ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
'और ४ भेदका वर्णन । सेतुका वर्णन श्रुतिमें इस प्रकार आया है—'अथ य
आत्मा स सेतुर्विधृतिः ।' ( छा० उ० ८ । ४ । १ )—'यह जो परमात्मा
है, यही सबको धारण करनेवाला सेतु है ।' 'एष सेतुर्विधरणः' ( बृह०
उ० ४ । ४ । २२ )—'यह सबको धारण करनेवाला सेतु है ।' इत्यादि ।
दूसरा हेतु है उन्मानका वर्णन । उन्मानका अर्थ है सबसे बड़ा माप—महत्
परिमाण । श्रुतिमे उस परमेश्वरको सबसे बड़ा बताया गया है—'तावानस्य
महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।'
( छा० उ० ३ । १२ । ६ )—'उतनी उसकी महिमा है, वह परम पुरुष
परमात्मा इससे भी श्रेष्ठ है । सम्पूर्ण भूत-प्राणी इसका एक पाद है और शेष
तीन अमृतस्वरूप पाद अप्राकृत परमधाममे है ।' तीसरा हेतु है सम्बन्धका
प्रतिपादन । परब्रह्म परमेश्वरको पूर्वोक्त प्रकृतियोका स्वामी, शासक एवं सञ्चालक
बताकर श्रुतिने इनमें स्वामि-सेवकभाव, शास्य-शासकभाव तथा नियन्तृ-नियन्तव्य-
भावरूप सम्बन्धका उपपादन किया है । जैसे—'ईश्वरोके भी परम महेश्वर,
देवताओके भी परम देवता, पतियोंके भी परम पति, समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी एवं
स्तुति करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हम जानते हैं ।'* (श्वेता० उ० ६।७)
'वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा सबका स्रष्टा, सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यका हेतु,
कालका भी महाकाल, समस्त कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न और सबको जाननेवाला
है । वह प्रकृति और जीवात्माका स्वामी, समस्त गुणोंका शासक तथा जन्म-मृत्यु-
रूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है ।'†
चौथा हेतु है भेदका प्रतिपादन । उस परब्रह्म परमात्माको इन दोनों
प्रकृतियोंका अन्तर्यामी एवं धारण-पोषण करनेवाला बताकर तथा अन्य प्रकारसे
भी श्रुतिने इनसे उसकी भिन्नताका निरूपण किया है ।‡
- यह मन्त्र पृष्ठ ७७'मे आ चुका है ।
† स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद् यः ।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥(श्वेता०६।१६)
‡ देखिये ( श्वेताश्वतरोपनिषद् अध्याय ४ के ६, ७, ८-१४-१५ आदि मन्त्र ),
( मु० उ० ३ । १ । १, २ ), ( श्वेता० उ० १ । ९ ) ( बृह० उ० ३ । ४ । १-२ तथा
३ । ७ । १ से २३ तक ) ।