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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 417 में से

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पृष्ठ 343

३२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
अपि=किसी कारणसे कठिनता प्राप्त होनेपर भी; ते=वे भक्तिसम्बन्धी कर्म
या भागवतधर्म तो; सर्वथा=सब प्रकारसे; एव=ही आचरणमें लाने योग्य हैं;
उभयलिङ्गात्=क्योंकि श्रुति और स्मृति दोनोंके निश्चयात्मक वर्णनरूप लिङ्ग
( लक्षण ) से यही सिद्ध होता है ।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि—
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायाद् बहून् शब्दान् वाचो विग्लापनँ हि तत् ॥
'बुद्धिमान् ब्राह्मणको चाहिये कि उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वको समझकर
उसीमे बुद्धिको प्रविष्ट करे, अन्य नाना प्रकारके व्यर्थ शब्दोंपर ध्यान न
दे; क्योंकि वह तो केवल वाणीका अपव्ययमात्र है ।' (बृह० उ० ४ । ४ । २१ )
तथा—
यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥
'जिस परब्रह्म परमेश्वरमे स्वर्ग, पृथिवी, अन्तरिक्ष, मनसहित समस्त इन्द्रियाँ
और प्राण स्थित हैं, उसी एक सबके आत्मा परमेश्वरको कहे हुए उपायोंद्वारा
जानो, दूसरी बातोको छोड़ो । यही अमृतरूप परमात्माको पानेके लिये
सेतुके सदृश सरल मार्ग है ।' ( मु० उ० २ । २ । ५ ) इसी प्रकार
श्रीमद्भागवतमें भी कहा है कि—
शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः
स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः ।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं
भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम् ॥
'जो आपके भक्त आपके चरित्रोंको प्रतिक्षण सुनते हैं, गाते हैं और वर्णन
करते है तथा उन्हींका स्मरण करके आनन्दित होते हैं, वे ही अविलम्ब आपके
उन चरण-कमलोंका दर्शन करते हैं, जो जन्म-मरणरूप प्रवाहके नाशक हैं ।'
( १ । ८ । ३६ ) । श्रीमद्भगवद्गीतामें भी कहा है—
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥