देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ८१
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आतुरे मृत्युकालेऽपि भूमिशय्यागतो नरः।<br>करोति मनसा चिन्तां दुःखितः पुत्रवर्जितः॥ १८<br>धनं मे विपुलं गेहे पात्राणि विविधानि च।<br>मन्दिरं सुन्दरं चैतत्कोऽस्य स्वामी भविष्यति॥ १९ | रोगावस्था में तथा मरणकालमें भूमि-शय्यापर पड़ा हुआ सन्तानहीन प्राणी दुःखित होकर अपने मनमें विचार करता है कि मेरे घरमें पर्याप्त धन है, अनेक प्रकारके पात्र हैं तथा मेरा यह भवन भी अत्यन्त सुन्दर है; किंतु अब इन सबका स्वामी कौन होगा ? ॥ १८-१९ ॥ |
| मृत्युकाले मनस्तस्य दुःखेन भ्रमते यतः।<br>अतोऽस्य दुर्गतिर्नूनं भ्रान्तचित्तस्य सर्वथा॥ २० | चूँकि मृत्युकालमें उस प्राणीका मन अति दुःखी होकर भ्रमित होता रहता है, इसलिये उस भ्रान्त मनवाले प्राणीकी दुर्गति अवश्य ही होती है॥ २०॥ |
| एवं बहुविधां चिन्तां कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>निःश्वस्य बहुधा चोष्णं विमनाः सम्बभूव ह॥ २१ | इस प्रकार अनेकानेक चिन्तन करके और बार-बार लम्बी तथा गर्म साँसें लेकर सत्यवतीपुत्र व्यासजीका मन अत्यन्त खिन्न हो गया॥ २१॥ |
| विचार्य मनसात्यर्थं कृत्वा मनसि निश्चयम्।<br>जगाम च तपस्तप्तुं मेरुपर्वतसन्निधौ॥ २२ | इसके बाद मनमें बहुत सोच-विचार करके अन्ततः दृढ़ निश्चय करके वे तपश्चर्याके लिये मेरुपर्वतपर चले गये॥ २२॥ |
| मनसा चिन्तयामास कं देवं समुपास्महे।<br>वरप्रदाननिपुणं वाञ्छितार्थप्रदं तथा॥ २३<br>विष्णुं रुद्रं सुरेन्द्रं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम्।<br>गणेशं कार्तिकेयं च पावकं वरुणं तथा॥ २४ | उन्होंने मनमें विचार किया कि मैं विष्णु, रुद्र, इन्द्र, ब्रह्मा, सूर्य, गणेश, कार्तिकेय, अग्नि एवं वरुण—इन देवताओंमें किस देवताकी आराधना करूँ, जो वरप्रदान करनेमें उदार तथा अभीष्ट फलोंको देनेवाला हो॥ २३-२४॥ |
| एवं चिन्तयतस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः।<br>यदृच्छया समायातो वीणापाणिः समाहितः॥ २५ | इस प्रकार व्यासजी विचार कर ही रहे थे कि उसी समय संयोगवश मुनिश्रेष्ठ नारदजी हाथोंमें वीणा धारण किये हुए वहाँ आ गये॥ २५॥ |
| तं दृष्ट्वा परमप्रीतो व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>कृत्वार्घ्यमासनं दत्त्वा पप्रच्छ कुशलं मुनिम्॥ २६ | उन्हें देखकर सत्यवतीपुत्र व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अर्घ्य तथा आसन प्रदान करके उन मुनिसे कुशल-क्षेम पूछा॥ २६॥ |
| श्रुत्वाथ कुशलप्रश्नं पप्रच्छ मुनिसत्तमः।<br>चिन्तातुरोऽसि कस्मात्त्वं द्वैपायन वदस्व मे॥ २७ | कुशल-प्रश्न सुन लेनेके पश्चात् मुनिवर नारदजीने पूछा—हे द्वैपायन! आप किस कारणसे चिन्ताग्रस्त हैं? मुझे बतायें॥ २७॥ |
| व्यास उवाच<br>अपुत्रस्य गतिर्नास्ति न सुखं मानसे यतः।<br>तदर्थं दुःखितश्चाहं चिन्तयामि पुनः पुनः॥ २८ | व्यासजी बोले—सन्तानहीन व्यक्तिकी सद्गति नहीं होती और कभी भी उसके मनमें सुखानुभूति नहीं होती है। इसी बातको लेकर मैं अत्यन्त दुःखित हूँ और बार-बार यही सोचता रहता हूँ॥ २८॥ |
| तपसा तोषयाम्यद्य कं देवं वाञ्छितार्थदम्।<br>इति चिन्तातुरोऽस्म्यद्य त्वामहं शरणं गतः॥ २९ | मैं अभिलषित फल देनेवाले किस देवताको अपनी तपःसाधनासे प्रसन्न करूँ, इसी चिन्तामें पड़ा हुआ मैं [अब इसके समाधानहेतु] आपकी शरणमें हूँ॥ २९॥ |
| ८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| सर्वज्ञोऽसि महर्षे त्वं कथयाशु कृपानिधे।<br>कं देवं शरणं यामि यो मे पुत्रं प्रदास्यति॥ ३० | हे महर्षे! आप सब कुछ जाननेवाले हैं। हे कृपासिन्धु! आप मुझे शीघ्र ही बतायें कि मैं किस देवताकी शरणमें जाऊँ, जो प्रसन्न होकर मुझे पुत्र प्रदान कर दे॥ ३०॥ |
| सूत उवाच<br>इति व्यासेन पृष्टस्तु नारदो वेदविन्मुनिः।<br>उवाच परया प्रीत्या कृष्णं प्रति महामनाः॥ ३१ | **सूतजी बोले—**व्यासजीके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदवेत्ता तथा महामना महर्षि नारद अत्यन्त प्रेमपूर्वक कृष्णद्वैपायनसे कहने लगे॥ ३१॥ |
| नारद उवाच<br>पाराशर्य महाभाग यत्त्वं पृच्छसि मामिह।<br>तमेवार्थं पुरा पृष्टः पित्रा मे मधुसूदनः॥ ३२ | **नारदजी बोले—**हे पराशरतपनय! हे महाभाग! आपके द्वारा जो प्रश्न यहाँ मुझसे पूछा गया है, वैसा ही प्रश्न पूर्वकालमें मेरे पिता ब्रह्माजीने मधुसूदन भगवान् विष्णुसे किया था॥ ३२॥ |
| ध्यानस्थं च हरिं दृष्ट्वा पिता मे विस्मयं गतः।<br>पर्यपृच्छत देवेशं श्रीनाथं जगतः पतिम्॥ ३३<br>कौस्तुभोद्भासितं दिव्यं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>पीताम्बरं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ३४<br>कारणं सर्वलोकानां देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>वासुदेवं जगन्नाथं तप्यमानं महत्त्पः॥ ३५ | मेरे पिता ब्रह्माजी कौस्तुभमणिकी प्रभासे दीप्तिमान्, शंख-चक्र-गदा और पद्म धारण करनेवाले, पीत वस्त्र धारण करनेवाले, चार भुजाओंवाले, श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित वक्षःस्थलवाले, सभी लोकोंके कारणस्वरूप, देवाधिदेव, जगद्गुरु, जगदीश्वर, वासुदेव, देवेश, जगत्पति, श्रीनाथ विष्णुको ध्यानमें अवस्थित होकर कठोर तप करते हुए देखकर अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने पूछा॥ ३३—३५॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>देवदेव जगन्नाथ भूतभव्यभवत्प्रभो।<br>तपश्चरसि कस्मात्त्वं किं ध्यायसि जनार्दन॥ ३६ | **ब्रह्माजी बोले—**हे देवाधिदेव ! हे जगन्नाथ ! हे भूत-भविष्य-वर्तमानके स्वामी ! आप किसलिये यह कठोर तपस्या कर रहे हैं ? हे जनार्दन ! आप किसके ध्यानमें लीन हैं ?॥ ३६॥ |
| विस्मयोऽयं ममात्यर्थं त्वं सर्वजगतां प्रभुः।<br>ध्यानयुक्तोऽसि देवेश किं च चित्रमतः परम्॥ ३७ | हे देवेश ! [यह देखकर] मैं परम विस्मयमें पड़ गया हूँ कि समस्त विश्वका स्वामी होते हुए भी आप ऐसा ध्यान कर रहे हैं; भला इससे बढ़कर अन्य कौन-सी विचित्र बात होगी !॥ ३७॥ |
| त्वन्नाभिकमलाज्जातः कर्ताहमखिलस्य ह।<br>त्वत्तः कोऽप्यधिकोऽस्त्यत्र तं देवं ब्रूहि मापते॥ ३८ | आपके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत होकर मैं सम्पूर्ण लोकोंके कर्ताके रूपमें अधिष्ठित हूँ। हे लक्ष्मीपते ! आपसे भी श्रेष्ठतर कौन देवता है ? उस देवताको मुझे बताइये॥ ३८॥ |
| जानाम्यहं जगन्नाथ त्वमादिः सर्वकारणम्।<br>कर्ता पालयिता हर्ता समर्थः सर्वकार्यकृत्॥ ३९ | हे जगन्नाथ ! मैं तो यही जानता हूँ कि आप ही आदिस্বরূপ, सबके कारण, निर्माता, पालनकर्ता, संहारक तथा सभी कार्योंको सम्पादित करनेवाले हैं॥ ३९॥ |
| इच्छया ते महाराज सृजाम्यहमिदं जगत्।<br>हरः संहरते काले सोऽपि ते वचने सदा॥ ४० | हे महाराज ! आपकी इच्छासे ही मैं इस जगत्के रचनाकार्यमें प्रवृत्त होता हूँ और सदा आपके ही आदेशसे शंकरजी प्रलयावस्थामें जगत्का संहार करते हैं॥ ४०॥ |
| अ० ४ ] | प्रथम स्कन्ध | ८३ |
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| सूर्यो भ्रमति चाकाशे वायुर्वाति शुभाशुभः।<br>अग्निस्तपति पर्जन्यो वर्षतीश त्वदाज्ञया॥ ४१ | हे ईश! आपकी आज्ञासे ही सूर्य आकाशमें [नियमित रूपसे] भ्रमण करता है, शुभ तथा अशुभ हवा चलती है, अग्नि ताप धारण करती है और मेघ वृष्टि करता है॥ ४१॥ |
| त्वं तु ध्यायसि कं देवं संशयोऽयं महान्मम।<br>त्वत्तः परं न पश्यामि देवं वै भुवनत्रये॥ ४२ | आप किस देवताका ध्यान कर रहे हैं? यह मेरी महती शंका है। मैं तो तीनों लोकोंमें आपसे बढ़कर अन्य किसी देवताको नहीं जानता हूँ॥ ४२॥ |
| कृपां कृत्वा वदस्वाद्य भक्तोऽस्मि तव सुव्रत।<br>महतां नैव गोप्यं हि प्रायः किञ्चिदिति स्मृतिः॥ ४३ | हे सुव्रत! मैं आपका भक्त हूँ, अतः कृपा करके [अपनी तपस्याका रहस्य] बताइये; क्योंकि यह सर्वविदित है कि महान् लोग अपने भक्तोंसे कुछ भी गोपनीय नहीं रखते हैं॥ ४३॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरिराह प्रजापतिम्।<br>शृणुष्वैकमना ब्रह्मंस्त्वां ब्रवीमि मनोगतम्॥ ४४ | ब्रह्माजीका वचन सुनकर भगवान् विष्णु उनसे बोले—हे ब्रह्मन्! आपको अपने मनकी बात बताता हूँ, आप उसे एकाग्रचित्त होकर सुनें॥ ४४॥ |
| यद्यपि त्वां शिवं मां च स्थितिसृष्ट्यन्तकारणम्।<br>ते जानन्ति जनाः सर्वे सदेवासुरमानुषाः॥ ४५<br><br>स्रष्टा त्वं पालकश्चाहं हरः संहारकारकः।<br>कृताः शक्त्येति संतर्कः क्रियते वेदपारगैः॥ ४६ | यद्यपि सभी देव, दानव और मानव यही जानते हैं कि आप जगत्की रचना, मैं जगत्के पालन और शिवजी जगत्के संहारके परम कारण हैं तथापि वेद-तत्त्वज्ञ विद्वान् यह तर्कना करते हैं कि किसी शक्तिके द्वारा ही आप सृष्टिके कर्ता हैं, मैं भर्ता हूँ और शंकरजी हर्ता हैं॥ ४५-४६॥ |
| जगत्संजनने शक्तिस्त्वयि तिष्ठति राजसी।<br>सात्त्विकी मयि रुद्रे च तामसी परिकीर्तिता॥ ४७ | जगत्की रचनाके लिये आपमें राजसी शक्ति विद्यमान है, मुझमें सात्त्विकी शक्ति स्थित है तथा शिवजीमें तामसी शक्ति बतायी गयी है॥ ४७॥ |
| तया विरहितस्त्वं न तत्कर्मकरणे प्रभुः।<br>नाहं पालयितुं शक्तः संहर्तुं नापि शङ्करः॥ ४८ | उस शक्तिके न रहनेपर आप न तो सृष्टि-रचना कर सकते हैं, न मैं पालन-कार्य करनेमें समर्थ हो सकता हूँ और न तो शंकर संहार कर सकते हैं॥ ४८॥ |
| तदधीना वयं सर्वे वर्तामः सततं विभो।<br>प्रत्यक्षे च परोक्षे च दृष्टान्तं शृणु सुव्रत॥ ४९ | हे विभो! हम सभी निरन्तर उसी शक्तिके अधीन रहते हैं। हे सुव्रत! अब प्रत्यक्ष तथा परोक्षसे सम्बन्धित दृष्टान्त भी आप सुनिये॥ ४९॥ |
| शेषे स्वपिमि पर्यङ्के परतन्त्रो न संशयः।<br>तदधीनः सदोत्तिष्ठे काले कालवशं गतः॥ ५० | इसमें कोई संशय नहीं कि मैं परतन्त्र होकर शेष-शय्यापर शयन करता हूँ और उसी शक्तिके अधीन होकर समयपर कालका वशवर्ती होकर मैं शयनसे उठता हूँ॥ ५०॥ |
| तपश्चरामि सततं तदधीनोऽस्म्यहं सदा।<br>कदाचित्सह लक्ष्म्या च विहरामि यथासुखम्॥ ५१<br><br>कदाचिद्दानवैः सार्धं संग्रामं प्रकरोम्यहम्।<br>दारुणं देहदमनं सर्वलोकभयङ्करम्॥ ५२ | उसी शक्तिका अवलम्बन प्राप्तकर मैं सदा तपश्चरण करता रहता हूँ। मैं कभी लक्ष्मीके साथ सुखपूर्वक विहार करता हूँ और कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण, शरीरको चूर्ण कर देनेवाला तथा लोगोंको भयभीत कर देनेवाला युद्ध भी करता हूँ॥ ५१-५२॥ |