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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

About this granth

The Chandogya Upanishad (छान्दोग्योपनिषद्) is an ancient and extensive Upanishad of the Samaveda. The preface to this Gita Press edition places it within the Talavakara Brahmana of the Samaveda, the same branch as the Kena Upanishad, which is why the two share a peace invocation. Its eight chapters set out spiritual knowledge together with the meditations and rites connected with it.

Famous passages include the meditation on Om as the udgitha, the Shandilya vidya, the stories of Satyakama Jabala and Raikva, the doctrine of the five fires, Uddalaka Aruni's teaching 'tat tvam asi' to his son Shvetaketu, the dialogue of Sanatkumara and Narada on the infinite (bhuma), the meditation on the small space in the heart, and the tale of Indra and Virochana learning about the Self from Prajapati. Many of the Brahma Sutras rest on these passages.

This is volume three of the Gita Press, Gorakhpur Upanishad-bhashya series (book code 582), giving the text, Shankara's commentary and a Hindi translation of both. Its imprint records 32,000 copies printed between Samvat 1993 and 2050 and an eighth edition of 5,000 in Samvat 2052. It has 978 pages.

८९६ छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

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८९६ छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ४ ॥

[अतः] वे समिद्पाणि होकर फिर [प्रजापतिके पास] आये । उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्त होकर गये थे अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! यद्यपि यह शरीर अंधा होता है तो भी वह (स्वप्नशरीर) अनन्ध रहता है, और यह स्राम होता है तो भी वह अस्राम रहता है; इस प्रकार वह इसके दोषसे दूषित नहीं होता ॥३॥ न इसके वधसे उसका वध होता है और न इसकी स्रामतासे वह स्राम होता है; किंतु उसे मानो कोई मारते हों, कोई ताडित करते हों और [उसके कारण] मानो वह अप्रियवेत्ता हो और रुदन करता हो—[ऐसा अनुभव होनेके कारण] इसमें मैं कोई फल नहीं देखता।' तब प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है, मैं तुम्हारे इस (आत्मतत्त्व) की पुनः व्याख्या करूँगा, तुम बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और निवास किया; तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ ४ ॥

| नाप्यस्य वधेन स हन्यते छायात्मवन्न चास्य स्राम्येण स्रामः स्वप्नात्मा भवति । यदध्यायादावागममात्रेणोपन्यस्तं नास्य जरयैतज्जीर्यतीत्यादि, | न तो छायात्माके समान इस देहके नाशसे उस (स्वप्नशरीर) का नाश ही होता है और न इसकी स्रामतासे वह स्राम होता है । इस अध्यायके आरम्भमें जो केवल शास्त्रप्रमाणसे कहा गया है कि 'इसकी जरावस्थासे वह जीर्ण नहीं होता' |

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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तदिह न्यायेनोपपादयितुमुपन्यस्तम् ।इत्यादि, उसीका न्यायतः उपपादन करनेके लिये यहाँ उल्लेख किया गया है।
न तावदयं छायात्मवद्देहदोषयुक्तः, किन्तु घ्नन्ति त्वेवैनम्। एवशब्द इवार्थे। घ्नन्तीवैनं केचनेति द्रष्टव्यम्, न तु घ्नन्त्येवेति, उत्तरेषु सर्वेष्विवशब्ददर्शनात्।[ इस प्रकार ] यह छायात्माके समान देहके दोषोंसे तो युक्त नहीं है; किंतु इसे मानो कोई मारते हैं। [ 'घ्नन्ति त्वेव' इस पदमें ] 'एव' शब्द 'इव' अर्थमें है; अतः इसका 'मानो इसे कोई मारते हैं' यही भाव समझना चाहिये, 'मारते ही हैं' ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि उत्तरवर्ती सब वाक्योंमें 'इव' शब्द ही देखा जाता है।
नास्य वधेन हन्यत इति विशेषणाद्घ्नन्ति त्वेवेति चेत् ? नैवम्, प्रजापतिं प्रमाणीकुर्वतोऽनृतवादित्वापादनानुपपत्तेः । 'एतदमृतम्' इत्येतत्प्रजापतिवचनं कथं मृषा कुर्यादिन्द्रस्तं प्रमाणीकुर्वन् ।यदि कहो कि 'यह इस ( स्थूल शरीर ) का नाश होनेसे नष्ट नहीं होता' ऐसा विशेषण होनेके कारण 'इसे कोई मारते ही हैं' यहो अर्थ समझना चाहिये तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्रजापतिको प्रामाणिक माननेवाले व्यक्तिके लिये उनपर मिथ्यावादित्वका आरोप करना सम्भव नहीं है। भला, प्रजापतिको प्रामाणिक माननेवाला इन्द्र उनके 'यह अमृत है' इस वचनको मिथ्या कैसे कर सकता है।

८९८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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८९८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| ननुच्छायापुरुषे प्रजापतिनोक्ते 'अस्य श रस्य नाशमन्वेष नश्यति' इति दोषमभ्यदधात्, तथेहापि स्यात् । | शङ्का—किंतु प्रजापतिके बतलाये हुए छायापुरुषमें तो [इन्द्रने] 'शरीरका नाश होनेके पश्चात् यह भी नष्ट हो जाता है' ऐसा दोष दिखलाया था; उसी प्रकार यहाँ भी हो सकता है । |
| नैवम्; कस्मात् ? 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इति नच्छायात्मा प्रजापतिनोक्त इति मन्यते मघवान् । कथम् ? अपहतपाप्मादिलक्षणे पृष्टे यदिच्छायात्मा प्रजापतिनोक्त इति मन्यते तदा कथं प्रजापतिं प्रमाणीकृत्य पुनः श्रवणाय समित्पाणिर्गच्छेत् ? जगाम च । तस्मान्नच्छायात्मा प्रजापतिनोक्त इति मन्यते । तथा च व्याख्यातम्—द्रष्टाक्षिणि दृश्यत इति । | समाधान—यह बात नहीं है; कैसे नहीं है ? क्योंकि 'यह जो नेत्रमें पुरुष दिखायी देता है' इस वाक्यसे प्रजापतिने छायात्माका निरूपण नहीं किया—ऐसा इन्द्र मानते हैं । किस प्रकार ?—यदि वे ऐसा मानते कि अपहतपाप्मादि लक्षणवाले आत्माके विषयमें पूछे जानेपर प्रजापतिने छायात्मा बतलाया है तो प्रजापतिको प्रामाणिक मानकर भी वे श्रवण करनेके लिये पुनः समित्पाणि होकर उनके पास क्यों जाते ? और गये थे ही । इसलिये वे यही मानते थे कि प्रजापतिने छायात्माका वर्णन नहीं किया। तथा हमने भी 'जो द्रष्टा नेत्रमें दिखायी देता है' ऐसी ही व्याख्या की है । |
| तथा विच्छादयन्तीव विद्रावयन्तीव, तथा च पुत्रादिमरण- | तथा मानो इसे कोई विच्छादित-विद्रावित ( ताडित ) करते हों और इसी प्रकार पुत्रादि-मरणके |

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| खण्ड १० ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८९९ |
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संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
निमित्तमप्रियवेत्तेव भवति। अपि च स्वयमपि रोदितीव।कारण मानो वह अप्रिय अनुभव करनेवाला होता है तथा वह स्वयं भी मानो रोता है।
नन्वप्रियं वेत्त्येव कथं वेत्तेवेति उच्यते ?शङ्काः—किंतु वह तो अप्रिय जानता ही है, फिर उसे 'मानो अप्रिय जाननेवाला हो' ऐसा क्यों कहा जाता है ?
न; अमृताभयत्ववचनानुपपत्तेः। "ध्यायतीव" (बृ० उ० ४।३।७) इति च श्रुत्यन्तरात्।समाधान—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि इससे उसका अमृतत्व और अभयत्वप्रतिपादन अनुपपन्न होगा तथा "मानो ध्यान करता है" ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है।
ननु प्रत्यक्षविरोध इति चेत् ?शङ्का—किंतु ऐसा माननेसे तो प्रत्यक्ष अनुभवसे विरोध आता है।
न; शरीरात्मत्वप्रत्यक्षवद्भ्रान्तिसम्भवात्।समाधान—नहीं, क्योंकि शरीर ही आत्मा है इस प्रत्यक्ष अनुभवके समान यह (अप्रियवेदनादि) भी भ्रान्तिजनित है।
तिष्ठतु तावदप्रियवेत्तेव न वेति; नाहमत्र भोग्यं पश्यामि।वह मानो अप्रियवेत्ता हो अथवा न हो, यह बात अलग रहे, मुझे इसमें कोई भोग्य (फल) दिखायी नहीं देता।
स्वप्नात्मज्ञानेऽपीष्टं फलं नोपलभ इत्यभिप्रायः।तात्पर्य यह है कि स्वप्नशरीरको आत्मा माननेमें भी मुझे इच्छित फल प्राप्त नहीं होता।
एवमेवैष तवाभिप्रायेणेति[प्रजापतिने कहा—] 'आत्माका अमृत और अभय गुणवान् होना

छा० उ० २९—

९०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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९०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८


| वाक्यशेषः । आत्मनोऽमृताभयगुणवत्त्वस्याभिप्रेतत्वात् ।<br><br>द्विरुक्तमपि न्यायतो मया यथावन्नावधारयति; तस्मात्पूर्ववदस्याद्यापि प्रतिबन्धकारणमस्तीति मन्वानस्तत्क्षपणाय वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमित्यादिदेश प्रजापतिः। तथोषितवते क्षपितकल्मषायाह ॥ २-४ ॥ | अभीष्ट है, अतः तुम्हारे अभिप्रायके अनुसार यह बात ऐसी ही है।* यहाँ 'एवमेवैष' इससे आगे 'तवाभिप्रायेण' यह वाक्यशेष है ।<br><br>फिर ऐसा समझकर कि 'मेरे दो बार युक्तिपूर्वक बतलानेपर भी यह ठीक-ठीक नहीं समझता, इसलिये पहलेकी भाँति अब भी इसमें प्रतिबन्धका कारण विद्यमान है'—प्रजापतिने उसकी निवृत्तिके लिये इन्द्रको 'बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो'—ऐसी आज्ञा दी। इस प्रकार ब्रह्मचर्यवास करके क्षीणदोष हुए इन्द्रसे प्रजापतिने कहा ॥ २-४ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥


* अर्थात् स्वप्नशरीरको आत्मा माननेमें वस्तुतः कोई लाभ नहीं है ।

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एकादश खण्ड

—: ❀ :—

सुषुप्त पुरुषका उपदेश

पूर्ववदेतं त्वेव त इत्याद्युक्त्वा—पूर्ववत् ‘मैं तेरे प्रति इसकी [पुनः व्याख्या करूँगा]’ ऐसा कहकर—

तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाह खल्वयमेवँसम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ १ ॥

‘जिस अवस्थामें यह सोया हुआ दर्शनवृत्तिसे रहित और सम्यक्-रूपसे आनन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता वह आत्मा है’—ऐसा प्रजापतिने कहा ‘यह अमृत है, यह अभय है और यही ब्रह्म है।’ यह सुनकर इन्द्र शान्तचित्तसे चले गये; किंतु देवताओंके पास पहुँचे बिना ही उन्हें यह भय दिखायी दिया—‘उस अवस्थामें तो इसे निश्चय ही यह भी ज्ञान नहीं होता कि ‘यह मैं हूँ’ और न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है; उस समय तो यह मानो विनाशको प्राप्त हो जाता है। इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता’ ॥ १ ॥

तद्यत्रैतत्सुप्त इत्यादि व्याख्यातं वाक्यम्। अक्षिणि यो‘तद्यत्रैतत् सुप्तः’ इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पहले हो चुकी है। ‘जो नेत्रस्थ द्रष्टा स्वप्नमें पूजित होता

९०२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

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९०२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी-अनुवाद
द्रष्टा स्वप्ने च महीयमानश्चरति स एष सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स्वाभिप्रेतमेव ।हुआ विचरता है, वह जब सो जानेपर दर्शनवृत्तिसे रहित और अत्यन्त आनन्दित होकर स्वप्न नहीं देखता तो वही आत्मा है यह अमृत और अभय है और यही ब्रह्म है' इस प्रकार प्रजापतिने अपने अभिप्रायके अनुसार ही आत्माका स्वरूप बतलाया ।
मघवांस्तत्रापि दोषं ददर्श ।किंतु इन्द्रने उसमें भी दोष देखा ।
कथम् ? नाह नैव सुषुप्तस्थोऽप्यात्मा खल्वयं सम्प्रति सम्यगिदानीं चात्मानं जानाति नैवं जानाति । कथम् ? अयमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि चेति, यथा जाग्रति स्वप्ने वा । अतो विनाशमेव विनाशमिवेति पूर्ववद्द्रष्टव्यम् । अपीतोऽपिगतो भवति विनष्ट इव भवतीत्यभिप्रायः ।सो किस प्रकार ?—'यह सुषुप्तस्थ आत्मा भी इस अवस्था में निश्चय ही अपनेको इस प्रकार नहीं जानता ।' किस प्रकार नहीं जानता ?— कि 'मैं यह हूँ' और न यह अन्य भूतोंको ही जानता है; जैसा कि यह जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें जानता था । अतः यह मानो विनाशको अपीत—प्राप्त हो जाता है; तात्पर्य यह है कि विनष्ट-सा हो जाता है । यहाँ पूर्ववत् 'विनाशमेव' के स्थानमें 'विनाशमिव' ऐसा समझना चाहिये ।
ज्ञाने हि सति ज्ञातुः सद्भावोऽवगम्यते नासति ज्ञाने । न च सुषुप्तस्य ज्ञानं दृश्यतेऽतो विनष्ट इवेत्यभिप्रायः । न तुज्ञान होनेपर ही ज्ञाताकी सत्ता जानी जाती है, ज्ञानके अभावमें नहीं जानी जाती; और सुषुप्त पुरुषको ज्ञान होना देखा नहीं जाता । अतः तात्पर्य यह है कि उस समय यह नष्ट-सा हो जाता है । अमृत और
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खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०३


विनाशमेवात्मनो मन्यतेऽमृताभयवचनस्य प्रामाण्यमिच्छन् ॥ १ ॥अभयवचनका प्रामाण्य चाहनेवाले इन्द्रदेव उस अवस्था में आत्माका साक्षात् विनाश ही नहीं मानते ॥ १ ॥

स समित्पाणिः पुनरेयाय तꣳह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच नाह खल्वयं भगव एवꣳसम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥२॥

वे समित्पाणि होकर पुनः प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्तसे गये थे, अब किस इच्छासे तुम्हारा पुनः आगमन हुआ है।' इन्द्रने कहा—'भगवन् ! इस अवस्था में तो निश्चय ही इसे यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मैं हूँ' और न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है, यह विनाशको प्राप्त-सा हो जाता है। इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता' ॥ २ ॥

--: ❀ :--

पूर्ववत्—। पहलेहीके समान—

एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्माद्वसापराणि पञ्च वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकशतꣳ सम्पेदुरेतत्तद्यदाहुरेकशतꣳ ह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तस्मै होवाच ॥ ३ ॥

९०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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९०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है'--ऐसा प्रजापतिने कहा 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा। आत्मा इससे भिन्न नहीं है। अभी पाँच वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो।' उन्होंने पाँच वर्ष और वहीं निवास किया। ये सब मिलाकर एक सौ एक वर्ष हो गये। इसीसे ऐसा कहते हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास किया। तब उनसे प्रजापतिने कहा ॥ ३ ॥

एवमेवेत्युक्त्वा यो मयोक्त-'यह बात ऐसी ही है' ऐसा
स्त्रिभिः पर्यायैस्तमेवैतं नो एवा-कहकर 'मैंने तीन पर्यायोंमें जिसका वर्णन किया था उसी इस आत्मा-
न्यत्रैतस्मादात्मनोऽन्यं कञ्चनकी-इस आत्मासे भिन्न किसी
किं तर्ह्येतमेव व्याख्यास्यामि।अन्य आत्माकी नहीं, तो किसकी? इसी आत्माकी मैं व्याख्या करूँगा।
स्वल्पस्तु दोषस्तवावशिष्टस्त-अभी तुम्हारा थोड़ा-सा दोष शेष
त्क्षपणाय वसापराण्यन्यानिहै। उसकी निवृत्तिके लिये अन्य
पञ्च वर्षाणीत्युक्तः स तथापाँच वर्ष और रहो' ऐसा कहे जानेपर इन्द्रने वैसा ही किया।
चकार। तस्मै मृदितकषायादि-इस प्रकार जिनके कषायादि दोष
दोषाय स्थानत्रयदोषसम्बन्ध-नष्ट हो गये हैं उन इन्द्रदेवके प्रति प्रजापतिने जाग्रदादि तीनों
रहितमात्मनः स्वरूपमपहत-स्थानोंके दोषोंके सम्बन्धमें रहित
पाप्मत्वादिलक्षणं मघवते तस्मैआत्माका अपहतपाप्मत्वादि लक्षण-
होवाच।वाला स्वरूप निरूपण किया।
तान्येकशतं वर्षाणि सम्पेदुःवे सब एक और सौ वर्ष हो गये।
सम्पन्नानि बभूवुः। यदाहुर्लोकेइसीसे लोकमें शिष्टजन ऐसा कहते
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खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५


| शिष्टा एकशतं ह वै वर्षाणि मघवान् प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवासेति । तदेतद्द्वात्रिंशतमित्यादिना दर्शितमित्याख्यायिकातोऽपसृत्य श्रुत्योच्यते । एवं किलैतदिन्द्रत्वादपि गुरुतरमिन्द्रेणापि महता यत्नेनैकोत्तरवर्षशतकृतायासेन प्राप्तमात्मज्ञानमतो नातः परं पुरुषार्थान्तरमस्तीत्यात्मज्ञानं स्तौति ॥ ३ ॥ | हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास किया। यह बात 'द्वात्रिंशतम्' इत्यादि वाक्योंसे कही गयी है, अतः श्रुतिने आख्यायिकासे कुछ हटकर इसे स्वयं भी कह दिया है। इस प्रकार जो इन्द्रत्वसे भी गुरुतर है ऐसे इस आत्मज्ञानको इन्द्रने भी एक सौ एक वर्षतक किये हुए परिश्रमसे बड़े यत्नपूर्वक प्राप्त किया था, अतः इससे बढ़कर और कोई पुरुषार्थ नहीं है—इस प्रकार श्रुति आत्मज्ञानकी स्तुति करती है ॥ ३ ॥ |

-: ० :-

इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये एकादशखण्ड-
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

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द्वादश खण्ड

मर्त्यशरीर आदिका उपदेश

मघवन्मर्त्यं वा इदँशरीरमात्तं मृत्युना तदस्या-
मृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रिया-
प्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहति-
रस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः॥ १ ॥

हे इन्द्र ! यह शरीर मरणशील ही है; यह मृत्युसे ग्रस्त है। यह इस अमृत, अशरीरी आत्माका अधिष्ठान है। सशरीर आत्मा निश्चय ही प्रिय और अप्रियसे ग्रस्त है; सशरीर रहते हुए इसके प्रियाप्रियका नाश नहीं हो सकता और अशरीर होनेपर इसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते ॥ १ ॥

| मघवन्मर्त्यं वै मरणधर्मीदं शरीरम्। यन्मन्यसेऽक्ष्याधारादिलक्षणः सम्प्रसादलक्षण आत्मा मयोक्तो विनाशमेवापीतो भवतीति। शृणु तत्र कारणम्। यदिदं शरीरं वै यत्पश्यसि तदेतन्मर्त्यं विनाशि। तच्चात्तं मृत्युना ग्रस्तं सततमेव। कदाचिदेव म्रियत इति मर्त्यमित्युक्ते न तथा | हे इन्द्र ! यह शरीर निश्चय ही मर्त्य—मरणधर्मी है। तुम जो ऐसा समझते हो कि मेरा बतलाया हुआ नेत्रादिका आधारभूत सम्प्रसादरूप आत्मा विनाशको ही प्राप्त हो जाता है, सो उसका कारण सुनो। तुम जो यह शरीर देखते हो वह यह शरीर मर्त्य—नाशवान् है—यह मृत्युसे आत्त अर्थात् सर्वदा ही ग्रस्त है। कभी-कभी ही मरता है, इसलिये यह मर्त्य है—ऐसा कहनेपर इतना भय नहीं |

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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
संत्रासो भवति यथा ग्रस्तमेव सदा व्याप्तमेव मृत्युनेत्युक्त इति वैराग्यार्थं विशेष इत्युच्यत आत्तं मृत्युनेति । कथं नाम देहाभिमानतो विरक्तः सन्निवर्तत इति । शरीरमप्यत्र सहेन्द्रियमनोभिरुच्यते ।होता जितना कि ‘मृत्युसे ग्रस्त अर्थात् सर्वदा व्याप्त ही है’ ऐसा कहनेपर होता है। अतः वैराग्यके लिये विशेषरूपसे कहनेके लिये यह कहा गया है कि यह मृत्युसे व्याप्त है; जिससे कि किसी-न-किसी तरह यह देहाभिमानसे विरक्त होकर निवृत्तिपरायण हो जाय। यहाँ शरीर भी इन्द्रिय और मनके सहित कहा गया है।
तच्छरीरमस्य सम्प्रसादस्य त्रिस्थानतया गम्यमानस्यामृतस्य मरणादिदेहेन्द्रियमनोधर्मवर्जितस्येत्येतत् । अमृतस्येत्यनेनैवाशरीरत्वे सिद्धे पुनरशरीरस्येति वचनं वाय्वादिवत्सावयवत्वमूर्त्तिमत्त्वे मा भूतामिति । आत्मनो भोगाधिष्ठानम् । आत्मनो वा सत ईक्षितुस्तेजोऽबन्नादिक्रमेणात्पनमधिष्ठानम् । जीवरूपेण प्रविश्यवह शरीर जाग्रदादि तीन स्थानोंके सम्बन्धसे विदित होनेवाले इस अमृत—देह, इन्द्रिय और मनके मरणादि-धर्मोंसे रहित सम्प्रसादका [ अधिष्ठान है ]। आत्माका अशरीरत्व तो ‘अमृतस्य’ इस पदसे ही सिद्ध होता है; किंतु फिर भी ‘अशरीरस्य’ ऐसा जो कहा गया है वह इसलिये है कि वायु आदिके समान आत्माके सावयवत्व और अमूर्त्तिमत्त्वका प्रसंग न हो जाय। उस आत्माका यह भोगाधिष्ठान है। अथवा आत्मासे—ईक्षण करनेवाले सत्-से तेज, अप् और अन्नादि क्रमसे उत्पन्न हुआ ‘अधिष्ठान’ (उस अपने उत्पादककी उपलब्धिका अधिकरण) है;

६०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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६०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| सदेवाधितिष्ठत्यस्मिन्निति वाधिष्ठानम् । | या [ यों समझो कि ] इसमें जीव-रूपसे प्रवेश करके सत् ही अधिष्ठित है, इसलिये यह अधिष्ठान है । |
| यस्येदमीदृशं नित्यमेव मृत्युग्रस्तं धर्माधर्मजनितत्वात्प्रियाप्रियवदधिष्ठानं तदधिष्ठितस्तद्वान् सशरीरो भवति । अशरीरस्वभावस्यात्मनस्तदेवाहं शरीरं शरीरमेव चाहमित्यविवेकात्मभावः सशरीरत्वमत एव सशरीरःसन्नात्तो ग्रस्तः प्रियाप्रियाभ्यां प्रसिद्धमेतत् । | जिसका यह इस प्रकारका अधिष्ठान सदा ही मृत्युग्रस्त और धर्माधर्मजनित होनेके कारण प्रियाप्रियवान् है उसमें अधिष्ठित हुआ उससे युक्त यह आत्मा 'सशरीर' है । अशरीरस्वभाव जो आत्मा है उसका 'वह मैं ही शरीर हूँ और शरीर ही मैं हूँ' ऐसा अविवेकात्मभाव ही सशरीरत्व है । इसीसे सशरीर रहते हुए यह प्रिय और अप्रियसे आत्त—ग्रस्त रहता है—यह बात प्रसिद्ध है । |
| तस्य च न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोर्बाह्यविषयसंयोगवियोगनिमित्तयोर्बाह्यविषयसंयोगवियोगौ ममेति मन्यमानस्यापहतिर्विनाश उच्छेदः संततिरूपयोर्नास्तीति । तं पुनर्देहाभिमानादशरीरस्वरूपविज्ञानेन निवर्तिताविवेकज्ञानमशरीरं सन्तं प्रियाप्रिये न स्पृशतः । स्पृशिः | बाह्य विषयोंके संयोग और वियोग मेरे हैं—ऐसा माननेवाले उस सशरीर रूपके बाह्य विषयोंके संयोग-वियोगसे होनेवाले प्रवाहरूप प्रिय और अप्रियकी अपहति नहीं होती अर्थात् उनका विनाश यानी उच्छेद नहीं होता । देहाभिमानसे उठकर अशरीरस्वरूप विज्ञानके द्वारा जिसका विवेकज्ञान निवृत्त हो गया है ऐसे उस अशरीरभूत आत्माको प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं करते । 'स्पृश' इस धातुसे प्रिय और अप्रिय प्रत्येकका सम्बन्ध |

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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
प्रत्येकं सम्बध्यत इति प्रियं न स्पृशत्यप्रियं न स्पृशतोति वाक्यद्वयं भवति । न म्लेच्छाशुच्यधार्मिकैः सह सम्भाषेतेति यद्वत् । धर्माधर्मकार्ये हि ते, अशरीरता तु स्वरूपमिति तत्र धर्माधर्मयोरसम्भवात्तत्कार्याभावो दूरत एवेत्यतो न प्रियाप्रिये स्पृशतः ।है; इसलिये 'प्रिय स्पर्श नहीं करता, अप्रिय स्पर्श नहीं करता' ये दो वाक्य होते हैं, जिस प्रकार कि 'म्लेच्छ, अपवित्र और अधार्मिक पुरुषोंसे सम्भाषण न करे' इस वाक्यमें 'सम्भाषण' क्रियाका म्लेच्छादि प्रत्येक पदसे सम्बन्ध है। वे (प्रिय और अप्रिय) धर्माधर्मके ही कार्य हैं, किंतु अशरीरता तो आत्माका स्वरूप है। अतः उसमें धर्माधर्मका अभाव होनेके कारण उनके कार्य (प्रियाप्रिय) भी दूर ही रहेंगे; इसीसे उसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं करते।
(प्रियस्पर्शप्रतिषेधे दूषणम्)<br>ननु यदि प्रियमप्यशरीरं न स्पृशतीति यन्मघवतोक्तं सुषुप्तस्थो विनाशमेवापीतो भवतीति तदेवेहाप्यापन्नम् ।शङ्का— किंतु यदि अशरीर आत्माको प्रिय भी स्पर्श नहीं करता तो इन्द्रने जो कहा था कि 'सुषुप्तिमें स्थित हुआ पुरुष विनाशको ही प्राप्त हो जाता है' वही बात यहाँ भी प्राप्त हो जाती है।
(उक्तदोषपरिहारः)<br>नैष दोषः; धर्माधर्मकार्ययोः शरीरसम्बन्धिनोः प्रियाप्रिययोः प्रतिषेधस्य विवक्षितत्वात् । अशरीरंसमाधान— यह दोष नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ धर्माधर्मके कार्यभूत शरीरसम्बन्धी प्रियाप्रियका प्रतिषेध निरूपण करना इष्ट है। अर्थात् अशरीरको प्रियाप्रिय स्पर्श

९१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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९१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| न प्रियाप्रिये स्पृशत इति । आगमापायिनोर्हि स्पर्शशब्दो दृष्टो यथा शीतस्पर्श उष्णस्पर्श इति । न त्वग्नेरुष्णप्रकाशयोः स्वभावभूतयोरग्निना स्पर्श इति भवति । तथाग्नेः सवितुर्वोष्णप्रकाशवत्स्वरूपभूतस्यानन्दस्य प्रियस्यापि नेह प्रतिषेधः "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" (बृ० उ० ३।९।२८) "आनन्दो ब्रह्म" (तै० उ० ३।६।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः । इहापि भूमैव सुखमित्युक्तत्वात् ।<br><br>ननु भूम्नः प्रियस्यैकत्वेऽसंवेद्यत्वात्<sup>इन्द्राभिमतात्म-</sup> स्वरूपेणैव<sup>स्वरूपदर्शनम् वा</sup> नित्यसंवेद्यत्वान्निर्विशेषतेति नेन्द्रस्य तदिष्टम् 'नाह खल्वयं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति । नाहमत्र भोग्यं पश्यामि' | नहीं करते । 'स्पर्श' शब्दका प्रयोग आगमापायी विषयोंके लिये ही देखा गया है; जैसे—शीतस्पर्श-उष्णस्पर्श इत्यादि । अग्निके स्वभावभूत उष्ण और प्रकाशका अग्निसे स्पर्श होता है—ऐसा प्रयोग नहीं होता । इसी प्रकार अग्नि या सूर्यके उष्ण एवं प्रकाशके समान आत्माके स्वरूपभूत आनन्द-प्रियका भी यहाँ प्रतिषेध नहीं है, क्योंकि 'ब्रह्म विज्ञान एवं आनन्दस्वरूप है', 'आनन्द ही ब्रह्म है' इत्यादि श्रुतियोंसे यही सिद्ध होता है और यहाँ भी 'भूमा ही सुख है' ऐसा ही कहा गया है ।<br><br>शङ्का—किंतु भूमा और प्रियकी एकता होनेके कारण वह प्रिय भूमाका वेद्य नहीं हो सकता अथवा उसका स्वरूप होनेसे नित्यसंवेद्य होनेके कारण उसमें निर्विशेषता रहेगी; इसलिये वह (निर्विशेषता) इन्द्रको इष्ट नहीं है; क्योंकि उसने ऐसा कहा है कि 'इस अवस्थामें तो 'यह मैं हूँ' इस प्रकार अपनेको भी नहीं जानता और न इन अन्य भूतोंको ही जानता है । इस समय यह विनाशको ही प्राप्त हो जाता |

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खण्ड १२ ]शाङ्करभाष्यार्थ९११

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
इत्युक्तत्वात्। तद्धीन्द्रस्येष्टं यद्भूतानि चात्मानं च जानाति न चाप्रियं किञ्चिद्वेत्ति स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्येन ज्ञानेन।है। मैं इसमें कोई फल नहीं देखता।' इन्द्रको तो वही ज्ञान इष्ट है जिस ज्ञानसे कि आत्मा सम्पूर्ण भूतोंको और अपनेको भी जानता है, किसी भी अप्रियका अनुभव नहीं करता तथा सम्पूर्ण लोकोंको और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है।
सत्यमेतदिष्टमिन्द्रस्येमानि <br><sub>तत्र प्रजापतेरविवक्षा</sub> भूतानि मत्तोऽन्यानि लोकाः कामाश्च सर्वं मत्तोऽन्येऽहमेषां स्वामीति; न त्वेतदिन्द्रस्य हितम्। हितं चेन्द्रस्य प्रजापतिना वक्तव्यम्। व्योमवदशरीरात्मतया सर्वभूतलोककामात्मत्वोपगमेन या प्राप्तिस्तद्धितमिन्द्राय वक्तव्यमिति प्रजापतिनाभिप्रेतम्। न तु राज्ञो राज्याप्तिवदन्यत्वेन। तत्रैवं सति कं केन विजानीयादात्मैकत्वे<sup>ते</sup> 'इमानि भूतान्ययमहमस्मि' इति।समाधान-- ठीक है, यह इन्द्रको इष्ट तो अवश्य है कि ये भूत मेरेसे भिन्न हैं तथा ये सम्पूर्ण लोक और भोग भी मेरेसे भिन्न हैं और मैं इनका स्वामी हूँ; किंतु यह इन्द्रके लिये हितकर नहीं है। और प्रजापतिको तो इन्द्रका हित बतलाना चाहिये। आकाशके समान अशरीररूपसे जो सम्पूर्ण भूतलोक और कामके आत्मभावको प्राप्त होकर उन्हें प्राप्त करना है उस हितकर विषयका इन्द्रके प्रति उपदेश करना चाहिये—ऐसा प्रजापतिको अभिमत है। राजाकी राज्यप्राप्तिके समान अन्यभावसे लोकादिकी प्राप्ति प्रजापतिको अभिमत नहीं है। तब ऐसी अवस्थामें आत्माका एकत्व होनेपर कौन किसके द्वारा यह बात जान सकता है कि 'वे भूत हैं और यह मैं हूँ।'

९१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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९१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| नन्वस्मिन्पक्षे 'स्त्रीभिर्वा यानैर्वा' 'स यदि पितृलोककामः' 'स एकधा भवति' इत्याद्यैश्वर्यश्रुतयोऽनुपपन्नाः । | शङ्का—किंतु ऐसा पक्ष होनेपर 'स्त्रियोंसे अथवा यानोंसे [ क्रीडा करता है ]' 'वह यदि पितृलोककी कामना करता है' 'वह एक रूप होता है' इत्यादि [ पूर्वोक्त ] ऐश्वर्यसूचक श्रुतियाँ अनुपपन्न हो जायँगी । |
| न; सर्वात्मनः सर्वफलसम्बन्धोपपत्तेरविरोधात् । मृद इव सर्वघटकरककुण्डाद्याप्तिः । | समाधान—यह बात नहीं है, क्योंकि सर्वात्मा विद्वान्का किसीसे विरोध न होनेके कारण सम्पूर्ण फलोंसे सम्बन्ध हो सकता है; जिस प्रकार मृत्तिकाकी घट, कमण्डलु और कूँडा आदि सम्पूर्ण विकारोंमें प्राप्ति होती है । |
| ननु सर्वात्मत्वे दुःखसम्बन्धोऽपि स्यादिति चेत् ? | शङ्का—किंतु सर्वात्मता होनेपर तो उसे दुःखका भी सम्बन्ध होगा ही ? |
| न, दुःखस्याप्यात्मत्वोपगमादविरोधः । आत्मन्यविद्याकल्पनानिमित्तानि दुःखानि रज्ज्वामिव सर्पादिकल्पनानिमित्तानि । सा चाविद्याशरीरात्मैकत्वस्वरूपदर्शनेन दुःखनिमित्तोच्छिन्नेति दुःखसम्बन्धाशङ्का न सम्भवति । | समाधान—नहीं, क्योंकि दुःखके भी आत्मत्वको प्राप्त हो जानेके कारण उससे भी उसका कोई विरोध नहीं है । आत्मामें अविद्याके कारण होनेवाली कल्पनाके निमित्तसे होनेवाले दुःख रज्जुमें सर्पादि कल्पनाके कारण होनेवाले कम्पादिके समान हैं । दुःखकी निमित्तभूता वह अविद्या आत्माके अशरीरत्व और एकत्वदर्शनसे उच्छिन्न हो गयी है; इसलिये अब उसे दुःखके सम्बन्धकी आशङ्का होना सम्भव नहीं है । |

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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१३


| शुद्धसत्त्वसंकल्पनिमित्तानां तु कामानामीश्वरदेहसम्बन्धः सर्वभूतेषु मानसानाम् । पर एव सर्वसत्त्वोपाधिद्वारेण भोक्तेति सर्वाविद्याकृतसंव्यवहाराणां पर एवात्मास्पदं नान्योऽस्तीति वेदान्तसिद्धान्तः । | [ यहाँ शङ्का होती है कि जब विद्यासे अविद्या दग्ध हो जाती है तो उसके द्वारा ईश्वरमें आरोपित किया हुआ सगुणविद्याका फलभूत पूर्वोक्त ऐश्वर्य भी तो दग्ध ही हो जाता है, फिर विद्याकी स्तुतिके लिये उनका उपदेश कैसे सिद्ध हो सकता है ? उत्तर—] शुद्धसत्त्वजन्य संकल्पके कारण प्राप्त होनेवाले मनोवाञ्छित भोगरूप ऐश्वर्योंका सम्पूर्ण भूतोंमें [ केवल मनके द्वारा मायावस्थामें ] ईश्वरसे सम्बन्ध सिद्ध होता है । समस्त सत्त्वमय उपाधिके द्वारा परमात्मा ही उन ऐश्वर्योंका भोक्ता है, इसलिये सम्पूर्ण अविद्याजन्य व्यवहारोंका अधिष्ठान परमात्मा ही है, कोई दूसरा नहीं है—ऐसा वेदान्त-शास्त्रका सिद्धान्त है । |
| अथैकदेशिमतम्<br>'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इतिच्छायापुरुष एव प्रजापतिनोक्तः । स्वप्नसुषुप्तयोश्चान्य एव, न परोऽपहतपाप्मत्वादिलक्षणः, विरोधादिति केचिन्मन्यन्ते । छायाद्यात्मनां चोपदेशे प्रयोजनमाचक्षते—आदावेवोच्यमाने | यहाँ कोई-कोई ऐसा मानते हैं कि 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इत्यादि वाक्यसे प्रजापतिने छायापुरुषका ही वर्णन किया है, तथा स्वप्न और सुषुप्तावस्थामें भी अन्य पुरुषका ही उल्लेख किया है, अपहतपाप्मत्वादिरूप परमात्माका निरूपण नहीं किया, क्योंकि इन दोनोंके लक्षणोंमें परस्पर विरोध है । छायात्मादिका उपदेश करनेमें वे यह प्रयोजन बतलाते हैं कि परमात्मा अत्यन्त दुर्विज्ञेय है, |

९१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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९१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| किल दुर्विज्ञेयत्वात्परस्यात्मनोऽत्यन्तबाह्यविषयासक्तचेतसोऽत्यन्तसूक्ष्मवस्तुश्रवणे व्यामोहो मा भूदिति । | अतः जिनका चित्त बाह्य विषयोंमें अत्यन्त आसक्त है ऐसे उन लोगोंको आरम्भमें ही उसका उपदेश कर देनेपर उस अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुका श्रवण करनेसे कहीं व्यामोह न हो जाय । |
| यथा किल द्वितीयायां सूक्ष्मं चन्द्रं दिदर्शयिषुर्वृक्षं कश्चित्प्रत्यक्षमादौ दर्शयति पश्यामुमेष चन्द्र इति। ततोऽयं ततोऽप्यन्यं गिरिमूर्धानं च चन्द्रसमीपस्थमेष चन्द्र इति । ततोऽसौ चन्द्रं पश्यति । | [ इसी बातको दृष्टान्तसे स्पष्ट करते हैं—] जिस प्रकार द्वितीयाके दिन सूक्ष्म चन्द्रमाको दिखलानेकी इच्छावाला कोई पुरुष पहले सामनेवाले वृक्षको 'देख यह चन्द्रमा है' ऐसा कहकर दिखाता है । फिर किसी अन्य वृक्षको और उसके पश्चात् चन्द्रमाके समीपवर्ती किसी पर्वतशिखरको 'यह चन्द्रमा है' ऐसा कहकर दिखलाता है । तदनन्तर वह चन्द्रमाको देख लेता है । |
| एवमेतद् 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादिमुक्तं प्रजापतिना त्रिभिः पर्यायैर्न पर इति । चतुर्थे तु पर्याये देहान्मर्त्यात्समुत्थायाशरीरतामापन्नो ज्योतिःस्वरूपं यस्मिन्नुत्तमपुरुषे स्त्र्यादिभिर्भक्षत्क्रीडन्रममाणो | इसी प्रकार प्रजापतिने 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादि तीन पर्यायोंसे जिसका वर्णन किया है वह पर आत्मा नहीं है; किंतु चौथे पर्यायमें इस मरणशील देहसे उत्थान कर जिस उत्तम पुरुषमें वह ज्योतिः- स्वरूप अशरीरताको प्राप्त होकर स्त्री आदिके साथ वर्तमान रहता हुआ भक्षण, क्रीडा और रमण |

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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
भवति स उत्तमः पुरुषः पर उक्त इति चाहुः ।करता रहता है वही उत्तम पुरुष परात्मा कहा गया है—ऐसा भी उनका कथन है ।
[पूर्वोक्तमतनिरसनपूर्वकं सिद्धान्तमतम्]<br>सत्यं रमणीया तावदियं व्याख्या श्रोतुम् । न त्वर्थोऽस्य ग्रन्थस्यैवं सम्भवति । कथम् ? 'अक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इत्युपन्यस्य शिष्याभ्यां छायात्मनि गृहीते तयोस्तद्विपरीतग्रहणं मत्वा तदपनयायोदशरावोपन्यासः किं पश्यथ इति च प्रश्नः साध्वलङ्कारोपदेशश्चानर्थकः स्यात्, यदिच्छायात्मैव प्रजापतिनाक्षिणि दृश्यत इत्युपदिष्टः । किञ्च यदि स्वयमुपदिष्ट इति ग्रहणस्याप्यपनयनकारणं वक्तव्यं स्यात् । स्वप्नसुषुप्तात्मग्रहणयोरपि तदप-**सिद्धान्ती—**ठीक है, यह व्याख्या सुननेमें तो बड़ी सुहावनी है, किंतु इस ग्रन्थका अर्थ ऐसा नहीं हो सकता । कैसे नहीं हो सकता ?—यदि प्रजापतिने 'अक्षिणि पुरुषो दृश्यते' ऐसा कहकर छायात्माका ही उपदेश किया होता तो 'अक्षिणि पुरुषो दृश्यते' ऐसा उल्लेख करके, दोनों शिष्योंद्वारा छायात्माका ही ग्रहण किये जानेपर फिर उनका वह विपरीत ग्रहण मानकर उसकी निवृत्तिके लिये उदशरावका उपक्रम, 'क्या देखते हो' ऐसा प्रश्न और सुन्दर अलङ्कारधारणका उपदेश यह सब व्यर्थ ही सिद्ध होगा । इसके सिवा यदि उन्होंने स्वयं ही उसका उपदेश किया था तो उन्हें उसी प्रकार किये हुए ग्रहणकी निवृत्तिका भी कारण बतलाना चाहिये था । इसी प्रकार स्वप्नात्मा और सुषुप्तात्माका ग्रहण करनेपर उनकी निवृत्तिका कारण