ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
इसलिये यह सिद्ध होता है कि जैसे मनुष्योंके लिये यज्ञादि कर्मद्वारा स्वर्गादिकी
प्राप्ति करानेवाली वेदवर्णित विद्याओंमें देवताओंका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार
ब्रह्मविद्यामे भी उनका अधिकार नहीं है । यों आचार्य जैमिनि कहते हैं ।
सम्बन्ध—इसी बातको पुष्ट करनेके लिये आचार्य जैमिनि दूसरी युक्ति
देते हैं—
ज्योतिषि भावाच्च ॥ १ । ३ । ३२ ॥
ज्योतिषि=ज्योतिर्मय लोकोमें; भावात्=देवताओंकी स्थिति होनेके
कारण; च=भी; ( उनका यज्ञादि कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं है ) ।
व्याख्या—वे देवता स्वभावसे ही ज्योतिर्मय देवलोकोंमें निवास करते हैं,
वहाँ उन्हें स्वभावसे ही सब प्रकारका ऐश्वर्य प्राप्त है; नये कर्मोंद्वारा उनको किसी
प्रकारका नूतन ऐश्वर्य नहीं प्राप्त करना है; अतएव उन सब लोकोंकी प्राप्तिके
लिये बताये हुए कर्मोंमें उनकी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है; इसलिये जिस प्रकार
वेदविहित अन्य विद्याओंमें उनका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें
भी नहीं है ।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त दो सूत्रोंसे जैमिनिके मतानुसार पूर्वपक्षकी स्थापना की
गयी । अब उसके उत्तरमें सूत्रकार अपना निश्चित मत बतलाकर देवताओंके
अधिकारविषयक प्रकरणको समाप्त करते हैं—
भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ १ । ३ । ३३ ॥
तु=किन्तु; बादरायणः=बादरायण आचार्य ( यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म-
विद्यामें ) देवता आदिके भी अधिकारका; भावम् ( मन्यते ) =भाव ( अस्तित्व )
मानते हैं; हि=क्योकि; अस्ति=श्रुतिमे ( उनके अधिकारका ) वर्णन है ।
व्याख्या—बादरायण आचार्य अपने मतका दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन करते
हुए 'तु' इस अव्यय पदके द्वारा यह सूचित करते हैं कि पूर्वपक्षीका मत शब्द-
प्रमाणसे रहित होनेके कारण मान्य नहीं है । निश्चय ही यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म-
विद्यामे देवताओंका भी अधिकार है; क्योकि वेदमें उनका यह अधिकार सूचित
करनेवाले वचन मिलते हैं । जैसे—'प्रजापतिरकामयत प्रजायेयेति स एतदग्नि-