ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २८—३१ ] अध्याय ३ २४७
सूत्र २८—३१ ] अध्याय ३ २४७
व्याख्या—अथवा पहले ( सूत्र २ । ३ । ४३ में ) जिस प्रकार परमात्मा-
का अपने अंशभूत जीवसमुदायसे अभेद सिद्ध किया गया है, उसी प्रकार यहाँ
शक्ति और शक्तिमान्का अभेद समझ लेना चाहिये ।
सम्बन्ध—शक्ति और शक्तिमान्के अभेदका मुख्य कारण बताते हैं—
प्रतिषेधाच्च ॥ ३ । २ । ३० ॥
च=तथा; प्रतिषेधात्=दूसरेका प्रतिषेध होनेसे ( भी अभेद ही सिद्ध
होता है ) ।
व्याख्या—श्रुतिमे कहा गया है कि 'यह जगत् प्रकट होनेसे पहले एकमात्र
परमात्मा ही था, दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था ( ऐ० उ० १ । १ ।
१ ) । इस कथनमे अन्यका प्रतिषेध होनेके कारण भी यही समझा जाता है कि
जगत्की उत्पत्तिके पहले प्रलयकालमे उस परब्रह्म परमेश्वरकी दोनो प्रकृतियों
उसमे विलीन रहती हैं; अतः उनमे किसी प्रकारके भेदकी प्रतीति नहीं होती
हैं; इसीलिये उनका अभेद बताया गया है ।
सम्बन्ध—यहाँतक उस परब्रह्म परमात्माका अपनी दोनों प्रकृतियोंसे अभेद
किस प्रकार है ? इसका स्पष्टीकरण किया गया । अब उन दोनोंसे उसकी
विलक्षणता और श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं—
परमतः सेतून्मानसंबंधभेदव्यपदेशेभ्यः ॥ ३ । २ । ३१ ॥
अतः=इस जड-चेतनरूप दोनों प्रकृतियोंके समुदायसे; परम्=( वह ब्रह्म )
अत्यन्त श्रेष्ठ है; सेतून्मानसंबंधभेदव्यपदेशेभ्यः=क्योंकि श्रुतिमे सेतु, उन्मान,
सम्बन्ध तथा भेदका वर्णन ( करके यही सिद्ध ) किया गया है ।
व्याख्या—इस जड-चेतनात्मक समस्त जगत्की कारणभूता जो भगवान्की
अपरा एवं परा नामवाली दो प्रकृतियाँ हैं ( गीता ७ । ४, ५ ), श्वेताश्वतरोप-
निषद् ( १ । १० ) में जिनका 'क्षर' और 'अक्षर' के नामसे वर्णन हुआ है,
श्रीमद्भगवद्गीतामें कहीं क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके नामसे ( १३ । १ ) तथा कहीं प्रकृति
और पुरुषके नामसे ( १३ । १९ ) जिनका उल्लेख किया गया है, उन दोनो
प्रकृतियोंसे तथा उन्हींके विस्ताररूप इस दृश्य जगत्से वह परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वथा
विलक्षण एवं परम श्रेष्ठ है ( गीता १५ । ७ ) । क्योंकि वेदमें उसकी श्रेष्ठता-
को सिद्ध करनेवाले चार हेतु उपलब्ध होते हैं—१ सेतु, २ उन्मान, ३ सम्बन्ध
२४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
'और ४ भेदका वर्णन । सेतुका वर्णन श्रुतिमें इस प्रकार आया है—'अथ य
आत्मा स सेतुर्विधृतिः ।' ( छा० उ० ८ । ४ । १ )—'यह जो परमात्मा
है, यही सबको धारण करनेवाला सेतु है ।' 'एष सेतुर्विधरणः' ( बृह०
उ० ४ । ४ । २२ )—'यह सबको धारण करनेवाला सेतु है ।' इत्यादि ।
दूसरा हेतु है उन्मानका वर्णन । उन्मानका अर्थ है सबसे बड़ा माप—महत्
परिमाण । श्रुतिमे उस परमेश्वरको सबसे बड़ा बताया गया है—'तावानस्य
महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।'
( छा० उ० ३ । १२ । ६ )—'उतनी उसकी महिमा है, वह परम पुरुष
परमात्मा इससे भी श्रेष्ठ है । सम्पूर्ण भूत-प्राणी इसका एक पाद है और शेष
तीन अमृतस्वरूप पाद अप्राकृत परमधाममे है ।' तीसरा हेतु है सम्बन्धका
प्रतिपादन । परब्रह्म परमेश्वरको पूर्वोक्त प्रकृतियोका स्वामी, शासक एवं सञ्चालक
बताकर श्रुतिने इनमें स्वामि-सेवकभाव, शास्य-शासकभाव तथा नियन्तृ-नियन्तव्य-
भावरूप सम्बन्धका उपपादन किया है । जैसे—'ईश्वरोके भी परम महेश्वर,
देवताओके भी परम देवता, पतियोंके भी परम पति, समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी एवं
स्तुति करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हम जानते हैं ।'* (श्वेता० उ० ६।७)
'वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा सबका स्रष्टा, सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यका हेतु,
कालका भी महाकाल, समस्त कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न और सबको जाननेवाला
है । वह प्रकृति और जीवात्माका स्वामी, समस्त गुणोंका शासक तथा जन्म-मृत्यु-
रूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है ।'†
चौथा हेतु है भेदका प्रतिपादन । उस परब्रह्म परमात्माको इन दोनों
प्रकृतियोंका अन्तर्यामी एवं धारण-पोषण करनेवाला बताकर तथा अन्य प्रकारसे
भी श्रुतिने इनसे उसकी भिन्नताका निरूपण किया है ।‡
- यह मन्त्र पृष्ठ ७७'मे आ चुका है ।
† स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद् यः ।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥(श्वेता०६।१६)
‡ देखिये ( श्वेताश्वतरोपनिषद् अध्याय ४ के ६, ७, ८-१४-१५ आदि मन्त्र ),
( मु० उ० ३ । १ । १, २ ), ( श्वेता० उ० १ । ९ ) ( बृह० उ० ३ । ४ । १-२ तथा
३ । ७ । १ से २३ तक ) ।