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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ५ ] | सुन्दरकाण्डम् | ८३

सर्गः ५ ]सुन्दरकाण्डम्८३

सुतः कर्णोऽस्य लिंगे गोकर्णं तद्वदस्ति हि । ततः खिन्नमनाभूयो पातालं रावणो ययौ ॥५४॥
मयगेहे निरीक्ष्याय देवीं मन्दोदरीं वराम् । मयं संप्राथर्यामास ददौ तां रावणाय सः ॥५५॥
ततो विवाहं निर्वर्त्य पाणिग्रहं ददौ मयः । रावणाय दृढां शक्तिममोघां शत्रुघातिनीम् ॥५६॥
दृष्ट्वा मन्दोदरा मन्द्यः प्राह मन्दोदरीमिति । तां नाम्ना रावणस्तुष्टस्त्वया स्वीयस्थलययौ ॥५७॥
ततो मात्रा धिकृतः स पुनस्तपुं मथान्वितः । गोकर्णं रावणो गत्वा तप्स्या लब्ध्वा विधेर्वरान् ॥५८॥
त्रैलोक्यं स्ववशे कृत्वा लङ्कायां राज्यमाप सः, तस्मान्सीतासमानेयं दृष्टा मन्दोदरा प्रिये ॥५९॥
लंकायां वायुपुत्रेण रावणाग्रे विनिद्रिता । मयोऽप्यासीच्च लंकायां गृहं कृत्वा यथासुखम् ॥६०॥
मयश्चैवांगयो नाम महान् वीरः प्रतापवान् । रात्रौ विनिद्रितो गेहे ब्रह्मदत्तवरन्सुधीः ॥६१॥
दशास्यहस्तात्तन्मृत्युर्विनिर्णिक्तं विचित्य च । तस्य वस्त्रं मारुतिना हतं सद्मनि वै पुरा ॥६२॥
तन्क्षिप्तमूर्ध्वपर्यङ्के रावणस्य कपिस्तदा । विभीषणस्य पर्यङ्के वसनं रावणस्य च ॥६३॥
विचिन्वत्यथ जानकीं म लङ्काया च मुहुः कपिः । ययावशोकवनिकां वृक्षप्रासादपण्डिताम् ॥६४॥
ददर्श तत्र प्रांशुं च शिंशपानाम पादपम् । तन्मूले राक्षसीमद्ध्ये ददर्शाविदिकन्यकाम् ॥६५॥
एकवेणीं कृशां दीनां मलिनाम्बरधारिणीम् । भूमौ शयानां शोचन्तीं रामरामेति भाषिणीम् ॥६६॥
कृतार्थोऽहमिति प्राह दृष्ट्वा सीतां स मारुतिः । शिंशपानगशाखाग्रपल्लवाभ्यन्तरे स्थितः ॥६७॥
पुरा दृष्टानलंकारान् तस्य देहे ददर्श न । ततः किलकिलाशब्दैर्ययौ तत्र दशाननः ॥६८॥
ददर्श रावणः स्वप्ने कपिः कश्चित्समागतः । अशोकवनिकाया सा दृष्टा तेन विदेहजा ॥६९॥

५४॥ उसके शिश्नाकार जगह कानके छेदकी तरह गढ्ढा हो गया। उसका सिर भी कर्णशंकुकी तरह गोल हो गया। ५४। अतएव पृथ्याक कलंक स्वरूप यह लिंग गोकर्ण नामसे विख्यात हुआ। तब खिन्नमना होकर रावण सुतलपातालको चला गया ॥ ५४ ॥ मयके घरमें सुन्दरी मन्दोदरीको देखकर मयसे रावणने प्रार्थना की। तब मयने रावणको वह कन्या दे दी। ५५। इस प्रकार मयने कन्याका विवाह करके रावणको एकदम बहुत सा वस्त्र आभूषण आदि दिया और शत्रुघातिनी, अमोघ दृढ़ शक्ति भी दी ॥ ५६ ॥ उस दवाकी कृपा दृष्टि अर्थात् मुख्य देखकर रावणने उसका नाम मन्दोदरि रखा और उसके साथ सन्तुष्ट होकर रावण अपने स्थानको चला गया ॥५७। तहां माताके धिक्कारनेपर रावण फिर गोकर्णके पास जाकर तप करने लगा। असीम अपनी तपस्याके बलसे रावणने ब्रह्मासे वर प्राप्त करके तीनों लोक वशन कर लिया और लङ्कापर राज्य करने लगा, हे प्रिये पार्वती इसी कारण हनुमान्ने सीताके समान मन्दोदरीको रावणके आगे सुहाम सोई हुए देखा था । बादमें तो मय दानव भी लङ्कामें घर बनाकर सुखपूर्वक रहने लगा ॥५८-६०। प्रतापी मयके भाई मय रात्रिके समय अपने भवनमें सो रहा था । विचारशील हनुमान्ने इसके दस मुखके रावणके हाथसे मृत्यु जानकर विचारसे उसके सर्ववस्त्रोंके लेकर सम्मुखमें रावणके ऊपर और बादमें रावणके वस्त्र ले जाकर विभीषणके पलंगपर रख दिया ॥ ६१-६३ । पुन हनुमान् मुहुर्मुहु जानकीजीको खोजने लगे। खोजते-खोजते वृक्षों तथा पासादोंसे सुशोभित अशोकवनिकामें गये ॥ ६४ । वहां उन्हें एक उत्कृष्ट शिंशपा (प्रशाम) का वृक्ष दिखायी दिया। इसके नीचे राक्षसियोंके बीचमें अवनि-कन्या जानकी जीको विराजमान देखा। ६५। उस समय शुष्क तथा दीन मुख होकर मलीन वस्त्र धारण किये हुए भूमिपर सोयी हुई रोती दुःखित मनसे रामका नाम जप रही थीं । उनके सिरके बालोंमें तैल आदि पर जानेसे वेडुनि बंध गयी था ॥ ६६ । सीताके दर्शनसे अपनेको कृतार्थ समझते हुए हनुमान्‌जी उस शिंशपावृक्षकी एक शाखाके अग्रभागके पत्तोंमें छिपकर बैठ गये ॥ ६७॥ उस समय सीताके शरीरपर एक शृंगार नहीं दिखायी दिये, जिनको कि हनुमान्ने पहिले सुग्रीवके पास देखा था। इतनेमें कुछ कोलाहलके साथ रावण वहां जा पहुंचा। ६८ । क्योंकि रावणको स्वप्नमें दिखायी दिया कि कोई वानर आया है और उसने

८४आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

रामहस्तान्मृतः शीघ्रं लब्धुं तां घर्षयास्यहम् । कपिर्दृष्ट्वा राघवाय निवेदयतु मत्कृतम् ॥७०॥
आगमिष्यति उल्लङ्घ्या मणौ मां निहनिष्यति । इति निश्चित्य स ययौ सीते मवेष्टितो मुदा ॥७१॥
नूपुराणां ध्वनिं श्रुत्वा सिंहलाऽऽसीद्विदेवता । रावणो जानकीमाह मा दृप्त किं विलम्बसे । ७२।
रामं वनेचरं राज्यभ्रष्टं त्यक्तगृहं जनम् । पित्रा हनं भोगहीनं यदा स्वगृहनिर्गतम् ॥७३॥
एकान्तवासिनं दिग्वस्त्रवल्कलाधारिणम् । तं त्यक्त्वा मां भजस्वाद्य त्रैलोक्येशं महाबलम् ॥७४॥
अमरौघैः सेवितं मां भवन्तं पदस्थितम् । प्रियो मन्दोदरीमुख्यास्त्वां भजिष्यन्त्यहर्निशम् ॥७५॥
मया राज्यं स्वदधीनं कृतमपि भजस्व माम् । मया स्वजीवनं वापि त्वदधीनं कृतं महत् ॥७६॥
इति नानाविधैर्वाक्यैः प्राथयामास रावणः उवाचाधोमुखी सीता निधाय तृणमन्तरे । ७७॥
राघवाद्बिभ्यता नूनं भिक्षुरूपं धृतं त्वया । रहिते राघवाभ्यां त्वं शुनीव हविराध्वरे ॥७८॥
हृतवानसि मां नीच तत्फलं प्राप्स्यसेऽचिरात् । यदा रामशराग्रविदारितवपुर्भवान् ॥
भविष्यसि रणे रामं जानीषे मानुषं तदा । ७९ ।
श्रुत्वा रक्षोधिपः क्रुद्धो जानक्याः परुषाक्षरम् । वाक्यं क्रोधसमाविष्टः पुनर्वचनमब्रवीत् ॥८०॥
प्रविशो लङ्कायां त्रिदशवदनार्त्तिनिवारिणी गतोऽपि स्थाता न युधि पुरतो लक्ष्मणसहः ।
तथा यास्यन्पूर्वेष्विपदमसुनेशश्च झटिती जयः श्रीरामे स्यान्न मम बहुनाशीश्च तु भवेत् ॥८१॥
तद्रावणवचः श्रुत्वा जानकी प्राह तं पुनः । षष्ठाक्षरमपादेषु चतुर्णं चरणेष्वपि ॥८२॥
सप्तमञ्चापि चत्वारि लोप लोकामुमुं पठ । एवं तया जितो वाक्यवाग्बाणैः स दशाननः ॥८३ ।

मम अवलम्ब जानकर रावण निरन्तर मुझ से प्रेम करता ही रहता है ६९ । 'रामके हाथसे शीघ्र मरनेके लिए मैं चलकर सीताका तिरस्कार करूंगा तो मेरी दुर्दशा देखकर वह वानर रामसे कहेगा ॥ ७० ॥ सो सुनकर राम यहाँ आवेंगे और मुझे मारेंगे' ऐसा विचार करके उस त्रिकूटकी शाखा लेकर सानन्द ऊपर चल पडा ॥ ७१ ॥
नूपुरोंकी ध्वनिश्रवण कर सीताजी घबडा गयीं और उन्होंने मुख बन्द कर लिया । तब रावणने सीतासे कहा- तू मुझसे लजाती क्यों है? ॥ ७२ । वनमें भ्रमण करनेवाले, राजपद सुखजनतासे रहित, पितृहीन, मात-हीन, सदा घर निष्कासित ॥ ७३ । एकान्तवासी दिगम्बर भोग बन्कल भण्डपण्डित वृत्तक (छिन्नवेषधारी) धारण करनेवाले रामको छोडकर तू त्रिजगत्पति और महाबलवान् मुझ रावणका आश्रय ले और मुझे सेवा कर ॥ ७४ ॥ मैं अमरगणोंसे सेवित और आद्यन्तहीन होकर महान् पदपर स्थित हूँ । मेरी सेवा करनेतु मेरी मन्दोदरी आदि स्त्रिये भी रात दिन तेरी दासी बनकर रहेंगी ॥ ७५ ॥ मैने अपना राज्य तथा अपना जीवन तुझको दे दिया है । तू मेरी बनकर रहे ॥ ७६ ॥ इस तरह अनेक प्रकारके वाक्यद्वारा रावण प्रार्थना करने लगा ।
तब नीचमें तिनकेका त्राट करके तथा नीच मुख किये हुए सीताने कहा-॥ ७७ ॥ अरे पापी ! बडा ढोंग हाँकता है । रामके डरसे तू भिक्षुका रूप धारण करके और श्रीरामलक्ष्मणका अनुपस्थितिम यज्ञमें जैसे कुत्ता हवि अर्थात् हव्यनया सामग्री चुराकर आदि लेकर भागे, उस प्रकार तू मुझे लेकर भग आया है। अरे नीच ! उसका फल तुझको शीघ्र मिल जायगा । जब रामके बाणसे विदारितशरीर होकर तू गिरेगा तब तुझे यह पता लग जायगा कि राम मनुष्य है या और कोई यह सुनकर राक्षसाधिप रावण कुपित होकर जानकीको कठोर वचन कहता हुआ बोला ॥ ७८-८० ॥ 'इस लङ्कामें आकर स्वर्गओकके र्भ, सुख शान्ति हो जायँगे । लक्ष्मणसहित वह राम भी मत समक्ष युद्धमें नहीं खडे रह सकेगा । यहाँ आगतो प्रधुओके सहित बहुत बडी भारी विपत्तिमे पड जागा । यहाँ उस जटाधारी रामकी जीत नही होगी और मुझे भी आनन्द न प्राप्त होगा' ॥ ८१ ॥ रावण-की इस बातको सुनकर जानकीने कहा-चारो चरणोम छठे अक्षर तथा आनेवाले चारो सप्तम अक्षरोका लोप करके तुम इसी श्लोकको फिरसे पढो । वही हल तुम लागोका होगा । कहनेका आशय यह है कि ८१वें श्लोकमेंसे चारो चरणोके प्र वि और न ये चार अक्षर निकल जानेसे यह अर्थ होगा कि लङ्कामे दशवदन रावणके ऊपर शीघ्र ही विपत्ति आ येगी अर्थात् वह झूर जायगा । लक्ष्मणके साथ राम युद्धमें मा हटेंगे ।

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ८५


त्रपाथ भीषयन्तीनां बहुशुश्राव संमदः । धृत्वा करेण तत्पाणिं मन्दोदर्या निषेधितः ॥८४॥
नादृष्टाः सन्ति बहवस्त्यजैनं कृपणां कृशाम् । ततोऽब्रवीद्दशग्रीवो राक्षसीर्विकृताननाः ॥८५॥
यथा मे वशगा सीता भविष्यति सकामना । तथा यतध्वं त्वरितं तर्जनादरणादिभिः ॥८६॥
यदि मासद्वयादूर्ध्वं मच्छय्यां नाभिनन्दति । तदा मे प्रातराशाय हत्वा कुरुत मानुषीम् ॥८७॥
तदा सीता पुनः प्राह वचनं तं दशाननम् । बाल्येन्वहेह समानीता पेटिकास्था त्वया पुरा ॥८८॥
तदा मया यत् प्रोक्तं तच्च किं विस्मृतोऽसि हि । अधुनाऽहं गमिष्यामि यास्यामि त्वरितं पुनः ॥८९॥
त्वं च पुत्रांश्च बांधवांश्च निहन्तुं च मयैषिणीम् । तन्मयाद्य वचनं सत्यं कर्तुमत्रागताऽस्म्यहम् ॥९०॥
मां बन्धून् सम्पर्यावर्त्यहरामि रामहस्ततः । ततोऽयोध्यापुरीं गत्वा पुनर्यास्यामि त्वत्पुरीम् ॥९१॥
तच्छ्रुत्वा शङ्कुकं न मातामहगृहे स्थितम् । शतशीर्षं रावणं च द्वीपांतरनिवासिनम् ॥९२॥
तत्साहाय्ये पोतुकैस्तल्लयामागतं पुनः । अहं तृतीयवेलायां सर्वाभ्यां सह वातुधा ॥९३॥
ततः स्वीयस्थलं गत्वा पुनश्च स्थाप्यहं जनान् । कुम्भकर्णोद्भवं वीरं मूलकासुरनामकम् ॥९४॥
अथवा तुर्यवेलायामागच्छ पूर्वकेण हि । अहमेव हनिष्यामि शितबाणं रणांगणे ॥९५॥
अन्यच्चापि स्मरस्य त्वं पुरा बाह्वर्जुनादितम् । यत्प्रियाञ्च त्वया गत्वा कौसल्यानृपतेः पुरा ॥९६॥
पेटिकास्थौ पुनश्च्यक्ता नाज्ञत्वे दैवयोगतः । अनन्यत्र मतुकामोऽसि यतोऽहमाहृता त्वया ॥९७॥
गच्छ गेहे सुखं भुङ्क्ष्व रामः शीघ्रं हनिष्यति । इति सीतावाक्यवाणाभिन्नममंस्थलोऽपि सः ॥९८॥
यया तूष्णीं निजं गेहं लज्जानध्र दशाननः । एवं दशानने याते राक्षस्यो रावणाज्ञया ॥९९॥
जानकीं ताः स्वशब्दैश्च तथा क्रूरोक्तिभिर्मुहुः । आख्यादीर्घप्रमुखाद्यैर्भीषयन्त्यः करालाभिः ॥१००॥


अनुज सहित राम को पराभव प्राप्त होगा और उस समय मेरी विजय होगी, तब मुझे बड़ा हर्ष होगा। इस प्रकार वार्तालाप समाप्त करके मौन हो दशानन ने जान लिया ॥८३।८४॥ तब रावण तलवार उठाकर सीता को मारने के लिए उद्यत हुआ। उस समय मन्दोदरी ने उसका हाथ पकड़कर रोका और कहा कि तुम्हारे बहुत सी स्त्रियां हैं, इस कृपण कमजोर तथा दीन व मानुषी नारीको छोड़ दो। तब रावणने उन मुखवाली राक्षसियोंसे कहा कि जिस तरह से यह सीता मेरे वशमें हो, वैसा तुमलोग उपाय करो और इसे समझाकर मेरे अनुकूल कराओ ॥८५।८६॥ यदि दो महीनेके भीतर यह मेरे शय्यापर न आय तो इसे प्रातःकालके भोजनके लिए तैयार करना, तब मैं इसे खा जाऊंगा ॥८७॥ सीता फिर दशमुख राक्षससे कहने लगी- जब तू बाल्यावस्थामें मुझे पेटारीसहित यहाँ ले आया था ॥८८॥ उस समय जो बात मैंने कही थी, क्या उसे भूल गये? मैंने कहा था कि अभी मैं जाती हूँ परन्तु फिर यहाँ तुरन्त ही आऊंगी ॥८९॥ और वह इसलिए कि मैं भाई, पुत्र तथा सेना सहित तुझ मार डालूंगी। अब मैं अपना वचन सत्य करने आई हूँ ॥९०॥ रामके हाथों तुझको और तेरे बन्धुओं तथा सेनाको मरवा-कर अयोध्यापुरी जाऊंगी, फिर मैं तीसरी बार भी तेरी नगरीमें आऊँगी ॥९१॥ उस समय मातामह के कुलमें या घरमें स्थित निकुम्भक पुत्र पोलस्कथा तथा द्वीपायतनमें रहनेवाले सो शिरवाले रावणको कि जिसकी सहायताके लिए घूम आया, तीसरी बार आकर उन दोनोंको मारूँगा ॥९२।९३॥ पश्चात् अपने स्थानको जाकर फिर चौथी बार में फिर आऊँगी और कुम्भकर्णके पुत्र वीर मूलकासुरका वध करूँगी ॥९४॥ अथवा विश्रामसे यहाँ आकर मैं इसे रणांगणमें मारूँगी ॥९५॥ पूर्वकालमें महाबाहुर्जुनने कहा था, यह भी स्मरण कर ले। जिसके कहनेसे तूने कौशल्या और राजा दशरथका हरण किया था ॥९६॥ दैवयोगसे फिर तूने उन्हें अयोध्यामें छुड़वा दिया था। इससे पता लगता है कि तू मरना चाहता है। इसीलिए तूने मुझसे प्रेम करना चाहा है। ९७॥ अब घर जा और सुखमं भोजन कर। राम तुझे शीघ्र मारेंगे। इस प्रकार सीताके वाक्यरूपी बाणसे विद्धहृदय होकर दशानन लज्जासे चुपचाप अपने घर चला गया । दशाननके चले जानेपर उसकी आज्ञासे राक्षस्योंने अपने भयानक शब्दोंसे, क्रूर वाक्योंस, मुँह फाड़कर, बलकार तथा

८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

निवार्य त्रिजटानाम्नी विभीषणप्रियाऽनुगा। ताः सर्वा राक्षसीर्वग्दाद्वापयन्नाह सादरम् ॥१०१॥
न भीषयध्वं रुदतीं नमस्कुरुत जानकीम् सुचिह्नं राघवः स्वप्ने मया दृष्टोऽद्य जानकीम् ॥१०२॥
मोचयामास दृष्ट्वेमां लङ्कां हन्त्वा तु रावणम्। रावणो गोमयह्रदे तैलाभ्यक्तो दिगम्बरः ॥१०३॥
मयाऽद्य दृष्टः स्वप्ने हि तस्मादेनां न साहसम् कार्यं सेव्या सदा चेयं रामादभयदायिनी ॥१०४॥
युष्माभद्दुःखिता नेष्टा भयंयं चानायिष्यति। इति तत्रिजटावाक्यं श्रुत्वा तस्थुर्भयाकुलाः ॥१०५॥
तूष्णीमेव तदा माना दुःखान्किमिदुदाथ मा। इदानीमेव मरणं केनोपायेन मे भवेत् ॥१०६॥
दीर्घा वेणी ममान्यर्थमुद्बन्धाय भविष्यति। यन्मयाऽशौर्यवाक्यैर्लक्ष्मणस्ताडितः पुरा ॥१०७॥
तस्मादिनाः पीडयति भोक्ष्यते स्वकृतं मया। मया विनागः सौमित्रिर्नासितो गौतमीऽटे ॥१०८॥
प्रायश्चित्तं करिष्येऽद्य सस्य त्यक्त्वाज्यजीवितम्। एवं निश्चितबुद्धिं तां मग्नायाय जानकीम् ॥१०९॥
दृष्ट्वा मुनेर्वायुपुत्रो रामवृत्तं न्यवेदयत्। आभ्राकर्णानिगेमाच्च स्वसीतादर्शनावधि ॥११०॥
मविस्तारं क्रमेणैव सीतातोषाथमादरात्। सीता क्रमेण तन्मर्वं श्रुत्वा साश्चर्यमानसा ॥१११॥
कि मयेदं श्रुतं स्वप्मिन् व्यमो दृष्टोऽथवा निधि। येन मे कर्णपीयूषवचनं समुदीरितम् ॥११२॥
स दृश्यता महाभागः प्रियवादी ममाग्रतः। तच्छ्रुत्वा मन्पुत्रे गन्त्वा नत्वा नामनवीत्पुनः ॥११३॥
रामदूतो ददौ तस्यै राघवस्यांगुलायकम्। तां राममुद्रिकां दृष्ट्वा नत्वा नामब्रवीत्कपिम् ॥११४॥
सर्वं कथय तद्वृत्तं यथा दृष्टं त्वयाऽत्र हि। तदा तां सांस्वयामास रामो मन्स्कन्धसंस्थितः ॥११५॥
वानरैश्च समागत्य हन्त्वा रावणमाहवे। त्वां नेष्यति नय सानेत्यब्रवं दम वाक्पतः ॥११६॥

अंगुलियोंके संकेतसे सीताको डराने लगीं । ९८-१०० । उसी समय विभीषणकी प्रिया अनुगामना त्रिजटा राक्षसोंने उन सबको ऐसा करनेसे रोका और उन सबको समझाकर कहा कि इस रोती हुई जानकीजीको तुम लोग डराओ नहीं प्रत्युत नमस्कार करो । मैंने आज स्वप्नमें रामको सुन्दर चिह्नोंसे युक्त देखा है और यह भी देखा है कि उन्होंने जानकीको छुड़ाकर लङ्काको जलाया तथा रावणको मार डाला है। तेल लगाये हुए रावण गोबरके गड्ढेमें गिर गया है ॥ १०१-१०३ ॥ मैंने आज यह स्वप्न देखा है। इस कारण इन्हे सतानेका साहस नहीं करना चाहिए । रामसे अभय दिलानेवाली इस जानकीकी तुम्हें सेवा करना चाहिए । १०४ ॥ यदि तुम लोग इसे दुःख दोगी तो वह अप्रसन्न पान रामके द्वारा तुम्हें भयको प्राप्त होगी । त्रिजटाके इस वाक्यको सुनकर सब राक्षसियाँ व्याकुल होकर चुप हो गयीं । १०५ ॥ उन सबके चले जानेपर दुःखित होकर सीता धीरे-धीरे कहने लगीं कि इसी समय मेरा मरण किस उपायसे हो सकता है । १०६ ॥ हाँ, यह मेरे सिरकी दीर्घवेणी इसको दृढ़ फांसी लगानेके लिए बहुत अच्छा तरह काम आवगी । उस समय जो मैंने बचनरूपी बाणों-से लक्ष्मणको बींधा था । १०७ ॥ उसीके फलस्वरूप आज ईश्वर मुझे रुला रहा है। वह मैं अपने किये हुए कर्मोंका फल पा रही हूँ। मैंने गौतमी तटपर बिनाही अपराधके निर्दोष मुद्ध लक्ष्मणजी को धमकाया था ॥१०८॥ उसका मैं आज प्राण देकर प्रायश्चित्त करूंगी। इस प्रकार मरनेका निश्चय कियेहुए जानकीको देखकर वायुपुत्र हनुमान्ने धीरे-धीरे रामका वृत्तान्त सुनाना प्रारम्भ किया । उन्होंने रामके अयोध्यासे वनमें आगमनसे लेकर सीताको देखने तकका सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक क्रमसे ही सीताके सन्तोषके लिए सुना दिया। वह सब वृत्तान्त सुनकर सीता आश्चर्यचकित होकर सोचने लगीं कि क्या यह मैं कोई स्वप्न अथवा भ्रम देख रही हूँ अथवा रात्रिके समयका स्वप्न देख रही हूँ। जिसने मेरे कानोंके लिए अमृतके समान यह वचन सुनाया है । १०९-११२ ॥ वह प्रियवादी मेरे सामने आकर दर्शन दे । यह सुनते ही हनुमान् उनके सामने प्रकट हो गये और नमस्कार करके उन्हें रामका वृत्तान्त पुनः सुनाया । ११३ ॥ फिर विश्वास दिलानेके लिए रामकी अंगूठी निकाल-कर सीताको दी । रामकी मुद्रिकाको देख तथा नमस्कार करके सीता बोलीं ॥ ११४ ॥ हे कपि ! जैसा कि तुमने देखा है, सो सब हाल जाकर रामसे कह देना। तब हनुमान् सीताको आश्वासन देकर कहने लगे कि राम मेरे कन्धेपर सवार हो वानरसेनापतियोंके साथ यहाँ आकर युद्धमें रावणको मारेंगे और आपको