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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १५ ] अध्याय २ १६९

सूत्र १५ ] अध्याय २ १६९
का वर्णन करते हुए उसे अजन्मा, अविनाशी, दिव्य, निराकार, सब प्रकारसे
परम शुद्ध और समस्त जगत्‌के बाहर-भीतर व्याप्त बताया गया है । *
तदनन्तर यह कहा गया है कि 'इसी परब्रह्म पुरुषोत्तमसे यह प्राण, मन,
सब इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, ज्योति, जल और सबको धारण करनेवाली
पृथिवी उत्पन्न होती है ।' † इस वर्णनसे परमात्मासे पहले प्राण, मन और
इन्द्रियोंके उत्पन्न होनेकी बात बताकर आकाश आदि भूतोंकी क्रमशः
उत्पत्ति बतायी गयी है; अतः परमात्मा और आकाशके बीचमें मन इन्द्रियोंका
स्थान निश्चित होता है । तात्पर्य यह कि प्राण और इन्द्रियोसहित मनकी उत्पत्ति-
के बाद ही आकाश आदि भूतोंकी सृष्टि माननी चाहिये; क्योंकि उपर्युक्त श्रुतिमे
जैसा क्रम दिया गया है, वह इसी निश्चयपर पहुँचानेवाला है; ऐसा यदि कोई
कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि इस वर्णनमें विशेषरूपसे
कोई क्रम नहीं बताया गया है । इससे तो केवल यही बात सिद्ध होती
है कि बुद्धि, मन और इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी परमेश्वरसे ही होती है;
इतना ही क्यों, उक्त श्रुतिके पूरे प्रकरणको देखनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि
श्रुतिका उद्देश्य किसी प्रकारके क्रमका प्रतिपादन करना नहीं है, उसे केवल यही
बताना अभीष्ट है कि जगत्‌का उपादान और निमित्त कारण एकमात्र ब्रह्म है;
क्योंकि भिन्न-भिन्न कल्पोंमे भिन्न-भिन्न क्रमसे जगत्‌की उत्पत्तिका वर्णन श्रुतियो और
स्मृतियोंमें पाया जाता है । अतः किसी एक ही क्रमको निश्चित कर देना नहीं
बन सकता ( देखिये मु० उ० २ । १ । ५ से ९ तक ) ।
सम्बन्ध—इस ग्रन्थमें अबतकके विवेचनसे परब्रह्म परमेश्वरको जड-चेतनात्मक
सम्पूर्ण जगत्‌का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया । इससे यह प्रतीत
होता है कि उस परब्रह्मसे अन्य तत्त्वोंकी भाँति जीवोंकी भी उत्पत्ति होती है ।
यदि यही बात है तो फिर यह प्रश्न उठता है कि परमात्माका ही अंश होनेसे
जीवात्मा तो अविनाशी, नित्य तथा जन्म-मरणसे रहित माना गया है, उसकी
उत्पत्ति कैसे होती है ? इसपर कहते हैं—

  • दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
    अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥
    ( मु० उ० २ । १ । २ )
    † एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
    खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥
    ( मु० उ० २ । १ । ३ )

१७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद्व्यपदेशो भाक्तस्त-
द्भावभावित्वात् ॥ २ । ३ । १६ ॥
तु=किन्तु; चराचरव्यपाश्रयः=चराचर शरीरोंको लेकर कहा हुआ;
तद्व्यपदेशः=वह जन्म-मरण आदिका कथन; भाक्तः स्यात्=जीवात्माके लिये
गौणरूपसे हो सकता है; तद्भावभावित्वात्=क्योकि वह उन-उन शरीरोके
भावसे भावित रहता है ।
व्याख्या—यह जीवात्मा वास्तवमे सर्वथा शुद्ध परमेश्वरका अंश, जन्म-मरणसे
रहित विज्ञानस्वरूप नित्य अविनाशी है; इसमें कोई शङ्का नहीं है । तो भी यह
अनादि परम्परागत अपने कर्मोंके अनुसार मिले हुए स्थावर (वृक्ष-पहाड़ आदि),
जङ्गम (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरोंके आश्रित है, उन-उनके साथ
तद्रूप हो रहा है, 'मैं शरीरसे सर्वथा भिन्न हूँ, इससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है,'
इस वास्तविक तत्त्वको नहीं जानता, इस कारण उन-उन शरीरोंके जन्म-मरण
आदिको लेकर गौणरूपसे जीवात्माका उत्पन्न होना श्रुतिमे कहा गया है, इसलिये
कोई विरोध नहीं है । कल्पके आदिमें इस जड-चेतनात्मक अनादिसिद्ध जगत्का
प्रकट हो जाना ही उस परमात्मामे इसका उत्पन्न होना है और कल्पके अन्तमे
उस परमेश्वरमे विलीन हो जाना ही उसका लय है (गीता ९ । ७-१०) ।
इसके सिवा, परब्रह्म परमात्मा किन्हीं नये जीवोंको उत्पन्न करते हों, ऐसी
बात नहीं है । इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन प्रकारके
शरीरोंके आश्रित जीवात्माका परमात्मासे उत्पन्न होना और उसमें विलीन होना
श्रुति-स्मृतियोंमें जगह-जगह कहा गया है । जीवोंको भगवान् उनके परम्परागत
संचित कर्मोंके अनुसार ही अच्छी-बुरी योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, यह पहले सिद्ध
कर दिया गया है (देखिये ब्र० सू० २ । १ । ३४) ।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीवोंकी उत्पत्ति गौण न मानकर
मुख्य मान ली जाय तो क्या आपत्ति है, इसपर कहते हैं—
नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥ २ । ३ । १७ ॥
आत्मा=जीवात्मा; न=वास्तवमें उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें
कहीं भी जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है; च=इसके सिवा; ताभ्यः=उन