ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ४०—४२ ] अध्याय २ १५७
ही वे प्रधान ( प्रकृति ) और जीवोंको भी अनन्त मानते हैं। अतः यह प्रश्न
उठता है कि उनका माना हुआ ईश्वर यह बात जानता है या नहीं कि 'जीव
कितने और कैसे हैं ? प्रधानका स्वरूप क्या और कैसा है ? तथा मै ( ईश्वर )
कौन और कैसा हूँ ?' इसके उत्तरमे यदि पाशुपतमतवाले यह कहे कि ईश्वर
यह सब कुछ जानता है, तब तो जाननेमे आ जानेवाले पदार्थोंको अनन्त (असीम)
मानना या कहना अयुक्त सिद्ध होता है और यदि कहे, वह नहीं जानता तो
ईश्वरको सर्वज्ञ मानना नहीं बन सकता । अतः या तो ईश्वर, जीवात्मा और
प्रकृतिको सान्त मानना पडेगा या ईश्वरको अल्पज्ञ स्वीकार करना पडेगा। इस
प्रकार पूर्वोक्त सिद्धान्त दोषयुक्त एवं वेदविरुद्ध होनेके कारण माननेयोग्य
नहीं है ।
सम्बन्ध—यहाँतक वेदविरुद्ध मतोंका खण्डन किया गया । अब वेद-
प्रमाण माननेवाले पाञ्चरात्र आगममे जो आंशिक अनुपपत्तिकी शङ्का उठायी
जाती हे, उसका समाधान करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते है।
भागवत-शास्त्र, पाञ्चरात्र आदिकी प्रक्रिया इस प्रकार है—'परम कारण परब्रह्म-
स्वरूप 'वासुदेव'से 'सङ्कर्षण' नामक जीवकी उत्पत्ति होती है; सङ्कर्षणसे 'प्रद्युम्न'संज्ञक
मन उत्पन्न होता है और उस प्रद्युम्नसे 'अनिरुद्ध' नामधारी अहङ्कारकी उत्पत्ति
होती है।' इसमे दोषकी उद्भावना करते हुए पूर्वपक्षी कहता है—
उत्पत्त्यसम्भवात् ॥ २ । २ । ४२ ॥
उत्पत्त्यसम्भवात् = जीवकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, इसलिये ( वासुदेवसे
सङ्कर्षणकी उत्पत्ति मानना वेद-विरुद्ध प्रतीत होता है )।
व्याख्या—भागवत-शास्त्र या पाञ्चरात्र आगम जो यह मानता है कि 'इसं
जगत्के परम कारण परब्रह्म पुरुषोत्तम श्री'वासुदेव' है, वे ही इसके निमित्त और
उपादान भी हैं;' यह वैदिक मान्यताके सर्वथा अनुकूल है। परन्तु उसमे
भगवान् वासुदेवसे जो 'सङ्कर्षण' नामक जीवकी उत्पत्ति बतायी गयी है, यह
कथन वेदविरुद्ध जान पड़ता है; क्योकि श्रुतिमे जीवको जन्म-मरणसे रहित और नित्य
कहा गया है ( क० उ० १ । २ । १८)। उत्पन्न होनेवाली वस्तु कभी नित्य
नहीं हो सकती; अतः जीवकी उत्पत्ति असम्भव है। यदि जीवको उत्पत्ति-