ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १-२ ] अध्याय १ २३
सूत्र १-२ ] अध्याय १ २३
प्रकार उपासना करनी चाहिये । अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना
चाहिये; क्योकि यह मनुष्य संकल्पमय है । इस लोकमे यह जैसे संकल्पसे
युक्त होता है, यहाँसे चले जानेपर परलोकमे यह वैसा ही बन जाता है । अतः
उसे उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये ।' इस मन्त्रवाक्यमे उसी परब्रह्मकी उपासना
करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय
होते है तथा जो समस्त वेदान्तवाक्योमें जगत्के महाकारणरूपसे प्रसिद्ध है ।
अतः इस प्रकरणमे बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा नहीं।
सम्बन्ध-यहाँ यह प्रश्न उठता है कि छा० उ० (३।१४।२) में उपास्यदेवको
मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है । ये विशेषण जीवात्माके हैं;
अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी सङ्गति कैसे लगेगी ? इसपर
कहते हैं—
विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १।२।२॥
च=तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः=श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोकी सङ्गति उस
परब्रह्ममें ही होती है. इसलिये (इस प्रकरणमे कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है) ।
व्याख्या-छा० उ० (३।१४।२) मे उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध
होता है—'मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा
सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ।' अर्थात् 'वह
उपास्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप, सत्य-संकल्प, आकाशके
सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त
जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित तथा संभ्रमशून्य है।' इस
वर्णनमे उपास्यदेवके जो उपादेय गुण बताये गये है, वे सब ब्रह्ममे ही सङ्गत
होते है । ब्रह्मको 'मनोमय' तथा 'प्राणरूप शरीरवाला' कहना भी अनुचित नहीं
है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है । केनोपनिषद्मे उसको मनका भी
मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है *। इसलिये इस प्रकरणमे बतलाया. हुआ
उपास्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है ।
सम्बन्ध-उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति (सङ्गति) ब्रह्ममें
- श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाच५ स उ प्राणस्य प्राणः ।
(के० उ० १।२)
२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
बतायी गयीं; अब जीवात्मामें उन गुणोंकी अनुपपत्ति बताकर पूर्वोक्त सिद्धान्तकी
पुष्टि की जाती है—
अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १ । २ । ३ ॥
तु=परन्तु; अनुपपत्तेः=जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुणोंकी सङ्गति न होनेके
कारण; शारीरः=जीवात्मा; न=( इस प्रकरणमें कहा हुआ उपास्यदेव ) नहीं है।
व्याख्या—उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पता, सर्वव्यापकता,
सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बताये गये हैं, वे जीवात्मामें नहीं पाये
जाते; इस कारण इस प्रसङ्गमें बताया हुआ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है, ऐसा
मानना ही ठीक है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध किया जाता है—
कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । ४ ॥
कर्मकर्तृव्यपदेशात्=उक्त प्रकरणमें उपास्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म
अर्थात् प्राप्त होने योग्य कहा है और जीवात्माको प्राप्तिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस
ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च=भी ( जीवात्मा उपास्य नहीं
हो सकता ) ।
व्याख्या—छा० उ० (३ । १४ । ४) में कहा गया है कि 'सर्वकर्मा आदि
विशेषणोंसे युक्त ब्रह्म ही मेरे हृदयमें रहनेवाला मेरा आत्मा है; मरनेके बाद यहाँसे
जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा ।'* इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको
प्राप्त होने योग्य तथा जीवात्माको उसे पानेवाला कहा गया है। अतः यहाँ उपास्य-
देव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा। यही मानना उचित है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं—
- 'एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद् वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा
श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरि-
क्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥' ( छा० उ० ३ । १४ । ३ )
'सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म
आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मि ।' ( छा० उ० ३ । १४ । ४ )