सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८५

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८५


विश्वामित्रप्रियो दाता शत्रुजिच्छत्रुतापनः । सर्वज्ञः सर्ववेदादिः शरण्यो बलिमर्दनः ॥४२॥
ज्ञानमयोऽपरिच्छेद्यो वाग्मी सत्यव्रतः शुचिः । ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञः शरधन्वी प्रतापवान् ॥४३॥
द्युतिमानात्मवान् वीरो जितक्रोधोऽरिमर्दनः । विश्वरूपो विशालाक्षः प्रभुः परिदृढो दृढः ॥४४॥
ईशः खड्गधरः श्रीमान् कौसल्येयोऽनसूयकः । विपुलांसो महोरस्कः परमेष्ठी परायणः ॥४५॥
सत्यव्रतः सत्यसंधो गुरुः परमधार्मिकः । लोकज्ञो लोकवत्त्वा लोकात्मा लोककृद्विभुः ॥४६॥
अनादिर्भगवान् सेव्यो जितमायो रघूद्वहः । रामो दयाकरो दक्षः सर्वज्ञः सर्वपावनः ॥४७॥
ब्रह्मण्यो नीतिमान् गोप्ता सर्वदेवमयो हरिः । सुन्दरः पीतवासाश्च सूत्रकारः पुरातनः ॥४८॥
सौम्यो महर्षिः कोदण्डः सर्वज्ञः सर्वकोविदः । कविः सुग्रीववरदः सर्वपुण्याधिकप्रदः ॥४९॥
भव्यो जिताग्निरिष्वर्गो महोदारोऽघनाशनः । सुकीर्तिरादिपुरुषः कान्तः पुण्यकृतोत्तमः ॥५०॥
अकल्मषश्चतुर्बाहुः सर्वावासो दुरासदः १०० स्मितभाषी निवृत्तात्मा स्मृतिमान् वीर्यवान् प्रभुः ॥५१॥
धीरो दान्तो घनश्यामः सर्वायुधविशारदः । अध्यात्मशामानिलयः सुमना लक्ष्मणाग्रजः ॥५२॥
सर्वतीर्थमयः शूरः सर्वयज्ञफलप्रदः । यज्ञस्वरूपो यज्ञेशो जरामरणवर्जितः ॥५३॥


परमेश्वर, जनार्दन जितमित्र (शत्रुओं को पराजित करनेवाले), परार्थकप्रयातन (परोपकार करना ही जिनका एकमात्र प्रयोजन है)। विश्वामित्रप्रिय दाता शत्रुजिच्छत्रुतापन (शत्रुओं को सतानेवाले), सर्वज्ञ, सर्ववेदादि समस्त वेदोंके आदिकारण। शरण्य, बलिमर्दन बलिको परास्त करनेवाले, ज्ञानमय, परिच्छेद्य वाग्मी (कुशल वक्ता) सत्यव्रत, शुचि, पवित्र, ज्ञानगम्य (ज्ञानद्वारा जानने योग्य), दृढप्रज्ञ (स्थिर बुद्धिकाले), शरधन्वी, प्रतापवान्, आत्मवान् वीर, जितक्रोध (जिन्होंने क्रोधको जीत लिया है), अरिमर्दन (शत्रुओंको नीचा दिखानेवाले) विश्वरूप (संसार ही जिनका स्वरूप है), विशालाक्ष (बड़ी बड़ी आंखवाले), प्रभु समस्त जगत्के ईश्वर) परिदृढ (सतर्क)। ४१-४४ ॥ ईश (सब संसारके स्वामी), खड्गधर (तलवार धारण करनेवाले), श्रीमान् कौसल्येय (कौशल्याके पुत्र), अनसूयक (किसीसे ईर्ष्या न करनेवाले), विपुलांस (जिनके स्कंध चौड़े हैं) महोरस्क (जिनकी विशाल छाती है), परमेष्ठी (जो ब्रह्मस्वरूप हैं), सत्यव्रतपरायण (सत्यवादी), सत्यसंध (सत्यप्रतिज्ञ), गुरु (सबके पूज्य), परम धार्मिक, लोकज्ञ (सब लोकोंके ज्ञाता), लोकवत्ता (सब लोकोंमें वसनेवाले, लोकात्मा (सब लोकोंके आत्मा), लोककृत (लोकोंके रचयिता, विभु (सर्वव्यापी)। ४५ । ४६ । अनादि (जिनका आदि नहीं है), भगवान् (सर्वसम्पत्तिशाली), सेव्य (सेवा योग्य), जितमाय (मायाका जीतनेवाले), रघूद्वह (रघुवंशके उजागरकर्ता), राम दयाकर, दयाके खानिस्वरूप, दक्ष (सब कार्योंमे निपुण), सर्वज्ञ, सर्वपावन (सबको पुनीत करनेवाले), ब्रह्मण्य (ब्राह्मणभक्त) नीतिमान् गोप्ता (सबका रक्षक), सर्वदेवमय, हरि, सुन्दर, पीतवासा (पीले वस्त्र धारण करनेवाले), पुरातन सूत्रकार (सर्वप्राचीन सूत्रकार अर्थात् सूत्ररूपमें ग्रंथोंके रचयिता), पुरातन (सबमे प्राचीन) ॥ ४७ । ४८ । सौम्य (जिनका सरल स्वभाव है), महर्षि, कोदण्ड (धनुर्धर), सर्वज्ञ, सर्वकोविद (सब विषयोंमें पूर्ण पण्डित, कवि, सुग्रीववरद (सुग्रीवको अभयवर देनेवाले), सर्वपुण्याधिकप्रद (सब पुण्योंसे भी अधिक फल देनेवाले) ॥ ४९, भव्य जिताग्निरिष्वर्गो (जिन्होंने अपने बलसे शत्रुके संघ-उत्साहादि छः वर्गोंको जीत लिया है), महोदार (जो सबसे उदार हैं), अघनाशन (पापका नाश करनेवाले, सुकीर्ति (जिनकी सुन्दर कीर्ति है), आदिपुरुष (जो सबके आदि पुरुष हैं), कान्त (सर्वप्रिय), पुण्यकृतोत्तम (पवित्रविचारसम्पन्न) अकल्मष (पापरहित) चतुर्बाहु (चतुर्भुज), सर्वावास (सबके निवासस्थान, दुरासद (बड़ी कठिनाईसे प्राप्त १०० स्मितभाषी (मुसकुराते हुए बातें करनेवाले), निवृत्तात्मा, जिनकी आत्मा स्वतन्त्र है, वा स्मृतिमान, वीर्यवान् और सबके प्रभु हैं। धीर, दान्त (उदारप्रकृति), घनश्याम (मेघकी नई श्यामस्वरूप), सर्वायुधविशारद (सब शस्त्रास्त्रोंमे निपुण, अध्यात्मशामनिलय (अध्यात्मशास्त्रोंके निवास), सुमना (सुन्दर चित्तवाले), लक्ष्मणाग्रज (लक्ष्मणके बड़े भ्राता), ॥ ५०-५२ ॥ तीर्थमय, शूर (महासाहस योद्धा), सर्वयज्ञफलप्रद (सब यज्ञोंके फलदाता) यज्ञस्वरूप

३८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः । शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता परमात्मा परात्परः ॥ ५५ ॥
प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः पूर्णः परपुरंजयः । अनन्तरूपिरानन्दी धनुर्वेदी धनुर्धरः ॥ ५६ ॥
गुणकरो गुणश्रेष्ठः सच्चिदानन्दविग्रहः । आप्तवाद्यो महाकायो विश्वकर्मा विशारदः ५७॥
विनीतात्मा वीतरागस्तपस्वीशो जनेश्वरः । कल्याणः प्रकृतिः कल्पः सर्वज्ञः सर्वकामदः । ५७.।
अक्षयः पुरुषः साक्षी केशवः पुरुषोत्तमः । लोकाध्यक्षो महाकार्यो विभीषणवरप्रदः ॥ ५८ ।
आनन्दविग्रहो ज्योतिर्हनुमत्प्रभुरव्ययः, भ्राजिष्णुः महनो भोक्ता मन्त्रवादी बहुश्रुतः । ५९ ।
सुप्रदः कारणं कर्ता भवबन्धनविमोचनः । देवचूड़ामणिर्नेता ब्राह्मण्यो ब्रह्मवर्धनः । ६० ॥
संसारतारको रामः सर्वदुःखविमोक्षकत् । विद्वत्तमो विश्वकर्ता विश्वकृद्विश्वकर्म च ॥ ६१ :
नित्यो नियतकल्याणः सर्वोपद्रवनाशकत् । काकुत्स्थः पुण्डरीकाक्षो विश्वामित्रभयापहः । ६२ ।
मारीचमथनो रामो विराधवधपण्डितः । दुःस्वप्ननाशनो रम्य किरीटी त्रिदशाधिपः ॥ ६३ ॥
महाधनुर्महाकायो भीमो भीमपराक्रमः । तत्त्वस्वरूपस्तत्त्वज्ञस्तत्त्ववादी सुविक्रमः । ६४
भूतात्मा भूतकृत्स्वामी कालज्ञानी महाप्रभुः । अनिर्विष्णो गुणग्रामो निष्कलङ्कः कलङ्कहा । ६५ ।
स्वभावभद्रः शत्रुघ्नः केशवः स्थाणुरीश्वरः । भूतादिः शंभुरादित्यः सर्वविद्ः शाश्वतो ध्रुवः । ६६ ।
कवची कुण्डली चक्री खड्गी भक्तजनप्रियः । अमर्त्युर्धर्म्मगदितः सर्वजिन्मर्वगोचरः । ६७ ।
अनुत्तमोऽप्रमेयात्मा सर्वात्मा गुणसागरः २००, समः समात्मा समगो जटामुकुटमण्डितः । ६८ ।
अजेयः सर्वभूतात्मा विष्वक्सेनो महातपाः । लोकाध्यक्षो महाबाहुःस्मृतो वरदश्चितमः । ६९ ।

। यज्ञके मूर्ति रूप ), यज्ञेश ( यज्ञके स्वामी ), जरमरणवर्जित ( बुढ़ापा और मृत्यु दोनोंस रहित ), वर्णाश्रमगुरु ( वर्ण और आश्रमके गुरु ), शत्रुजित् ( शत्रुओंको जीतनेवाले), पुरुषोत्तम ( सब पुरुषोंमें श्रेष्ठ ), शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता ( विविध शिवलिङ्गोंके संस्थापक ), परमात्मा, परात्पर प्रमाणभूत विश्वके प्रमाणस्वरूप ), दुर्ज्ञेय बड़े कठिनाईसे जानने योग्य ), पूर्ण, परपुरञ्जय ( शत्रुओका नगर जीतनेवा... अनन्तरूपि ( अपारदृष्टि ), आनन्द, धनुर्वेदके ज्ञाता, धन्धारि गुणकर, गुणाक भण्डार ), गुणश्रेष्ठ ( सब गुणोंमें श्रेष्ठ ), सच्चिदानन्दविग्रह ( सत चित् आनन्द इन तीनोंस जिनका शरीर बना है ), आप्तवाद्य ( सबोंके वन्दनीय ), महाकाय, विश्वकर्मा विशारद । ५३ ५६ ॥ विनीत आन्तरवाल, वीतराग ( रागद्वेषशून्य ), तपस्वीश ( तपस्वियोंके स्वामी ), जनेश्वर, कल्याण ( कल्याणस्वरूप ), प्रकृति सदा प्रसन्न ), कल्प, स्थिति तथा प्रलयकालके अधिपति ), सर्वज्ञ, सर्वकामद अक्षय, पुरुष, साक्षी केशव, पुरुषोत्तम, लोकाध्यक्ष, महाकार्य, विभीषणवरप्रद । ५७ । ५८ आनन्दविग्रह आनन्द रूप ही ), ज्योतिस्वरूप, हनुमान्के स्वामी, अविनाशी, भ्राजिष्णु ( दीप्तिसम्पन्न ), सहनशील, भोक्ता, मन्त्रके बहुश्रुत । ५९ ॥ सुखदाता, कारणस्वरूप, कर्ता, भवबन्धनसे छुड़ानेवाले, देवताओंके मुकुट, ब्राह्मणभक्त ब्राह्मणके बढ़ानेवाले ॥ ६० ॥ संसारसागरसे तारनेवाले, सब दुःखसे छुड़ानेवाले, अतिशय विद्वान्, विश्वरचयिता, विश्वकर्ता, विश्वके कत्तृत्व रूपस्वरूप ॥ ६१ , नित्य कल्याणतत्पर, सर्वबाधाविनाशक, काकुत्स्थ, कमलनयन, विश्वामित्रभयहारी । ६२ । मारीचहन्ता, राम, विराधवधमें निपुण, दुःस्वप्नविद्वारक, रमणीक, किरीटधारी, देवाधिपति ॥ ६३ ॥ विशाल धनुष धारण करनेवाले विशालकाय, भयानक भयानक पराक्रम-सम्पन्न, तत्त्वाक मूर्तरूप, तत्त्वोंके ज्ञाता तत्त्वविषयक वक्ता, असाधारण पराक्रमी ॥ ६४ ॥ प्राणमात्रके सखा सबके स्वामी, समयके पारखी, विशालभारोद्धारी, सदा प्रसन्न, गुणधाम निष्कलंक, कलंकनाशक ॥ ६५ ॥ स्वभावतः कल्याणकारी, शत्रुनाशक, केशव, चिरस्थायी, ईश्वर, प्राणियोंके आदि शम्भु अदिति-तनय स्वर्गी, नित्य, अटल ॥ ६६ ॥ कवचधारी, कुण्डलधारी चक्रधारी, खड्गधारी, भक्तजनके प्रिय, अमर, भक्तके सेवक विजेता, सर्वदर्शी ॥ ६७ ॥ सर्वोत्तम, अप्रमेयात्मा सर्वात्मा, गुणसागर २०० । सदा सम, प्रकृति, समात्मा, समगामी, जटामुकुटविमण्डित । ६८ ॥ अजय, सर्वभूतात्मा, विष्वक्सेन महातपा,