ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
बतायी गयीं; अब जीवात्मामें उन गुणोंकी अनुपपत्ति बताकर पूर्वोक्त सिद्धान्तकी
पुष्टि की जाती है—
अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १ । २ । ३ ॥
तु=परन्तु; अनुपपत्तेः=जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुणोंकी सङ्गति न होनेके
कारण; शारीरः=जीवात्मा; न=( इस प्रकरणमें कहा हुआ उपास्यदेव ) नहीं है।
व्याख्या—उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पता, सर्वव्यापकता,
सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बताये गये हैं, वे जीवात्मामें नहीं पाये
जाते; इस कारण इस प्रसङ्गमें बताया हुआ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है, ऐसा
मानना ही ठीक है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध किया जाता है—
कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । ४ ॥
कर्मकर्तृव्यपदेशात्=उक्त प्रकरणमें उपास्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म
अर्थात् प्राप्त होने योग्य कहा है और जीवात्माको प्राप्तिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस
ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च=भी ( जीवात्मा उपास्य नहीं
हो सकता ) ।
व्याख्या—छा० उ० (३ । १४ । ४) में कहा गया है कि 'सर्वकर्मा आदि
विशेषणोंसे युक्त ब्रह्म ही मेरे हृदयमें रहनेवाला मेरा आत्मा है; मरनेके बाद यहाँसे
जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा ।'* इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको
प्राप्त होने योग्य तथा जीवात्माको उसे पानेवाला कहा गया है। अतः यहाँ उपास्य-
देव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा। यही मानना उचित है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं—
- 'एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद् वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा
श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरि-
क्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥' ( छा० उ० ३ । १४ । ३ )
'सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म
आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मि ।' ( छा० उ० ३ । १४ । ४ )