ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ४०—४२ ] अध्याय २ १५७
सूत्र ४०—४२ ] अध्याय २ १५७
ही वे प्रधान ( प्रकृति ) और जीवोंको भी अनन्त मानते हैं। अतः यह प्रश्न
उठता है कि उनका माना हुआ ईश्वर यह बात जानता है या नहीं कि 'जीव
कितने और कैसे हैं ? प्रधानका स्वरूप क्या और कैसा है ? तथा मै ( ईश्वर )
कौन और कैसा हूँ ?' इसके उत्तरमे यदि पाशुपतमतवाले यह कहे कि ईश्वर
यह सब कुछ जानता है, तब तो जाननेमे आ जानेवाले पदार्थोंको अनन्त (असीम)
मानना या कहना अयुक्त सिद्ध होता है और यदि कहे, वह नहीं जानता तो
ईश्वरको सर्वज्ञ मानना नहीं बन सकता । अतः या तो ईश्वर, जीवात्मा और
प्रकृतिको सान्त मानना पडेगा या ईश्वरको अल्पज्ञ स्वीकार करना पडेगा। इस
प्रकार पूर्वोक्त सिद्धान्त दोषयुक्त एवं वेदविरुद्ध होनेके कारण माननेयोग्य
नहीं है ।
सम्बन्ध—यहाँतक वेदविरुद्ध मतोंका खण्डन किया गया । अब वेद-
प्रमाण माननेवाले पाञ्चरात्र आगममे जो आंशिक अनुपपत्तिकी शङ्का उठायी
जाती हे, उसका समाधान करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते है।
भागवत-शास्त्र, पाञ्चरात्र आदिकी प्रक्रिया इस प्रकार है—'परम कारण परब्रह्म-
स्वरूप 'वासुदेव'से 'सङ्कर्षण' नामक जीवकी उत्पत्ति होती है; सङ्कर्षणसे 'प्रद्युम्न'संज्ञक
मन उत्पन्न होता है और उस प्रद्युम्नसे 'अनिरुद्ध' नामधारी अहङ्कारकी उत्पत्ति
होती है।' इसमे दोषकी उद्भावना करते हुए पूर्वपक्षी कहता है—
उत्पत्त्यसम्भवात् ॥ २ । २ । ४२ ॥
उत्पत्त्यसम्भवात् = जीवकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, इसलिये ( वासुदेवसे
सङ्कर्षणकी उत्पत्ति मानना वेद-विरुद्ध प्रतीत होता है )।
व्याख्या—भागवत-शास्त्र या पाञ्चरात्र आगम जो यह मानता है कि 'इसं
जगत्के परम कारण परब्रह्म पुरुषोत्तम श्री'वासुदेव' है, वे ही इसके निमित्त और
उपादान भी हैं;' यह वैदिक मान्यताके सर्वथा अनुकूल है। परन्तु उसमे
भगवान् वासुदेवसे जो 'सङ्कर्षण' नामक जीवकी उत्पत्ति बतायी गयी है, यह
कथन वेदविरुद्ध जान पड़ता है; क्योकि श्रुतिमे जीवको जन्म-मरणसे रहित और नित्य
कहा गया है ( क० उ० १ । २ । १८)। उत्पन्न होनेवाली वस्तु कभी नित्य
नहीं हो सकती; अतः जीवकी उत्पत्ति असम्भव है। यदि जीवको उत्पत्ति-
१५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
विनाशशील एवं अनित्य मान लिया जाय तो वेद-शास्त्रोंमें जो उसकी बद्ध-मुक्त
अवस्थाका वर्णन है, वह व्यर्थ होगा । इसके सिवा, जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटने
और परमात्माको प्राप्त करनेके लिये जो वेदोंमें साधन बताये गये हैं, वे सब भी
व्यर्थ सिद्ध होते हैं। अतः जीवकी उत्पत्ति मानना उचित नहीं है।
सम्बन्ध-अब पूर्वपक्षीकी दूसरी शङ्काका उल्लेख करते हैं-
न च कर्तुः करणम् ॥ २ । २ । ४३ ॥
च=तथा; कर्तुः=कर्ता (जीवात्मा) से; करणम्=करण (मन और मनसे
अहङ्कार) की उत्पत्ति भी; न=सम्भव नहीं है।
व्याख्या-जिस प्रकार परब्रह्म भगवान् वासुदेवसे जीवकी उत्पत्ति असम्भव
है, उसी प्रकार सङ्कर्षण नामसे कहे जानेवाले चेतन जीवात्मासे 'प्रद्युम्न' नामक
मनस्तत्त्वकी और उससे 'अनिरुद्ध' नामक अहङ्कारतत्त्वकी उत्पत्ति भी सम्भव नहीं
है; क्योंकि जीवात्मा कर्ता और चेतन है, मन करण है। अतः कर्तासे करणकी
उत्पत्ति नहीं हो सकती।
सम्बन्ध-इस प्रकार पाञ्चरात्रनामक भक्तिशास्त्रमें अन्य सब मान्यता
वेदानुकूल होनेपर भी उपर्युक्त स्थलोंमें श्रुतिसे कुछ विरोध-सा प्रतीत होता है;
उसे पूर्वपक्षके रूपमें उठाकर सूत्रकार अगले दो सूत्रोंद्वारा उस विरोधका परिहार
करते हुए कहते हैं-
विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥ २ । २ । ४४ ॥
वा=निःसन्देह; विज्ञानादिभावे=(पाञ्चरात्र शास्त्रद्वारा) भगवान्के
विज्ञानादि षड्विध गुणोंका सङ्कर्षण आदिमें भाव (होना) सूचित किया गया है
इस मान्यताके अनुसार उनका भगवत्स्वरूप होना सिद्ध होता है, इसलिये;
तदप्रतिषेधः=उनकी उत्पत्तिका वेदमें निषेध नहीं है।
व्याख्या-पूर्वपक्षीने जो यह कहा कि 'श्रुतिमें जीवात्माकी उत्पत्तिका विरोध
है तथा कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती' इसके उत्तरमें सिद्धान्तपक्षका
कहना है कि उक्त पाञ्चरात्रशास्त्रमें जीवकी उत्पत्ति या कर्तासे करणकी उत्पत्ति
नहीं बतायी गयी है, अपि तु सङ्कर्षण जीव-तत्त्वके, प्रद्युम्न मनस्तत्त्वके और
अनिरुद्ध अहङ्कारतत्त्वके अधिष्ठाता बताये गये हैं, जो भगवान् वासुदेवके ही