्तानुवाच ह।<br>योद्धव्यं नाथ गन्तव्यं पलाय्य दानवोत्तमाः ॥ २९ | इस प्रकार उन्हें चिन्तासे व्याकुल देखकर प्रह्लादने उनसे कहा—हे श्रेष्ठ दानवो! इस समय हमें युद्ध नहीं करना चाहिये, बल्कि भागकर यहाँसे चले जाना चाहिये ॥ २९ ॥ |
| नमुचिस्तानुवाचाथ पलायनपरानिह।<br>हनिष्यति जगन्माता रुषिता किल हेतिभिः ॥ ३० | तब भागनेकी चेष्टा करनेवाले उन दैत्योंसे नमुचिने कहा—ये जगन्माता भगवती कुपित होकर शस्त्रोंसे हमलोगोंका संहार अवश्य कर देंगी। [इसके |
| तथा कुरु महाभाग यथा दुःखं न जायते।<br>व्रजामोऽद्यैव पातालं तां स्तुत्वा तदनुज्ञया ॥ ३१ | बाद उसने प्रह्लादसे कहा—] हे महाभाग! आप ऐसा उपाय करें, जिससे हमलोगोंको दुःख न मिले। उन भगवतीकी स्तुति करके उनकी आज्ञासे हमलोग इसी क्षण पातालके लिये प्रस्थान कर दें ॥ ३०-३१ ॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>स्तौमि देवीं महामायां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्।<br>सर्वेषां जननीं शक्तिं भक्तानामभयङ्करीम् ॥ ३२ | प्रह्लाद बोले—सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली, सभी प्राणियोंकी माता तथा भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाली शक्तिस्वरूपा भगवती महामायाकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ ३२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा विष्णुभक्तस्तु प्रह्लादः परमार्थवित्।<br>तुष्टाव जगतां धात्रीं कृताञ्जलिपुटस्तदा ॥ ३३ | व्यासजी बोले—ऐसा कहकर परमार्थवेत्ता विष्णुभक्त प्रह्लाद दोनों हाथ जोड़कर जगज्जननी भगवतीकी स्तुति करने लगे— ॥ ३३ ॥ |
| मालासर्पवदाभाति यस्यां सर्वं चराचरम्।<br>सर्वाधिष्ठानरूपायै तस्यै ह्रींमूर्तये नमः ॥ ३४ | जिनमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् मालामें सर्पकी भाँति प्रतीत हो रहा है, सबकी अधिष्ठानस्वरूपा उन ‘ह्रीं’ मूर्तिधारिणी भगवतीको नमस्कार है ॥ ३४ ॥ |