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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्रकारने कहीं भी अपने सूत्रमें सांख्य, जैन, बौद्ध या वैशेषिक मतके आचार्योंका

( ६ )
होनेवाली त्रुटियोंको सूचित करें, जिससे दूसरे संस्करणमें उनके सुधारका
प्रयत्न किया जा सके ।
यहाँ प्रसङ्गवश ब्रह्मसूत्र और उसके प्रतिपाद्य विषयके सम्बन्धमें भी कुछ
निवेदन करना आवश्यक प्रतीत होता है । ब्रह्मसूत्र अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ
है । कुछ आधुनिक विद्वान् इसमें सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन, पाशुपत और
पाञ्चरात्र आदि मतोंकी आलोचना देखकर इसे अर्वाचीन बतानेका साहस
करते हैं और बादरायणको वेदव्याससे भिन्न मानते हैं; परंतु उनकी यह धारणा
नितान्त भ्रमपूर्ण है । ब्रह्मसूत्रमें जिन मतोंकी आलोचना की गयी है,
वे प्रवाहरूपसे अनादि हैं । वैदिककालसे ही सद्वाद और असद्वाद ( आस्तिक
और नास्तिकमत ) का विवाद चला आ रहा है । इन प्रवाहरूपसे चले आये
हुए विचारोंमेंसे किसी एकको अपनाकर भिन्न-भिन्न दर्शनोंका संकलन हुआ है ।
सूत्रकारने कहीं भी अपने सूत्रमें सांख्य, जैन, बौद्ध या वैशेषिक मतके आचार्योंका
नामोल्लेख नहीं किया है । उन्होंने केवल प्रधानकारणवाद, अणुकारणवाद,
विज्ञानवाद आदि सिद्धान्तोंकी ही समीक्षा की है । सूत्रोंमें बादरि औडुलोमि, जैमिनि,
आश्मरथ्य, काशकृत्स्न और आत्रेय आदिके नाम आये हैं, जो अत्यन्त प्राचीन हैं;
इनमेंसे कितनोंके नाम मीमांसासूत्रोंमें भी उल्लिखित हैं । श्रीमद्भगवद्गीतामें भी
'हेतुमद्' विशेषणसहित 'ब्रह्मसूत्र'का नाम आता है, इससे भी इसकी परम
प्राचीनता सिद्ध होती है । बादरायण शब्द पुरातनकालसे ही श्रीवेदव्यासजीके
लिये व्यवहृत होता आया है । अतः ब्रह्मसूत्र वेदव्यासजीकी ही रचना है, यह
माननेमें कोई बाधा नहीं है । पाणिनिने पाराशर्य व्यासद्वारा रचित 'भिक्षुसूत्र'
की भी चर्चा अपने सूत्रोंमें की है । वह अब उपलब्ध नहीं है । अथवा यह भी
सम्भव है, वह ब्रह्मसूत्रसे अभिन्न रहा हो ।
सूत्रकारने अपने ग्रन्थको चार अध्यायों और सोलह पादोंमें विभक्त किया
है । पहले अध्यायमें बताया गया है कि सभी वेदान्तवाक्योंका एकमात्र परब्रह्मके
प्रतिपादनमें ही अन्वय है; इसीलिये उसका नाम 'समन्वयाध्याय' है । दूसरे
अध्यायमें सब प्रकारके विरोधाभासोंका निराकरण किया गया है, इसलिये उसका
नाम अविरोधाध्याय' है । तीसरेमें परब्रह्मकी प्राप्ति या साक्षात्कारके साधनभूत
ब्रह्मविद्या तथा दूसरी-दूसरी उपासनाओंके विषयमें निर्णय किया गया है, अतः
उसको 'साधनाध्याय' कहते हैं और चौथेमें उन विद्याओंद्वारा साधकको अधिकारके

( ७ )
अनुरूप प्राप्त होनेवाले फलके विषयमें निर्णय किया गया है; इस कारण उसकी
'फलाध्याय' के नामसे प्रसिद्धि है। इस ग्रन्थमें वर्णित समग्र विषयोंका संक्षिप्त
परिचय विषय-सूचीसे अवगत हो सकता है। यहाँ कुछ चुनी हुई सैद्धान्तिक बातोंका
दिग्दर्शन कराया जाता है। ब्रह्मसूत्रमें पूज्यपाद वेदव्यासजीने अपने सिद्धान्तका
प्रतिपादन करते समय मेरी अल्पबुद्धिके अनुसार इस प्रकार निर्णय दिया है—
( १ ) यह प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाला जो जडचेतनात्मक जगत् है, इसका
उपादान और निमित्तकारण ब्रह्म ही है ( ब्र० सू० १ । १ । २ )।
( २ ) सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरकी जो परा ( चेतन जीवसमुदाय )
और अपरा ( परिवर्तनशील जडवर्ग ) नामक दो प्रकृतियाँ हैं, वे उसीकी अपनी
शक्तियाँ हैं, इसलिये उससे अभिन्न हैं ( ३ । २ । २८ )। वह इन शक्तियोंका
आश्रय है, अतः इनसे भिन्न भी है। परब्रह्म जीव और जडवर्गसे सर्वथा विलक्षण
और उत्तम है ( ३ । २ । ३१ )।
( ३ ) वह परब्रह्म परमेश्वर अपनी उपर्युक्त दोनों प्रकृतियोंको लेकर ही
सृष्टिकालमें जगत्की रचना करता है और प्रलयकालमें इन दोनों प्रकृतियोंको
अपनेमें विलीन कर लेता है।
( ४ ) परब्रह्म परमात्मा शब्द, स्पर्श आदिसे रहित, निर्विशेष, निर्गुण एवं
निराकार भी है तथा अनन्त कल्याणमय गुणसमुदायसे युक्त सगुण एवं साकार
भी है। इस प्रकार एक ही परमात्माका यह उभयविध स्वरूप स्वाभाविक तथा
परम सत्य है, औपाधिक नहीं है ( ३ । २ । ११ से २६ तक )।
( ५ ) जीव-समुदाय उस परब्रह्मकी परा प्रकृतिका समूह है, इसलिये
उसीका अंश है ( २ । ३ । ४३ )। इसी दृष्टिसे वह अभिन्न भी है। तथापि
परमेश्वर जीवके कर्मफलोंकी व्यवस्था करनेवाला ( ३ । २ । ३८ ) सबका
नियन्ता और स्वामी है।
( ६ ) जीव नित्य है ( २ । ३ । १७ )। उसका जन्मना और मरना
शरीरके सम्बन्धसे औपचारिक है ( २ । ३ । १६ )।
( ७ ) जीवका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें और लोकान्तरमें भी जाना-
आना शरीरके सम्बन्धसे ही है। ब्रह्मलोकमें भी वह सूक्ष्मशरीरके सम्बन्धसे ही
जाता है ( ४ । २ । ९ )।

( ८ )
( ८ ) परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें पहुँचनेपर ज्ञानीका किसी प्रकारके
प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, वह अपने दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होता है
( ४ । ४ । १ ) । वह उसकी सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित मुक्तावस्था है
( ४ । ४ । २ )।
( ९ ) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले जीवको वहाँके भोगोंका उपभोग
संकल्पमात्रसे भी होता है और उसके संकल्पानुसार प्राप्त हुए शरीरके द्वारा भी
( ४ । ४ । ८ ) तथा ( ४ । ४ । १२ ) ।
( १० ) देवयान-मार्गसे जानेवाले विद्वानोंमेंसे कोई तो परब्रह्मके परमधाममें
जाकर सायुज्य मुक्ति-लाभ कर लेते है ( ४ । ४ । ४ ) और कोई चैतन्यमात्र
स्वरूपसे अलग भी रह सकते है ( ४ । ४ । ७ ) ।
( ११ ) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले उस लोकके स्वामीके साथ प्रलय-
कालके समय सायुज्यमुक्तिको प्राप्त हो जाते हैं ( ४ । ३ । १० ) ।
( १२ ) उत्तरायण-मार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवालोंके लिये रात्रिकाल या
दक्षिणायनकालमें मृत्यु होना बाधक नहीं है ( ४ । २ । १९-२० )।
( १३ ) जीवका कर्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे औपचारिक
है ( २ । ३ । ३३ से ४० तक )।
( १४ ) जीवके कर्तापनमें परमात्मा ही कारण है ( २ । ३ । ४१ ) ।
( १५ ) जीवात्मा विभु है; उसका एकदेशित्व शरीरके सम्बन्धसे ही
है, वास्तवमें नहीं है ( २ । ३ । २९ ) ।
( १६ ) जिन ज्ञानी महापुरुषोंके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं
रहती, जो सर्वथा निष्काम और आप्तकाम हैं, उनको यहीं ब्रह्मकी प्राप्ति
हो जाती है । उनका ब्रह्मलोकमें जाना नहीं होता ।
( १७ ) ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहके लिये सभी प्रकारके विहित कर्मोंका
अनुष्ठान कर सकता है ( ४ । १ । १६-१७ ) ।
( १८ ) ब्रह्मज्ञान सभी आश्रमोंमें हो सकता है । सभी आश्रमोंमें ब्रह्म-
विद्याका अधिकार है ( ३ । ४ । ४९ ) ।
( १९ ) ब्रह्मलोकमें जानेवालेका पुनरागमन नहीं होता ( ४ । ४ । २२)।

( ९ )
( २० ) ज्ञानीके पूर्वकृत संचित पुण्य-पापका नाश हो जाता है। नये
कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता ( ४ । १ । १३-१४ )। प्रारब्धकर्मका
उपभोगद्वारा नाश हो जानेपर वर्तमान शरीर नष्ट हो जाता है और वह ब्रह्म-
लोकको या वहीं परमात्माको प्राप्त हो जाता है ( ४ । १ । १९ )।
( २१ ) ब्रह्मविद्याके साधकको यज्ञादि आश्रमकर्म भी निष्कामभावसे
करने चाहिये ( ३ । ४ । २६ )। शम-दम आदि साधन अवश्य कर्तव्य
हैं ( ३ । ४ । २७ )।
( २२ ) ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है ( ३ । ४ । २ से २५ तक )।
( २३ ) परमात्माकी प्राप्तिका हेतु ब्रह्मज्ञान ही है ( ३ । ३ । ४७ )
तथा ( ३ । ४ । १ )।
( २४ ) यह जगत् प्रलयकालमे भी अप्रकटरूपसे वर्तमान रहता है
( २ । १ । १६ )।
इन सबको ध्यानमें रखकर इस ग्रन्थका अनुशीलन करना चाहिये । इससे
परमात्माका क्या स्वरूप है, उनकी प्राप्तिके कौन-से साधन हैं और साधकका
परमात्माके साथ क्या सम्बन्ध है—इन बातोकी तथा साधनोपयोगी अन्य
आवश्यक विषयोकी जानकारी प्राप्त करके एक निश्चयपर पहुँचनेमे विशेष
सहायता प्राप्त हो सकती है। अतः प्रत्येक साधकको श्रद्धापूर्वक इस ग्रन्थका
अध्ययन एवं मनन करना चाहिये ।
श्रीरामनवमी } विनीत,
संवत् २००९ वि० } हरिकृष्णदास गोयन्दका

[चित्र: मध्य में चतुर्भुज भगवान् विष्णु का विग्रह एवं चारों ओर यन्त्र/ज्यामितीय आकृति]