देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३
५४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मदग्रे को भवेच्छूरः कोटिशश्चेत्तथाविधाः।<br>न बिभेम्येकतः कामं हनिष्याम्यद्य सर्वथा॥ ३२ | मेरे सम्मुख भला कौन पराक्रमी बन सकता है? यदि उस इन्द्रके समान करोड़ों लोग मेरे सामने आ जायँ तो भी मैं नहीं डरूँगा, तब उस अकेले इन्द्रसे कैसे डर सकता हूँ? उसको तो मैं अब निश्चितरूपसे मार डालूँगा॥ ३२॥ |
| शूरः शान्तेष्वसौ नूनं तपस्विषु बलाधिकः।<br>बलकर्ता हि कुहको लम्पटः परदारहृत्॥ ३३ | वह इन्द्र शान्त स्वभाववाले लोगोंपर अपने पराक्रमका प्रदर्शन तथा तपस्वियोंपर अपने बलका प्रयोग करता है। वह मायावी, व्यभिचारी तथा दूसरेकी स्त्रीका हरण करनेवाला है॥ ३३॥ |
| अप्सरोबलसम्मतस्तपोविघ्नकरः खलः।<br>छिद्रप्रहरणः पापो नित्यं विश्वासघातकः॥ ३४ | वह दुष्ट अपनी अप्सराओंके बलबूते दूसरोंकी तपस्यामें विघ्न डालता है, शत्रु की कमजोरी देखकर अवसरवादिताका लाभ उठाकर उसपर प्रहार करता है, वह सदासे पापकृत्योंमें रत रहनेवाला तथा घोर विश्वासघात करनेवाला है॥ ३४॥ |
| नमुचिर्निहतो येन कृत्वा सन्धिं दुरात्मना।<br>शपथान्विविधानादौ कृत्वा भीतेन छद्मना॥ ३५ | भयके मारे उस छली इन्द्रने पहले विश्वास-प्रदर्शनके लिये अनेक प्रकारकी शपथें खाकर नमुचि नामक दैत्यसे सन्धि स्थापित की, किंतु बादमें उस दुष्टात्माने छलपूर्वक नमुचिको मार डाला॥ ३५॥ |
| विष्णुस्तु कपटाचार्यः कुहकः शपथाकरः।<br>नानारूपधरः कामं बलकृद्दम्भपण्डितः॥ ३६<br><br>कृत्वा कोलाकृतिं येन हिरण्याक्षो निपातितः।<br>हिरण्यकशिपुर्येन नृसिंहेन च घातितः॥ ३७ | विष्णु तो कपटका आचार्य, मायावी, झूठी प्रतिज्ञाएँ करनेमें बड़ा ही कुशल, बहुरूपिया, सैन्य-बलका संचय करनेवाला तथा महान् पाखण्डी है। उसीने सूकरका रूप धारणकर हिरण्याक्षका वध कर डाला और नृसिंहका रूप धारणकर हिरण्यकशिपुका संहार किया॥ ३६-३७॥ |
| नाहं तद्वशगो नूनं भवेयं दनुनन्दनाः।<br>विश्वासं नैव गच्छामि देवानां कुत्र कर्हिचित्॥ ३८ | अतएव हे दनुके वंशजो! मैं उसका वशवर्ती कभी भी नहीं होऊँगा और देवताओंका कहीं भी कदापि विश्वास नहीं करूँगा॥ ३८॥ |
| किं करिष्यति मे विष्णुरिन्द्रो वा बलवत्तरः।<br>रुद्रो वापि न मे शक्तः प्रतिकर्तुं रणाङ्गणे॥ ३९<br><br>त्रिविष्टपं ग्रहीष्यामि जित्वेन्द्रं वरुणं यमम्।<br>धनदं पावकं चैव चन्द्रसूर्यौ विजित्य च॥ ४० | विष्णु तथा इन्द्र—ये दोनों मेरा क्या कर लेंगे? यहाँतक कि उनसे भी अधिक शक्तिशाली रुद्र भी युद्ध-भूमिमें मेरा प्रतीकार कर पानेमें समर्थ नहीं हैं। इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, चन्द्रमा तथा सूर्यको जीतकर मैं स्वर्गपर अधिकार कर लूँगा॥ ३९-४०॥ |
| यज्ञभागभुजः सर्वे भविष्यामोऽद्य सोमपाः।<br>जित्वा देवसमूहञ्च विहरिष्यामि दानवैः॥ ४१ | अब हमलोग यज्ञका भाग प्राप्त करेंगे तथा सोमरसका पान करनेवाले होंगे। मैं देवसमुदायको जीतकर दानवोंके साथ विहार करूँगा॥ ४१॥ |
| न मे भयं सुरेभ्यश्च वरदानेन दानवाः।<br>मरणं न नरेभ्यश्च नारी किं मे करिष्यति॥ ४२ | हे दानवो! वरदानके कारण मुझे देवताओंका भय नहीं है। पुरुषसे मेरी मृत्यु हो ही नहीं सकती; तब भला स्त्री मेरा क्या कर लेगी?॥ ४२॥ |
| अ० ३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५४५ |
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| पातालपर्वतेभ्यश्च समाहूय वरान्वरान्।<br>दानवान्मम सैन्येशान्कुर्वन्तु त्वरिताश्चराः॥ ४३ | हे गुप्तचरो! पातालमें तथा पर्वतोंपर रहनेवाले बड़े-बड़े दानव-वीरोंको तत्काल यहाँ बुलाकर उन्हें मेरी सेनाओंका अध्यक्ष बना दो॥ ४३॥ |
| एकोऽहं सर्वदेवान्किजेतुं दानवाः क्षमः।<br>शोभार्थं वः समाहूय नयामि सुरसङ्गमे॥ ४४ | हे दानवो! मैं तो अकेला ही समस्त देवताओंको जीतनेमें समर्थ हूँ, फिर भी शोभा बढ़ानेकी दृष्टिसे आप सबको भी बुलाकर देवताओंके साथ होनेवाले संग्राममें ले चलूँगा॥ ४४॥ |
| शृङ्गाभ्यां च खुराभ्यां च हनिष्येऽहं सुरान्किल।<br>न मे भयं सुरेभ्यश्च वरदानप्रभावतः॥ ४५ | मैं अपनी सींगों तथा खुरोंसे देवताओंको निश्चितरूपसे मार डालूँगा। वरदानके प्रभावसे मुझे देवताओंसे भय नहीं है॥ ४५॥ |
| अवध्योऽहं सुरगणैरसुरैर्मानवैस्तथा।<br>तस्मात्सज्जा भवन्त्वद्य देवलोकजयाय वै॥ ४६ | देवता, दानव तथा मनुष्य—सभीसे मैं अवध्य हूँ, अतः आप सब देवलोकपर विजय प्राप्त करनेके लिये अब तैयार हो जायँ॥ ४६॥ |
| जित्वा सुरालयं दैत्या विहरिष्यामि नन्दने।<br>मन्दारकुसुमापीडा देवयोषित्समन्विताः॥ ४७<br>कामधेनुपयोत्सिक्ताः सुधापानप्रमोदिताः।<br>देवगन्धर्वगीतादिनृत्यलास्यसमन्विताः ॥ ४८ | हे दैत्यो! देवलोकको जीतकर मैं नन्दनवनमें विहार करूँगा। मन्दारपुष्पकी मालाएँ धारण करके आपलोग देवांगनाओंके साथ रहेंगे, कामधेनुके दुग्धका सेवन करेंगे, प्रसन्नतापूर्वक अमृत-पान करेंगे और देवताओं तथा गन्धर्वोंके गीतों तथा मनमोहक हाव-भाव-युक्त नृत्योंका आनन्द लेंगे॥ ४७-४८॥ |
| उर्वशी मेनका रम्भा घृताची च तिलोत्तमा।<br>प्रम्लोचा महासेना मिश्रकेशी मदोत्कटा॥ ४९<br>विप्रचित्तिप्रभृतयो नृत्यगीतविशारदाः।<br>रञ्जयिष्यन्ति वः सर्वान्नानासवनिषेवणैः॥ ५० | उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा, प्रम्लोचा, महासेना, मिश्रकेशी, मदोत्कटा, विप्रचित्ति आदि नृत्य तथा गायन-कलामें अति निपुण अप्सराएँ विविध प्रकारके मद्य पिलाकर आप सभीका मनोरंजन करेंगी॥ ४९-५०॥ |
| सर्वे सज्जा भवन्त्वद्य रोचतां गमनं दिवि।<br>संग्रामार्थं सुरैः सार्धं कृत्वा मङ्गलमुत्तमम्॥ ५१ | देवताओंके साथ युद्ध करनेके लिये देवलोकके लिये प्रस्थान करना यदि आपलोगोंको उचित लगे तो आप सब उत्तम मंगलाचार सम्पन्न करके आज ही चलनेके लिये तैयार हो जाइये॥ ५१॥ |
| रक्षणार्थं च सर्वेषां भार्गवं मुनिसत्तमम्।<br>समाहूय च सम्पूज्य स्थाप्य यज्ञे गुरुं परम्॥ ५२ | समस्त दानवोंकी रक्षाके लिये मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्यको बुलाकर उनका पूजन करके उन परम गुरुको यज्ञ-कार्यमें नियुक्त कीजिये॥ ५२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति संदिश्य दैत्येन्द्रान्महिषः पापधीस्तदा।<br>जगाम त्वरितो राजन्भवनं स्वं मुदान्वितः॥ ५३ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार दानववीरोंको आदेश देकर वह पापबुद्धि महिषासुर प्रसन्नताके साथ शीघ्र ही अपने भवनको चला गया॥ ५३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
भगवतीमाहात्म्ये दैत्यसैन्योद्योगो नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 18 A