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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २९—३१ ] अध्याय १ ६७

सूत्र २९—३१ ] अध्याय १ ६७
'जो परमेश्वर निश्चय ही, सृष्टिकालमें सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है
और उन्हें समस्त वेदोंका उपदेश देता है, उस आत्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट
करनेवाले प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षुभावसे शरण ग्रहण करता हूँ।' इसी
प्रकार स्मृतिमें भी कहा गया है कि—
तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्या प्रतिपेदिरे ।
तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमाना पुनः पुनः ॥ ( महा० )
'पूर्वकल्पकी सृष्टिमें जिन्होंने जिन कर्मोंको अपनाया था, बादकी सृष्टिमें
बारंबार रचे हुए वे प्राणी फिर उन्हीं कर्मोंको प्राप्त होते हैं।'
इस प्रकार श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि कल्पान्तर-
में उत्पन्न होनेवाले देवादिकोंके नाम, रूप पहलेके सदृश ही वेद-वचनानुसार
रचे जाते हैं; इसलिये उनकी बार-बार आवृत्ति होती रहनेपर भी वेदोंकी नित्यता
तथा प्रामाणिकतामें किसी प्रकारका विरोध नहीं आता है।
सम्बन्ध—२६ वें सूत्रमें जो प्रसङ्गवश यह बात कही गयी थी कि ब्रह्म-
विद्यामें देवादिका भी अधिकार है, ऐसा वेदव्यासजी मानते हैं, उसीकी पुष्टि
तीसवें सूत्रतक की गयी। अब आचार्य जैमिनिके मतानुसार यह बात कही
जाती है कि ब्रह्मविद्यामें देवता आदिका अधिकार नहीं है—
मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ॥ १ । ३ । ३१ ॥
जैमिनिः=जैमिनि नामक आचार्य; मध्वादिषु=मधु-विद्या आदिमें;
अनधिकारम् (आह) =देवता आदिका अधिकार नहीं बताते हैं; असंभवात्=
क्योंकि यह संभव नहीं है।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्‌के तीसरे अध्यायमें प्रथमसे लेकर ग्यारहवें
खण्डतक मधुविद्याका प्रकरण है। यहाँ 'सूर्य' को देवताओंका 'मधु' बताया गया
है। मनुष्योंके लिये साधनद्वारा प्राप्त होनेवाली वस्तु देवताओंको स्वतः प्राप्त है,
इस कारण देवताओंके लिये मधु-विद्या अनावश्यक है; अतः उस विद्यामें उनका
अधिकार मानना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार स्वर्गादि देवलोकके भोगोंकी
प्राप्तिके लिये जो वेदोंमें यज्ञादिके द्वारा देवताओंकी सकाम उपासनाका वर्णन
है, उसका अनुष्ठान भी देवताओंके लिये अनावश्यक होनेके कारण उनके द्वारा
किया जाना सम्भव नहीं है। अतएव उसमें भी उनका अधिकार नहीं है,

६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
इसलिये यह सिद्ध होता है कि जैसे मनुष्योंके लिये यज्ञादि कर्मद्वारा स्वर्गादिकी
प्राप्ति करानेवाली वेदवर्णित विद्याओंमें देवताओंका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार
ब्रह्मविद्यामे भी उनका अधिकार नहीं है । यों आचार्य जैमिनि कहते हैं ।
सम्बन्ध—इसी बातको पुष्ट करनेके लिये आचार्य जैमिनि दूसरी युक्ति
देते हैं—
ज्योतिषि भावाच्च ॥ १ । ३ । ३२ ॥
ज्योतिषि=ज्योतिर्मय लोकोमें; भावात्=देवताओंकी स्थिति होनेके
कारण; च=भी; ( उनका यज्ञादि कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं है ) ।
व्याख्या—वे देवता स्वभावसे ही ज्योतिर्मय देवलोकोंमें निवास करते हैं,
वहाँ उन्हें स्वभावसे ही सब प्रकारका ऐश्वर्य प्राप्त है; नये कर्मोंद्वारा उनको किसी
प्रकारका नूतन ऐश्वर्य नहीं प्राप्त करना है; अतएव उन सब लोकोंकी प्राप्तिके
लिये बताये हुए कर्मोंमें उनकी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है; इसलिये जिस प्रकार
वेदविहित अन्य विद्याओंमें उनका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें
भी नहीं है ।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त दो सूत्रोंसे जैमिनिके मतानुसार पूर्वपक्षकी स्थापना की
गयी । अब उसके उत्तरमें सूत्रकार अपना निश्चित मत बतलाकर देवताओंके
अधिकारविषयक प्रकरणको समाप्त करते हैं—
भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ १ । ३ । ३३ ॥
तु=किन्तु; बादरायणः=बादरायण आचार्य ( यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म-
विद्यामें ) देवता आदिके भी अधिकारका; भावम् ( मन्यते ) =भाव ( अस्तित्व )
मानते हैं; हि=क्योकि; अस्ति=श्रुतिमे ( उनके अधिकारका ) वर्णन है ।
व्याख्या—बादरायण आचार्य अपने मतका दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन करते
हुए 'तु' इस अव्यय पदके द्वारा यह सूचित करते हैं कि पूर्वपक्षीका मत शब्द-
प्रमाणसे रहित होनेके कारण मान्य नहीं है । निश्चय ही यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म-
विद्यामे देवताओंका भी अधिकार है; क्योकि वेदमें उनका यह अधिकार सूचित
करनेवाले वचन मिलते हैं । जैसे—'प्रजापतिरकामयत प्रजायेयेति स एतदग्नि-