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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

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DevanagariHindipublished811 pages

About this granth

The Ananda Ramayana (श्रीमदानन्दरामायण) is a long Sanskrit telling of the Rama story traditionally associated with Valmiki. Besides the familiar plot it contains many episodes found in no other Ramayana, and it describes at length Rama's reign, pilgrimages, sacrifices and family life.

The work has nine kandas: Sara, Yatra, Yaga, Vilasa, Janma, Vivaha, Rajya, Manohara and Purna. The detailed index in this edition lists the episodes sarga by sarga. The very first sarga, for example, gives a short genealogy of the Raghu line, tells how Ravana learned from Brahma that Rama would kill him and so shut Kausalya in a box and handed it to a sea monster, and narrates Dasharatha's gandharva marriage to Kausalya and Kaikeyi saving Dasharatha's life in battle by holding the broken axle of his chariot with her hand. Later sargas cover the freeing of Ahalya, the breaking of the bow and Sita's marriage.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi translation, all nine kandas in 811 pages.

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११८आनन्दरामायणे[ सर्गः ६

गत्वाऽऽरामाच्च कासारं गृहीत्वाऽब्जानि निर्भयः। शनैर्यानद्रथं प्राप तावदारामापाऽऽययुः ॥२७॥
तं तु दृष्ट्वा लवं साब्जं पप्रच्छुर्विस्मयान्विताः। न त्वं दृष्टः कदाऽस्माभिः श्रीरामानुचरेषु हि॥२८॥
कदारभ्य रामसेवा त्वया चाङ्गीकृता वद । यत्त्वं निर्भयोऽब्जानि गृहीत्वा गच्छसि प्रभोः॥२९॥
रामदूतवचः श्रुत्वा विहस्याह लवोऽपि सः। वाल्मीक्यनुगोऽहं न रामदर्शनं मम ॥३०॥
दासोऽहं मुनिराजस्य वाल्मीकेः शुद्धचेतसः। तदाज्ञया वै नीयन्ते कमलानि मया मुदा ॥३१॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा वाल्मीकीयं लवं तदा। ज्ञात्वा दूताः पारक्यं क्रोधाद्वचनमब्रुवन् ॥३२॥
रामसेवया न दृष्टोऽत्र न नः पृष्ट्व्वया पुनः । नाज्ञादत्ताऽपि रामेण नीयन्तेऽब्जानि प्रत्यहम् ॥३३।
न ज्ञातमेतदस्माभिस्त्विदानीं तिष्ठ मा व्रज। अपराध्यसिरामस्य त्वां नेष्यामो वय प्रभोम् ॥३४॥
इत्युक्त्वा तस्य पन्थानं रुरुधु रामसेवकाः। चतुर्दश सशस्त्र स्ता समन्ता रामतो यदा ॥३५॥
तान्दृष्ट्वा स्यन्दनस्थ ह लवोऽप्याह विहस्य च । यूयं गच्छत श्रीरामं मद्वृत्तं ब्रूयमादरात् ॥३६॥
यद्यस्ति पौरुषं रामे तर्हि यास्यति मां प्रति । बालस्य वचनं श्रुत्वा कोपाद्द्ता वचोऽब्रुवन् ॥३७॥
कथ वत्स मर्तुकामस्त्वमित्थं वत्थसे मुधा । बद्ध्वा त्वां वयमेवाद्य विनेष्यामो रघूत्तमम् ॥३८।
इत्युक्त्वा ते लव धतुं ययुस्तस्य रथांतिकम्। तान्दृष्ट्वा निकटं यामान् रामदूतान्लवोऽपि सः ॥३९॥
टणस्कृत्य महच्चापं शुणम्धाय वेगतः । अब्रवीत्तान्पुनर्वाक्यं माऽऽगन्तव्य ममान्तिकम्॥४०॥
मार्गेणैषुणा युष्मान् त्यजामि राघवन्तिके । इत्युक्त्वा तान्पुनर्रदृष्ट्वा ऽऽगच्छन्तान धतुं समुद्यतान् ॥४१॥
रवाशं शशिखड्गार्हस्तीक्ष्णाऽप्यच्चम्मंडपे । चतुर्दश रामदूता लवमार्गणताडिताः ॥४२॥
निपेतुर्मूच्छिताः सर्वे श्यामे जाह्नवीतटे । शतशो रामदूतास्ते दृष्ट्वा चक्रुः पलायनम् । ३॥
लवोऽपि विजयी शीघ्र पूर्ववन्स्वाश्रम ययौ । समर्प्याब्जानि सीतायै सर्व वृत्त न्यवेदयत् ॥४४॥

गये ॥ २५-२७॥ लवको फूल लिये देखकर विस्मयपूर्वक वे बोले—हमने कुल कभी रामचन्द्रजीके सेवकोंमें नहीं देखा है ॥ २८ ॥ तुमने कब नौकरी की है ? जो इस तरह निर्भय होकर कमलके फूल ले जा रहे हो ॥ २९ ॥ तब दूतोंकी बात सुनकर हंसते हुए लवने कहा—मैंने तो अभी तक रामको देखा भी नहीं है ॥ ३० ॥ रामका नहीं मैं महर्षि वाल्मीकिका सेवक हूँ । उन्हींके आज्ञानुसार मैं यहांसे फूल ले जाता हूँ। किन्तु तुमने आज ही हमको देखा है। इसके पहले कभी नहीं देख पाया ॥ ३१ ॥ इस तरह अपनेको वाल्मीकिका सेवक बतलानेपर दूतोंको समझमें आया कि यह कोई अजनबी मनुष्य है। यह जानत ही वे मारे क्रोधके तमतमा उठे। उन्होंने कहा—॥ ३२ ॥ तुमने न रामकी आज्ञा ली, न हम लोगोंसे पूछा और रोज फूल ले जाते हो ॥ ३३ । यह बात हमको मालूम नहीं थी । किन्तु, अब ठहरो । तुम रामचन्द्रजीके अपराधी हो । अतएव हम तुम्हें उनके पास ले चलेंगे। ३४ । ऐसा कहकर उन लोगोंने लवका रास्ता रोक लिया। जब एक सौ चौदह सशस्त्र सैनिकों ने लवको घेर लिया। तब लवने रथपर बैठे ही बैठे उनकी ओर देख तथा हँसकर कहा तुम लोग रामके पास जाकर हमारा वृत्तान्त कहो । ३५ ॥ यदि राममे कुछ सामर्थ्य होगी तो वे स्वयं मेरे सामने आयेंगे एक पाँच वर्षके बच्चेकी ऐसी बातें सुनकर दूतोंने कोधपूर्वक कहा—॥३६॥३७॥ हे बच्चे ! तुम क्यों मरना चाहते हो, जो ऐसी बढ़-चढ़कर बातें करत हो ? तुमको बाँधकर हमीं लोग उनके पास अभी लिये चलते हैं । ३८ । ऐसा कहकर लवको पकड़नेके लिए कई दूत आगे बढ़े। उनकी निकट देखकर लवने तुरन्त अपने धनुषका टंकोर करके उसपर एक बाण चढ़ाया और उनसे कहा—सावधान ! मेरे पास न आना ॥ ३९ ॥ ४० ॥ नहीं मानोगे तो मैं इसी धनुष और बाणसे तुम लोगोंको उठाकर रामके पास फेंक दूँगा। ऐसा कहकर लवने देखा कि वे लोग फिर भी उन्हें पकड़नेका प्रयत्न कर रहे हैं ॥४१॥ ऐसी दशामें लवने बाणोंसे दूतोंको उठाकर फेंका और वे गङ्गाके समीप रामकरे यज्ञका कार्यमें मूर्छित होकर जा गिरे। इस प्रकार लवका पराक्रम देखकर रामके जो सैकड़ों सैनिक वहाँ बचे थे, वे सब इधर-उधर भाग गये ॥ ४२ ॥४३॥ सब विजयी होकर वे अपने आश्रमकी ओर बढ़े। वहाँ पहुंचकर लवने कमल

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सर्गः १ ] अगम्यकाण्डम् ११९


चतुर्दश रामदूताः स्वस्थचित्ताश्चिरेण ते । सर्वं वृत्तं राघवाय कथयामासुरादरात् ॥४५॥
तच्छ्रुत्वा रामचन्द्रोऽपि विस्मयाविष्टमानसः । सहस्रदूतानामगमद्वनस्यार्थे प्रबोधवत् ॥४६॥
लवोऽप्यथ नवम्यां स साकेतं पुरंन्वयौ । भट्यं रामदूतास्ते तत्र योद्धुं समुद्यताः ॥४७॥
लवस्तानाह युष्माकं स्वामिना रावणेन हि । यदा सीता वने त्यक्ता जयश्रीश्च गता तदा ॥४८॥
युष्माकं राघवस्यापि गच्छध्वं राघवं पुनः । युष्माभिर्मा मया युद्धं कर्तव्यं मरणोन्मुखैः ॥४९॥
सीताशयायैतु युष्माकं स्वामिनः पौरुषं न हि । इति ते लववाग्बाणैर्भिन्नामर्मस्थलास्तदा ॥५०॥
दूताः शस्त्राणि मुमुचुर्लवोपरि महात्मनैः । लवेोऽपि बाणमाकृत्य रामदूतान्स्वमार्गजैः ॥५१॥
प्रक्षिपत्पूर्ववद्रामं तच्छत्रौघं निवार्य च । अह्नायतो यदा दूताश्शक्रुः सर्वं पलायनम् ॥५२॥
ययौ लवः स विजयी पुष्पसञ्चयलान्वितः । आश्रमं मातरं नत्वा सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥५३॥
पुत्रस्य पौरुषं श्रुत्वा तुतोष जानकी तदा । भुवि निवेदयामासु रामदूता रघूत्तमम् ॥५४॥
मूर्च्छा लवशरैः प्राप्ता भिन्नदेहा मग्नांगणे राम राम महाबाहो शृणुष्वापूर्वमादरात् ॥५५॥
पञ्चवर्षवयस्केन वयमद्य पराजिताः । वाल्मीकेर्भटपुत्रिणः स न जेयो लक्ष्मणादिभिः ॥५६॥
तद्वधे मंत्रयस्वाद्य त्वमुपायं रघूत्तम । सीतात्यागादिवचनैर्नास्तथापि च बालकः ॥५७॥
चकार निंदां श्रीराम गतभीस्त्वेक एव यः । तेषां वचनंवृत्तं कृत्स्नमाकर्ण्य राघवः ॥५८॥
मंत्रय्य सचिवैर्दूतं वाल्मीकि प्रेषयज्जवान् । नत्वा मुनिं रामदूतो रामवाक्यं न्यवेदयत् ॥५९॥
यस्ते शिष्यो महावीरः सोऽपराध्यस्ति वै मम । तं प्रेषयाथवा तेन त्वमागच्छत्व सन्मुखम् ॥६०॥


सीताको दिया और उस दिनका सारा हाल कह सुनाया ॥४४॥ जो दूत रामको यज्ञशालामें गिरे थे, वे बहुत देर तक मूर्छित पड़े रहे। जब चेतना आयी, तब सादर उन्होंने रामको लवका सब समाचार सुनाया ॥४५॥ सो सुनकर रामचन्द्रजीको भी बड़ा आश्चर्य हुआ; उन्होंने फिरसे एक हजार दूतोंको बगीचेकी रखवालीके लिए नियुक्त कर दिया ॥ ४६ ॥ दूसरे दिन अर्थात् नवमीको लव फिर फूल लेनेके लिए बगीचेमें जा पहुंचे। सबने दूतोंको देखकर कहा कि जिस दिन तुम्हारे प्रभु रामने सीताको वनमें भेज दिया उसी दिन उनकी जयश्री भी बिदा हो गयी ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ तुम्हें चाहिए कि तुम रामके पास जाकर लड़ाई करनेसे इनकार कर दो। तुम मरणोन्मुख हो। अतएव मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे साथ युद्ध करूँ ॥ ४९ ॥ सीतापने त्यागनेवाले तुम्हारे प्रभु रामके साथ संग्राम करना मुझे उचित नहीं जँचता इस प्रकार लवके वचनरूपी बाणोंसे सैनिकोंके हृदय विदीर्ण हो गये ॥५०॥ तब उन्होंने लवपर बाणवर्षा आरम्भ कर दी। उधर लवने भी अपने बाणोंसे सैनिकोंके प्रहार बचाते हुए अपने बाणोंसे उनको उठा-उठाकर रामके पास फेंकना आरम्भ किया। थोड़ी देरमे ही सब दूत बगीचा छोड़ छड़कर भाग निकले। तब लव अपनेको विजयी जानते हुए रोजकी तरह फूल लेकर आश्रमको लौट गये। वहाँ पहुंचकर लवने सीता माताको प्रणाम किया और उस दिनका भी सारा हाल सुनाया ॥ ५१-५३ ॥ बेटाका पुरुषार्थ सुनकर सीता परम प्रसन्न हुईं। इधर रामचन्द्रके दूतोंने रामके पास जाकर सब अपनी आपबीती कह सुनायी ॥ ५४॥ जिनको लवने अपने बाणसे उठाकर रामके पास फेंका था, वे लोग घायल होकर बहुत देर तक मूर्छित अवस्थाम ही पड़े रहे। बाद होशमें आने तो कहने लगे हे राम ! हे महाबाहो ! मैं जो कह रहा हूँ, उसे तनिक ध्यान देकर सुनिए। आज हम सब बाल्मीकिके एक शिष्यसे, जिनकी अवस्था अभी पाँच वर्षकी है, परास्त हो गये। मेरा तो यहाँतक विश्वास है कि आपके अलावा लक्ष्मण आदि भी उसे नहीं हरा सकते। ५५ ॥ ५६ ॥ हे रघूत्तम ! उसे मारनेके लिए आप कोई उपाय कीजिए। सीतात्याग आदिकी बातें दुहराकर उस एकाकी बालकने हमारी और आपकी भी भरपूर निन्दा की है। उनकी बातें सुनी तो मंत्रियोंसे परामर्श करके रामने तुरंत कई दूतोंको बाल्मीकिके आश्रमपर भेजा। वे दूत बाल्मीकिके पास पहुंचे और उन्हें प्रणाम करके रामका सन्देश इस तरह सुनाने लगे ॥ ५७-५९ ॥ रामचन्द्रने कहा है कि आपका महावीर शिष्य लव हमारा अपराधी है। उसे या तो हमारे

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३२०आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

विस्मृत्यापूर्वमेव त्वं नाहूतोऽसि क्षमस्व तत् । तद्दूतवचनं श्रुत्वा रामीयं मुनिरब्रवीत् ॥६१॥
शिष्यान्साकं वा समाहूय यास्यामि त्वं व्रज । तथोक्तः रामदूतोऽपि मुनिं नत्वा ययौ मखम् ॥ ६२॥
जानन्नेव भावि वृत्तमादौ रामो मुनिं मखम् । नाहूयामास शिष्याभ्यां लौकिकीं रीतिमाश्रितः ॥६३॥
स्वीयव्रतसमाप्तिं साऽकरोत्सीताऽपि सादरम् ।

विष्णुदास उवाच
अशक्तश्च कथं पार्थ व्रतमपेतद्वदस्व माम् ॥६४॥

श्रीरामदास उवाच
काञ्चनस्याथवा रौप्यस्याथवा ताम्रनिर्मिते । कार्ये द्वे पादुके रम्ये राघवस्य यथासुखम् ॥६५॥
अभावे कमलानां च पुष्पैर्जलिरीरिता । एकाशीतिदंपतीनां न शक्तिः पूजने तदा । ६६।
पूजनीयानि युगलानि नव शक्त्याऽथवा सुखम् । स्वशक्त्या पूजनं कार्यं वित्तशाठ्यं परित्यजेत् । ६७॥
अनेकदूरगस्यापि संयोगश्च भवेद्ध्रुवात् । भाविकार्याणि वेगेन भविष्यन्ति न संशयः ॥६८।
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

सप्तमः सर्गः

( राम लक्ष्मण आदिका लव-कुशके साथ युद्ध )

श्रीरामचन्द्र उवाच
अथ रामोऽपि धर्मात्मा चरमे तुरगाध्वरे । हयं मुमोच शत्रुघ्नस्तस्य पृष्ठे ययौ जवात् ॥१॥
दक्षिणां पश्चिमामाशासुत्तरां तुरगोत्तमः । अतिक्रम्य तथा प्राचीं यज्ञस्थानं न्यवर्तत ॥२।
नृपतिभ्यः समस्तेभ्यः शत्रुघ्नो वसु कोटिशः । गृहीत्वा नैरुपैर्युक्तस्तुरगस्यानुगो ययौ ॥३॥

दूतोंके साथ भेज दीजिए अथवा आप स्वयं अपने साथ लेकर हमारे यज्ञमण्डपमें आइए ॥६०। भूलसे मैंने आपको पहले निमन्त्रण नहीं दिया था, सो क्षमा कीजिएगा। इस प्रकार दूतोंके मुखसे रामका सन्देश सुनकर महर्षि वाल्मीकिने कहा- ॥ ६१ ॥ हम अपने शिष्योंके साथ स्वयं यज्ञमण्डपमें आयेंगे, तुम लोग जाओ। रामके दूतोंने ऋषिराजके वचन सुनकर प्रणाम किया और वहांसे प्रस्थान करके रामकी यज्ञशालाको चल पड़े ॥ ६२॥ राम इस भावी घटनाको पहिलेसे ही जानते थे। इसीलिए लौकिक रीति निभाते हुए शिष्योंके साथ वाल्मीकि-जीको पहले यज्ञमें नहीं बुलाया था । ६३ ॥ उधर सीताने भी नौ दिनवाला व्रत समाप्त कर लिया।
विष्णुदासने पूछा जो लोग सामर्थ्यहीन हैं, वे इस व्रतको कैसे करेंगे ? सो बताइए ॥ ६४॥ श्रीरामदासने उत्तर दिया यदि सुवर्णकी पादुका न बनवा सकें तो चांदीकी बनवा लें, वह भी न हो सके तो तांबेकी दो चरणपादुकाएं बनवानी चाहिए ॥ ६५ ॥ यदि उतने कमलक फल न मिल सकें तो साधारणतया किसी भी फलकी अञ्जली दे। यदि इक्यासी द्विजदम्पतीकी पूजा करनेकी सामर्थ्य न हो तो नौ द्विजदम्पतीका ही पूजन करे। उसके भी अभावमें अपनी शक्तिके अनुसार पूजा करे, लेकिन उनम कंजूसी न होने पाये ॥ ६६ ॥ ६७॥ इस व्रतको करनेसे चाहे कितनों ही दूरीपर रहनवाला भी प्रियजनका मिलाप अवश्य हो जाता है इसके अतिरिक्त जितने भी भविष्यके कार्य होंगे वे सब सम्पन्न हो जायेंगे। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ६८ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योत्स्ना आख्याटीकासमन्विते जन्मकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
श्रीरामदास बोले—इस प्रकार रामचन्द्रने ९९ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिये, अन्तिम सौवें यज्ञके लिए भी घोड़ा अभिषिक्त करके छोड़ा और शत्रुघ्न उसकी रक्षा करनेके लिए इसके साथ गये ॥ १ ॥ दक्षिण, पश्चिम, पूर्व और उत्तर दिशाकी प्रदक्षिणा करक घोड़ा रामचन्द्रजीके यज्ञमण्डपकी ओर लौट पड़ा ॥ २॥ रास्तेमें कितने ही राजाओंसे अनेक प्रकारकी भेंटे ले लेकर उन राजाओंको अपने साथ लिये शत्रुघ्न अश्वसमेत

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सर्गः ७ ]
जन्मकाण्डम्
३२१


सेनया चतुरङ्गिण्या च दशसाहस्रसंख्यया ।
तस्मिन्विमाने ऋषयः सर्वे राजर्षयस्तथा ॥ ५ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः समाजग्मुः सहस्रशः ।
यज्ञाश्चर्यमयं द्रष्टुं हर्षेणोन्मत्तमागताः ॥ ६ ॥
दान्तौ चिरेऽपि संगृह्य गायन्तौ भूमिजात्मजौ ।
अगाम यज्ञवाटस्य समीपं सीतया सुखम् ॥ ६ ॥
मार्गे नृपसमूहेषु शिविकास्थां हि जानकीम् ।
न विदुः पांथाः सर्वे जानन्नपि यथेतरे ॥ ७ ॥
तथैव या जनकोऽपि ययौ रामाश्रयं प्रति ।
क्रोशार्धान्तरे पूर्वं पश्चादापन्मुनीश्वरः ॥ ८ ॥
कृत्वा पर्णकुटीं रम्यां ताभ्यां युक्तः स सीतया ।
वाल्मीकिर्निवासयामास पर्णकुट्यां विदेहजाम् ॥ ९ ॥
नृपसेनानिवासेषु जनकश्च सुमेधया ।
स्वसैन्येन ययौ तूष्णीं रामेणापि निरीक्षितः ॥ १० ॥
वाल्मीकिस्तौ प्राह तन्मान्तरमण्डितौ ।
जटाचीरधराधर्मी वीरपुत्रौ महाधियौ ॥ ११ ॥
यत्र यत्र च गायन्तौ पुरे वीथिषु सर्वतः ।
रामस्याग्रे प्रगायेतां शुश्रूषुर्यदि राघवः ॥ १२ ॥
आश्रमकाण्डकाण्डानि न गेयमथ बालकौ ।
यदा दयेत्सहं चाहो गायतां सकलं तदा ॥ १३ ॥
न ग्राह्यं नृपवर्याभ्यां यत्किंचिन्नृपमर्हति ।
इति तौ वाल्मीकिनात्र गान्धार्यौ विचेरतुः ॥ १४ ॥
तथोक्तं ऋषिणा पूर्वं तत्र तत्र व्यगायतम् ।
तौ तु शुश्रुव ऋषयः पूर्वमश्रुतं ततः ॥ १५ ॥
अपूर्वरसवादिनौ तौ समाविदुर्ब्रह्म बालकौ ।
सधनाः सर्वेऽनुसस्रुस्तेऽब्रवन् ॥ १६ ॥
अथ कर्मान्तरे रामः समाहूय मुनीश्वरान् ।
गान्धर्वं गायतामेतौ पृष्टवांश्च नृपोत्तमः ॥ १७ ॥
पौरांश्चित्रांश्छन्दविदो गाथाश्च विविधान्यतः ।
ज्ञातादींश्चैव नैपुण्यात्तथाऽऽहूय द्विजादिकान् ॥ १८ ॥
यज्ञवाटे तु वाल्मीक्ये गच्छन्तौ जनतो भयात् ।
ते सर्वे दृष्टमनसो बालौ ब्राह्मणादयः ॥ १९ ॥
रामं तौ दारको दृष्ट्वा विस्मिता निर्निमेषकः ।
अथोऽन्योन्यं पूर्वत परस्परमथानयोः ॥ २० ॥
इमौ रामस्य सदृशौ बिम्बाद्बिम्बिनिभाविनौ ।
जटिलौ यदि न स्यातां न वल्कलधारिणौ ॥ २१ ॥


अश्वमेधके समीप आ पहुंचे ॥ ५ ॥ उस समय अयोध्यामें उस हजार चतुरङ्गिणी सेना थी। इसके अतिरिक्त उस विमानमें कितने ही ऋषि, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यगण इस दृश्यमें रामचन्द्रके इस अन्तिम यज्ञको देखने आये थे ॥ ५ ॥ ५ ॥ वाल्मीकि जी भी चुप रूप सीताको अपने साथ लेकर गएक यज्ञमण्डपकी ओर चल पड़े ॥ ६ ॥ रास्तेमें जाते समय न कोई लोग नहीं जान पाये कि इनमें कौन है। तब जनक और सुमित्रा ने भी रामाश्रय को गए। जब एक कोश बाकी रह गया, वहीं पर वाल्मीकिजी सीताजीके साथ ठहर गये और सुन्दर पर्णकुटी बनाकर पर्णकुटीके अन्दर सीताको छुपा दिया ॥ ८ ॥ ९ ॥ जनक अपना पड़ाव सेनाके पड़ावके पास ही डालकर ठहर गये। वहीं रामसे भेंट हुई ॥ १० ॥ वाल्मीकिने उन दोनों राजकुमारोंको वस्त्र भूषण उतार तथा जटा और अजिन पहन कर कहा कि तुम नगर भरमें घूमकर गाओ और जो रामचन्द्रजीको गाना यदि रामचन्द्र स्वयं सुनना चाहें तो उनको भी सुना देना ॥ ११ । १२ । लेकिन आश्रम काण्डका पूर्व भाग नहीं गाना, जब वे कहें कि हमसे लेकर बालकाण्ड पर्यन्तका गाओ बिल्कुल आवाज़ साफ़ रखकर उस समय कुछ देना चाहें तो ऐसा इन्कार कर देना। इस प्रकार वाल्मीकिजीके आज्ञानुसार वे दोनों बालक गान्धर्व गान गाते हुए घूमने लगे ॥ १३ ॥ १४ ॥ जहां-जहां और जिस-जिस प्रकार गुरुजीने आदर गान को कहा था, वहां-वहां जाकर दोनोंने गाया। रामचन्द्रजीके पास भी यह खबर पहुंची और उन्होंने सर्वोत्तम उत्तम गानकी प्रशंसा सुना ॥ १५ ॥ उस तरह बालक युगल इस प्रकार आश्चर्यजनक गानकी वान सुनकर तो सबका बड़ा कौतूहल हुआ ॥ १६ ॥ विश्राम के समय उन्होंने यज्ञमण्डपमें वाल्मीकि आश्रम, नैमिषारण्यके अन्यान्य मुनियों, राजाओं, ब्राह्मणों, पौराणिक पण्डितों, वैय्याकरणों तथा विभिन्न प्रकारके अन्य विद्वान लोगों को इस गानको सुनने बुलाया। इसके बाद सब गाने वालेका पूजा कर और उन दोनों कुमारोंको बुलाया। उन राजाओं और ब्राह्मणादि लोग दोनों बालकों को प्रथम देखा ॥ १७-२१ ॥ वहां लोगोंने एक बार रामकी ओर देखा, फिर बच्चोंकी तरफ निहारा तो उनके आश्चर्यका ठिकाना नहीं रहा। उनकी आँख निर्निमेष हो गयी

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३२२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७

विशेषं नाधिगच्छामो राघवस्यान्वयोस्तदा । एवं संवदतां तेषां विस्मितानां परस्परम् ॥२२॥
तदाऽऽह शमदूतोऽपि लवबाणरुजं स्मरन् । रामचंद्रं यजुर्वाट्स्थितं वै संभ्रमेण हि ॥२३॥
लवमंगुलिना वीरं दर्शयंश्च मुहुर्मुहुः राम राम महाबाहो तमेनं पश्य वै लवम् ॥२४॥
येनास्माकं शरौघैश्च प्रक्षिप्य तव सन्निधौ । नीतानि कनकच्छानेि सुगंधीनि निरंतरम् ॥२५॥
सीतान्यागनिमित्तेन येन तेनापि वा मुहुः । कृता निंदा गरिष्ठेन त्वद्दण्डस्यार्थिना प्रभो ॥२६॥
ननु दण्डभयादेव पूर्ववेषं विलोपितः । रथशस्त्राभरणानि शस्त्राण्यपि विहाय च ॥२७॥
धृतानि वल्कलादीनि दीनरूपोऽत्र दृश्यते । न्यायोऽय दण्डनीयोऽय वधुभागनिवर्हितः ॥२८॥
इति स्वदूतवाक्यानि शृण्वन्नपि रघूत्तमः । प्रेम्णाऽवलोकयामास सुधाक्षिभ्यां शिशू मुहुः ॥२९॥
मध्याह्वारि सभास्थानान्मस्कृत्य यथाक्रमम् । राघवं स्वपितृव्यांश्च वसिष्ठ प्रणिपत्य च ॥३०॥
उपाचक्रमतुर्गातुं वीणे रणयतः शुभे । ततः प्रवृत्तं मधुरं गांधर्वं गतिनुत्तमम् ॥३१॥
श्रुत्वा तन्मधुरं गीतं रामस्नोपमवाप ह । ताभ्यां श्रुतं स्वचरितं विलासाद्यद्यनुक्रमात् ॥३२॥
यद्यदाचरितं पूर्वं सीतया सह मौख्यदम् । ततोऽपराह्ने श्रीरामः प्रसन्नवदनांबुजः ॥३३॥
उवाच तौ समग्रं वै श्रो गेयं मम सन्निधौ । नवेति रामवचन तावंगीनकृतून्वदा ॥३४॥
ततो रामो लवं प्राह मे यद्यप्यपराधिनम् । त्वया पूर्वं तथापि त्वां तुष्टोऽह नात्र संशयः ॥३५॥
स्वद्गीतिमच्चरित्रादि श्रवणादय मे मनः । परं विश्रांतिमापन्नं त्वत्कृतं क्षमितं मया ॥३६॥
अधुना मद्भयं त्यक्त्वा त्वं सुखं विचरस्व हि । तद्रामवचन श्रुत्वा नयो राघवमब्रवीत् । ३७॥
मयाऽपराचितं राजंस्तव दर्शनकाम्यया । मदपराधिन ब्भून्वान्नाहान्तोऽहं यनस्त्वया । ३८॥

और वे आपसमें कहने लगे-२०। एक बिम्बसे निकले दूसरे प्रतिबिम्बकी भाँत ये दोनो बालक बिल्कुल रामचन्द्रके समान हैं। यदि इनके मस्तकपर जटा न रहे और वल्कल वस्त्र उतार दिये जायें तो इनमें तथा राममें कोई अन्तर ही नहीं रह जाता। जब सब लोग विस्मित होकर परस्पर इस प्रकार बात कर रहे थे। तभी उनके बाणोम बाघनेवाले मारको पाड़ाका स्मरण करता हुआ रामका एक दूत घबड़ाकर बोला -२१-२३॥ हे राम! हे महाबाहो! देखिये, यही लव है। जिसने अपने बाणोसे उठाकर मुझे आपके पास फेंक दिया था और सुगन्धित कनककमलके फूलोंको हठात् तोड़कर ले जाया करता था। २४। २५॥ आपके सीन्तात्यागविषयक बालक होकर इसीने बड़े घमण्डके साथ आपकी निन्दा की दी। २६॥ ज्ञान होता है कि आपके दण्डसे डरकर इसने रथ तथा वस्त्राभरण त्याग दिये हैं ओर वल्कलवस्त्र आदि पहन तथा दीनरूप धारण करके आया है। किन्तु मेरा यह परामर्श है कि इस अभिमानीको अवश्य दण्ड दीजिये। २७।२८॥ इस प्रकार दूतकी बातें सुन करके भी रामचन्द्र अपनी अमृतभरी आँखोंसे उन बच्चियोंको प्रेमपूर्वक देख रहे थे ॥ २९॥ उन्होंने सभाभें पहुँचकर वहाँ बैठे हुए लोगोंको प्रणाम करके रामको, लक्ष्मण आदि अपने चाचाओं को तथा वसिष्ठ आदि गुरुजनोंको प्रणाम किया और वीणा बजाते हुए रामचरित्र गान लगे। उस समय मघाम जैसे गान्धर्व गायनका रंग बरसने लगा ॥ ३० ॥ ३१ ॥ राम उनका मधुर गायन सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। गायनमे रामके उस चरित्रका वर्णन था, जो जन्मसे लेकर विलासकाण्ड पर्यन्त सीताके साथ उन्होंने किया था॥ ३२॥ गान-गाते दोपहरका समय हो गया। तब रामचन्द्रन प्रसन्नतापूर्वक उन बच्चास कहा-बच्चो, आज समय अधिक बीत चुका। इसलिये रहने दो। कल मेरे पास फिर आना और मुझे सारी रामायण सुनाना। रामकी बातको उन्होंने अङ्गीकार कर लिया ॥ ३३ ॥ ३४॥ इसके अनन्तर रामने लवस कहा-यद्यपि तुम हमारे अपराधी हो फिर भी मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हें कोई दण्ड देनेकी इच्छा ही नहीं होती। तुम्हार गानभीम अपनी चरित्रसुली सुनकर मेरा हृदय शान्त हो गया है और तुमने जो अपराध किया था, उसे क्षमा करता हूँ । ३५ ॥ ३६ ॥ अब तुम मुझसे डरो नहीं निर्भय होकर जहाँ चाहो घूमो। इस प्रकार रामकी बातें सुनकर सबने उत्तर दिया-राजन् ! उस समय

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सर्गः ७ ] अष्टमकाण्डम् ३२१


अद्य ते दर्शनेनैव पौरुषं वृद्धिमङ्गतम् । कीर्तिर्न महती जाता तवाग्रे गायनादपि ॥३९॥
इत्युक्त्वाऽऽर्याज्ञयाऽऽपूर्णा बन्धुना गन्तुमुद्यतः । मखयात्रौ संतुकामो स्थलन्मीय निरीक्ष्य च । ४०॥
रत्नोऽयुतं वसु तपोऽर्थिनांवेन प्रदापयन् । दीयमानं सुवर्णं तौ न मजग्गृहतुस्तदा ॥४१॥
राजन् हेम्ना किमेतेन पात्रौ वै वन्यभोजिनौ । कृपालोकनेनैव यदि न्याय्योः सदा ॥४२॥
इति संत्यज्य तद्दत्तं जग्मतुर्मुनिमाश्रिषम् । आत्मानम्वृत्ता स्वचरितं रामो हृद्यतिविस्मितः । ४३॥
कुशोऽपि सकलं वृत्तं वाल्मीकिं मानदं तदा । निवेद्य बाहुवीर्यं स्नातुं कौतुकेन ययौ सुतम् ॥४४॥
लवो मुनीनां शिशुभिः शिशुक्रीडनमथाचरत् । एतस्मिन्नन्तरे यत्र लवः क्रीडां चकार ह ॥४५॥
बालकैस्तत्र संत्राप्तास्तुरगं ध्वजकारिणः । त्यक्त्वा क्रीडां लवः शीघ्रमुपमूर्वीटजान्तिके ॥४६॥
वृक्षे बबंध शिशुभिः पूर्ववत् क्रीडन व्यधात् । ततः से पुष्पकं प्राप्त दृष्ट्वा बहु तुरङ्गवम् ॥४७॥
श्रान्त्वा बालकृतं सर्वे शत्रुघ्नाया निवेद्य ते । दूतानाज्ञापयामासुर्न्नयतां तुरगः सुखम् ॥४८॥
लवस्तानागतान् दृष्ट्वा वायव्यास्त्रेण वै तृणम् संमन्त्र्य तान् सुमोधाय नीलपा शिशुसंयुतः ॥४९॥
सञ्चार्नस्तदा यातं हन्यश्चाथतुरङ्गितम् । शत्रुघ्नेनापि तैर्दूतैः खेडभूत्तद्रमगोपमम् ॥५०॥
तच्छ्रुत्वा राघवचन्द्रोऽपि प्रेषयामास सादरम् । सुग्रीवमङ्गदं नीलं मैन्दं जाम्बवन्तं नलम् ॥५१॥
सुषेणं भरतं वायुपुत्रं ताक्ष्यं विभीषणम् । नृपेण पार्थिवान्सर्वान् स्वस्त्रांस्तर्बलपेतान् ॥५२॥
द्विविदं दधिवक्त्रं च वानरान्मकराध्वजम् । ते सर्व दुद्रुवुर्योद्धुं चक्रुस्त्त्वरान्विताः ॥५३॥
तानागतान कपी दृष्ट्वा कस्यचित्पतितं भुवि । दूतस्याश्वमोचनायायातस्य शरासनम् ॥५४॥
तूणीरं च स्वयं धृत्वा ययौ योद्धुं त्वरान्वितः । टणत्कृत्य महच्चापं चिन्तयामास चेतसि ॥५५॥


मैंने जो अपराध किया था, उसका उद्देश्य एकमात्र यही था कि मैं किस प्रकार आपसे मिलूँ। आपने भी मेरे अपराधका स्मरण करके भी मुझे बुलाया साधुवत् कृपा की ॥ ३७ । ३८ ॥ आज आपके दर्शन करते ही मेरा पुरुषार्थ बढ़ गया और आपके सामने रामचरित गायन बड़ी कीर्ति की बात ॥ ३९ ॥ इतना कहकर कुश धूप दाशद और अपने भ्राताके साथ आश्रमको जानेकी तैयारी करने लगे। उधर रामने उन बच्चोंके लिए दस हजार स्वर्णमुद्रायें अवश्य दिलवायीं। किन्तु उन्होंने वह धन नहीं लिया। उन्होंने कहा—राजन् अरण्यमें फल-मूलपर जीवन बितानेवाले हम वगवाका काम आपकी इस सुवर्णराशिको लेकर क्या करेंगे। बस, आप अपनी कृपादृष्टिसे हमारी रक्षा करते रहिए ॥ ४०-४२ ॥ इस प्रकार उस दानद्रव्यका परित्याग करके वे दोनों वाल्मीकिजीके पास चले गये। वन्ताके मुखसे अपना चरित्र सुनकर रामचन्द्रजी बहुत विस्मित हुए ॥ ४३ ॥ उधर कुश आश्रमपर पहुँचे तो वहाँ वाल्मीकि तथा माताको उस दिनका वृत्तान्त सुनाया और स्नान करनेके लिए गङ्गाजी-को चले गये ॥ ४४ ॥ इधर लव कुछ मुनिकुमारोंके साथ खेलने लगे। इसी बीच जहाँ वे सब खेल रहे, उस तरफका अश्वमेघका घोड़ा चारों ओर घूमकर रामकी यज्ञशालामे जा रहा था। उसे देखते ही कौतुकवश भटोंने घेर लिया। लवने आगे बढ़कर घोड़ेको पकड़ा और अपने कुटियाके किनार ले जाकर एक वृक्षमें बाँध दिया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ लडक फिर खेलने लगे। उस समय म.काश्रम पूरवक विमानपर बैठे हुए शत्रुघ्नने देखा तो बहुत हँसे। उन्होंने सोचा कि यह बच्चोंने खेलवाड़ किया है। शत्रुघ्नने दूतोंसे कहा जाओ और घोड़ेको यहाँम छुड़ा लान ओ। दूत लवके पास पहुँचे। ज्यों ही लवने एक तिनका उठाया और वायुव्य मन्त्रस अभिमन्त्रित करके उनपर डाल दिया। उसके डालते ही बड़ा जोरसा आँधी चलने लगी ओर शत्रुघ्न तथा उनके सैनिक हाथी, घोड़े, रथ आदि आकाशमें औरोंकी तरह उड़ने लगे ॥ ४७-५० ॥ यह समाचार सुनकर रामने अपने यहाँसे सुग्रीव, अङ्गद, नील, जाम्बवान् नल, सुषेण, भरत, हनुमान्, गरुड़, विभीषण, सुषेण तथा देश-देशान्तरसे आये हुए राजाओंको शत्रुघ्नकी सहायताके लिए भेजा। इनके अतिरिक्त द्विविद-दधिवक्त्र आदि वानर तथा मकरध्वज आदि वीर गर्जनाके साथ युद्धभूमिकी ओर दौड़ पड़े ॥ ५१-५३ ॥ इतनी बड़ी सेनाको सामने देखकर लवने एक साधारण मनुष्यको, जो घोड़ा छुड़ानेके लिए आये हुए किसी सैनिकका गिर पड़ा था,

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३२५आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

पितृव्याद्याः स्थिता योद्धुं ममाद्य पुरतःस्थले। इदमेवाथ सोढव्यं मया च महासंगरे ॥५६॥
कथं तीक्ष्णानथ शरांस्तेषु प्रक्षिपाम्यहम्। मन्मन्त्रादिशरैर्नाद्या मा भवन्तुनिगोचराः ॥५७॥
महिक्षतिं कथं दृष्ट्वा कर्तव्यं किं मयाऽधुना। सीतां गन्तुं पश्चिमेऽन्वा गच्छामि तं मुनिम्॥५८
वाल्मीकिशिक्षिता विद्या नष्टा स्यान्निष्फला मयि। अत्रोपायोऽथ विना युद्धं करोम्यहम् ॥५९
इति निश्चित्य मनसि मेघवल्लक्ष्मणो वदन्। प्रहसन्वै किमर्थं मा मुग्धा मित्रैव वेगतः ॥६०॥
न सीतास्वङ्गुलभोऽहं पीडनान्मोहनाय हि मोहास्त्रेणाऽन्मुह्वं मां मेवं वेत्थ भो खलाः ॥६१॥
सीतास्योच्छ्विसितेनाऽग्निरुत्थास्यतिभिड्ङिव पौरुषम्।
त्रिदग्ध न स्फुटं लोकेऽदर्शयन्मे समापि च ॥ ६२॥
इति स्ववाक्यैर्गर्जन्त्सहस्यान्यं मथ पुनः माहायामन्त्रमादाय मोहनास्त्रं विसृज्य च ॥ ६३ ।
ततो लवः सं विजया सुमंत्र दग्त तथा कृत्वा मर्कटशः प्राप्तै लब्ध्वा वायुनन्दनम्। ६४
सुग्रीवं च मुदा युक्तो मानायं तान प्रदर्शयत्। दृष्ट्वा मोहाविदान् वीरान् मोहनास्त्रं प्रमोहितान् ॥६५॥
पुत्रान्न मोचयामास क्षपयामास तानू रहः नानानानाविधैः श्रुत्वा लक्ष्मण बाष्पमब्रवीत् । ६६।
ईदृशं पौरुषं तथा रावणेनापि ना कृतर् यथा कृत बालकर इत्यायं किमत्र वै । ६७।
श्रीरामवचनं श्रुत्वा लक्ष्मणः प्राह राघवं मा विनेश वश कामं तृत्वाऽहं न शिशुं तुमाम् । ६८।
त्वन्मन्त्रिभारानयामि सिंहो मृगशिशुं यथा। इत्युक्त्वा माधव नत्वा रथाऽऽरूढो ययौ जवात् ॥६९।
सेनया मन्त्रिर्युक्ता वाग्माक्यव्योममण्डलम् । तत्रागतं धनुष्पाणिं लव दृष्ट्वा तन्मुखे ययौ ॥७०।
न दृष्ट्वा बालकं रम्यं कृपया लक्ष्णोऽब्रवीत् । मा शिशो त्व कुपर्याय माहवे मन्पुरस्थित ॥७१॥


उसका हाथ न हिलावेगा न लगावेगा और युद्ध करने के लिये राजी न होगा। हे देव ! यह तो मेरे सम्बन्धी सब इकट्ठे होकर मेरे चाचा आदि युद्ध करनेके लिए सामने आये हैं, इसलिए मैं इनपर अस्त्र न चलाऊंगा क्यों कि महात्माओंने स्वजनोंका वध करावर माना गया है । इस कारण यह मेरे दुष्कर्मोंको भला कैसे सहेंगे। ऐसी अवस्था में मैं क्या करूँ ? यदि युद्धसे मुँह मोडूँगा तो वाल्मीकिजीके आश्रम में न जाउँ तो महर्षिकी सिखायी विद्या निष्फल हो जायगी। अनन्तर कोई ऐसा उपाय सोचना होगा, जिसमें किसीका वध न हो ॥ ५४-५९ ॥ ऐसा निश्चय करके मेघकी तरह गर्जते हुए लवने कहा- हे दुष्ट ! तुमलोग किसलिये मेरी ओर दौड़े चले आ रहे हो ? ॥६०॥ तुम लोग धोके में न रहना । श्रीरामकी दी हुई मोहास्त्रको चुपचाप सह लूंगा। देखो मेरे समान बन्ध्य अग्निका दूसरा रूप ही मैं स्वयं हूँ। सीताकी उष्ण उच्छ्वासकी यह ज्वालाके समान आज बन गया है । इसलिए तुमलोगोने मेरे सामने व्यर्थ होगा और दुःख पायेगा इस प्रकार कहकर अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढाकर बाणोंका तीक्ष्णतर प्रहार किया। तदनन्तर अपने माहेश्वरास्त्र और जीवास्त्र नाम बाणोंका संधान कर दिया ॥ ६१-६३ ॥ इसतरह विजय प्राप्त करके लवने सुमन्त्र और अन्य सबोंको बान्ध लिया। प्रयोग हनुमान्जी तथा सुग्रीवको दबाकर प्रसन्नतापूर्वक माताके पास ले गये और सबोंको दिखाया। उन वानरोंको माहास्त्रसहित देखकर सीताने उन्हें मुक्त करा दिया। उधर जब रामने यह सुना कि लव मोहनास्त्रसे मन्त्रियोंको मोहित करके बान्धके आश्रमको पकड़ ले गया है। तब एकान्तमें लक्ष्मणसे कहने लगे— हे लक्ष्मण ! इस प्रकारका पराक्रम तो रावण भी नहीं दिखा सका था, जैसा कि यहाँ वह छोकरा दिखा रहा है। इस विषयमें क्या करना चाहिये यह मैं कुछ भी नहीं सोच सका हूँ इस प्रकार रामकी बात सुनकर लक्ष्मण बोले- आप कुछ चिन्ता न करें। मैं अभी जाता हूँ और क्षणमात्र में उस बच्चेको बन्दी बनाकर आपके पास लाता हूँ ॥६४-६८॥ ऐसा कहकर लक्ष्मण रथपर बैठे और सेनाके साथ चल दिये। एक बड़ी सेना और मन्त्रियोंके साथ लक्ष्मण थोड़ी ही देरमें अश्वमेधके पास जा पहुँचे। जब लवने सुना कि लक्ष्मण आये हैं तो वे स्वयं उनके सामने गये। लक्ष्मण जब उस सुन्दर और सुकुमार किन्तु वीर

सर्गः ७ ] उत्तरकाण्डम् ३२५

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सर्गः ७ ] उत्तरकाण्डम् ३२५


न मत्सौढोऽसि हे व्यर्थं गच्छ नोचेन्न रिष्यसि । शमं न गमयन्नद्य भग्नोऽहं स्यां न संशयः ॥७२॥
त्वयाऽपराधिनं बालं रामस्य सुतमेककम् । नाहं हन्मीह नानेनात्मानं निहन्म्यहम् ॥७३॥
नीतान् वीरान् समर्प्यथ बद्धांस्तुल्यान्निजैः सुतैः । सपुत्रं रघुपत्याशु प्राप्नुयान्मम संमुहात् ॥७४॥
तत्सौमित्रेर्वचः श्रुत्वा लवोऽपीत्थमभाषत । जानेऽहं राघवौ चाथ सौन्दर्याणामपौरुषम् ॥७५॥
सीतायामेव युष्माकं पौरुषं न त्वन्यतः । सम्भूताऽपनादार्थं मुनिना निर्मितस्त्वहम् ॥७६॥
यूयं जित्वाऽथ समरे मातुस्तापं प्रमार्क्ष्यहे । मुरा नृपाश्चापि या माना ल्लवनात्पापिनोवता ॥७७॥
तस्या विनिष्कृतिं कर्तुं कङ्कपत्रं समागतः । मातर्दुःखाग्निना युष्मत्पापं दग्धमवेहि तत् ॥७८॥
न स्वातन्त्र्यं ममाग्रेऽत्र गच्छध्वं विधयोपमाः । इति ते लववाणौघैर्हृत्प्रमथ्यदलश्च वै ॥७९॥
लक्ष्मणायो यत्प्रयुक्तं शस्त्रमस्त्रं च वृथा ततो मन्त्रश्च तैर्र्बाणैः शस्त्रैश्चैव निवारिते च ॥८०॥
श्रीरामसचिवार्दींश्च प्राधमद्यज्ञमण्डपे । ते सर्व सचिवा व्याध लक्ष्मणगताऽद्वताः ॥८१॥
भिन्नदेहा लोहिताङ्गा मेनू रामं व्यजिज्ञपन् । पश्य त्वं भो पश्याम किं तूष्णामध्यक्षमण्डपे ॥८२॥
उपायं चिन्तयस्यान्यं वधेऽन्यस्य लवस्य च । शस्त्रास्त्रैरिति युद्धं न गच्छति लवः प्रभो ॥८३॥
साहाय्यं कुरु सौमित्रेर्यदि बन्धुं मनीषितम् । लवशरप्रहारैश्चातुमुत्सलम् ॥८४॥
इत्युक्त्वा सर्ववाक्यानि राघवं ते न्यवेदयन् । तानि श्रुत्वा राघवोऽपि तूष्णामप्यासीत्तदा क्षणम् ॥८५॥
लवाऽपि लक्ष्मणं बाणैर्विद्व्याध दशभिर्दृढम् । अपृच्छन्मज्जने बाणाः शरीरे लक्ष्मणस्य च ॥८६॥
ततः क्रोधपरोतात्मा लक्ष्मणो वेगवत्तरः । स्वदेहं स्वशस्त्राणि भवन्ति विफ़लानि हि ॥८७॥

बालकका सामन देख तो दुखपूर्वक कहने लगे- देख, वत्स! अब मैं आया हूँ। मेरे सामने किसी तरहकी दुष्टता न करना। तुम मेरे सामने नहीं ठहर सकते। जाओ, चले जाओ, नहीं तो तुम नहीं बच सकते। अभी तुम तुम्हारे उत्तम व्यर्थ रामका काम भुगता है। इसलिए नहीं मार रहा हूँ हे अज्ञान बालक ! तुमने कई बार रामको अपराध किया है। मैं सब जानता हूँ। फिर भी मैं तुमको नहीं मारता ॥७१-७३॥ यदि तुम्हें अपने प्राणोंका लोभ हो तो तुमने जिन लोगोंको पकड़ लिया है, उन्हें लाकर हम दे दो और भाइयोंको लेकर मेरे साथ रामचन्द्रजी के पास चलो। -७४ इस तरह लक्ष्मणजीकी बात सुनकर लबने कहा- बेचारी सीताके ऊपर अपना वीरता दिखलानेवाले तुमको और रामको मैं अच्छी तरह जानता हूँ। सीताके ऊपर तुम्हारा जो पुरुषार्थ चला था, वह संसार नहीं भूल सकता। सीताके दुःखको दूर करनेके लिए ही महर्षि बाल्मीकिने मेरा रचना की है। ७५, ७६, अब मैं तुम दोनोंको जीतकर सीताका दुःख दूर करूँगा। तुमने भोलीभाली सीताके साथ कपटपूर्ण व्यवहार किया है। उसका प्रायश्चित्त करनेके लिए ही मैं यहाँ आया हूँ। सीताके दुःखरूपी अग्निमें तुमलोगोंका दुष्कर्म जल चुका है ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ तुमलोगोंको चाहिए कि मेरे सामनेसे हट जाओ। इस प्रकार लवके चलाये हुए बाणोंसे लक्ष्मणका हृदय विदीर्ण हो गया। ७९ । ८० ॥ अतः क्रुद्ध होकर सब एक साथ लवपर बाणवर्षा करने लगे। लवने भी अस्त्रसे उनके शस्त्रास्त्रका निवारण किया और लक्ष्मणके साथ आये हुए मन्त्रिसैनिक आदिको अपने बाणोंसे उठा उठाकर रामके यज्ञमण्डपमें फेंक दिया। लवके बाणोंसे आहत मन्त्री आदिका दङ्गल जहाँतहाँ पाथ हो गये थे और उनसे रुधिर बह रहा था। इस दशामें वे सब रामके पास जाकर कहने लगे- हे राम ! इस यज्ञमण्डपं चुपचाप बैठे बैठे आप क्या देख रहे हैं । ८१॥ ८२ ॥ लवको मारनेके लिए कोई दूसरा उपाय सोचिये। हे प्रभो ! लव संग्राममें किस तरहके अस्त्र-शस्त्रसे नहीं मर रहा है। हे बन्धुवत्सल ! यदि लक्ष्मणको जीवित देखना चाहते हो तो उनकी सहायता करिये क्योंकि वे बाणोंके प्रहारसे बहुत थकगये। इस तरह वहाँका समाचार सुनानेके बाद उन बातोंको बतलाया, जो लवने रामके विषयमें कहा थी। उनकी बातें सुनकर राम कुछ देरतक चुप बैठे रहे। उधर लबने दश बाणोंसे लक्ष्मणको घायल कर दिया और वे दसों बाण लक्ष्मणके शरीरमें सिरसे लेकर पूँछतक घुस गये थे ॥ ८३-८६ । ऐसी अवस्थामें लक्ष्मण क्रोधसे आग-

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३२६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ७

दृष्ट्वेत्यूचुर्भृशं वित्रस्ताः सः क्षणं सन्विचिन्त्य वै हृदि । ब्रह्मास्त्रेण लवं बद्ध्वा साश्वं गङ्गे न्यवेदयत् ॥८८॥
ब्रह्मास्त्रं मानयंस्तूणीं ययौ राम लवेऽपि सः । पश्चादस्तं समायांतं दृष्ट्वा लक्ष्मणमब्रवीत् ॥८९॥
जानन्नपि सुतं स्वोष कौतुकं दर्शयञ्जनान् । महत्कार्यं कृतं बन्धो त्वयाऽत्र विद्धि बहुजम् ॥९०॥
द्विजहत्यामय त्यक्त्वा घातयस्सैनमद्य हि। राम प्रोवाच सौमित्रिर्नायं शस्त्रैर्मरिष्यति ।९१।
भरताद्यैर्मया चापि नायं किं ताडितोऽग्निभिः । यस्य देहे क्षतं चैकमपि किं दृश्यते त्वया ।९२॥
तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह प्रष्टव्यो बालकोऽन्यथा। केनोपायेन ते मृत्युर्भवेदिति समाग्रतः ।९३॥
गोपायन्ति निजं मृत्युं न शूरा वधशङ्कया । न वदन्त्यनृतं क्वापि स्वबलेनैव जीविताः । ९४॥
वतः पृष्टो लक्ष्मणेन लवः प्राहाथ लक्ष्मणम् । जलस्य सेचनाद्वृद्धिं स्वीयां ज्ञात्वा मुनेर्गिरा ॥९५॥
ज्ञापयन्बुद्ध्या लोकांश्च दर्शयन् स्वपराक्रमम् । जलस्य सेचनान्मे मृत्युर्मे निश्चितो भवत् ॥९६।
ततस्त्य वचनं श्रुत्वा शिलायां तं निवेश्य च । सेचनं तोयकलशैः कारयामास लक्ष्मणः ॥
अयोध्यावासिभिर्नारैः पुरुषैः परमादरात् । ९७॥
चतुर्मुखैश्च घटैर्पानीयंश्च कोटिशः । तथा कार्पटिकैश्चापि रथौष्ट्रवारणादिभिः ॥९८॥
आनयित्वा जलं शीघ्रं सिषेचु लवालकम् । यथा यथा जलैस्त हि सेचन चक्रिरे जनाः ॥९९॥
तथा तथा लवस्तत्र व्यवर्द्धत घनो यथा । सप्ततालप्रमाणोऽभूदृष्ट्वा ताम्पसत्तमम् ॥१००॥
ततस्तं लक्ष्मण, प्राह त्वया लव मुषेरितम् । नाय तव वधोपायः स्ववृद्धयर्थे कृतः खलु । १०१॥
लवोऽप्याहाय सौमित्र कोटिन्येन प्रनाश्यन् । यथा तैरुद्यने दीपो वृद्धिमते प्रणश्यति । १०२।
तथायुषः क्षये मेऽपि वृद्धिं पश्य क्षणं निशम् । तद्वाक्यं मानयन्नन्य सेचयत् स लक्ष्मणः । १०३॥
जलेर्मागैः समानीतैः पूर्ववच्च पुनः पुनः । कष्टमोषानमार्गेण सेचन चक्रिरे जनाः । १०४॥

बबुल हो उठे। उन्होंने कई शस्त्र लवपर चलाये, लेकिन जब उन्हें बेकार होते देखा तो घबड़ा उठे। क्षण भर उन्होंने न जाने क्या सोचा और तब ब्रह्मास्त्रसे लवको बाध लिया और घोलाको भी साथ लेकर अयोध्यामे रामके पास ले आये ॥८७॥ ८८ ॥ ब्रह्मास्त्रका मर्यादा रखकर लिए लव भी चुपचाप लक्ष्मणके साथ चल दिये। जब रामने लवको देखा तो कौतुकावश कहा यद्यपि मै जानता हूँ कि यह मेरा ही पुत्र है। फिर भी संसारको शिक्षा दनक लिय मै आज्ञा देता हूँ कि द्विजहत्याके भयको दूर करके आज ही इसे मार डालो। इसने बड़े अपराध किये हैं। लक्ष्मणने उत्तर दिया कि यह किसी शस्त्रास्त्रस नहीं मरेगा ॥ ८९-९१॥ हमने तथा भरतजीने इसपर कितना ही बार शस्त्रास्त्रके प्रहार किये है, किन्तु देखिए न ! इसके शरीरमे कहीं कोई घाव दीखता है ! ॥ ९२ ॥ रामने कहा- इससे पूछो कि तू किस प्रकार मर सकेगा। जो सच्चे शूरवीर होते है, वे अपनी मृत्युके उपायको भी नही छिपाते। राज्य बार कभी झूठ नही बोलते ॥ ९३॥ ॥९४॥ इस प्रकार पूछनेपर लव कुछ सोचने लगा। एक बार महर्षि वाल्मीकिने लवस कहा था कि तुम्हारे ऊपर जितना जल डाला जायगा, तुम उतने ही बढ़ोगे । इसी बातका ख्याल करके लवने समारको अपना पराक्रम दिखाने-के लिए लक्ष्मणसे कहा- जलके सींचनेपर मेरी मृत्यु होगा ॥ ९५ । ६६ ॥ लवकी बात सुनकर लक्ष्मणने लवको पास ही एक पत्थरपर बिठाया और पानके घडासे नहलाने लगे। अयोध्यानिवासी बहुतसे नरनारी बड़े आदरके साथ लवपर जल डालने लगे । चार मुंहवाले बड़े-बड़े घमडकर झट बेल रथ हाथी, घाड़े, ओर ऊँटपर लाद-लादकर कराडोका सख्यामे वहाँ आन लग और व सब उसके ऊपर डाल दिये गये। जैसे-जैसे पानी पड़ता था, त्यो त्यो लव मेघके समान बढ़ने जाते थे। बहु परम वीर बढ़ते-बढ़ते जब सात ताड़का ऊँचाई तक बढ़ा ॥ ९७-१०० ॥ तब लक्ष्मणने कहा-लव ! जान होता है कि तुम झूठ बोल हो। तुमने मरनेके लिये नहीं, अपने बढ़नेका उपाय बताया था ॥ १०१ ॥ लवने भी लक्ष्मणका बहकाकर कहा-न एक जब बुझनेवाला होता है तो उसकी ली कितना बढ़ जाया करता है। उसी तरह आयुके क्षय होनेसे मै भी बढ़ रहा हूँ। अबकी बार भी लक्ष्मणने लवका बात सच मानी और उसी तरह लवके ऊपर जलके कमसे डालते रहे ॥ १०२।१०३। बहुत्तणोके

सर्गः ७ ] जन्मकाण्डम् १२७

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सर्गः ७ ] जन्मकाण्डम् १२७

भस्त्रात्रेण विनिर्मुक्तः प्रजवाल ह्यमन्दहा । मुग्धावागङ्गलवाभाम सद्योरु बाललीलथा ॥१०५॥
तं दृष्ट्वा दुद्रुवुः सर्वे त्यक्त्वा तोयघटानपि । शकृन्मूत्रं प्रमुञ्चन्तो मुक्तकच्छा लवेषवः ॥१०६॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रीडन्गङ्गायां तानूजनान्दृशः । पप्रच्छाथ मुहूर्तीर किमर्थं नीयते जलान् ॥१०७॥
जनाः प्रोचुर्लवं हन्तुमस्माभिर्नीयते जलम् । दिव्यमैलरवास्त्रेण तन्मुग्धा मययौ कुशः ॥१०८॥
संगृह्य स्वाश्रमाच्चापं तूणीरं देगशत्रुतः । लव मोचयितुं चापं टान्कुन्वाऽश्वत्थशाखे ॥१०९॥
कुशचावध्वनिं श्रुत्वा तस्थौ तूष्णीं लवः क्षणम् । मनो दृष्ट्वा कुशं प्राप्तं ययौ योद्धं म लक्ष्मणः ॥११०॥
तं दृष्ट्वा म कुशः प्राह छलिनौ जानकीसूतौ । त्वदा गमण नोकेंश्च गयोः कर्तुं विनिष्कृतिम् ॥१११॥
अह हाहोपमंय मां बाल लक्सन्न न यानय ।
युवयोः रीक्ष्यं नार्था शिक्षावन्मीति वेदम्यम् ॥११२॥
गंतवकेशान्तुलम्बतासद्धर्षं पुरयोर्वलम् । न ममाग्रे स्फुटं कार्यं युवाभ्यामुपहामकन् ॥११३॥
वाञ्चार्काक्षाक्षतां विद्यां राम स्वामद्य दर्शये । इत्युक्त्वा तुमुलं युद्धं विक्षुब्धेन चकार मः ॥११४॥
आसन् वृथा जानकीये लक्ष्मणेन्मुष्टमार्षणाः । रामायणानुक्तौ ज्ञात्वा ज्ञेय एवात्र लक्ष्मणः ॥११५॥
जातोऽर्थादिति वधे मस्य गरुडास्त्र मुमोच सः । क्षात्रधर्मं पुरस्कृत्य न तद्धिमाभयं दधे ॥११६॥
जानन् युद्धं पितुर्हन्ता ज्ञानं चैव मय न्विति । तदृष्ट्वा स्वगताश्चासं सौमित्रिः कु ठेना मतिः ॥११७॥
भयभीतः पृथिव्यां हि पपात लक्ष्मणो रथात् । च्युतं दृष्ट्वा स्वयं तत्र दीक्षायुक्तोऽपि वेगतः ॥११८॥
धृन्वा चापं च तूणीरं यज्ञकुण्डप्रवः स्थितः । चाप संधाय ब्रह्मात्रं सौमित्रेर्जी विनाशश ॥११९॥


जल भर-भरकर लाया जा रहा था और स ही लगाकर लवलर उसकी आग डाला जाता थी ॥ १०४ ॥ उसी समय सबके देखत ही इसन सब ब्रह्मास्त्रस्त्र छूट गया और अगार मय वाल डोगत हुआ दौड़ने लगा। उसको देखकर वहाँके सारे नर-नारग अपने अपने कलसानी छु ड-छाडकर भाग गये। उसक उस विकराल रूपको देखकर बहुतोंकी बालियाँ सुन्त गयीं। कई एकका तो मारे डरके पशाव टट्टी तक हा गयी । १०५ ॥ १०६ ॥

उधर कुश बच्चोकी तरह खेलत-कूदता गङ्गाजीके किनारे गया। वहीं उसन देखा कि बहुतस लोग पानी भर रहे हैं। उनस कुशल पूछा-तुमलोग इतना पानी क्यों भरे लिये जा रह हो ? ॥ १०७ ॥ उन्होने कहा— लवको मारनेके लिए। यह सुनकर कुश अपने आश्रमपर गया और धनुष-बाण लेकर लवको छुड़ानेके लिए रावणके यज्ञशालाके समान जा पहुंचा और ध.णुषका भीषण टंकार किया ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ कुशके धनुषकी टंकार सुनकर लव कुछ देरके लिए शान्त खडा हो गया और कुशसे युद्ध करनेके लिए लक्ष्मणके सामने जा पहुँचा । ११० ॥ लक्ष्मणको देखकर कुशने कहा—तुमन और रामन लव तथा सीताके साथ बडा छल किया है। उसीका बदला लनक लिए मैं आ रहा हूँ। मुझको लवकी तरह साधरण बालक न समझना। तुम लोगोंका औरना स्वा और छाट-छाट बच्चोंपर ही चल सकता है यह में जानता हूँ। सीताके बलक्षयकी कुरुना आदिम तुम्हारा श्रम जल चुका है। अब अपना उपहास करानेके लिए मेर सामने लड़नेको व्यर्थ आये हैं। अच्छा, यदि तुम्हारी यही इच्छा है ता वाणवार्षिकी शिक्षाकी विद्या आज में तुम्हें और रामको दिखाता हूँ। ऐसा कहकर कुशने लक्ष्मणके साथ तुमुल युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥ १११-११४ ॥ लक्ष्मणने कुशपर जितने वाण चलाये, वे सब व्यथ गये। रामायणकी भविष्यवार्तासे कुशने ज्ञात हो चुका था कि अब लक्ष्मणके सिवाय और कोई वीर बांकी बचा हा नहीं है कि जिसके साथ युद्ध करके हारनेकी आवश्यकता हो। यह सोचकर क्षात्रधर्मके अनुसार उसने बालकके मारनेम कई अपराध न समझकर उन्हें मारनेके लिए गरुडास्त्रका प्रयोग किया ॥ ११५ ॥ ११६ ॥ उस गरुडास्त्रको अपने ऊपर आते देखकर लक्ष्मण सिटपिटा गये उनको सारी चतुरी भूल गयी और मूर्छित होकर रथसे पृथ्वोपर गिर पड़े। लक्ष्मणको रथसे गिरते देखकर राम दीक्षित होते हुए भी धनुष बाण लेकर दौड़े और लक्ष्मणको बचानेके लिए उन्होंने कुशके छोड़े हुए गरुडास्त्रपर अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्रके पहुँचनेपर गरुडास्त्र आकाशमें ही ठंडा हो

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३२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७

मुमोच बाणमाग्नेयं गरुडेऽपि मारुत्य् । तेन गच्छन्निगगद्वह्निर्मातुं तु गारुडम् ॥१२०॥
ततः कुशः संदधे य मदाख्यं गपवातरि... वच नारी सीतान्युलब्धकीर्तिं त्वया । १२१॥
जनान दर्शयितुं स्वाय पौरुषं जानकी यते । न्यक्तं यया वृथा पूर्वं जानैद्ध न चेष्टितम् १२२॥
वाल्मीकिशितिरुत्पन्नां विद्यां ममाद्य श्व विलोकया । नेचेत्य यदि दृप्तस्त्वं वाल्मीकिं जानकीमपि ॥१२३॥
तद्वाक्यैर्रिन्नमर्माऽगवन्मा विलोक्य नरा गोत्रेषु मुमुचे बांर म्नैन उत्छ्रितिमाप वै ॥१२४॥
मध्ये मान्गयाणं कुशस्तं राघव पुनः । गन्धर्वेण दोशलाश्चेण वारमयं न्यवारयन ॥१२५॥
इषुगत्रं मुमुचे घोरं कुशाऽरि राघव जवात् । तन्जगामच तद्राभो मेघ क्षेण व लीलया ॥१२६॥
पपुलपं मुमुचे गाम जानकीजटरोद्भवः । नदावारयच तद्राभ पर्वतेन लीलया । १२७।
वज्राम्रं मुमुचे शर्व यानेश्व मोऽतिमन्त्रवान् । याग श्वेनाथ रामेऽपि वज्रास्त्रं तन्न्यवादयत ॥१२८॥
अंवाश्मं मुमुचे राम मातयः परमदारुन हाहाशब्दस्तदा चार्मद्राघवस्याश्वसंगणे ॥१२९॥
अथवारयचवाश्मं वैष्णवेन रघूत्तम । ततोगम कुशश्चोष्णान्नानां बांणतस्तः पुनः ॥१३०॥
मुमोच राघवश्चापि मार्गणांश्चहुशः कुशम् । एव तत्तुल युद्धं बभूव प्रहर नयोः ॥१३१॥
तदाऽऽश्चर्याकौतुक रामकुशयोर्युद्धवामहन् गढचापार्ष मुक्ता रता ये ये पनात्रिणः ॥१३२॥
ने ने कुशशिरोन्मार्गेपतितादृष्टवान्त्वरे । पति सम् तथा ने ये कुशचापविनिर्गताः ॥१३३॥
शासने रामचंद्रस्य पतन्ति स्म पदांतिके । तद्दृष्ट्वा क्षोभक गतो दम्भाश्चर्यप्रजाप्रजः ॥१३४॥
आज्ञापयन्मंत्रिवरं गच्छ वाल्मीकिमान्तिवे । पूष्धव ग जाकन्थ्य कौन श्छावावनी वली॥१३५॥
तता गान्त्वाऽनयोर्याने करिष्यामि मनि कामतम् । श्वेत रामवचनाम् मन्त्री ददमास्थितः । १३६॥
काश्चयंतिरंरगत्र गच्छं कृत्वा कुशं त्वरात् । दृष्ट्वा वन्चाऽब्रवन्त सर्व रास्व बचनवेद्यवन् । १३७ ।
मुनिः प्राह मंत्रिवण म्व बद रामाय म वचः । सभाऽग्रे मागनश्व राल श्वा विचित्वम् ॥१३८॥

गया। ११९-१२० इसके अनन्तर कुश ने गान्धर्वास्त्र... पर चलाया... वह गरुडास्त्र नष्ट हुआ जो मृत्यु था। समरकी विद्यातक लिये तुमने अपनी सामर्थ्य दिखलाया, अब यदि मन पौरुष देखना चाहते हो तो... मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। यदि सामर्थ्य हो तो मुनि... जानकी... जीतकर दिखाओ; न कर सको तो हाथ बाँधकर जानकी के पास... आज्ञाकार बनो। १२१-१२३॥ कुशकी बात न सह सकनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ने क्रोध किया। जिससे बहु भ्रान्त हो गया। फिर गान्धर्वास्त्र से जो बाण चलाया था श्रीरामचन्द्रजी ने उसका निवारण किया। कुशनें रामपर बाण चलाया और श्रीरामचन्द्रजी ने जल से उसका विनाश किया। तदनन्तर सुकुमार वीर कुशने रामपर पर्शुलपाश चलाया, तब रामने पर्बतास्त्र से उसका विनाश किया ॥ १२४-१२७॥ तब कुशने वज्रास्त्र चलाया और रामने आग्नेयास्त्र से उसका नाश किया। १२८॥ एव वृक्षन बाण के ऊपर वैष्णवास्त्र चलाया, उस समय दोनों सेनाओं में विस्मय हुआ। अपने वैष्णवास्त्र बाण उसको व्यर्थ कर दिया। इसके बाद कुशने बाण छोड़े और श्री रामचंद्रजी ने बाण चलाये ॥ १२९॥ १३०॥ रामने भी कुशके प्रती-कारार्थ बाण छोड़े। इस प्रकार एक प्रहर तक राम और कुशमें तुमुल युद्ध होता रहा ॥ १३१॥
उस समय आप-पेटके युद्धमें यह बड़ा कौतुक था कि श्री बाण श्रीरामके धनुषसे छूटे वे कुशके मस्तकपर गिरते थे तथा कुश द्वारा छूटे बाण रामके पैरोंपर गिरते थे। यह आश्चर्य देखकर विस्मित रामने अपने मंत्रीको बुलाया और उनसे कहा कि वाल्मीकि के पास जाकर पूछो कि आपके ये महाबलवान् शिष्य कौन हैं ॥ १३२-१३५ । यह जानकर मैं इनकी माताका यत्न पूर्वक उपाय करूँगा। रामके आज्ञानुसार मन्त्री रथपर सवार हुआ और दो कोस चलकर वाल्मीकिके पास जा पहुंचा। वाल्मीकिको देखकर मन्त्रीने प्रणाम किया और रामका सन्देश सुनाया ॥ १३६। १३७॥ मुनि वाल्मीकिने कहा—उनसे कह दो कि कल

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सर्गः ८ ] जन्मकाण्डम् १२९


भविष्यति समस्तं हि वृत्तं शालकयोः शुभम् । ततो मन्त्री मुनेर्वाक्यं राघवाय न्यवेदयत् ॥१३९॥
कुशं लवं समाहूय वाल्मीकिरपि तौ मुदा । समालिङ्ग्य कथाभिस्तां निनाय रजनीं सुखम् ॥१४०॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे
कुशलवयोः पराक्रमवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( रामका सीताको पुनः स्वीकार करना )
श्रीरामदास उवाच

अथ प्रभाते रामेण समाहूतावुभौ शिशू । नत्वा मुनिं मातरञ्च सभायां जग्मतुर्मुदा ॥ १ ॥
वाल्मीकेराज्ञया बालौ जटाकृष्णाजिनाम्बरौ । जन्मकाण्डं त्वेकमेव जग्रतुस्तौ पितुः पुरः ॥ २ ॥
जनैः श्रुत्वा स्वचरितं रामोऽभूदतिविस्मितः ॥ ३ ।
आसन् जनाश्चापि सर्वे विस्मयाविष्टमानसाः । ज्ञात्वा सीताकुमारौ तौ सन्तोषं परमं ययुः ॥ ४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे सर्वे लवबाणस्वरूपीडिताः । शत्रुघ्नाद्या ययुस्तत्र यानस्थाश्चाप्तजीविताः ॥ ५ ॥
अंगदाद्याः पार्थिवाश्च मोहनास्त्रैकजीविताः । ययुः सवानराः सर्वे लक्ष्मणोऽपि ययावरुक् ॥ ६ ॥
सर्वे नत्वा रामचन्द्रं तस्थुश्चास्थांतिके मुदा । अथ समाप्य रामोऽपि तौ विसृज्यादरेण हि ॥ ७ ॥
राक्षसेंद्रं लक्ष्मणं च शत्रुघ्नं मकरध्वजम् । खगराजं सुषेणं च जांबवन्तं वचोऽब्रवीत् ॥ ८॥
आनयध्वं मुनिवरं समीतं देवममितम् । अद्यास्तु पर्षदां मध्ये प्रत्ययो वै सभांगणे ॥ ९ ॥
गंगाया दक्षिणे तीरे सभा कार्याऽऽयता शुभा । करोतु शपथं सीता ममाग्रे जाह्नवीतटे ॥१०॥
मुनीश्वराद्याः सर्वे तां जानन्तु गतकल्मषाम् । तथा ममापि वाल्मीके शुद्धिं जानंतु देवताः ॥११॥


जब सभामें ये दोनों रामायण गाने पहुंचेंगे, उस समय सारा वृत्तान्त ज्ञात हो जायगा । १३८ ॥ तदनुसार मंत्री लौट आया और बाल्मीकिने जो कुछ कहा था, सो रामको बतला दिया । उधर वाल्मीकिने लव और कुशको पास बुलाकर हृदयसे लगाया और अनेक प्रकारकी कहानियां कहते हुए रात बितायी ॥ १३९ ॥ १४० ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योतिष्मती'भाषाटीकासहिते जन्मकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

श्रीरामदास बोले-दूसरे दिन सबेरे रामने उन दोनों बालकोंको बुलवाया और वे अपनी माता तथा मुनि वाल्मीकिको प्रणाम करके रामकी सभामें गये ॥ १ ॥ जटा एवं वल्कल वस्त्र धारण किये हुए उन बच्चोंने उस दिन वाल्मीकिके आज्ञानुसार केवल जन्मकाण्डका गान किया । २ ॥ रामने जब अपना चरित्र सुना तो बड़े विस्मित हुए । सभामे बैठे हुए लोगोको भी बड़ा आश्चर्य हुआ और जब यह जाना कि ये सीताके बेटे हैं तो बहुत ही प्रसन्न हुए । ३ ॥ ४॥ उसी समय लवके बाणोंसे पीड़ित लक्ष्मण-शत्रुघ्न आदि भी वहाँ आ पहुंचे । उनके साथ अङ्गद-हनुमान् आदि जो लवके मोहनास्त्रसे मूर्च्छित हो गये थे, वे भी आये। वहाँपर सबान रामको प्रणाम किया और उनके समीप जाकर बैठ गये । तब रामने अपने मंत्रियोंसे सलाह करके लव कुशको विदा कर दिया ॥ ५-७ ॥ तदनन्तर विभीषण, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, मकरध्वज तथा अङ्गदको सम्बोधित करके राम बोले-तुम सब जाकर बाल्मीकिके साथ सीताको यहाँ ले आओ। आज इस सभामे यह निश्चय किया जायगा कि सीता-का क्या अपराध है। इसी पुनीत जाह्नवीके तटपर सीता शपथ खायगी । यहाँपर आये हुए समस्त ऋषिगण जिससे यह समझ जायें कि सीता सर्वथा निष्कलंक तथा पापोंसे रहित है। साथ ही हमारो ओरसे बाल्मीकिकी भी परीक्षा होगी । इस प्रकार रामके आज्ञानुसार लक्ष्मणादि वाल्मीकिके पास गये और उन्होंने

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२३० आनन्दरामायणे [ सर्ग ८


इति तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणाद्या महीं गताः । ऊचुर्यथोक्तं रामेण वाल्मीकिं लक्ष्मणादिकाः ॥ १२॥
रामस्य हृद्गतं सर्वं ज्ञात्वा वाल्मीकिरब्रवीत् । सर्वानितान् सुमंत्राद्यान् लक्ष्मणाय समर्प्य च । १३।
युष्माभिः कथनीयं यद्वाक्यं श्रीराघवं प्रति । श्वः करिष्यति वै सीता शपथं जनसंसदि । १४।
योषितां परमो देवः पतिरेको न चापरः । पतिं विना गतिः काऽन्या भार्याश्चास्ति जगत्त्रये ॥१५।
लक्ष्मणाद्यास्ततः सर्वे राममागम्य ते पुनः । सुमंत्रादींश्चतुर्वीरांश्चाघवाय समर्प्य च ॥१६।
वाल्मीकेर्वचनं हर्षात्पुनर्मं रघुनायकम् । वाल्मीकेर्वचनं श्रुत्वा तुतोष राघवोऽपि च ॥१७।
सुमन्त्रं भरतं वायुपुत्रं वानरनायकः । समालिङ्ग्य चतुर्व्यान् स पुनर्जन्ममन्यत । १८।
सीतया पालिताः सर्वे वयं लवजितास्त्विति । कथयामासुः श्रीरामं सुमन्त्रादिद्विरद० ॥१९।
द्वितीये दिवसे कृत्वा सभां श्रेष्ठां मनोरमाम् । सर्वानृष्यान् समाहूय रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥२०॥
मुनयः पार्थिवाः सर्वे शृणुत स्वयमागताः । सीतायाः शपथं लोद्य विज्ञास्येऽनुभयं ततः॥२१
इत्युक्त्वा राघवेणाथ लोकाः सीतादिदृक्षवः । ब्राह्मणा क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्चैव सहस्रशः २२।
सत्रावगः समाजग्मुस्तद्दिव्यं द्रष्टुमुद्यताः । ततो मुनिसंयुक्ता सीता समाययौ पुरः ॥२३।
अध्रनर्त्त मुनिं कृत्वा यांती किंचिदवाङ्मुखी । तावल्लोका जनाश्चैव चक्रुर्जयजयं ततः ॥ २४।
दृष्टा लक्ष्मीमिरायांतीं श्रीविष्णोरनुयायिनीम् । वाल्मीकेः पुरत स्तेषां जयघोषं प्रचक्रिरे २५।
तदा मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः । माहामात्यैः वाल्मीकिर्मदा मघामब्रवीत् । २६।
इयं दाशरथे सीता सुवृत्ता धर्मचारिणी । त्वया पापान्मुदा त्यक्ता ममाश्रमसमीपत २७।
लोकापवादभीतेन यमुनादक्षिणे तटे । प्रत्यक्षं दास्यते मह्यं तदनुज्ञातुमर्हसि ॥२८॥
इमौ तु सीतातनयौ कुशश्चवत्तो लवे मया । लवैर्वनिर्मितः सीताप्रत्ययञ्चाग्रवेचनमा ॥२९।


जो कुछ कहा था, सो कह सुनाया ॥ ६-११॥ रामके मनकी बात जानकर वाल्मीकिने कहा - आज तुम लोग जाओ और रामसे कह दो कि कल सभामे जाकर सीता सब लोगोके सामने शपथ खायगी ॥ १२-१४॥ स्त्रियोंके लिए पतिके सिवाय और कोई देवता नही होता ! इसी अवस्थामें सीता और कर ही क्या सकती है। पतिके बिना स्त्रीके लिए लोकमें और कोई गति भी नहीं है ॥ १५। तब लक्ष्मण आदि वहाँसे लौट आये। रामने उनके मुखसे वाल्मीकिका सन्देश सुना तो परम प्रसन्न हुए। वे लोग वहांसे लौटते समय सुमन्त्र आदि चारों वीरोंको, जिनको कि लवने बन्दी बना रक्खा था, साथ में लाये थे। राम उन सबको अपनी छातीसे लगाकर मिले और यह समझा कि इन चारोंका पुनर्जन्म हुआ है ॥ १६-१८ उन सबोंने अपना हाल बतलाते हुए कहा कि यद्यपि लवने हम सबको कैद कर दिया था किन्तु सीताने पूर्णरूपसे हमारी रक्षा की ॥ १९॥ दूसरे दिन एक विशाल सभा आयोजित की गयी। उसमें सब लोगोंको सम्बोधित करके रामने कहा- हे देशविदेशसे आये हुए ऋषियों ! आज इस सभामे आप लोगोंके समक्ष सीता शपथ खायगी। इससे आप लोगोंको उसके शुद्धता तथा दुष्टताका पता लग जायगा। इस प्रकार राम-के वचन सुनते ही सब लोग माताको देखनेके लिए उतावले हो उठे। नगरमें भी यह समाचार पहुँच गया। अतएव इस दिव्य शपथको देखनेकी लालसासे कितने ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वहाँ आ पहुँचे ॥ २०-२२॥ थोड़ी देर बाद सीताके साथ वाल्मीकि जी सभा में पधारे। आगे आगे वाल्मीकि थे और उनके पीछे नीचा सिर किये सीता मन्दगतिसे सभा में आयीं। उस समय सीता और वाल्मीकिको देखकर ऐसा लगता था कि मानों विधातुके पीछे पीछे लक्ष्मी चली आ रही हैं। सीताको देखते ही लोगोंने जयजयकार किया और वाल्मीकिजी सभाके बीचमे पहुँचकर रामसे कहने लगे - । २३-२६॥ हे राम ! कुछ दिन हुए जब आपने लोकापवादके भयसे सीताको मेरे आश्रमके समीप छोड़वा दिया था । आज वह ही सीता आपके सामने शपथ खायगी, आप इसके लिए आज्ञा दें । सीताके इन दोनों पुत्रोंमें कुश आपका सगा रूप (कुशकी दूर्वोंसे) बनाया हुआ मेरा वेटा है। उसे मैंने सहसा सीताके डरस बनाया था। ये दोनों बेटे

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॥ सर्गः ८ ॥ जन्मकाण्डम् १३१

मुक्ताविमौ तु दुर्धर्षौ मध्यमेन्द्रावपि ते । प्रचेतासोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह ॥३०॥
अनृतं न स्मराम्युक्तं यथेमौ तव पुत्रकौ । बहुवर्षसहस्राणां सम्यक् तपश्चर्या मया कृता ॥३१॥
नोपभोक्ता फलं तस्या भवेयं यदि मे ऽनिला । इत्युक्त्वा राघवस्यांके दक्षिणे स्थाप्य वै कुशम् ॥३२॥
लवं विन्यस्य वामांके तस्यान्वेवापरासने मूर्त्तः । गतोऽपि तौ समालिंग्य मूर्ध्न्यावघ्राय सादरम् ॥३३॥
लक्ष्म्य हस्तेके हस्तं संस्थाप्य आशीश्वरः । प्रतिष्ठास्ततं बालं पूर्ववन्मोऽकरोत् च तम् ॥३४॥
ततो रामोऽपि तां सीतां दृष्ट्वा बुद्धयन्विताम् । अथात इव सम्प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् ॥३५॥
त्वया सूनः ममानीतः सीतायाश्च प्रदर्शितुम् । पुरा तमानयस्वाद्य खेदस्ति शशिनस्त्वया ॥३६॥
तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपि पेटिकान्निहितं भुजम् । सीतायाः पुरतो राम दर्शयामास सादरम् ॥३७॥
सीताभुजोपमं दृष्ट्वा भुजं मारुतिनिर्मितम् । वस्त्ररुपांतरे काले सामन् सर्वऽतिविस्मिताः ॥३८॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र पश्यत्सु सकलेष्वपि । भुजः स गुप्ततां प्राप्तो विश्वकर्मोद्भवः क्षणात् ॥३९॥
तद्दृष्ट्वा कौतुकं लोका अभूवन्नतिविस्मिताः । रामोऽपि विस्मितः प्राह वाल्मीकिं प्रणिपत्य च ॥४०॥
एवमेव महाप्राज्ञ यदुक्तं मा मया ऽनृतम् । प्रत्ययो जनितो मह्यं तव वाक्यैरकिल्बिषैः ॥४१॥
लङ्कायामपि दृष्टा मे चैरेवाऽप्रतप्तः शपतः । इन्द्राद्यैः सुरतस्तेन मन्दिरं सम्प्रवेशिता ॥४२॥
सेयं लोकापवादेन मयाऽपि मतिमाऽधुना । मया त्यक्ता परित्यक्ता तद्गतान् क्षन्तुमर्हसि ॥४३॥
ममार्जुनोऽर्कश्चारूपं कुशीऽय वलवान्मया। सर्वशौर्या कृतो वेद्मि सीतायामप्यनसूये ॥४४॥
तथापि लोकसङ्गह्यान्कुरुतां शपयं त्वयि । जगत्सु शपयं नापि ममाद्यो तव सन्निधौ ॥४५॥
शुद्धायां जगतामध्ये सीतामंगीकरोम्यहम् । तदा तच्छपथं द्रष्टुमामन्लोकाः समुत्सुकाः ॥४६॥
समग्रा जानकी चाथ तदा कौशेयवासिनी । उदङ्मुखी ह्यधोदृष्टिः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥४७॥

असाधारण बल हैं। कोई भी योद्धा इनके सामने नहीं टिक सकता। विधाताका मैं दसवाँ पुत्र हूँ। आज तक मैं कभी झूठ नहीं बोला। अनेक वर्षोंतक मैने घोर तपस्या की है। यदि सीता किसी तरह भी पापाचारिणी हुई तो मैं उस तपस्याके फलका उपभोग न ग्रहण करूंगा। इतना कहकर वाल्मीकिने कुशको रामके दाहिना बगल तथा लवको बायीं ओर बिठाया और स्वयं उनके सामने एक ऊँचे आसनपर बैठे। रामने इन भाइयों उस बालकोंका आलिंगन किया, माथा सूंघा और उनके मस्तकपर अपना दाहिना हाथ रखकर कुशके समान उस अवसरपर उनका नाम बता दिया ॥ २७ से ३४ ॥ इसके अनन्तर रामने सीताकी ओर देखा तो सीताका शरीर देखकर बहुत शोक देखा। उन्होंने मज सभासद लक्ष्मणको आज्ञा दी कि उस समय जो सुवर्ण भुज काटकर हनुमान तुम दिखाये लाये थे, यदि वह सुरक्षित रीतिसे रक्खी हो तो यहाँ ले आओ ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कहकर पटाम रक्खी भुजा लाकर रामके सामने रख दी ॥ ३७ ॥ दृश्न दिन दसोरपर भी ठंक सीताकी भुजाओंके समान लटकते चामके चीथड़े तथा रुधिरसंयुक्त भूषाप्रथा देखकर सभासद जितने लोग बैठे थे वे बड़े विस्मित हुए ॥ ३८ ॥ इसी बीच लोगोंके देखते ही देखते वह विश्वकर्माकी बनायी भुजा गायब हो गयी। यह कौतुक देखकर लोगोंको और भी आश्चर्य हुआ। तब रामने विस्मित होकर वाल्मीकिसे कहा—हे महाराज ! मुझे तो आपकी बातोंसे ही विश्वास हो गया था कि सीता परम पवित्र है ॥ ३९-४१ । लङ्कामें भी मैंने सीताका शपथ देखी थी। उस समय देवताओंके समक्ष शपथ लेनेपर ही मैंने उसे अपने घर किया था ॥ ४२ । तथापि लोकापवादके भयसे पवित्र समझकर भी मैंने सीताका परित्योग किया। आप मेरे इस अपराधको क्षमा करें ॥ ४३ ॥ यह भी मैं जानता हूँ कि कुश मेरा पुत्र है और लवको आपने सीताके गर्भसे उत्पन्न किया था ॥ ४४ । यह सब होते हुए भी इन संसारवालोंको विश्वास दिलानेके लिये सीता इस सभा में शपथ ले ॥ ४५ । यदि इस जनसमाजमें और इस संसारमे सीता शुद्ध सिद्ध हो गयी तो मैं इसको फिर अङ्गीकार कर लूँगा। उस समय सीताकी शपथको देखनेके लिए वहाँ बैठे हुए सब लोग उत्सुक हो रहे थे ॥ ४६ ॥ तदनन्तर सभामें रेशमी कपड़े पहने सीता खड़ी हो गयी और हाथ

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३३२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

रामादन्यमहं चेद्धि मनसाऽपि न चिन्तये । तर्हि मे धरणी देवि विवरं दातुमर्हसि ॥४८॥
एवं शपन्त्याः सीतायाः प्रादुरासीन्महाद्भुतम् । भूतलाद्दिव्यरूपार्थं सिंहासनमनुत्तमम् ॥४९॥
धृतो दिव्यरसै रोषैः समानीतं मनोहरम् । नागेन्द्रैर्ध्रियमाणं तद्दिव्यदेहं रविप्रभम् ॥५०॥
मूर्द्ध्ना जानकीं दोर्भ्यां धृत्वा दुहितरं निजाम् । स्वागतामीति तामुक्त्वाऽऽसने मा मन्यवेशयत् ॥५१॥
वस्त्राऽलङ्कारसम्पन्नमुदधैः पूज्य मैथिलीम् । समालिङ्ग्याथ भूदेवी वीजयामास सादरम् ॥५२॥
तदा शनैः शनैर्भूम्यां सुतं सिंहासनं त्वभूत् । सिंहासनस्थ वैदेही प्रविशन्ती रसातलम् ॥५३॥
दृष्ट्वाऽऽकाशस्थिता देवाश्चैव सर्वांस्तु मन्त्रमन्त् । निरन्तरं भिर्र्वैदेही ववपुः पुष्पवृष्टिभिः ॥५४॥
साधुवादश्च सुमहान्बभूव सुरकीर्त्तितः । अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वं स्थावरजङ्गमम् ॥५५॥
तदा बभूव चकितं सीतापथदर्शनात् । ऊचुश्चे वसुधा वाचो वानराश्च नगादिकाः ॥५६॥
केचिच्चिन्तापराः केचिदासन्ध्यानपरायणाः । केचिद्रामं निरीक्षन्तः केचित्सीतामचेतसः ॥५७॥
मुहूर्त्तमात्रं तत्सर्वं तूष्णींभूतमचेतनम् । प्रविशन्तीं भुवं सीतां दृष्ट्वा संमोहितं जगत् ॥५८॥
एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रविशन्तीं दृ भूतले । विदेहजां तदा दृष्ट्वा वामहस्तेन संभ्रमात् ॥५९॥
यां दधार करेणादौ धन्वा हस्तेन वै भुवम् । ततम्भो प्रार्थयामास भुवं स रघुनन्दनः ॥६०॥

श्रीरामचन्द्र उवाच

देवि त्वं सर्वलोकानां निवासस्थानमुत्तमम् । अपि लोकमाता त्वं महानीरोपरिवृतः सदा ॥६१॥
वर्तसे पुण्यरूपान्वं सम्पुदा सकलान् जनान् । स्वजठरोर्ध्वौषधीभ्यश्च करोषि विभृतन्विद्राः ॥६२॥
त्वं दुर्गा त्वं स्वरा लक्ष्मीरभमं विष्णोः प्रिया शुभा त्वमेवाद्यात्र मे शुक्तिर्निमिताऽसि मयैव हि ॥६३॥
निजोधराद्ददासि त्वं धातून्बीज्या जनान्मदा अभायुक्ता त्वमेवासि सूक्ताष्टाकादिकर्मसु ॥६४॥


की ओर नीचे निगाह तथा ऊपर मुँह करके बोली—॥४७॥ हे पृथ्वि माता ! यदि रामके सिवाय अन्य किसीको मैंने अपने हृदयमें भी न ठाना हो, तो आप मुझे ऐसी जगह दीजिए कि जिससे मैं आपमें समा जाऊँ ॥ ४८ ॥ इस प्रकार सीताके प्रार्थना करनेपर तुरन्त एक दिव्य सिंहासन पृथ्वीके भीतरसे निकला । उसको बड़े-बड़े नाग अपने शिरपर उठाये हुए थे सूर्यके समान देदीप्यमान उन नागोंका प्रकाश था ॥ ४९ ॥ ५० ॥ इतनेमें साक्षात् पृथ्वी देवीने अपनी दोनों भुजाओंमें सीताका स्वागत किया। फिर छातीसे लगा तथा गोदमें लेकर उन्हें उस सिंहासनपर बिठाल दिया । इसके अनन्तर वस्त्र अलङ्कार माला-फल आदिसे सीताकी पूजा की और छातासे लगाकर पङ्खा झलने लगी । ५१ । ५२ ॥ इसके बाद धीरे-धीरे वह सिंहासन पृथ्वीके भीतर घूमने लगा । सिंहासनपर बैठी हुई सीताको पातालमें जाती देखकर आकाशमें स्थित सारी देवांगनाएँ उनपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं ॥ ५३ । ५४ ॥ आकाश और पृथ्वीमें देवताओं और मनुष्योंने साधुवाद किया । सीताकी उस शपथको देखकर समस्त स्थावर-जंगम प्राणी चकित हो गये और अपनी बुद्धि-बुद्धि भूलकर परस्पर बात करने लगे ॥ ५५ । ५६ ॥ उनमें कुछ लोग चिन्तित थे और कुछ ध्यानमग्न । कुछ लोग रामको देख रहे थे । कुछ लोग अपनी सुधि-बुद्धि भूलकर सीताकी ओर निहार रह थे ॥ ५७ ॥ मुहूर्तभरके लिए वही सारा समाज सन्न हो गया । सीताको पृथ्वीके भीतर समाती देखकर समस्त संसार मुग्ध हो गया ॥ ५८ ॥ राम सीताको पृथ्वीमें धंसती देखकर अपने सिंहासनसे कूद पड़े और पृथ्वीके पास जा पहुंचे। वे उनका हाथ अपने हाथसे पकड़कर इस प्रकार पृथ्वीसे प्रार्थना करने लगे । ५९ । ६० । श्रीरामचन्द्र बोले— हे देवि ! आप सारे संसारकी निवासभूमि हैं समस्त जगत्की माता होकर महानीरके ऊपर आप स्थित हैं ॥६१॥ आप पुण्यरूप हैं । समस्त जनोंको हर प्रकारकी सम्पत्तियां देनेको सामर्थ्य रखती हैं । आप अपने उदरसे अनेक प्रकारकी औषधियाँ उत्पन्न करके सबका रक्षा करती हैं । आप दुर्गा, रुद्रा और विष्णुकी प्रिया लक्ष्मी हैं । आप आदिशक्ति हैं और मैंने ही आपको बनाया है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ आप अपने उदरसे भाँति-भांतिके धातु निकालकर

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सर्गः ८ ] जन्मकाण्डम् ३३३

जानकी तव कन्येयं श्वश्रूस्त्वं मेऽधुना प्रिये । कन्यादानं कुरु मुदा यत्त्वया पूर्वं कृतं न हि ॥६५।
प्रसीद देवि नोचेन्मे त्वयि क्रोधो भविष्यति ।
श्रीरामदास उवाच
इति संप्रार्थिता साऽथ शश्वत्तु महात्मना ॥६६।
नारी काठिन्यभावाच्या नाश्रृणोद्रघवेश्चित् । शनैः शनैः समाविष्टा सा जगाम ह ॥६७।
तां गच्छन्तीं पुनर्दृष्ट्वा भृशं रामो रुषान्वितः । बभूव क्रोधताम्राक्षस्तदा लक्ष्मणमब्रवीत् ॥६८।
चापमानय सौमित्रे शिक्षयेऽहं भुवं त्विमाम् । मन्मुखोपेक्षरूपेण वसुधेयं विदेहजाम् ॥६९॥
मामकं दास्यति क्षिप्रमन्यथा घातं न संशयः । ततोऽसौ लक्ष्मणस्तूर्णं करे कोदण्डमुक्तवान् ॥७०॥
धृत्वा ज्यारोपणं कृत्वा शरसंधानमातनोत् । तदा ववौ महन्वायुरुद्भूमे लवणार्णवः ॥७१॥
तारा निपेतुर्धरणीं बभूवुः सरजा दिशः । चकम्पे धरणी भीता त्राह्यत्राह्यति वदती मुहुः ॥७२॥
कराभ्यां जानकीं धृत्वा रामस्याङ्के न्यवेशयत् । श्रीरामचरणयोः पृथ्वी शिरसा नमनं व्यधात् ॥७३॥
तदा खे देववाद्यानि नेदुः कुसुमवृष्टिभिः । ववृषुर्जाानकीं रामं देवसङ्घा मुदान्विताः ॥७४॥
ततो रामोऽपि तां दृष्ट्वा पदयोर्नमतीं भुवाम् । स्वक्रोधं शान्तमकरोत्त्यक्त्वा चापमथोऽसृजत् ॥७५॥
विस्मृत्योत्थापयामास स्वकराभ्यामपि प्रभुः । ततः सा राघवं नत्वा प्रसाद्य च पुनः पुनः ॥७६॥
दत्त्वा विदेहकन्यायै तन्सिंहासनमुत्तमम् । सीतां स्तुत्वाऽथ तां पृष्ट्वा तया संपूजिताऽपि च ॥७७॥
आमन्त्र्य राघवं पृथ्वी क्षणदन्तरहिताऽभवत् । तदा सीतां जनाः सर्वे पुनर्जातान्तु मेनिरे ॥७८॥
अयोध्यास्थाः प्रणमुस्तां चक्रुः पूजां पृथक् पृथक् । ददौ दानान्यनेकानि तदा रामो मुदान्वितः ॥७९॥
नवरत्नादिनिम्नाश्च सम्बभूवुः समन्ततः । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः ॥८०॥

संसारी मायाका प्रीतिपूर्वक प्रदान करता है। मुझ और अमुक जितना था कम है, उनमें आप सहायका हैं ॥ ६४ ॥ यह सीता आपका कन्या है। इस नाते आप मम सास हैं। आपने विवाहके समय कन्यादान नहीं किया था, सो अब कर दीजिए ॥ ६५ ॥ हे देवि ! आप मेरेपर प्रसन्न हो जावें । नहीं तो मैं आपपर क्रुद्ध हो जाऊँगा । श्रीरामदासवत कहा—रामके इस तरह प्रार्थना करनेपर भी पृथ्वीने उनकी एक न सुनी। क्योंकि स्वभावतः ही नायिकाका हृदय कठिन हुआ करता है। सीता धीरे-धीरे पृथ्वितलम समाती जा रही थी ॥ ६६।६७ ॥ विनय करनेपर भी जब रामने देखा कि पृथ्वी मेरी बातोंपर कुछ ध्यान नहीं दे रही है तो मारे क्रोधके उनका आँख लाल हो गयी और लक्ष्मणसे बाले—॥ ६८ ॥ लक्ष्मण ! मेरा धनुष तो उठा लाओ, मैं पृथ्वीका उसके दुराग्रहका दण्ड दे दूँ। मेरे छूटे सदृश तीक्ष्ण बाणसे डरकर यह सीताको लौटा देगी। इस मैं मारना नहीं चाहता, चाहता हूँ केवल साताको इसके हाथोंसे लोटना। तदनुसार तुरन्त लक्ष्मण धनुष उठा लाये। रामने उस लेकर राजा ठाक किया और बाण चढ़ाया। उस समय जोरास बांय चलन लगा, समुद्रमे प्रलयसदृशकी लहरें उठने लगीं, तारे टूट-टूटकर गिरने लगे और चारों दिशाएँ धूलसे आच्छादित हो गयी। ऐसी अवस्था में 'त्राहि त्राहि' करती हुई पृथ्वी काँपने लगी और उसने अपने हाथो साताका उठाकर रामकी गोदमें बिठा दिया। इसके बाद पृथ्वीने सिर भुकाकर रामके चरणोंकी वन्दना की ॥ ६९-७३ ॥ उस समय स्वर्गमें देवताओंने देवबाय बज ये और राम तथा सीतापर फूलोंकी वर्षा की ॥ ७४ । इसके बाद जब रामने देखा कि पृथ्वी मेरे चरणम मुकी हुई विनती कर रही है तो अपना कोप शान्त कर लिया तथा धनुष-बाणका परित्याग करके अपन दत्तो हाथोंसे पृथ्वीको उठाया । इसके अनन्तर पृथ्वीने किन्द भगवान्को बार-बार नमस्कार किया, प्रार्थना की और सीता तथा यह सुवर्णमय सिहासन रामको समपर्ण कर दिया। फिर सीताकी स्तुति की। सीताने भी पृथ्वीकी विधिवत् पूजा का। तत्पश्चात् रामकी आज्ञा लेकर क्षण भरके भीतर ही पृथ्वी अन्तर्धान हो गयीं। उस समय सभामें बैठे हुए लोगोंने सीताका पुनर्जन्म समना ॥ ७५-७८ ॥ सब लोगोंने सीताकी विधिवत् पूजा की और जय-जयकार करके प्रणाम किया। तब रामने अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ७९ ॥ भाँति-भाँतिके नवीन बाजे बजे,

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३३४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ८

सीतायाः शपथो यत्र जाह्नव्या दक्षिणे तटे । सीताकुण्डमिति ख्यातं तत्र तीर्थं बभूव ह ॥८१॥
पातालस्थं जलं पुण्यं सन्तप्तमनलोपमम् । दर्शनेष्वपि यत्तीर्थे सीतोष्णोष्णमुपद्रवात् ॥८२॥
तदत्र जानकीकुण्डं स्मरणान्घविनाशनम् । पुत्पुत्रायुषवृद्ध्यर्थं स्त्रीभिः सेव्यं सदा भुवि ॥८३॥
ततः सीतायुतो रामः पुत्राभ्यां सहितो मुदा । वसिष्ठऋश्यशृङ्गाभ्यां स्नानं सर्वमृषेर्गणैः ॥८४॥
चकार ऋषिमिश्रैश्च पूर्ववच्च सविस्तरम् । अथ यज्ञसुतं पूर्णमेव कृत्वा रघूत्तमः ॥८५॥
जातकर्मादिसंस्कारान् लवस्य विधिनाऽकरोत् । चकार नानादानानि देवान् सपूज्य भक्तितः ॥८६॥
ततो मुनीश्वरान् पूज्य पूजयामास पार्थिवान् । जनकं च सुमेधां च पूजयामास राघवः ॥८७॥
विससर्ज ऋषीन्सर्वान् ऋत्विजो ये समागताः । द्विजाद्यखिलाञ्जन्तून्धनाद्यैश्च तोषयामासुर्मुदं गतान् ॥८८॥
ततो विसृज्य विप्रांश्च पार्थिवैः सह राघवः । कुशाभ्यां सीतया च बन्धुभिश्चागमत्पुरीम् ॥८९॥
नीराजितः पुरस्त्रीभिर्हस्तिष्ठो रघूत्तमः । सीतया तनयाभ्यां च ययौ निजगृहे प्रति ॥९०॥
तदा महोत्सवेनासीदयोध्यायां समन्ततः । चिरकालेन वैदेह्या दर्शनं च जनैः कृतम् ॥९१॥
ततो नृपादिकान् पूज्य विससर्ज रघूद्वहः । जनकं च सुमेधां च ददवाज्ञां निजां पुरीम् ॥९२॥
सुतः सीतायुतो रामः पुत्राभ्यां बन्धुभिः सह । पूर्ववच्च सुखं रेमे चिरकालं रघूद्वहः ॥९३॥
रामेण सीतया सार्थं सहस्राणि त्रयोदश । वर्षाण्यत्र कृतं राज्यं कस्मिन्कल्पे द्विजोत्तम ॥९४॥
एकादश सहस्राणि वत्सराणि महान्ति च । वर्षान्कादश वर्षाणि मासा एकादशैव तु ॥९५॥
दिनान्येकादशैवात्र रामेण सीतया सह । अयोध्यायां कृतं राज्यं कस्मिन्कल्पे द्विजोत्तम ॥९६॥
एकादश सहस्राणि चैकादश दिनानि च । समहीपवनेनापि रामेणाभूत् कल्पभेदतः ॥९७॥
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । गायन् सीतया राज्यं कस्मिन्कल्पे कृत द्विज ॥९८॥
इति श्रीमत्कोटिसंहितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकाण्डे जानकीग्रहणं नामाष्टमः सर्गः ॥८॥


वैभवपूर्वक नृत्य किया और बन्दियों तथा मागधोंने विविध प्रकारसे स्तुति की ॥८०॥ जाह्नवीके दक्षिणी तटपर जहां सीताने शपथ ली थी, वह सीताकुण्डके नामसे एक विख्यात तीर्थ बन गया ॥८१॥ सीताके उष्ण उच्छ्वास निकलनेके कारण आज भी वहां अग्निके सदृश तपता हुआ पवित्र जल निकलता रहता है ॥८२॥ इस जानकीकुण्डके स्मरणमात्रसे सब अघ नष्ट हो जाते हैं। अपने पतिकी आयुवृद्धिके लिए स्त्रियोंको इसमें स्नान करना चाहिये ॥८३॥ इसके बाद सीता तथा अपने पुत्रोंके साथ रामने यज्ञशाला सम्बन्धी स्नान किया। यह अवभृथ स्नान था पूर्वकथित स्नानके सदृश ही उत्साहयुक्त हुआ। इस प्रकार रामने सो यज्ञ पूर्ण करके विधिवूर्वक लवका जातकर्मादि संस्कार किया। अनेक प्रकारके दान दिये और देवताओंका विधिवत् पूजन किया। इसके अनन्तर यज्ञमें आये हुए समस्त ऋषियों तथा राजाओंकी पूजा की और जनक तथा सुमेधाका भी पूजन किया। इसके बाद ऋषियों तथा ऋत्विजोंको धनादिसे सन्तुष्ट करके विदा किया ॥८४-८८॥ साथ ही ब्राह्मणों तथा राजाओंको भी विदा किया और सीता, पुत्रों तथा बन्धुबान्धवोंके साथ राम अपनी अयोध्यापुरीको गये ॥८९॥ अयोध्यामें जाते ही राम हाथ पर सवार होकर पहुंचे, त्यों ही नगरकी स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी और सब लोग अपने महलोंमें गये। उस समय अयोध्यामें चारों ओर महान् उत्सव हो रहा था। बहुत दिनोंके वियुक्त सीताका लोगोंने दर्शन पाया ॥९०।९१॥ कई दिनों बाद रामने जनक, सुमेधा तथा अन्य राजाओंको अपने-अपने नगर जानेकी आज्ञा दी ॥९२॥ इसके अनन्तर फिर पहिलेके समान रामचन्द्रजी सीता तथा पुत्रोंके साथ आनन्दपूर्वक अयोध्यामें रहने लगे ॥९३॥ किसी कल्पमें रामने सीताके साथ तेरह हजार वर्ष तक राज्य किया, किसी कल्पमें ग्यारह हजार वर्ष तथा किसी कल्पमें ग्यारह हजार वर्ष ग्यारह मास और ग्यारह दिनतक राज्य किया ॥९४-९७॥ किसी कल्पमें रामने दस हजार दस सौ वर्ष तक राज्य किया है ॥९८॥ इति श्रीमत्कोटिसंहितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेय-कृत ज्योतिष्मतीभाषाटीकासहिते जन्मकाण्डे अष्टमः सर्गः । ८॥

सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् ११५

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सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् ११५


नवमः सर्गः

( रामादिके बालकोंका उपनयन-संस्कार )

श्रीरामदास उवाच

अथोर्मिला मांडवी च श्रुतकीर्त्तिः सहैव ताः । बभूवुर्गर्भिण्यश्चिद्दनैर्गम्यो महोदराः ॥ १ ॥
तासां चकार श्रीरामः कौतुकानि च चादरम् । तासां पुंसवनादीनि विधिवत्तानि रघूत्तमः ॥ २ ॥
आहूय पत्या जनकं कुशध्वजं च बन्धुभिः । दौहित्रान् पूरयामासुस्तासां पौरसुहृत्त्रियः ॥ ३ ॥
तासां मन्थान् समुत्सङ्गे कृत्वा नृत्तमः । वस्त्रालङ्कारभूषाभिस्तोषयामास ताः मुदास् ॥ ४ ॥
अथोर्मिला सा तनयं सुषुवे चात्मोदयम् । ततः सा मण्डवी पुत्रं सुषुवे परमे दिने ॥ ५ ॥
ततः सा श्रुतकीर्त्तिश्च सुषुवे यमलौ सुतौ । अन्यां रक्षोभिसाया द्वितीयस्तनयोऽभवत् ॥ ६ ॥
तथाऽपरस्तु मांडव्याः पुत्रः कायादजायत । जनकश्चोदितान् सर्वान् कुमारांस्तोषयन् पृथक् ॥ ७ ॥
चकार गुरुणा विधीन्सोन्मादं परां मुदा । ज्येष्ठमङ्गदाख्यं ज्येष्ठं चित्रकेतुं कनिष्ठकम् ॥ ८ ॥
मांडव्याः पुत्रयोर्ज्येष्ठः पुष्कलस्तदनन्तरम् । बाहुं चाप्यनुजं तूपकेतुं यः स्मृतः ॥ ९ ॥
एवं कुमारांस्तेषां च गुरुणा विधिवत्कृताः । नामकरणं दत्वानां काले काले क्रमेण च ॥ १० ॥
तेषामेव मया प्रोक्तः संक्षेपेणैकमात्रतः । तेषां जन्मकालेषु सुराः सर्वे मुदान्विताः ॥ ११ ॥
वादयामासुर्वाद्यानि ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः । मातरोः पितृभिर्युक्तान् बालकान् सूर्यसन्निभान् ॥ १२ ॥
राजद्वारे महानासीदुत्सवश्च नृपाज्ञया । निनेदुर्नववाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ १३ ॥
शंसयन्ति स्म नृपतिं स्तुववन्दितमागधाः । नगरीं शोभयामासुः पताकाध्वजतोरणैः ॥ १४ ॥
सुहृदः पार्थिवाः सर्वे रामादीनां च पूजनम् । वस्त्रैराभरणाद्यैश्च चक्रिरे ते पृथक् पृथक् ॥ १५ ॥
ददुर्जानानि विप्रेभ्यो राम श्या भ्रातृवश्च ते । ब्राह्मणान् भोजयामासुः श्राद्धानि चकुरादरात् ॥ १६ ॥


श्रीरामदास बोले-कुछ काल बाद उर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकीर्तिने साथ-साथ गर्भ धारण किया ॥ १ ॥
श्रीराम ने इस समयपर बड़ा स्वागतादि की और रदन विधिपूर्वक पुंसवनादि संस्कार किये ॥ २ ॥ इस संस्कारके समय जनक तथा कुशध्वजको भी रामने बुलवा लिया और उन्हींके द्वारा यह कार्य सम्पन्न हुआ । पुरवासिनी स्त्रियोंने उर्मिलादिकी जो इच्छा हुई, सो पूर्ण किया ॥ ३ ॥ रामने इस प्रकार उत्सव करके अनेक तरहके वस्त्र और आभूषण दिये ॥ ४ ॥ इसके बाद समय पूरा होनेपर उर्मिलान एक परम तेजस्वी पुत्र उत्पन्न किया और दूसरे दिन माण्डवी को एक पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ ॥ ५ ॥ इसके अनन्तर श्रुतकीर्तिने एक साथ दो पुत्र उत्पन्न किये। कुछ दिनों बाद उर्मिलाने एक दूसरा पुत्र और उत्पन्न किया ॥ ६ ॥ इसी प्रकार कालान्तरमें माण्डवी के भी एक और पुत्र हुआ । रामने अपने कुलगुरु वसिष्ठके द्वारा उन पुत्रोंका जातकर्मादि संस्कार किया । लक्ष्मणके ज्येष्ठ पुत्रका नाम अङ्गद और दूसरे बेटेका नाम चित्रकेतु पड़ा ॥ ७ ॥ ८ ॥
माण्डवीके ज्येष्ठ पुत्रका नाम पुष्कर तथा कनिष्ठका तक्ष नाम पड़ा । इसी तरह श्रुतकीर्तिके ज्येष्ठ पुत्रका नाम सुबाहु तथा कनिष्ठ बेटेका नाम यूपकेतु पड़ा ॥ ९ ॥ १० ॥ गुरु वसिष्ठने विधिपूर्वक सबका नामकरणादि संस्कार किया । हे शिष्य ! यहाँपर मैंने तुम्हें संक्षेपमें एक ही एक पुत्रका नाम बतलाया है। इनके सिवाय भी बहुतसे पुत्र हुए। प्रत्येक पुत्रके जन्मसमयपर देवतागण हर्षपूर्वक अपने बाजे बजाते और उनपर तथा उनके माता-पितापर पुष्पोंकी वृष्टि किया करते थे । रामचन्द्रजीके आज्ञानुसार राजद्वारपर बड़े-बड़े उत्सव रचाये जाते, नये-नये बाजे बजते और वेश्याएँ नृत्य करती थीं । वन्दीजन तथा सूत मागध आ-आकर विविध प्रकारकी स्तुतियाँ किया करते थे । पताका-ध्वजा तथा तोरणादिकोंसे अयोध्या नगरीका शृङ्गार किया गया था। रामके मित्र समस्त राजे अनेक प्रकारके वस्त्राभूषणोंको देखकर उनका पूजन करते थे ॥ ११-१५ ॥
राम-लक्ष्मण आदि चारो भ्राता भी ब्राह्मणों को दान देते उन्हें भोजन कराते एवं नान्दीशाखादि कृत्योंको

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११६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

एवमष्टौ कुमारास्ते रामादीनां मनोरमाः । ववृधुश्चन्द्रवदना मातृभिर्लालिताः सुखम् ॥१७॥
शृङ्खलावद्धरत्नौघनिर्मितेषु वरेषु च । प्रखेषु हि कुमारास्ते विरेजू रत्नभूषिताः ॥१८॥
भाले स्वर्णमयाश्वत्थपर्णाभ्यतिमहान्ति च । मुक्ताफलाग्रलम्बीनि शोभयन्ति स्म बालकान् ॥१९॥
कण्ठे रत्नमणीवानमध्यगौपन्नखाञ्चिताः । कर्णयोः स्वर्णसंपन्नरत्नाज्जुनसुतालकाः ॥२०॥
सिंजानमणिमंजीरकट्सूत्रार्गदैर्युताः । स्निग्धवक्त्र लपदशना इंद्रनीलमणिप्रभाः ॥२१॥
मंगणे रिंगमाणाश्च मस्कारैः मण्डनाः शुभाः । ते पितॄन् रञ्जयामासुर्भाताश्चापि विशेषतः ॥२२॥
नाना शिशु क्रीडनैश्चैव प्रमंग्मुखचुम्बनैः । बालकविभ्रमैर्मुग्धैर्गमनैर्मधुरैरितैः ॥२३॥
ततस्ते बालकाः सर्व्वे वस्त्रालङ्कारभूषिताः । सभायां राघवं नत्वा तस्थुः सिंहासनेोपरि । २४।
एकदा राघवः प्राह वसिष्ठं सदसि स्थितम् । अवलोक्य बालानां त्वं चिह्नानि यथाक्रमम् । २५।
तच्छ्रुत्वा रामवचनं वसिष्ठो भूसुरैः सह । आदौ कुशं समाहूय दृष्ट्वा रामं वचोऽब्रवीत् ॥२६॥

वसिष्ठ उवाच

पंचसूक्ष्मः पंचदीर्घः सप्तरक्तः षडुन्नतः त्रिषुयुक्तंषुगंभीरो द्वात्रिंशल्लक्षणव्ययम् ॥२७॥
पंच दीर्घाणि शस्तानि यथा दीर्घायुरोऽत्र च । भुजौ नेत्रं हनुर्जान् नासा च तनयस्य ते ॥२८॥
ग्रीवा जंघा मेढ़नैश्च त्रिभिर्ह्रस्वोऽयर्मडितः । स्वरेण सत्त्वनाभिभ्यां त्रिगंभीरः शिशुः शुभः । २९॥
त्वक्केशंगुलिदशनाः पत्रांण्यङ्गुलिजान्यपि । तथाऽम्य पंच सूक्ष्माणि सूचयन्ति परां श्रियम् ॥३०॥
पाण्र्यङ्घ्रितलनेत्रांते तालुजिह्वाधरोष्ठकम् सप्तरूष्ण च सनममस्मिन् राज्यसुखप्रदम् ॥३१॥
वक्षः कुक्ष्वालिकस्कन्धकरवक्त्रं षडुन्नतम् । तथाऽत्र दृश्यते बाले महदैश्वर्य्यभोगभाक् ॥३२॥


किया करते थे इस तरह रामादि चारों भ्राताओंके आठो कुमार—जिनका चन्द्रमाके समान मुखमण्डल था—माताओसे लालित होकर बढ़न आत थे। सोनेके जंजीरोंसे बधे हुए एवं तरह-तरहके रत्नोंसे सुसज्जित पालनोंपर ये आनन्दकी किलकारियां भरा करत थे । १६ , उन बच्चोंका कितने ही प्रकारके स्वर्णमय आभूषण पहनाये जाते और माथेपर पीपलके पत्तेकी नई सुवर्णका पत्ता बनाकर लगाया जाता था। जिसमें छोटे छोटे मोतियोंके गुच्छ लटकते हुए बड़े भले लगते थे । १७ ।। १८ । गलेमें रत्नों और मणियोंके समूहके बीचमें व्याघ्रका नख शोभायमान हो रहा था। कानामे सुवर्णक कुण्डल झूलते रहते थे और उनमें लगा हुआ हीरा प्रकाशित हो रहा था । १९ ।। २० ।। रुनझुन करती हुई मणियोंकी करधनी पड़ी थी । हाथोंमें कङ्कण तथा विजायत अपना असाधारण निखार दिखा रहा था। जिस समय वे बच्चे तनिक मुस्करा देते तो इन्द्रनीलमणिके समान उनके छोटे छोटे दांत दीखने लगत थे । हाथ और पैरके सहारे आँगनमें रंगते हुए वे बालक नाना प्रकारके बालविनोद तरह तरहके बाल, मुखचुम्बन, बालकीय कृत्रिम युद्ध ओर मोडामोंड़ा बोलोंसे अपने-अपने माता-पिताको आनन्दित करते रहते थे। कुछ दिनों बाद वे अच्छे अच्छे वस्त्रालभूषण पहिनकर राजसभाम जाते और वहाँ नियमत रामचन्द्रको प्रणाम करके अपने आसनपर बैठ जाते थे ॥ २१-२४॥

एक दिन राजसभाम बैठे हुए वसिष्ठजीसे रामन कहा—आप कृपया इन बालकोंका शुभाशुभ लक्षण देखकर हमें बतलाइए । यह बात सुनकर वसिष्ठने सबसे पहले कुशको अपने सामने बुलाया और रामसे कहने लगे—॥ २५ ॥ २६ ॥ पाँच प्रकारके लक्षण सूक्ष्म, पाँच ही तरहके दीर्घ, सात रक्त, छः उन्नत, तीन विस्तृत, तीन ही सांग लघु तथा तीन गंभीर सब मिलाकर ३२ प्रकारके लक्षण होते हैं ॥ २७॥ जैसे कि इस चिरंजीवी कुशके हाथ, नेत्र, बाहु घुटने, नाक ये पाँच दीर्घ हैं। अतएव ये बहुत अच्छे हैं। ग्रीवा, जंघा और लिंग इन तीनोंके छोटे होनेसे इसके तीन ह्रस्व हैं। ये भी अच्छे हैं। शब्द, बल तथा नाभि ये तीन गंभीर हैं। इसकी त्वचा, केश उँगलियां, दाँत, शरीरकी संधियां तथा नख ये पाँच सूक्ष्म इसकी श्रीकी सूचना दे रहे हैं। हाथ, पैर, तलवे, नेत्रके आस-पासवाले भाग तथा तालु, जिह्वा, अधरोष्ठ और नख ये रक्तवर्णके होनेसे राज्यसुख देनेवाले हैं ॥ २८-३१॥ छाती, पेट, कन्धा,

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सर्गः ९] जन्मकाण्डम् ३३७


ललाटकटिवक्षोभिस्त्रिभिर्विस्तीर्णैः यथा ह्यसौ। सर्वतेजो महैश्वर्यं तथा प्राप्स्यति नान्यथा ॥३३॥
अविच्छिन्नां तर्जनीं प्राप्य तथा रेखाऽस्य दृश्यते। कनिष्ठामूलनिर्याता दीर्घायुष्यं यया भवेत् ॥३४॥
कमठपृष्ठकठिनावूर्ध्वकण्ठौ करौ। राज्यहेतू शिरोऽस्य पादौ चाप्यति कोमलौ ॥३५॥
पादौ समामलौ रक्तौ समौ सूक्ष्मौ सुशोभनौ। समगूढ...म्वशब्देन स्निग्धार्थदर्शनैस्तथा ॥३६॥
स्कन्धाभिः कररेखाभिश्चारुकाभिः सदा सुखी। लिंग... कूहस्वनेन राज्ञां राजा भविष्यति ॥३७॥
उन्नतशमनगुल्फस्निग्धनाभिस्तथापि च। जंघा राजन वर्तुलस्या महदैश्वर्यसूचकम् ॥३८॥
धारैका मूत्रके यस्य दक्षिणावर्तनी यदि। मद्यश्च मानमधुनोर्यदि वीर्यं तदा नृपः ॥३९॥
विस्तीर्णा पीवरी स्निग्धी भुजावस्य सुखोचितौ। वामावर्ती सप्रसक्तौ भुजौ भूरथगोचितौ ॥४०॥
श्रीवत्सवज्रचक्राब्जमत्स्यकोदण्डदण्डभृत् । तथाऽस्य कण्ठगा रेखा यथा स्यात्त्रिदिवम्पतिः ॥४१॥
द्वात्रिंशल्लक्षणधायं वरंबुद्धिगोचरः। कोचदुदुमिहंसास्वरः सर्वैश्चाधिकः ॥४२॥
मधुपिंगलनेत्रोऽसौ नैनं श्रीन्त्यजति क्वचित्। पंचरेखाललाटस्थु तथा सिंहोदरः शुभः ॥४३॥
ऊर्ध्वरेखांकितपदो निःश्वसनपद्मगन्धवान्। आंक्षाद्रघ्राणिः सुसमो महालक्षणवानयम् ॥४४॥
एवं कुशं निरीक्ष्याथ सर्वान् दृष्ट्वा क्रमेण सः। लवादीनां मचिह्नानि पूर्ववत्प्राह राघवम् ॥४५॥
ततः प्रीतमना रामः पूजयामास तं गुरुम्। वस्त्रैराभरणैश्चैव ययौ हर्षात्ततो गृहम् ॥४६॥
एतस्मिन्नंतरे सीता भूमिदत्त्यवरामने। संस्थिता चामरैर्दर्पदर्शनीभिः परिवीजिता ॥४७॥
सखीभिः सेविता रम्या श्वेताभांसोपवस्त्रगा। मुहुर् म्वं निरक्षन्ती मुखं चन्द्रनिभं वरम् ॥४८॥


हाथ, पसलियां और मुंड यः छः उन्नत दृश्यते हैं, नासिका, नख और कर्ण ये रक्त दाता हैं ॥३२॥ मस्तक, कमर और छाती ये तीन विस्तीर्ण हैं, जो सब ऐश्वर्य देने वाले हैं इसमें कोई सन्देह नहीं है। ३३॥ हाथकी एक रेखा ठीक तर्जनी पर्यन्त चला गया है कनिष्ठाङ्गुलीपर्यन्त । ३४ । कछुएकी पीठके समान कड़े-कड़े इसके हाथ राज्यप्राप्तिकी सूचना दे रहे हैं, इसके कपोल, वृत्ताकार, लाल, पतले, सुन्दर और बराबर एंडीवाले पैर भी इसके राज्यप्राप्तिकी सूचना दे रहे हैं ॥ ३५ ॥ इसके कंधे और सरल सुन्दर रेखाएं यह बतलाती हैं कि यह सदा सुखी रहेगा। इसका लिंग पतला और गोल है। इससे यह जाना जाता है कि यह बच्चा भविष्यमें राजाओंका भी राजा होगा। इसका नितम्ब तथा गुल्फ मजबूत है और नाभि गहरी तथा दक्षिणावर्त होकर लाल रङ्गुली है ये सब भी महान् ऐश्वर्यकी सूचना देते हैं। लक्षणशास्त्रमें कहा गया है कि मूत्रत्यागके समय जिसके लिंगसे मूत्रकी केवल एक धार दक्षिणावर्त हो और उसके वीर्यसे मछली तथा शहदके समान गन्ध निकले तो वह मनुष्य राजा होता है ॥ ३६-३९ ॥ इसके बड़े मोटे और चिकनी भुजाएं सुख भोगने लायक हैं। लम्बी और वामावर्त बाहुदण्ड पृथिवीका राज्य भुगताने वाले हैं ॥ ४० ॥ इसके हाथमें वज्र, चक्र, कमल, मत्स्य, धनुष तथा दण्ड आदिके आकारकी ऐसी रेखाएं दृष्टिगोचर होती हैं जिससे ज्ञात होता है कि यह देवताओंका भी राजा होगा ॥ ४१ ॥ इसके मुखमें बत्तीस लक्षण हैं। शंखके समान सुन्दर इसकी ग्रीवा है। ग्रीव पक्षी, क्रौञ्च, हंस तथा मेघके समान गम्भीर इसका स्वर है। इससे जान पड़ता है कि यह संसारके समस्त राजाओंसे बढ़कर होगा ॥ ४२ ॥ मधु (शहद) के समान पिंगल वर्ण इसकी आंखें हैं, इसके ललाटमें पांच रेखाएं हैं, सिंहके समान उदर है, इसके पैरोंकी रेखाएं ऊपरको गयी हैं, इसके श्वाससे कमलकी गन्ध आती है और सुन्दर-सी नासिका है इन सब लक्षणोंसे ज्ञात होता है कि यह असाधारण लक्षणसम्पन्न बालक है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ इस प्रकार कुशके लक्षणोंको बतलाकर वशिष्ठने बाकी लव आदि बालकोंके भी लक्षण बतलाये। तदनन्तर रामने अनेक प्रकारके वस्त्रों और आभूषणोंसे वसिष्ठकी पूजा की और उनकी आज्ञा लेकर रामचन्द्रजी अपने महलमें चले गये ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ वहां सीताजी पृथ्वीके दिये हुए सुन्दर सिंहासनपर बैठी थी। कितनी ही सखियां चंवर पंखे आदि झल रही थीं। बहुत सी सखियें तरह-तरहका सेवामें लगी थीं। उस समय सीताजी पीछे तकिया लगाकर बैठी हुई दर्पणमें अपना मुख देख रही थीं। सब उन्होंने सुना कि