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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 417 में से

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पृष्ठ 258

सूत्र १३-१६ ] अध्याय ३ २३७
व्याख्या-जिस प्रकार उस परब्रह्म परमात्माको निर्गुण-निराकार बतानेवाले
वेदवाक्य मुख्य हैं, ठीक उसी प्रकार उसे सगुण साकार, सर्वदिव्यगुणसम्पन्न
बतानेवाले वेदवाक्य भी प्रधान हैं; उनमेंसे किसी एकको मुख्य और दूसरेको
गौण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि एक ही प्रकरणमें और एक ही मन्त्रमें एक
परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे दोनों लक्षणोंवाला बताया गया
है ( श्वे० उ० ६ । ११ ) अतएव रूपरहित निर्विशेष लक्षणोंकी भाँति
ही सगुण साकाररूपकी भी प्रधानता ज्ञात होती है यही सिद्ध होता है कि
वह परब्रह्म परमेश्वर दोनों लक्षणोंवाला है ।
सम्बन्ध-अब दूसरे दृष्टान्तसे उसी बातको सिद्ध करते हैं-
प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ॥ ३ । २ । १५ ॥
च=तथा; प्रकाशवत्=प्रकाशकी भाँति; अवैयर्थ्यात्=दोनोंमेंसे कोई भी
लक्षण या उसके प्रतिपादक वेदवाक्य व्यर्थ नहीं हैं, इसलिये ( यही सिद्ध होता
है कि परमात्मा दोनों लक्षणोंवाला है ) ।
व्याख्या-जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदिके दो रूप होते हैं-
एक प्रकट और दूसरा अप्रकट-उन दोनोंमेंसे कोई भी व्यर्थ नहीं है, दोनों ही सार्थक
हैं, उसी प्रकार उस ब्रह्मके भी दोनों रूप सार्थक हैं, व्यर्थ नहीं हैं; क्योंकि
ऐसा माननेसे ही उसकी उपासना आदिकी सार्थकता होगी, दोनोंमेंसे किसी एक-
को प्रधान और दूसरेको गौण या अनावश्यक मान लेंगे तो उसकी सार्थकता
नहीं होगी । श्रुतिमें उसके दोनों लक्षणोंका वर्णन है; श्रुतिके वचन कभी व्यर्थ
नहीं हो सकते; क्योंकि वे स्वतः प्रमाण हैं, अतः उन वेदवाक्योंकी सार्थकताके लिये
भी ब्रह्मको सविशेष और निर्विशेष दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त मानना ही उचित है ।
सम्बन्ध-अब श्रुतिमें प्रतीत होनेवाले विरोधका दो सूत्रोंद्वारा समाधान किया
जाता है--
आह च तन्मात्रम् ॥ ३ । २ । १६ ॥
तन्मात्रम्=( श्रुति उस परमात्माको ) केवल सत्य; ज्ञान और अनन्तमात्र;
च=ही; आह=बताती है, वहाँ सगुणवाचक शब्दोंका प्रयोग नहीं है ।
व्याख्या-ऐसी शङ्का भी नहीं करनी चाहिये कि तैत्तिरीय-श्रुतिमें 'सत्यं
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' ( तै० उ० २ । १ ) अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है'-