ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 8, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८ )
( ८ ) परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें पहुँचनेपर ज्ञानीका किसी प्रकारके
प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, वह अपने दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होता है
( ४ । ४ । १ ) । वह उसकी सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित मुक्तावस्था है
( ४ । ४ । २ )।
( ९ ) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले जीवको वहाँके भोगोंका उपभोग
संकल्पमात्रसे भी होता है और उसके संकल्पानुसार प्राप्त हुए शरीरके द्वारा भी
( ४ । ४ । ८ ) तथा ( ४ । ४ । १२ ) ।
( १० ) देवयान-मार्गसे जानेवाले विद्वानोंमेंसे कोई तो परब्रह्मके परमधाममें
जाकर सायुज्य मुक्ति-लाभ कर लेते है ( ४ । ४ । ४ ) और कोई चैतन्यमात्र
स्वरूपसे अलग भी रह सकते है ( ४ । ४ । ७ ) ।
( ११ ) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले उस लोकके स्वामीके साथ प्रलय-
कालके समय सायुज्यमुक्तिको प्राप्त हो जाते हैं ( ४ । ३ । १० ) ।
( १२ ) उत्तरायण-मार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवालोंके लिये रात्रिकाल या
दक्षिणायनकालमें मृत्यु होना बाधक नहीं है ( ४ । २ । १९-२० )।
( १३ ) जीवका कर्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे औपचारिक
है ( २ । ३ । ३३ से ४० तक )।
( १४ ) जीवके कर्तापनमें परमात्मा ही कारण है ( २ । ३ । ४१ ) ।
( १५ ) जीवात्मा विभु है; उसका एकदेशित्व शरीरके सम्बन्धसे ही
है, वास्तवमें नहीं है ( २ । ३ । २९ ) ।
( १६ ) जिन ज्ञानी महापुरुषोंके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं
रहती, जो सर्वथा निष्काम और आप्तकाम हैं, उनको यहीं ब्रह्मकी प्राप्ति
हो जाती है । उनका ब्रह्मलोकमें जाना नहीं होता ।
( १७ ) ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहके लिये सभी प्रकारके विहित कर्मोंका
अनुष्ठान कर सकता है ( ४ । १ । १६-१७ ) ।
( १८ ) ब्रह्मज्ञान सभी आश्रमोंमें हो सकता है । सभी आश्रमोंमें ब्रह्म-
विद्याका अधिकार है ( ३ । ४ । ४९ ) ।
( १९ ) ब्रह्मलोकमें जानेवालेका पुनरागमन नहीं होता ( ४ । ४ । २२)।