छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 910 of 978
Read in contextद्वादश खण्ड
मर्त्यशरीर आदिका उपदेश
मघवन्मर्त्यं वा इदँशरीरमात्तं मृत्युना तदस्या-
मृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रिया-
प्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहति-
रस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः॥ १ ॥
हे इन्द्र ! यह शरीर मरणशील ही है; यह मृत्युसे ग्रस्त है। यह इस अमृत, अशरीरी आत्माका अधिष्ठान है। सशरीर आत्मा निश्चय ही प्रिय और अप्रियसे ग्रस्त है; सशरीर रहते हुए इसके प्रियाप्रियका नाश नहीं हो सकता और अशरीर होनेपर इसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते ॥ १ ॥
| मघवन्मर्त्यं वै मरणधर्मीदं शरीरम्। यन्मन्यसेऽक्ष्याधारादिलक्षणः सम्प्रसादलक्षण आत्मा मयोक्तो विनाशमेवापीतो भवतीति। शृणु तत्र कारणम्। यदिदं शरीरं वै यत्पश्यसि तदेतन्मर्त्यं विनाशि। तच्चात्तं मृत्युना ग्रस्तं सततमेव। कदाचिदेव म्रियत इति मर्त्यमित्युक्ते न तथा | हे इन्द्र ! यह शरीर निश्चय ही मर्त्य—मरणधर्मी है। तुम जो ऐसा समझते हो कि मेरा बतलाया हुआ नेत्रादिका आधारभूत सम्प्रसादरूप आत्मा विनाशको ही प्राप्त हो जाता है, सो उसका कारण सुनो। तुम जो यह शरीर देखते हो वह यह शरीर मर्त्य—नाशवान् है—यह मृत्युसे आत्त अर्थात् सर्वदा ही ग्रस्त है। कभी-कभी ही मरता है, इसलिये यह मर्त्य है—ऐसा कहनेपर इतना भय नहीं |