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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० १७] षष्ठ स्कन्ध ८०३

अ० १७] षष्ठ स्कन्ध ८०३


लोभ एव मनुष्याणां देहसंस्थो महारिपुः।<br>सर्वदुःखाकरः प्रोक्तो दुःखदः प्राणनाशकः॥ ४६लोभ मनुष्योंके देहमें रहनेवाला सबसे बड़ा शत्रु है। यह समस्त दुःखोंका आगार, दुःखदायी तथा प्राणोंका नाश करनेवाला कहा गया है॥ ४६॥
सर्वपापस्य मूलं हि सर्वदा तृष्णायान्वितः।<br>विरोधकृत्त्रिवर्णानां सर्वार्तेः कारणं तथा॥ ४७यह लोभ सम्पूर्ण पापोंकी जड़ तथा सभी दुःखोंका कारण है। लोभसे युक्त प्राणी सदा तीनों वर्णोंके लोगोंसे विरोध रखनेवाला होता है॥ ४७॥
लोभात्त्यजन्ति धर्मं वै कुलधर्मं तथैव हि।<br>मातरं भ्रातरं हन्ति पितरं बान्धवं तथा॥ ४८लोभके वशीभूत प्राणी अपने सदाचार तथा कुल-धर्मका भी परित्याग कर देते हैं। वे अपने माता, पिता, भाई, बान्धव, गुरु, मित्र, पत्नी, पुत्र तथा बहनतकका वध कर देते हैं। इस प्रकार लोभके वशीभूत मनुष्य पापसे विमोहित होकर कौन-सा दुष्कर्म नहीं कर डालता॥ ४८-४९॥
गुरुं मित्रं तथा भार्यां पुत्रं च भगिनीं तथा।<br>लोभाविष्टो न किं कुर्यादकृत्यं पापमोहितः॥ ४९
क्रोधात्कामादहङ्कारालोभ एव महारिपुः।<br>प्राणांस्त्यजति लोभेन किं पुनः स्यादनावृतम्॥ ५०क्रोध, काम तथा अहंकारसे भी बढ़कर लोभ महान् शत्रु है। लोभमें पड़कर मनुष्य अपने प्राणतक गँवा देता है; फिर इसके विषयमें और क्या कहा जाय !॥ ५०॥
पूर्वजास्ते महाराज धर्मज्ञाः सत्पथे स्थिताः।<br>पाण्डवाः कौरवाश्चैव लोभेन निधनं गताः॥ ५१हे महाराज ! आपके पूर्वज धर्मज्ञ तथा सत्यपथपर चलनेवाले थे, किंतु वे पाण्डव तथा कौरव लोभके कारण ही मारे गये। जहाँ भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, बाह्रीक, भीमसेन, धर्मपुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन तथा श्रीकृष्ण थे, फिर भी लोभके वशीभूत उन्होंने आपसमें भीषण युद्ध किया और अपने कुटुम्बका महाविनाश कर डाला। उस युद्धमें द्रोण, भीष्म, पाण्डवोंके पुत्र, भाई, पिता, पुत्र सभी मारे गये॥ ५१-५४॥
यत्र भीष्मश्च द्रोणश्च कृपः कर्णश्च बाह्लिकः।<br>भीमसेनो धर्मपुत्रस्तथैवार्जुनकेशवौ॥ ५२
तथापि युद्धमत्युग्रं कृतं तैश्च परस्परम्।<br>कुटुम्बकदनं भूरि कृतं लोभात्तैरैरिह॥ ५३
हतो द्रोणो हतो भीष्मस्तथैव पाण्डवात्मजाः।<br>भ्रातरः पितरः पुत्राः सर्वे वै निहता रणे॥ ५४
तस्माल्लोभाभिभूतस्तु किं न कुर्यान्नरः किल।<br>हैहयैर्निहताः सर्वे भृगवः पापबुद्धिभिः॥ ५५अतएव लोभपरायण मनुष्य क्या नहीं कर डालता? [लोभके कारण ही] पापबुद्धि हैहयवंशी क्षत्रियोंने भृगुकुलके समस्त ब्राह्मणोंको मार डाला था॥ ५५॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयैर्धनाहरणेन सह भृगूणां वधवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥


अथ सप्तदशोऽध्यायः

भगवतीकी कृपासे भार्गव-ब्राह्मणीकी जंघासे तेजस्वी बालककी उत्पत्ति, हैहयवंशी क्षत्रियोंकी उत्पत्तिकी कथा

जनमेजय उवाच<br>कथं ताश्च स्त्रियः सर्वा भृगूणां दुःखसागरात्।<br>मुक्ता वंशः पुनस्तेषां ब्राह्मणानां स्थिरोऽभवत्॥ १जनमेजय बोले— भृगुवंशकी स्त्रियोंका पुनः दुःखरूप समुद्रसे कैसे उद्धार हुआ और उन ब्राह्मणोंकी वंशपरम्परा किस प्रकार स्थिर रही?॥ १॥
हैहयैः किं कृतं कार्यं हत्वा तान्ब्राह्मणानपि।<br>क्षत्रियैर्लोभसंयुक्तैः पापाचारैर्वदस्व तत्॥ २लोभके वशीभूत तथा पापाचारी हैहय क्षत्रियोंने उन ब्राह्मणोंको मारनेके पश्चात् कौन-सा कार्य किया? उसे आप बताइये॥ २॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 C

८०४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
न तृप्तिरस्ति मे ब्रह्मन् पिबतस्ते कथामृतम् ।<br>पावनं सुखदं नृणां परलोके फलप्रदम् ॥ ३हे ब्रह्मन्! आपके द्वारा कथित इस पवित्र, लोगोंके लिये सुखदायक तथा परलोकमें फल देनेवाले कथामृतका पान करते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ३ ॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् ।<br>यथा स्त्रियस्तु ता मुक्ता दुःखात्तस्माद्दुरत्ययात् ॥ ४व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, वे स्त्रियाँ उस भयावह दुःखसे जिस प्रकार मुक्त हुई, अब मैं उस पापनाशिनी कथाका वर्णन करूँगा ॥ ४ ॥
भृगुपत्न्यो यदा राजन् हिमवन्तं गिरिं गताः ।<br>भयत्रस्ता विभग्नाशा हैहयैः पीडिता भृशम् ॥ ५हे राजन्! जब क्षत्रिय हैहय भृगुकुलकी नारियोंको बहुत पीड़ित करने लगे तब वे भयभीत तथा निराश होकर हिमालयपर्वतपर चली गयीं ॥ ५ ॥
गौरीं तत्र तु संस्थाप्य मृण्मयीं सरितस्तटे ।<br>उपोषणपराश्चक्रुर्निश्चयं मरणं प्रति ॥ ६उन्होंने वहाँ नदीके तटपर गौरीकी मृण्मयी प्रतिमा स्थापित करके निराहार रहते हुए [उपासनामें लीन होकर] अपने मरणके प्रति पूरा निश्चय कर लिया ॥ ६ ॥
स्वप्ने गत्वा तदा देवी प्राह ताः प्रमदोत्तमाः ।<br>युष्मासु मध्ये कस्याश्चिद्भविता चोरुजः पुमान् ॥ ७<br>मदंशशक्तिसम्भिन्नः स वः कार्यं विधास्यति ।<br>इत्यादिश्य पराम्बा सा पश्चादन्तर्हिताभवत् ॥ ८एक समय स्वप्नमें भगवती जगदम्बाने उन उत्तम स्त्रियोंके पास पहुँचकर कहा—तुमलोगोंमेंसे किसीकी जंघासे एक पुरुष उत्पन्न होगा। मेरा अंशभूत वही शक्तिमान् पुरुष तुमलोगोंका कार्य सिद्ध करेगा। ऐसा कहकर पराम्बा भगवती अन्तर्धान हो गयीं ॥ ७-८ ॥
जागृतास्तु ततः सर्वा मुदमापुर्वराङ्गनाः ।<br>काचित्तासां भयोद्विग्ना कामिनी चतुरा भृशम् ॥ ९<br>दधार चोरुणैकेन गर्भं सा कुलवृद्धये ।जागनेपर वे सभी स्त्रियाँ बहुत प्रसन्न हुईं। उनमेंसे किसी चतुर, कामिनी स्त्रीने जो भयसे त्रस्त थी; वंशवृद्धिकेहेतु अपनी एक जंघामें गर्भ धारण किया ॥ ९ १/२ ॥
पलायनपरा दृष्टा क्षत्रियैर्ब्राह्मणी यदा ॥ १०<br>विह्वला तेजसा युक्ता तदा ते दुद्रुवुर्भृशम् ।जब उन हैहय क्षत्रियोंने व्याकुल तथा तेजयुक्त उस स्त्रीको भागती हुई देखा तब वे उसके पीछे दौड़ पड़े ॥ १० १/२ ॥
गृह्यतां वध्यतां नारी सगर्भा याति सत्वरा ॥ ११<br>इति ब्रुवन्तः सम्प्राप्ताः कामिनीं खड्गपाणयः ।'यह गर्भ धारण करके वेगपूर्वक भागी जा रही है, इसे पकड़ लो और मार डालो'—इस प्रकार कहते हुए हाथमें तलवार लेकर वे उस स्त्रीके पास पहुँच गये ॥ ११ १/२ ॥
सा भयार्ता तु तान्दृष्ट्वा रुरोद समुपागतान् ॥ १२<br>गर्भस्य रक्षणार्थं सा चुक्रोशातिभयातुरा ।भयसे घबरायी हुई वह स्त्री अपने समीप आये हुए उन क्षत्रियोंको देखकर रोने लगी और पुनः गर्भरक्षाके लिये भयसे विह्वल होकर जोर-जोरसे विलाप करने लगी ॥ १२ १/२ ॥
रुदतीं मातरं श्रुत्वा दीनां प्राणविवर्जिताम् ॥ १३<br>निराधारां क्रन्दमानां क्षत्रियैर्भृशतापिताम् ।<br>गृहीतामिव सिंहेन सगर्भां हरिणीं यथा ॥ १४<br>साश्रुनेत्रां वेपमानां सङ्क्रुध्य बालकस्तदा ।<br>भित्त्वोरुं निर्जगामाशु गर्भः सूर्य इवापरः ॥ १५<br>मुष्णन्दृष्टीः क्षत्रियाणां तेजसा बालकः शुभः ।तब दयनीय दशावाली, प्राणहीन-सी प्रतीत हो रही, आश्रयहीन, क्षत्रियोंसे पीड़ित होनेके कारण क्रन्दन करती हुई, सिंहके द्वारा पकड़ी गयी गर्भवती हिरनीके समान प्रतीत होनेवाली, आँसूभरे नेत्रोंवाली तथा थर-थर काँपती हुई माताका रुदन सुनकर वह सुन्दर गर्भस्थ बालक कुपित होकर अपने तेजसे क्षत्रियोंकी नेत्र-ज्योतिका हरण करता हुआ जंघाका भेदन करके दूसरे सूर्यकी भाँति शीघ्र ही बाहर निकल आया ॥ १३-१५ १/२ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 26 D

अ० १७]षष्ठ स्कन्ध८०५

| दर्शनाद् बालकस्याशु सर्वे जाता विलोचनाः ॥ १६ <br><br> बभ्रमुर्गिरिदुर्गेषु जन्मान्धा इव क्षत्रियाः । <br> चिन्तितं मनसा सर्वैः किमेतदिति साम्प्रतम् ॥ १७ <br><br> सर्वे चक्षुर्विहीना यज्जाताः स्म बालदर्शनात् । <br> ब्राह्मण्यास्तु प्रभावोऽयं सतीव्रतबलं महत् ॥ १८ <br><br> क्षणाद्दामोघसङ्कल्पाः किं करिष्यन्ति दुःखिताः । <br> इति सञ्चिन्त्य मनसा नेत्रहीना निराश्रयाः ॥ १९ <br><br> ब्राह्मणीं शरणं जग्मुर्हैहया गतचेतसः । <br> प्रणेमुस्तां भयत्रस्तां कृताञ्जलिपुटाश्च ते ॥ २० <br><br> ऊचुश्चैनां भयोद्विग्नां दृष्ट्यर्थं क्षत्रियर्षभाः । <br> प्रसीद सुभगे मातः सेवकास्ते वयं किल ॥ २१ <br><br> कृतापराधा रम्भोरु क्षत्रियाः पापबुद्धयः । <br> दर्शनात्तव तन्वङ्गि जाताः सर्वे विलोचनाः ॥ २२ <br><br> मुखं ते नैव पश्यामो जन्मान्धा इव भामिनि । <br> अद्भुतं ते तपो वीर्यं किं कुर्मः पापकारिणः ॥ २३ <br><br> शरणं ते प्रपन्नाः स्मो देहि चक्षूंषि मानदे । <br> अन्धत्वं मरणादुग्रं कृपां कर्तुं त्वमर्हसि ॥ २४ <br><br> पुनर्दृष्टिप्रदानेन सेवकांश्क्षत्रियान्कुरु । <br> उपरम्य च गच्छेम सहिताः पापकर्मणः ॥ २५ <br><br> अतः परं न कर्तव्यमीदृशं कर्म कर्हिचित् । <br> भार्गवाणां तु सर्वेषां सेवकाः स्मो वयं किल ॥ २६ <br><br> अज्ञानाद्यत्कृतं पापं क्षन्तव्यं तत्त्वयाधुना । <br> वैरं नातः परं क्वापि भृगुभिः क्षत्रियैः सह ॥ २७ <br><br> कर्तव्यं शपथैः सम्यग्वर्तितव्यं तु हैहयैः । <br> सपुत्रा भव सुश्रोणि प्रणताः स्मो वयं च ते ॥ २८ <br><br> प्रसादं कुरु कल्याणि न द्विष्यामः कदाचन । <br><br> व्यास उवाच <br> इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्राह्मणी विस्मयान्विता ॥ २९ | उस बालककी ओर देखते ही वे सभी दृष्टिहीन हो गये। तत्पश्चात् वे क्षत्रिय जन्मान्धकी भाँति पर्वतकी गुफाओंमें इधर-उधर भटकने लगे। सभी क्षत्रिय मनमें विचार करने लगे कि इस समय यह क्या हो गया है कि हम सभी लोग बालकको देखनेमात्रसे चक्षुहीन हो गये। ऐसा प्रतीत होता है कि इसी ब्राह्मणीका यह प्रभाव है; क्योंकि सतीव्रत एक महान् बल है। अमोघ संकल्पवाली दुःखित स्त्रियाँ क्षणभरमें न जाने क्या कर डालेंगी! ॥ १६-१८ १/२ ॥ <br><br> ऐसा मनमें सोचकर नेत्रहीन, निराश्रय तथा चेतना-रहित हैहयवंशी क्षत्रिय उस ब्राह्मणीकी शरणमें गये और उन्होंने भयसे त्रस्त उस स्त्रीको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। वे श्रेष्ठ क्षत्रिय अपनी नेत्रज्योतिके लिये इस भयाकुल ब्राह्मणीसे कहने लगे— ॥ १९-२० १/२ ॥ <br><br> हे सुभगे! हे माता! हम सब आपके सेवक हैं। अब आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइये। हे रम्भोरु! पाप बुद्धिवाले हम क्षत्रियोंने अपराध किया है। हे तन्वंगि! इसीलिये आपको देखते ही हम सब चक्षुविहीन हो गये। हे भामिनि! जन्मसे अन्धे व्यक्तिकी भाँति हम आपका मुखदर्शन कर पानेमें समर्थ नहीं हैं। आपका तप तथा पराक्रम अद्भुत है; हम पापपरायण कर ही क्या सकते हैं? हे मानदे! हम आपकी शरणमें हैं। हमें नेत्र दीजिये; क्योंकि नेत्रज्योतिसे विहीन हो जाना मृत्युसे भी कष्टकारक होता है। आप हमारे ऊपर कृपा कीजिये। फिरसे नेत्रज्योति देकर इन समस्त क्षत्रियोंको अपना सेवक बना लीजिये। इसके बाद पापकर्मसे रहित होकर हमलोग साथ-साथ चले जायेंगे। अब हमलोग इस प्रकारका कर्म कभी नहीं करेंगे। अब हम सभी भार्गव ब्राह्मणोंके सेवक हो गये। हमलोगोंने अज्ञानवश जो भी पाप किया है उसे आप क्षमा करें। हम हैहय क्षत्रिय शपथपूर्वक कहते हैं कि आजसे कभी भी भृगुवंशी ब्राह्मणोंके साथ हमें वैरभाव नहीं रखना चाहिये और यथोचित व्यवहार करना चाहिये। हे सुश्रोणि! आप पुत्रवती होवें। हम आपकी शरणमें हैं। हे कल्याणि! आप कृपा करें; हमलोग अब कभी भी द्वेषभाव नहीं रखेंगे ॥ २१-२८ १/२ ॥ <br><br> व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उन क्षत्रियोंकी यह बात सुनकर ब्राह्मणी विस्मयमें पड़ गयी और उसने शरणागत तथा दुर्गतिंको प्राप्त उन नेत्रहीन |

८०६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७

| तानाह प्रणतान्दुःखान्नाश्वास्य गतलोचनान्।<br>गृहीता न मया दृष्टिर्युष्माकं क्षत्रियाः किल॥ ३० | क्षत्रियोंको आश्वासन देकर कहा—हे क्षत्रियो! आपलोग निश्चितरूपसे जान लें कि मैंने आप सबकी दृष्टिका हरण नहीं किया है॥ २९-३०॥ |
| नाहं रुषान्विता सत्यं कारणं शृणुताद्य यत्।<br>अयं च भार्गवो नूनमूरुजः कुपितोऽद्य वः॥ ३१ | मैं आपलोगोंपर कुपित नहीं हूँ। अब मैं वास्तविक कारण बता रही हूँ, आपलोग सुनिये। मेरी जंघासे उत्पन्न यह भृगुवंशी बालक आज आपलोगोंपर कुपित है। क्षत्रियोंके द्वारा अपने बान्धवों और यहाँतक कि गर्भस्थित बालकोंका वध किये जानेकी बात जानकर कोपाविष्ट इसी बालकने आपलोगोंके नेत्र स्तम्भित कर दिये हैं॥ ३१-३२॥ |
| चक्षूंषि तेन युष्माकं स्तम्भितानि रुषावता।<br>स्वबन्धून्निहताञ्ज्ञात्वा गर्भस्थानपि क्षत्रियैः॥ ३२ | |
| अनागसो धर्मपरांस्तापसान्धनकाम्यया।<br>गर्भानपि यदा यूयं भृगूनघ्नंस्तु पुत्रकाः॥ ३३ | हे वत्सगण! जब आपलोग निरपराध, धर्मनिष्ठ तथा तपस्वी भार्गव ब्राह्मणों और गर्भस्थ बालकोंको भी धन-लोलुपतामें पड़कर मार रहे थे तभी मैंने इसे अपनी जंघामें गर्भरूपसे एक सौ वर्षतक धारण किये रखा। भृगुवंशकी वृद्धिके लिये इस गर्भस्थ बालकने छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका बड़े सहजभावसे अध्ययन कर लिया है और अब यह अपने पितृजनोंके वधसे अत्यन्त कुपित होकर आपलोगोंका संहार करना चाहता है॥ ३३—३५॥ |
| तदायमूरुणा गर्भो मया वर्षशतं धृतः।<br>षडङ्गश्चाखिलो वेदो गृहीतोऽनेन चाञ्जसा॥ ३४ | |
| गर्भस्थेनापि बालेन भृगुवंशविवृद्धये।<br>सोऽपि पितृवधान्नूंनं क्रोधोद्धो हन्तुमिच्छति॥ ३५ | |
| भगवत्याः प्रसादेन जातोऽयं मम बालकः।<br>तेजसा यस्य दिव्येन चक्षूंषि मुषितानि वः॥ ३६ | मेरा यह पुत्र भगवतीकी कृपासे उत्पन्न हुआ है, जिसके अलौकिक तेजने आपलोगोंके नेत्र हर लिये हैं॥ ३६॥ |
| तस्मादौर्वं सुतं मेऽद्य याचध्वं विनयान्विताः।<br>प्रणिपातेन तुष्टोऽसौ दृष्टिं वः प्रतिमोक्ष्यति॥ ३७ | अतएव आपलोग इसी समय मेरी जंघासे उत्पन्न इस बालकसे विनम्रतापूर्वक याचना कीजिये। चरणोंमें गिरनेसे प्रसन्न होकर यह बालक आपलोगोंकी नेत्रज्योति मुक्त कर देगा॥ ३७॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या हैहयास्तुष्टुवुश्च तम्।<br>प्रणेमुर्विनयोपेता ऊरुजं मुनिसत्तमम्॥ ३८ | उस ब्राह्मणीका वचन सुनकर हैहयोंने जंघासे उत्पन्न बालकरूप मुनिश्रेष्ठको प्रणाम किया और वे विनयसे युक्त होकर उसकी स्तुति करने लगे॥ ३८॥ |
| स सन्तुष्टो बभूवाथ तानुवाच विचक्षणः।<br>गच्छध्वं स्वगृहान्भूपा ममाख्यानकृतं वचः॥ ३९ | तत्पश्चात् प्रसन्न होकर उस बालकने उन नेत्रहीन क्षत्रियोंसे कहा—हे राजाओ! अब तुमलोग मेरी कही हुई बातपर विश्वास करके अपने घर लौट जाओ॥ ३९॥ |
| अवश्यम्भाविभावास्ते भवन्ति देवनिर्मिताः।<br>नात्र शोकस्तु कर्तव्यः पुरुषेण विजानता॥ ४० | दैवने जो विधान सुनिश्चित कर दिये हैं, वे अवश्य होकर रहते हैं; ज्ञानी व्यक्तिको इस विषयमें चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥ ४०॥ |
| पूर्ववदृषयः सर्वे प्राप्नुवन्तु यथासुखम्।<br>व्रजन्तु विगतक्रोधा भवनानि यथासुखम्॥ ४१ | सभी ऋषिगण पूर्वकी भाँति सुख प्राप्त करें तथा सभी क्षत्रिय भी अब क्रोधरहित होकर सुखपूर्वक अपने-अपने घरोंके लिये प्रस्थान करें॥ ४१॥ |

अ० १७ ]षष्ठ स्कन्ध८०७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इति तेन समादिष्टा हैहयाः प्राप्तलोचनाः।<br>और्वमामन्त्र्य जग्मुस्ते सदनानि यथारुचि ॥ ४२इस प्रकार उसके कहनेपर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंको दृष्टि प्राप्त हो गयी और वे और्व (ऊरुसे उत्पन्न) उस बालकसे आज्ञा लेकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने घर चले गये॥ ४२ ॥
ब्राह्मणी तं सुतं दिव्यं गृहीत्वा स्वाश्रमं गता।<br>पालयामास भूपाल तेजस्विनमतन्द्रिता ॥ ४३हे राजन्! वह ब्राह्मणी भी उस तेजस्वी तथा अलौकिक बालकको लेकर अपने आश्रम चली गयी और बड़ी सावधानीपूर्वक उसका पालन-पोषण करने लगी ॥ ४३ ॥
एवं ते कथितं राजन् भृगूणां तु विनाशनम्।<br>लोभाविष्टैः क्षत्रियैश्च यत्कृतं पातकं किल ॥ ४४हे राजन्! इस प्रकार भृगुवंशके विनाश तथा लोभके वशीभूत हैहय क्षत्रियोंने जो पापकर्म किया था; उसके विषयमें मैंने आपसे कहा ॥ ४४ ॥
जनमेजय उवाच<br>श्रुतं मया महत्कर्म क्षत्रियाणाञ्च दारुणम्।<br>कारणं लोभ एवात्र दुःखदश्चोभयोस्तु सः ॥ ४५**जनमेजय बोले—**हे मुने! मैंने क्षत्रियोंके अत्यन्त दारुण कर्मके विषयमें सुन लिया। इहलोक तथा परलोकमें दुःख देनेवाला वह लोभ ही इसमें मूल कारण है॥ ४५ ॥
किञ्चित्प्रष्टुमिहेच्छामि संशयं वासवीसूत।<br>हैहयास्ते कथं नाम्ना ख्याता भुवि नृपात्मजाः ॥ ४६हे सत्यवतीनन्दन! मैं संशयग्रस्त हूँ; [इस विषयमें] आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। ये क्षत्रिय राजकुमार इस जगत्में हैहय नामसे क्यों प्रसिद्ध हुए? ॥ ४६ ॥
यदोस्तु यादवाः कामं भरताद्भारतास्तथा।<br>हैहयः कोऽपि राजाभूत्तेषां वंशे प्रतिष्ठितः ॥ ४७यदुसे यादव हुए तथा भरतसे भारत हुए। उसी प्रकार क्या उन क्षत्रियोंके वंशमें 'हैहय' नामधारी कोई प्रतिष्ठित राजा हुआ था ? ॥ ४७ ॥
तदहं श्रोतुमिच्छामि कारणं करुणानिधे।<br>हैहयास्ते कथं जाताः क्षत्रियाः केन कर्मणा ॥ ४८हे करुणानिधान! उन हैहय क्षत्रियोंकी उत्पत्ति कैसे हुई तथा किस कर्मसे उनका यह नाम पड़ा ? वह कारण मैं सुनना चाहता हूँ॥ ४८ ॥
व्यास उवाच<br>हैहयानां समुत्पत्तिं शृणु भूप सविस्तराम्।<br>पुरातनीं सुपुण्यां च कथां पापप्रणाशिनीम् ॥ ४९**व्यासजी बोले—**हे राजन्! अब मैं हैहयोंकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित अति प्राचीन, पुण्यदायिनी तथा पापनाशिनी कथाका विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ, आप इसे सुनिये ॥ ४९ ॥
कस्मिश्चित्समये भूप सूर्यपुत्रः सुशोभनः।<br>रेवन्तेति च विख्यातो रूपवानमितप्रभः ॥ ५०<br><br>उच्चैःश्रवसमारुह्य हयरत्नं मनोहरम्।<br>जगाम विष्णुसदनं वैकुण्ठं भास्करात्मजः ॥ ५१हे महाराज! किसी समय अत्यन्त सुन्दर, रूपवान् तथा अपरिमित तेजवाले सूर्यपुत्र जो 'रेवन्त' नामसे विख्यात थे, अपने मनोहर अश्वरत्न उच्चैःश्रवापर आरूढ़ होकर भगवान् विष्णुके निवासस्थान वैकुण्ठलोक गये ॥ ५०-५१ ॥
भगवद्दर्शनाकांक्षी हयारूढो यदागतः।<br>हयस्थस्तु तदा दृष्टो लक्ष्म्यासौ रविनन्दनः ॥ ५२विष्णुके दर्शनके आकांक्षी वे भास्करनन्दन घोड़ेपर सवार होकर जब वहाँ पहुँचे तब लक्ष्मीजीकी दृष्टि अश्वपर विराजमान रेवन्तपर पड़ गयी ॥ ५२ ॥
रमा वीक्ष्य हयं दिव्यं भ्रातरं सागरोद्भवम्।<br>रूपेण विस्मिता तस्य तस्थौ स्तम्भितलोचना ॥ ५३समुद्रसे प्रादुर्भूत अपने भाई अलौकिक उच्चैःश्रवा घोड़ेको देखकर वे महान् विस्मयमें पड़ गयीं और उसके रूपको स्थिर नेत्रोंसे देखती रह गयीं ॥ ५३ ॥

| ८०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १७] |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भगवानपि तं दृष्ट्वा हयारूढं मनोहरम्।<br>आगच्छन्तं रमां विष्णुः पप्रच्छ प्रणयात्प्रभुः ॥ ५४<br><br>कोऽयमायाति चार्वङ्गि हयारूढ इवापरः।<br>स्मरतेजस्तनुः कान्ते मोहयन्भुवनत्रयम् ॥ ५५भगवान् विष्णुने उस मनोहर रेवन्तको घोड़ेपर बैठकर आता हुआ देखकर लक्ष्मीजीसे प्रेमपूर्वक पूछा—हे सुन्दर अंगोंवाली! हे प्रिये! दूसरे कामदेवके समान तेजोमय शरीरवाला यह कौन है जो घोड़ेपर सवार होकर तीनों लोकोंको मोहित करता हुआ इधर चला आ रहा है॥ ५४-५५॥
प्रेक्षमाणा तदा लक्ष्मीस्तच्चित्ता दैवयोगतः।<br>नोवाच वचनं किञ्चित्पृष्टापि च पुनः पुनः ॥ ५६उस समय घोड़ेको एकटक देखते रहनेसे दैववशात् उसीमें चित्तयोग हो जानेके कारण भगवान् विष्णुके बार-बार पूछनेपर भी लक्ष्मीजीने कुछ नहीं कहा॥ ५६॥
व्यास उवाच<br>अश्वासक्तमतिं वीक्ष्य कामिनीमतिमोहिताम्।<br>पश्यन्तीं परमप्रेम्णा चञ्चलाक्षीं च चञ्चलाम्॥ ५७<br><br>तामाह भगवान्क्रुद्धः किं पश्यसि सुलोचने।<br>मोहिता च हरिं दृष्ट्वा पृष्टा नैवाभिभाषसे ॥ ५८व्यासजी बोले—भगवान् विष्णु कामिनी, चपल नेत्रोंवाली तथा चंचला लक्ष्मीको अत्यन्त मोहित होकर अत्यधिक प्रेमके साथ निहारती हुई तथा उस अश्वमें अनुरक्त बुद्धिवाली देखकर क्रोधित हो उठे और उनसे बोले—हे सुलोचने! तुम क्या देख रही हो? इस घोड़ेको देखकर मोहित हुई तुम मेरे पूछनेपर भी उत्तर नहीं दे रही हो॥ ५७-५८॥
सर्वत्र रमसे यस्माद्रमा तस्माद् भविष्यसि।<br>चञ्चलत्वाच्चलेत्येवं सर्वथैव न संशयः ॥ ५९क्योंकि तुम्हारा चित्त सभी ओर रमण करता है अतएव ‘रमा’ और तुम्हारी चंचल होके कारण तुम ‘चला’ कही जाओगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५९॥
प्राकृता च यथा नारी नूनं भवति चञ्चला।<br>तथा त्वमपि कल्याणि स्थिरा नैव कदाचन ॥ ६०जिस प्रकार सामान्य नारी चंचल होती है, उसी प्रकार हे कल्याणि! तुम भी कभी स्थिर स्वभाववाली नहीं रहोगी॥ ६०॥
त्वं हयं मत्समीपस्था समीक्ष्य यदि मोहिता।<br>वडवा भव वामोरु मर्त्यलोकेऽतिदारुणे ॥ ६१मेरे पास रहनेपर भी तुम यदि एक अश्वको देखकर मोहित हो गयी हो तो हे वामोरु! तुम अत्यन्त दारुण मर्त्यलोकमें घोड़ीके रूपमें जन्म ग्रहण करो॥ ६१॥
इति शप्ता रमा देवी हरिणा दैवयोगतः।<br>रुरोद वेपमाना सा भयभीतातिदुःखिता ॥ ६२दैवयोगसे भगवान् विष्णुने जब देवी लक्ष्मीको ऐसा शाप दे दिया तब वे अत्यन्त भयभीत तथा दुःखी होकर काँपती हुई रोने लगीं॥ ६२॥
तमुवाच रमानाथं शङ्किता चारुहासिनी।<br>प्रणम्य शिरसा देवं स्वपतिं विनयान्विता ॥ ६३सुन्दर मुसकानवाली लक्ष्मीजी दुविधामें पड़ गयीं और अपने पति भगवान् विष्णुको विनयसे युक्त होकर मस्तक झुकाकर प्रणाम करके उनसे कहने लगीं— ॥ ६३॥
देवदेव जगन्नाथ करुणाकर केशव।<br>स्वल्पेऽपराधे गोविन्द कस्माच्छापं ददासि मे ॥ ६४हे देवदेव! हे जगदीश्वर! हे करुणानिधान! हे केशव! हे गोविन्द! एक छोटेसे अपराधके लिये आपने मुझे ऐसा शाप क्यों दे दिया?॥ ६४॥
न कदाचिन्मया दृष्टः क्रोधस्ते हीदृशः प्रभो।<br>क्व गतस्ते मयि स्नेहः सहजो न तु नश्वरः ॥ ६५हे प्रभो! मैंने आपका ऐसा क्रोध पहले कभी नहीं देखा। मेरे प्रति आपका वह सहज तथा शाश्वत प्रेम कहाँ चला गया?॥ ६५॥
अ० १८ ]षष्ठ स्कन्ध८०९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वज्रपातस्तु शत्रौ वै कर्तव्यो न सुहृज्जने।<br>सदाहं वरयोग्या ते शापयोग्या कथं कृता॥ ६६आपको वज्रपात शत्रुपर करना चाहिये न कि अपने स्नेहीजनपर। आपसे सदा वर पानेयोग्य मैं आज शापके योग्य कैसे हो गयी?॥ ६६॥
प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द पश्यतोऽद्य तवाग्रतः।<br>कथं जीवे त्वया हीना विरहानलतापिता॥ ६७हे गोविन्द! मैं इसी समय आपके देखते-देखते आपके सामने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि आपसे वियुक्त होकर विरहाग्निमें जलती हुई मैं कैसे जीवित रह सकूँगी?॥ ६७॥
प्रसादं कुरु देवेश शापादस्मात्सुदारुणात्।<br>कदा मुक्ता समीपं ते प्राप्नोमि सुखदं विभो॥ ६८हे देवेश! मेरे ऊपर कृपा कीजिये। हे विभो! अब मैं इस दारुण शापसे मुक्त होकर आपका सुखदायी सांनिध्य कब प्राप्त करूँगी?॥ ६८॥
हरिरुवाच<br>यदा ते भविता पुत्रः पृथिव्यां मत्समः प्रिये।<br>तदा मां प्राप्य तन्वङ्गि सुखिता त्वं भविष्यसि॥ ६९हरि बोले— हे प्रिये! हे तन्वंगि! जब पृथ्वीलोकमें तुम्हें मेरे समान एक पुत्रकी प्राप्ति हो जायगी तब पुनः मुझे प्राप्त करके तुम सुखी हो जाओगी॥ ६९॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयानामुत्पत्ति-प्रसङ्गे रमाविष्णुसंवादवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥


अथाष्टादशोऽध्यायः

भगवती लक्ष्मीद्वारा घोड़ीका रूप धारणकर तपस्या करना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>इति शप्ता भगवता सिन्धुजा कोपयोगतः।<br>कथं सा वडवा जाता रेवन्तेन च किं कृतम्॥ १जनमेजय बोले— [हे मुने!] इस प्रकार कोप करके भगवान्‌के द्वारा शापित लक्ष्मीजीने घोड़ीके रूपमें किस प्रकार जन्म लिया और इसके बाद रेवन्तने क्या किया?॥ १॥
कस्मिन्देशेऽब्धिजा देवी वडवारूपधारिणी।<br>संस्थितैकाकिनी बाला परोषितपतिका यथा॥ २अपने पतिके प्रवासमें रहनेके कारण उसके वियोगमें एकाकिनी समय व्यतीत करनेवाली नारीकी भाँति लक्ष्मीजीने घोड़ीका रूप धारण करके किस देशमें समय व्यतीत किया?॥ २॥
कालं कियन्तमायुष्मन् वियुक्ता पतिना रमा।<br>संस्थिता विजनेऽरण्ये किं कृतं च तया पुनः॥ ३हे आयुष्मन्! पतिसे वियुक्त रहते हुए लक्ष्मीजीने कितना समय बिताया और पुनः उस निर्जन वनमें रहती हुई उन्होंने क्या किया?॥ ३॥
समागमं कदा प्राप्ता वासुदेवस्य सिन्धुजा।<br>पुत्रः कथं तया प्राप्तो नारायणवियुक्तया॥ ४समुद्रतनया लक्ष्मीको पुनः भगवान् विष्णुका समागम कब प्राप्त हुआ तथा विष्णुसे अलग रहते हुए उन्होंने किस प्रकार पुत्र प्राप्त किया?॥ ४॥
एतद्वृत्तान्तमार्येश कथयस्व सविस्तरम्।<br>श्रोतुकामोऽस्मि विप्रेन्द्र कथाख्यानमनुत्तमम्॥ ५हे आर्येश! इस वृत्तान्तका वर्णन विस्तारके साथ कीजिये। हे विप्रवर! मैं इस अत्युत्तम पौराणिक आख्यानको सुनना चाहता हूँ॥ ५॥
सूत उवाच<br>इति पृष्टस्तदा व्यासः परीक्षित्तनयेन वै।<br>कथयामास भो विप्राः कथामेतां सुविस्तराम्॥ ६सूतजी बोले— हे विप्रो! परीक्षित्पुत्र जनमेजयके ऐसा पूछनेपर व्यासजी इस अति विस्तृत कथाका वर्णन करने लगे॥ ६॥