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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 417 में से

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पृष्ठ 191

१७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद्व्यपदेशो भाक्तस्त-
द्भावभावित्वात् ॥ २ । ३ । १६ ॥
तु=किन्तु; चराचरव्यपाश्रयः=चराचर शरीरोंको लेकर कहा हुआ;
तद्व्यपदेशः=वह जन्म-मरण आदिका कथन; भाक्तः स्यात्=जीवात्माके लिये
गौणरूपसे हो सकता है; तद्भावभावित्वात्=क्योकि वह उन-उन शरीरोके
भावसे भावित रहता है ।
व्याख्या—यह जीवात्मा वास्तवमे सर्वथा शुद्ध परमेश्वरका अंश, जन्म-मरणसे
रहित विज्ञानस्वरूप नित्य अविनाशी है; इसमें कोई शङ्का नहीं है । तो भी यह
अनादि परम्परागत अपने कर्मोंके अनुसार मिले हुए स्थावर (वृक्ष-पहाड़ आदि),
जङ्गम (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरोंके आश्रित है, उन-उनके साथ
तद्रूप हो रहा है, 'मैं शरीरसे सर्वथा भिन्न हूँ, इससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है,'
इस वास्तविक तत्त्वको नहीं जानता, इस कारण उन-उन शरीरोंके जन्म-मरण
आदिको लेकर गौणरूपसे जीवात्माका उत्पन्न होना श्रुतिमे कहा गया है, इसलिये
कोई विरोध नहीं है । कल्पके आदिमें इस जड-चेतनात्मक अनादिसिद्ध जगत्का
प्रकट हो जाना ही उस परमात्मामे इसका उत्पन्न होना है और कल्पके अन्तमे
उस परमेश्वरमे विलीन हो जाना ही उसका लय है (गीता ९ । ७-१०) ।
इसके सिवा, परब्रह्म परमात्मा किन्हीं नये जीवोंको उत्पन्न करते हों, ऐसी
बात नहीं है । इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन प्रकारके
शरीरोंके आश्रित जीवात्माका परमात्मासे उत्पन्न होना और उसमें विलीन होना
श्रुति-स्मृतियोंमें जगह-जगह कहा गया है । जीवोंको भगवान् उनके परम्परागत
संचित कर्मोंके अनुसार ही अच्छी-बुरी योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, यह पहले सिद्ध
कर दिया गया है (देखिये ब्र० सू० २ । १ । ३४) ।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीवोंकी उत्पत्ति गौण न मानकर
मुख्य मान ली जाय तो क्या आपत्ति है, इसपर कहते हैं—
नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥ २ । ३ । १७ ॥
आत्मा=जीवात्मा; न=वास्तवमें उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें
कहीं भी जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है; च=इसके सिवा; ताभ्यः=उन