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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८३

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८३

श्रीरामचन्द्र उवाच
द्विजहत्यामहंमस्य प्रायश्चित्तं वदामि ते ॥ २२ ॥
जप नामसहस्रं मे हत्याकोटिविनाशनम् । इति गुह्यं ददौ रामस्तत्त्वं नामसहस्रकम् ॥२३॥
तस्य त्वग्रहणादेव निष्पापोऽहं तदाभवम् । सदारभ्यास्मि देवानां पूज्योऽहं मुनिसत्तम ॥२४॥
त्वमप्येतदधीयानो राघवस्य महात्मना । नाम्नां सहस्रं लोकेषु प्रख्यापय महामते ॥२५॥

सनत्कुमार उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि गणाधिप । त्वत्प्रसादान्मयाऽधीतं रामनामसहस्रकम् ॥२६॥

श्रीमहादेव उवाच
इति विज्ञाप्य देवेशं परिक्रम्य प्रणम्य च । तदादि सततं जपन्वा स्तोत्रमेतद्वरानने ॥२७॥
अवाप परमां सिद्धिं पुण्यपापविवर्जितः ।

श्रीपार्वत्युवाच
श्रोतुमिच्छामि देवेश तदहं सर्वकामदम् ॥ २८ ॥
नाम्नां सहस्रं तां ब्रूहि यद्यस्ति मयि ते दया ।

श्रीमहादेव उवाच
अद्य वक्ष्यामि भो देवि रामनामसहस्रकम् । शृणुष्वैकमनाः स्तोत्रं गुह्याद्गुह्यतरं महत् ॥२९॥
ऋषिर्विनायकश्चास्य अनुष्टुप्छन्द उच्यते । परब्रह्मात्मको रामो देवता शुभदर्शने ॥३०॥

ॐअस्य श्रीरामसहस्रनाममालामंत्रस्य विनायक ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीरामो देवता महाविष्णुरिति बीजं गुणभृन्निर्गुणो महानिति शक्ति सच्चिदानन्दविग्रह इति कीलकं श्रीराम-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः

ॐश्रीरामचन्द्राय अंगुष्ठाभ्यां नमः । सीतापतये तर्जनीभ्यां नमः । रघुनाथाय मध्यमाभ्यां नमः । भरताग्रजाय अनामिकाभ्यां नमः । दशरथात्मजाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । हनुमत्प्रभवे करतलकर-पृष्ठाभ्यां नमः । श्रीरामचन्द्राय हृदयाय नमः सीतापतये शिरसे स्वाहा रघुनाथाय शिखायै वषट् । भरताग्रजाय कवचाय हुम् । दशरथात्मजाय नेत्रत्रयाय वौषट् । हनुमत्प्रभवे अस्त्राय फट् ।

स्तुति की और उनके चरणोमे लाट गया । फिर रामचन्द्रजी कहने लगे तुजारो द्विजहत्याके पापसे उद्धार पानेका उपाय मै तुम्हें बतलाता हूँ ॥ २२ ॥ मेरे रामसहस्रनाम का जप करो वह सहस्रों हत्याओंका नाशभी नष्ट कर देता है । ऐसा कहकर रामचन्द्रजीने अपना गुप्त सहस्रनाम मुझे बताया और उसके ग्रहणमात्रसे मेरे पाप नष्ट हो गये । तभीसे हे मुनिसत्तम ! मै देवताओंका भी पूज्य हो गया हूँ ॥ २३ ॥ २४ ॥ तुम भी इसी रामसहस्रनामका पाठ करते हुए संसारमे इसका प्रचार करो । सनत्कुमारने कहा-मैं धन्य हूँ । मुझपर आपकी बड़ी कृपा है । आपकीही दयासे मैने रामसहस्रनाम पा लिया । मै कृतार्थ हो गया । श्रीशिवजीने कहा-इस तरह उस सहस्र-नामको जानकर सनत्कुमारने गणेशजीकी परिक्रमा की, प्रणाम किया और तभीसे नित्य इसका जप करके पुण्य-पापसे विवर्जित होकर वे परम सिद्धिको प्राप्त हुए । पार्वतीजी बोलीं-हे देवेश ! सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाले रामसहस्रनामको मैं भी जानना चाहती हूँ । यदि आपकी मुझपर दया रहती हो तो मुझे बताइए । शिवजी कहने लगे-हे देवि ! मै तुम्हें वह पुनीत सहस्रनाम बतलाता हूँ । तुम भी सावधान मन होकर उस गुह्यातिगुह्य स्तोत्रको सुनो ॥ २५-२९ ॥ इस रामसहस्रनाम मंत्रमय स्तोत्रके ऋषि विनायक हैं और साक्षात् परब्रह्म राम इसके देवता हैं ॥ ३० । 'ॐ अस्य श्रीराम' इस मंत्रसे विनियोग करके 'श्रीरामचन्द्राय' कहकर अंगुष्ठ, 'सीता-पतये' कहकर तर्जनी, 'रघुनाथाय' कहकर मध्यकी अंगुली, 'भरताग्रजाय' कहकर अनामिका, 'दशरथात्मजाय' कहकर कनिष्ठिका, 'हनुमत्प्रभवे' कहकर दोनों करपृष्ठोंका न्यास करे । फिर 'रामचन्द्राय' कहकर हृदय, 'सीतापतये' कहकर शिर, 'रघुनाथाय' कहकर शिखा, 'भरताग्रजाय' से दोनों बाहुमूल, 'दशरथात्मजाय'

३८२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

अथ ध्यानम्

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलस्पर्धि नेत्रं प्रसन्नम् ।
रामांकास्तूर्णताक्षमुखकमलमलम्प्रेक्ष्यनेत्रं नीलाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥३१॥

वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे
मध्ये पुष्पकमासने मणिमये वीरासने संस्थितम् ।
अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं
व्याख्यातं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजेच्छ्याम लम् ॥३२॥

सौवर्णेमण्डपे दिव्ये पुष्पके सुविराजिते । मूले कल्पतरोः स्वर्णपीठे सिंहासनेयुते ॥३३॥
मृदुल्लक्ष्णीतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम् । रामं नीलोत्पलश्यामं द्विभुजं पीतवाससम् ॥३४॥
स्मितवक्त्रं सुखासीनं पद्मपत्रनिभेक्षणम् । किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ॥३५॥
आभ्रमानं ज्ञानमुद्राधरं वीरासनन्दितम् । स्पृशन्तं स्तनयोश्च जानक्याः सव्यपाणिना ॥३६॥
वसिष्ठवामदेवाद्यैः सेवितं लक्ष्मणादिभिः । अयोध्यानागरो रम्ये अभिषिक्तं रघूद्वहम् ॥३७॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं रामनामसहस्रकम् । हत्याकोटियुतो वापि मुच्यते नात्र संशयः ॥३८॥
ॐरामः श्रीमान्महाविष्णुर्जिष्णुर्देवहितावहः । तत्त्वं चा तारक ब्रह्म शाश्वतः सर्वसिद्धिदः ॥३९॥
राजीवलोचनः श्रीमांल्लक्ष्मण्यो रघुपूंगवः । रामभद्रः सदाचारो राजेन्द्रो जानकीपतिः ॥४०॥
अग्रगण्यो वरेण्यश्च वरदः परमेश्वरः । जनार्दनो जितमित्रः परार्थैकप्रयोजनः ॥४१॥


से दोनों नेत्र छुए तथा 'हुंफट्स्वाहे' कहकर चुटकी बजाये । अथ ध्यानम् जिनका आजानु बाहु है, जो धनुष-बाण धारण किये हैं, पद्मासन मारकर बैठे हैं, पीत वस्त्र पहने हैं, नवीन कमलदलसे होड़ करनेवाले जिनकी दोनों आँखें हैं, जिनके वामभाग सीताजी बैठी हैं सीता तथा राम दोनों आपसमें एक दूसरेके मुखकी शोभा देखनेमें संलग्न हैं, नवीन मेघके सदृश जिनका रूप है, विविध प्रकारके अलङ्कारोंसे अलंकृत तथा लम्बो लम्बी जटा धारण करनेवाले रामचन्द्रका ध्यान करे ॥३१॥ कल्पवृक्षके नीचे सुवर्णके मध्य एक सुन्दर सुवर्णके मण्डपमें पूर्वनिर्मित महासन, जिसमें अनेक प्रकारकी मणियां जड़ी हैं, उसपर श्रीराम वीरासनसे बैठे हुए हैं। उनके सामने बैठे हनुमान्‌जी मुनियोंको परम सम्बन्ध व्याख्यान कर रहे हैं। भरतादि तीनों भ्राता जिनकी बगल-बगल खड़े हैं। ऐसे श्यामस्वरूप रामका भजन करे ॥३२॥ सुवर्णनिर्मित दिव्य पुष्पक विमान कल्पतरुके नीचे रक्खा है। जिसमे आठ सिंह लगे हैं। जो कोमल और चिकने हैं, ऐसी गद्दीपर सीताके साथ बैठे हुए हैं नीलोत्पल सरीखे जिनके नेत्र हैं दो भुजाएं हैं, पीत वस्त्र है, मुसकुराता हुआ मुख है और वे आनन्दसे बैठे हैं। किरीट, हार, केयूर कुण्डल और कटकादिसे सुशोभित हो रहे हैं। वे एक ओर ज्ञानमुद्रा धारण किये हैं। दूसरी तरफ बायें हाथसे सीताके स्तनोंको छूते हैं। ॥३३-३६॥ वसिष्ठ, वामदेव तथा लक्ष्मणादिक जिनकी सेवामें तत्पर हैं। अयोध्या नगरीमें जिनका राज्यभिषेक हो चुका है। ऐसे रघूद्वह रामचन्द्रजीका ध्यान करके सर्वदा इस रामसहस्रनामका पाठ करना चाहिए। ऐसा करनेसे यदि किसीको करोड़ों हत्यायें भी लगी हैं तो दूर हो जाती हैं इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं करना चाहिए। ॥३७-३८॥ ॥३८॥ अब सहस्रनाम कहते हैं - राम, श्रीमान्, महाविष्णु, जिष्णु (सबको जीतनेवाले), देवहितावह (देवताओंका कल्याण करनेवाले), तत्त्वात्मकस्वरूप तारकब्रह्म, शाश्वत, सर्वसिद्धिद (सब प्रकारकी सिद्धियो-को देनेवाले) ॥३९॥ कमल सरीखे नेत्रवाले, श्रीमान्, रघुपूंगव, धनु, रामभद्र, सदाचार, (पुनीत आचारवाले) राजेन्द्र, जानकीके पति ॥४०॥ सबमें अग्रेसर, वरेण्य (सर्वश्रेष्ठ), वरद (वरदायक)