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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ३०-३४ ] अध्याय ३ ३२१

सूत्र ३०-३४ ] अध्याय ३ ३२१
किं ज्ञानीको कर्म करना चाहिये या नहीं ? यदि करना चाहिये तो कौन-से कर्म
करने चाहिये ? अतः इसके निर्णयके लिये कहते हैं—
विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि ॥ ३ । ४ । ३२ ॥
च=तथा; विहितत्वात्=शास्त्रविहित होनेके कारण; आश्रमकर्म=आश्रम-
सम्बन्धी कर्मोंका; अपि=भी ( अनुष्ठान करना चाहिये ) ।
व्याख्या—ज्ञानीके द्वारा भी जिस प्रकार शरीरस्थितिके लिये उपयोगी भोजनादि
कर्म तथा ब्रह्मविद्योपयोगी शमदमादि कर्म लोकसंग्रहके लिये कर्तव्य हैं, उसी प्रकार
जिस आश्रममें वह रहता हो, उस आश्रमके कर्म भी उसके लिये विहित हैं, ( बृह०
उ० ४ । ४ । २२ ) ।* अतः उनका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये; इसीलिये
भगवान्ने भी कहा है—‘नियत कर्मोंका त्याग करना नहीं बन सकता, अतः मोह-
पूर्वक उनका त्याग देना तामस त्याग कहा गया है ( गीता १८ । ७ )।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ करते हैं—
सहकारित्वेन च ॥ ३ । ४ । ३३ ॥
सहकारित्वेन=साधनमे सहायक होनेके कारण; च=भी ( उनका अनुष्ठान
लोकसंग्रहके लिये करना चाहिये ) ।
व्याख्या—जिस प्रकार शम, दम, तितिक्षादि कर्म परमात्माकी प्राप्तिके
साधनमे सहायक हैं, उसी प्रकार निष्कामभावसे किये जानेवाले शास्त्रविहित
आश्रमसम्बन्धी आचार, व्यवहार आदि भी सहायक हैं । इसलिये उनका
अनुष्ठान भी लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना चाहिये, त्याग नहीं करना चाहिये ।
सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ब्रह्मविद्याका अभ्यास करनेवाले
साधकोंके लिये निष्कामभावसे और परमात्माको प्राप्त हुए महात्माओंके लिये
लोकसंग्रहार्थ आश्रम-सम्बन्धी विहित कर्मोंका अनुष्ठान तथा खान-पानसम्बन्धी
सदाचारका पालन आवश्यक है । अब परब्रह्म पुरुषोत्तमकी भक्तिके अङ्गभूत
जो श्रवण, कीर्तन आदि कर्म हैं, उनका पालन किस परिस्थितिमे और किस प्रकार
करना चाहिये ? इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया
जाता है—
सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात् ॥ ३ । ४ । ३४ ॥

  • तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन ।
    बृ० द० २१—

३२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
अपि=किसी कारणसे कठिनता प्राप्त होनेपर भी; ते=वे भक्तिसम्बन्धी कर्म
या भागवतधर्म तो; सर्वथा=सब प्रकारसे; एव=ही आचरणमें लाने योग्य हैं;
उभयलिङ्गात्=क्योंकि श्रुति और स्मृति दोनोंके निश्चयात्मक वर्णनरूप लिङ्ग
( लक्षण ) से यही सिद्ध होता है ।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि—
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायाद् बहून् शब्दान् वाचो विग्लापनँ हि तत् ॥
'बुद्धिमान् ब्राह्मणको चाहिये कि उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वको समझकर
उसीमे बुद्धिको प्रविष्ट करे, अन्य नाना प्रकारके व्यर्थ शब्दोंपर ध्यान न
दे; क्योंकि वह तो केवल वाणीका अपव्ययमात्र है ।' (बृह० उ० ४ । ४ । २१ )
तथा—
यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥
'जिस परब्रह्म परमेश्वरमे स्वर्ग, पृथिवी, अन्तरिक्ष, मनसहित समस्त इन्द्रियाँ
और प्राण स्थित हैं, उसी एक सबके आत्मा परमेश्वरको कहे हुए उपायोंद्वारा
जानो, दूसरी बातोको छोड़ो । यही अमृतरूप परमात्माको पानेके लिये
सेतुके सदृश सरल मार्ग है ।' ( मु० उ० २ । २ । ५ ) इसी प्रकार
श्रीमद्भागवतमें भी कहा है कि—
शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः
स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः ।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं
भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम् ॥
'जो आपके भक्त आपके चरित्रोंको प्रतिक्षण सुनते हैं, गाते हैं और वर्णन
करते है तथा उन्हींका स्मरण करके आनन्दित होते हैं, वे ही अविलम्ब आपके
उन चरण-कमलोंका दर्शन करते हैं, जो जन्म-मरणरूप प्रवाहके नाशक हैं ।'
( १ । ८ । ३६ ) । श्रीमद्भगवद्गीतामें भी कहा है—
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥