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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८३

अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८३

श्लोकअर्थ
स्वाहास्वधानाममनुप्रभावै-<br>स्तृप्यन्ति देवाः पितरस्तथैव।<br>यज्ञेषु सर्वेषु मुदा हरन्ति<br>यन्नामयुग्मं श्रुतिभिर्मुनीन्द्राः॥ २५देवगण इनके 'स्वाहा' नाममन्त्रके प्रभावसे तथा पितृगण 'स्वधा' नाममन्त्रके प्रभावसे तृप्त होते हैं। इसीलिये महान् मुनिजन प्रसन्नतापूर्वक सभी यज्ञों तथा श्राद्धकार्योंमें मन्त्रोंके साथ 'स्वाहा' एवं 'स्वधा' नामोंका उच्चारण करते हैं॥ २५॥
यस्येच्छया सृजति विश्वमिदं प्रजेशो<br>नानावतारकलनं कुरुते हरिश्च।<br>नूनं करोति जगतः किल भस्म शम्भु-<br>स्तां शर्मदां न भजते नु कथं मनुष्यः॥ २६जिनकी इच्छासे ब्रह्मा इस विश्वका सृजन करते हैं, भगवान् विष्णु अनेकविध अवतार लेते हैं और शंकरजी जगत्‌को भस्मसात् करते हैं, उन कल्याणकारिणी भगवतीको मनुष्य क्यों नहीं भजता?॥ २६॥
नैकोऽस्ति सर्वभुवनेषु तया विहीनो<br>देवो नरोऽथ विहगः किल पन्नगो वा।<br>गन्धर्वराक्षसपिशाचनगेषु नूनं<br>यः स्पन्दितुं भवति शक्तियुतो यथेच्छम्॥ २७सभी भुवनोंमें कोई भी ऐसा देवता, मनुष्य, पक्षी, सर्प, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच एवं पर्वत नहीं है; जो उन भगवतीकी शक्तिके बिना अपनी इच्छासे शक्तिसम्पन्न होकर स्पन्दित होनेमें समर्थ हो॥ २७॥
तां न सेवेत कश्चण्डीं सर्वकामार्थदां शिवाम्।<br>व्रतं तस्या न कः कुर्याद्वाञ्छन्नर्थचतुष्टयम्॥ २८सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन कल्याणदायिनी चण्डिकाकी सेवा भला कौन नहीं करेगा? चारों प्रकारके पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष)-को चाहनेवाला कौन प्राणी उन भगवतीके नवरात्रव्रतका अनुष्ठान नहीं करेगा?॥ २८॥
महापातकसंयुक्तो नवरात्रव्रतं चरेत्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा॥ २९यदि कोई महापापी भी नवरात्रव्रत करे तो वह समस्त पापोंसे मुक्ति पा लेता है, इसमें लेशमात्र भी विचार नहीं करना चाहिये॥ २९॥
पुरा कश्चिद्वणिग्दीनो धनहीनः सुदुःखितः।<br>कुटुम्बी चाभवत्कश्चित् कोसले नृपसत्तम॥ ३०हे नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालमें कोसलदेशमें दीन, धनहीन, अत्यन्त दुःखी एवं विशाल कुटुम्बवाला एक वैश्य रहता था॥ ३०॥
अपत्यानि बहून्यस्याभवन्क्षुत्पीडितानि च।<br>भक्ष्यं किञ्चित्तु सायाह्ने प्राप्तस्तस्य च बालकाः॥ ३१<br><br>भुंक्ते स्म कार्यकर्त्तासौ परस्याथ बुभुक्षितः।<br>कुटुम्बभरणं तत्र चकारातिनिराकुलः॥ ३२उसकी अनेक सन्तानें थीं, जो धनाभावके कारण क्षुधासे पीड़ित रहा करती थीं; सायंकालमें उसके लड़कोंको खानेके लिये कुछ मिल जाता था तथा वह भी कुछ खा लेता था। इस प्रकार वह वणिक् भूखा रहते हुए सर्वदा दूसरोंका काम करके धैर्यपूर्वक परिवारका पालन-पोषण कर रहा था॥ ३१-३२॥
सदा धर्मरतः शान्तः सदाचारश्च सत्यवाक्।<br>अक्रोधनश्च धृतिमान्निर्मदश्चानसूयकः॥ ३३वह सर्वदा धर्मपरायण, शान्त, सदाचारी, सत्यवादी, क्रोध न करनेवाला, धैर्यवान्, अभिमानरहित तथा ईर्ष्याहीन था॥ ३३॥
सम्पूज्य देवता नित्यं पितॄनप्यतिथींस्तदा।<br>भुञ्जाने पोष्यवर्गेऽथ कृतवान्भोजनं वणिक्॥ ३४प्रतिदिन देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंकी पूजा करके वह अपने परिवारजनोंके भोजन कर लेनेके उपरान्त स्वयं भोजन करता था॥ ३४॥

३८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं गच्छति काले वै सुशीलो नामतो गुणैः।<br>दारिद्र्यार्तो द्विजं शान्तं पप्रच्छातिबुभुक्षितः॥ ३५इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गुणोंके कारण सुशील नामसे ख्यातिप्राप्त उस वणिक्ने दरिद्रता तथा क्षुधा-पीड़ासे अत्यन्त व्याकुल होकर एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणसे पूछा॥ ३५॥
सुशील उवाच<br>भो भूदेव कृपां कृत्वा वदस्वाद्य महामते।<br>कथं दारिद्र्यनाशः स्यादिति मे निश्चयेन वै॥ ३६**सुशील बोला—**हे महाबुद्धिसम्पन्न ब्राह्मण-देवता! आज मुझपर कृपा करके यह बताइये कि मेरी दरिद्रताका नाश निश्चितरूपसे कैसे हो सकता है?॥ ३६॥
धनैषणा मे नैवास्ति धनी स्यामिति मानद।<br>कुटुम्बभरणार्थं वै पृच्छामि त्वां द्विजोत्तम॥ ३७हे मानद! मुझे धनकी अभिलाषा तो नहीं है; किंतु हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे कोई ऐसा उपाय पूछ रहा हूँ, जिससे मैं कुटुम्बके भरण-पोषणमात्रके लिये धनसम्पन्न हो जाऊँ॥ ३७॥
पुत्री सुतस्तु मे बालो भक्षार्थी रोदते भृशम्।<br>तावन्मात्रं गृहे नान्नं मुष्टिमेकां ददाम्यहम्॥ ३८मेरी पुत्री और पुत्र [क्षुधासे पीड़ित होकर] भोजनके लिये बहुत रोते हैं और मेरे घरमें इतना भी अन्न नहीं रहता कि मैं उन्हें एक मुट्ठीभर अन्न दे सकूँ॥ ३८॥
विसर्जितो यतो गेहाद् गतो बालो रुदन्मया।<br>अतो मे दह्यतेऽत्यर्थं किं करोमि धनं विना॥ ३९रोते हुए बालकको मैंने घरसे निकाल दिया और वह चला गया। इसलिये मेरा हृदय शोकाग्निमें जल रहा है। धनके अभावमें मैं क्या करूँ?॥ ३९॥
विवाहोऽस्ति सुताया मे नास्ति वित्तं करोमि किम्।<br>दशवर्षाधिकायास्तु दानकालोऽपि यात्यलम्॥ ४०मेरी पुत्री विवाहके योग्य हो चुकी है, किंतु मेरे पास धन नहीं है। अब मैं क्या करूँ? वह दस वर्षसे अधिककी हो गयी है; इस प्रकार कन्यादानका समय बीता जा रहा है॥ ४०॥
तेन शोचामि विप्रेन्द्र सर्वज्ञोऽसि दयानिधे।<br>तपो दानं व्रतं किञ्चिद् ब्रूहि मन्त्रं जपं तथा॥ ४१<br><br>येनाहं पोष्यवर्गस्य करोमि द्विज पोषणम्।<br>तावन्मे स्याद्धनप्राप्तिर्नाधिकं प्रार्थये किल॥ ४२हे विप्रेन्द्र! इसीलिये मैं अत्यधिक चिन्तित हूँ। हे दयानिधान! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतएव मुझे कोई ऐसा तप, दान, व्रत, मन्त्र तथा जप बताइये, जिससे मैं अपने आश्रितजनोंका भरण-पोषण करनेमें समर्थ हो जाऊँ। हे द्विज! बस मुझे उतना ही धन मिल जाय और मैं उससे अधिक धनके लिये प्रार्थना नहीं करता॥ ४१-४२॥
त्वत्प्रसादात्कुटुम्बं मे सुखितं प्रभवेदिह।<br>तत्कुरुष्व महाभाग ज्ञानेन परिचिन्त्य च॥ ४३हे महाभाग! आपकी कृपासे मेरा परिवार अवश्य सुखी हो सकता है। अतएव आप अपने ज्ञानबलसे भलीभाँति विचार करके वह उपाय बताइये॥ ४३॥