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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १३-१६ ] अध्याय ३ २३७

सूत्र १३-१६ ] अध्याय ३ २३७
व्याख्या-जिस प्रकार उस परब्रह्म परमात्माको निर्गुण-निराकार बतानेवाले
वेदवाक्य मुख्य हैं, ठीक उसी प्रकार उसे सगुण साकार, सर्वदिव्यगुणसम्पन्न
बतानेवाले वेदवाक्य भी प्रधान हैं; उनमेंसे किसी एकको मुख्य और दूसरेको
गौण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि एक ही प्रकरणमें और एक ही मन्त्रमें एक
परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे दोनों लक्षणोंवाला बताया गया
है ( श्वे० उ० ६ । ११ ) अतएव रूपरहित निर्विशेष लक्षणोंकी भाँति
ही सगुण साकाररूपकी भी प्रधानता ज्ञात होती है यही सिद्ध होता है कि
वह परब्रह्म परमेश्वर दोनों लक्षणोंवाला है ।
सम्बन्ध-अब दूसरे दृष्टान्तसे उसी बातको सिद्ध करते हैं-
प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ॥ ३ । २ । १५ ॥
च=तथा; प्रकाशवत्=प्रकाशकी भाँति; अवैयर्थ्यात्=दोनोंमेंसे कोई भी
लक्षण या उसके प्रतिपादक वेदवाक्य व्यर्थ नहीं हैं, इसलिये ( यही सिद्ध होता
है कि परमात्मा दोनों लक्षणोंवाला है ) ।
व्याख्या-जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदिके दो रूप होते हैं-
एक प्रकट और दूसरा अप्रकट-उन दोनोंमेंसे कोई भी व्यर्थ नहीं है, दोनों ही सार्थक
हैं, उसी प्रकार उस ब्रह्मके भी दोनों रूप सार्थक हैं, व्यर्थ नहीं हैं; क्योंकि
ऐसा माननेसे ही उसकी उपासना आदिकी सार्थकता होगी, दोनोंमेंसे किसी एक-
को प्रधान और दूसरेको गौण या अनावश्यक मान लेंगे तो उसकी सार्थकता
नहीं होगी । श्रुतिमें उसके दोनों लक्षणोंका वर्णन है; श्रुतिके वचन कभी व्यर्थ
नहीं हो सकते; क्योंकि वे स्वतः प्रमाण हैं, अतः उन वेदवाक्योंकी सार्थकताके लिये
भी ब्रह्मको सविशेष और निर्विशेष दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त मानना ही उचित है ।
सम्बन्ध-अब श्रुतिमें प्रतीत होनेवाले विरोधका दो सूत्रोंद्वारा समाधान किया
जाता है--
आह च तन्मात्रम् ॥ ३ । २ । १६ ॥
तन्मात्रम्=( श्रुति उस परमात्माको ) केवल सत्य; ज्ञान और अनन्तमात्र;
च=ही; आह=बताती है, वहाँ सगुणवाचक शब्दोंका प्रयोग नहीं है ।
व्याख्या-ऐसी शङ्का भी नहीं करनी चाहिये कि तैत्तिरीय-श्रुतिमें 'सत्यं
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' ( तै० उ० २ । १ ) अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है'-

२३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
इस प्रकार ब्रह्मको केवल ज्ञानस्वरूप ही बताया है, सत्यसङ्कल्पत्व आदि गुणोंवाला
नहीं बताया, अतः उसको दोनों लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता।
सम्बन्ध—क्योंकि—
दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥ ३ । २ । १७ ॥
अथो=उक्त कथनके अनन्तर; दर्शयति=श्रुति उसीको अनेक रूपवाला भी
दिखाती है; च=इसके सिवा; स्मर्यते अपि=स्मृतिमें भी उसके सगुण खरूपका
वर्णन आया है।
व्याख्या—पूर्वोक्त 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' इस मन्त्रमे आगे चलकर उस परमात्माको
सबके हृदयमे निहित बताया है और उसीसे समस्त जगत्की उत्पत्तिका वर्णन
किया है (तै० उ० २ । १); फिर उसे रस-स्वरूप, सबको आनन्द देनेवाला (२ । ७)
और सबका संचालक (२ । ८) कहा है। इसलिये उस श्रुतिको केवल
निर्गुणपरक मानना उचित नहीं है। इसी प्रकार स्मृतिमें भी जगह-जगह उस
परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन दोनो प्रकारसे उपलब्ध होता है। जैसे—'जो मुझे
अजन्मा, अनादि और लोकमहेश्वर जानता है, वह मनुष्योमे ज्ञानी है और सब
पापोंसे मुक्त हो जाता है।'* (गीता १० । ३) 'मुझे सब यज्ञ और तपोका
भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोका महान् ईश्वर, समस्त प्राणियोका सुहृद् जानकर मनुष्य
शान्तिको प्राप्त होता है।'† (गीता ५ । २९) 'ऐसे सगुण रूपवाला मैं
केवल अनन्य भक्तिके द्वारा देखा जा सकता हूँ, तत्त्वसे जाननेमे आ सकता
हूँ और मुझमें प्रवेश भी किया जा सकता है।'‡ (गीता ११ । ५४) ।
श्रीमद्भगवद्गीताके पंद्रहवें अध्यायमें क्षर और अक्षरका लक्षण बताकर यह स्पष्ट
रूपसे कहा गया है कि 'उत्तम पुरुष इन दोनोंसे भिन्न है, जो कि परमात्मा
नामसे कहा जाता है, जो तीनो लोकोंमे प्रविष्ट होकर सबको धारण करता है

  • यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
    असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
    † भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
    सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
    ‡ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
    ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥