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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 901 of 978

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Page 901

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तदिह न्यायेनोपपादयितुमुपन्यस्तम् ।इत्यादि, उसीका न्यायतः उपपादन करनेके लिये यहाँ उल्लेख किया गया है।
न तावदयं छायात्मवद्देहदोषयुक्तः, किन्तु घ्नन्ति त्वेवैनम्। एवशब्द इवार्थे। घ्नन्तीवैनं केचनेति द्रष्टव्यम्, न तु घ्नन्त्येवेति, उत्तरेषु सर्वेष्विवशब्ददर्शनात्।[ इस प्रकार ] यह छायात्माके समान देहके दोषोंसे तो युक्त नहीं है; किंतु इसे मानो कोई मारते हैं। [ 'घ्नन्ति त्वेव' इस पदमें ] 'एव' शब्द 'इव' अर्थमें है; अतः इसका 'मानो इसे कोई मारते हैं' यही भाव समझना चाहिये, 'मारते ही हैं' ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि उत्तरवर्ती सब वाक्योंमें 'इव' शब्द ही देखा जाता है।
नास्य वधेन हन्यत इति विशेषणाद्घ्नन्ति त्वेवेति चेत् ? नैवम्, प्रजापतिं प्रमाणीकुर्वतोऽनृतवादित्वापादनानुपपत्तेः । 'एतदमृतम्' इत्येतत्प्रजापतिवचनं कथं मृषा कुर्यादिन्द्रस्तं प्रमाणीकुर्वन् ।यदि कहो कि 'यह इस ( स्थूल शरीर ) का नाश होनेसे नष्ट नहीं होता' ऐसा विशेषण होनेके कारण 'इसे कोई मारते ही हैं' यहो अर्थ समझना चाहिये तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्रजापतिको प्रामाणिक माननेवाले व्यक्तिके लिये उनपर मिथ्यावादित्वका आरोप करना सम्भव नहीं है। भला, प्रजापतिको प्रामाणिक माननेवाला इन्द्र उनके 'यह अमृत है' इस वचनको मिथ्या कैसे कर सकता है।