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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १०] बालकाण्डम् १०९

सर्गः १०] बालकाण्डम् १०९

मद्रूपमोहिताः सर्वा ऋषिपत्न्यः सहस्रशः । भग्नेच्छे ताः समागन्तुमृषिभित्रासिता अपि ॥१५८॥
ततो ते मुनयः सर्वे मामज्ञात्वा मुनीश्वराः । ददुः शापं महाघोरं क्रोधसञ्चिन्नमानसाः ॥१५९॥
ऋष्यर्थे मोहिता नार्यस्त्वया तस्माद्विद्विजोत्तम । पतत्वद्य रतेरंगं लिंगं भुवि च नो गिरा ॥१६०॥
एवं द्विजैस्तदा शप्तोऽपतल्लिङ्गं तदा भुवि । द्विजशापस्य सं राम गतोऽहं गुप्ततां तदा ॥१६१॥
द्विजनायोऽप्यदृष्ट्वा मां जग्मुः स्वं स्वं गृहं प्रति । तल्लिंगं वर्धते भूयो गगनं व्याप्य संस्थितम् ॥१६२॥
तद्दृष्ट्वा चकिता देवास्तस्यान्तं द्रष्टुमुद्यताः । पश्यन्तस्तस्य नोऽप्यन्दानन्तमौण्ड्यं बेधसः ॥१६३॥
तदा मामेत्य स विधिभेदाऽङ्गं न्यवेदयत् । अकाले प्रलयस्त्वद्य शम्भोऽनेन भविष्यति ॥१६४॥
तदा मया पूर्ववृत्तं विधि संश्राव्य सादराम् । त्रिशूलो देयसो दत्तम् छेतुं सोऽब्रवीच्च माम् ॥१६५॥
कथं तैऽङ्गं दास्येऽहं त्वमेव छेत्तुमर्हसि । ततो मयार्कखण्डानि कृतानि तस्य राघव ॥१६६॥
त्रिशूलेनापि क्षिप्तानि भूमौ निर्गतानि हि । तज्जातान्यत्र लिंगानि ज्योतिर्मयानि द्वादश ॥१६७॥
ॐकारः सोमनाथश्च त्र्यम्बको मल्लिकार्जुनः । नागेशो वैद्यनाथश्च काशीविश्वेश्वरस्त्वहम् ॥१६८॥
केदारेशो महाकालो भी मेशो घुमृणेश्वरः । एवमेकादश प्रोक्ता ज्योतिर्लिङ्गमयाः शुभाः ॥१६९॥
गन्धमादननाम्नेगो मेरोरीशानदिक्स्थितः । आपोच्छिन्नः न कस्यापि मानवस्याक्षियोचरः ॥१७०॥
तदा ते मुनयः सर्वे शिवं बुद्ध्वा तु लज्जिताः । ददुश्च पुनर्लिंगं मदास्तु गिरिजाप्रिय ॥१७१॥
ततः प्रलयवातेन गन्धमादननामकम् । तन्मेरोरुत्तरे शृङ्गेप्रकम्पानापतद्भुवि ॥१७२॥
तदिदं बान्धिमद्येऽगं दानेण सागरागाम् । गन्धमादननाम्नेदं शृङ्गं पश्यात्र राघव ॥१७३॥
गन्धमादननाम्नश्च लिंगं द्वादशमं शिवम् । अस्यप्रतिष्ठितलिंगम्य हंप्राप्यामान्तिके स्थितम्॥१७४॥


... कर आनंदसे भिक्षाके लिए मुनियोंके आश्रममें विचर रहा था। इस प्रकार ऋषियोंके आश्रममें घूमता हुआ रूप देखकर संख्या ऋषिपत्नियां मन होकर मोहित हो गयीं। पतिव्रताके संस्कारपर भी न नहीं रही और घर पदपूर्वक पूछने लगीं ॥ १५६-१५८ ॥ तब वे सब मुनि और मुनि न पहिचानकर बहुत घबराय और क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझ बड़ा भयानक शाप दे दिया ॥ १५९ ॥ उन्होंने कहा—अरे अधम ब्राह्मण ! तूने रति करनेके लिए हमारे स्त्रियोंको मोहित कर लिया है, इससे तेरे रति का साधन अङ्ग अर्थात् लिङ्ग हमारे कहेनुसार कटकर समान पर गिर पड़े ॥ १६० ॥ हे राम ! उनके शापम द्विजवर्य्याश मेरा लिङ्ग कटकर तुरन्त जमीनपर गिर पड़ा। आश्रम में अन्तर्धान हो गया ॥ १६१ ॥ मुझ न देखकर ऋषियोंके स्त्रिय भी अपने-अपने घर चली गयीं । तदनन्तर वह लिङ्ग इस प्रकार बढ़ा कि आकाश तक व्याप्त हो गया ॥ १६२॥ यह देखकर ब्रह्मा बहुत चकित हुए और उसका अन्त देखनेके लिए उद्यत हो गये । बहुत कालतक देख पन्ता नान्तान्तर भी न पाया। जब मेरे लिङ्गका अन्त नहीं मिला ॥ १६३ ॥ तब उस परम अम्बर ईश्वरने तुरन्त उनसे कहा—हे शम्भो, इस ही अकालमें ही प्रलय होना चाहता है ॥ १६४ ॥ मैंने ब्रह्माको पूर्ववृत्तान्त सुना कर सादर उनके हाथमें उस लिङ्गको काटनेके लिए अपना त्रिशूल दे दिया। तब ब्रह्मा ने कहा— ॥ १६५ ॥ न ब्रह्मा आपके अङ्गको कैसे काट सकता हूँ। आप ही इसे काटें । हे राघव ! तब मैंने उस लिङ्गके बारह टुकड़े कर डाले ॥ १६६ ॥ फिर त्रिशूलसे ही उठाकर उनको भूमिपर इधर उधर फेंक दिया, वे ही बारह टुकड़े यहांपर बारह ज्योतिर्लिङ्ग नामसे प्रख्यात हुए ॥ १६७॥ ॐकारनाथ, सोमनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, मल्लिकार्जुन, नागेश, वैद्यनाथ, काशी विश्वनाथ, केदारनाथ, करदारेश्वर, महाकाल, और घुमृणेश्वर ये ग्यारह शुभ ज्योतिर्लिङ्ग हैं ॥ १६८ । १६९॥ बारहवां लिङ्ग गन्धमादन पर्वतके ईशान कोणवाल शिखरपर बहुत काल तक स्थित रहकर भी किसी मनुष्यका दृष्टान्त नहीं भ या ॥ १७० ॥ तब मुनियोंने शिवके रूप शिवको पहिचानकर पुनः वर दिया—हे गिरिजाप्रिय ! तुमदुष्ट फिर लिंग हो जाय ॥ १७१ ॥ तदनन्तर उस समय वह मेरुका गन्धमादन नामक उत्तरी शिखर प्रलयवायुसे उड़कर यहाँ आ गिरा ॥ १७२ ॥ हे राघव ! यह गन्धमादन शिखरको तुम यहाँ देखिया समुद्रके संगमपर नसमें देख सकते हो ॥ १७३ ॥ बारहवां गन्धमादन ...

११० आनन्दरामायणे [ सर्गः १०


एतावत्कालपर्यन्तं नेदं केचिदलोकितम् । अद्य त्वया सादराद्यद्दृष्टं स्पष्टं विमोक्षदम् ॥१७५॥
स्वप्रतिष्ठितलिङ्गस्य प्रसादादवनीतले । ख्यातिं गतं त्विदं लिङ्गं यस्मात्तस्माद्रघूत्तम ॥१७६॥
अस्य लिङ्गस्य यज्ज्योतिर्मदीये त्वत्प्रतिष्ठिते । याम्यद्यैव संकेतेऽत्र लिङ्गे सेतौ स्थिरा भव ॥१७७॥
ज्योतिर्लिङ्गं द्वादशमं तव रामेश्वराभिधम् । वदिष्यन्ति जनाः सर्वे ह्यद्यारभ्य रघूत्तम ॥१७८॥
पूजास्रग्वादिकं कर्म यद्यत्किंचिदिरा मम । सर्वत्र लिङ्गे तत्सर्वमस्तु रामेश्वरे सदा ॥१७९॥
अहं चापि मुनेर्वाक्यादगस्तेस्त्वत्प्रियापि च । त्यक्त्वा काशीमागतोऽस्मि त्वल्लिङ्गेऽस्मिन्सदावसम् ॥
प्रणमेत्सेतुबन्धे यः पुमान् रामेश्वरं शिवम् । ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते तदनुग्रहात् ॥१८१॥
स्वं प्रदाय रघुश्रेष्ठ वरं देन जनाः सदा । स्नानार्थमाययिष्यन्ति मणिकर्णीजलं मम ॥१८२॥
शर्वस्यैतद्वचनं श्रुत्वा प्रमथो गणनायकः । जगाद स्नात्वा सेतुबन्धे रामेशं परिपश्यति ॥१८३॥
संकल्प्य नियतो भूत्वा गृहीत्वा सेतुवालुकाम्। काडिकामिर्यत्नेन गत्वा वाराणसीं शुभाम् ॥१८४॥
क्षिप्य्त्वा तां बालुकां त्यक्त्वा वेण्यां बालुकण्डिकाम् ।
आनीय गङ्गासलिलं रामेश्वरमभिषिच्य च ॥१८५॥
समुद्रे त्यक्तकङ्कारो मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम् । संकल्पेन विना गंतो रामेशं नागमिव्यति ॥१८६॥
आगता चेत्तदा ज्ञेयः संकल्पः पूर्वजन्मनि । कृतोऽस्तीत्यत्र मद्रूपवाद्यात्र कार्या विचारणा ॥१८७॥
एवं नानावदान्रामो यावल्लिङ्गाग्र मोऽब्रवीत् । तावत्तत्र समायातः कुम्भजन्मा मुनीश्वरः ॥१८८॥
नत्वा शङ्करो रामं रामोऽपि प्रणनाम तम् । तदा मुनिः प्राह रामं प्रसादात्तव राघव ॥१८९॥
दर्शनं विश्वनाथस्य जातं मेऽद्यात्र वै चिरात् । अथात्र तुष्टिर्जाता मे लिङ्गमत्र करोम्यहम् ॥१९०॥
इत्युक्त्वा स्थापयामास स्वनाम्ना लिङ्गमुत्तमम् । रामेश्वराग्निदिग्भागे कुम्भजन्मा मुदान्वितः ॥१९१॥


प्रिया तुम्हारे प्रतिष्ठित लिंगकी ईशानदिशामें वाम ही विद्यमान है ॥ १७४ ॥ इतने समय तक इसको किसीने नहीं देखा था । पर आज वानरसहित तुमने इस मोक्षप्रद लिंगका स्पष्ट देख लिया है ॥ १७५ ॥ तुम्हारे द्वारा स्थापित लिंगकी महिमासे ही पृथ्वीपर इसकी प्रसिद्धि हुई है। इस कारण हे रघुत्तम ! इस लिंगका जो ज्योति है, वह ज्योति तुम्हारे द्वारा स्थापित बालुकामय लिंगमें भरे कहुनेसे आज ही चली जायगी ॥ १७६ ॥ १७७ ॥ हे रघूत्तम ! आजसे बारहवां ज्योतिर्लिंग तुम्हारा स्थापित रामेश्वर ही दुनियाके सब मनुष्योम प्रसिद्ध होगा ॥ १७८ ॥ भेंट वस्त्रगले दूवा आदि सब उपचार तथा तुम्हारे रामेश्वर लिंगका ही होगा ॥ १७९ ॥ मैं या अगस्त्य मुनिके तथा तुम्हारे कहनेसे काशी छोड़कर यहाँ आ गया हूँ और अब तुम्हारे इस लिंगमें ही निवास करूंगा ॥ १८० ॥ जो मनुष्य सेतुबन्ध रामेश्वरको प्रणाम करेगा, वह मेरी कृपासे ब्रह्महत्या आदि भयानक पापोसे भी मुक्त हो जायगा ॥ १८१ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे यह वर दें कि सब लोग मुझे स्नान करानेक लिए सदा काशीका मणिकर्णिकाका जल लाकर चढ़ाण करें ॥ १८२ ॥ हे पार्वती ! शरे इस वचनको सुनकर श्रीराम हर्षित होकर बोले कि जो मनुष्य सेतुबन्धमें स्नान करके रामेश्वर शिवका दर्शन करेंगे ॥ १८३ ॥ फिर दृढ़ संकल्पसे सेतुकी बालुकाको काँवरमें रखकर प्रेम तथा यत्नसे काशीमे से जाकर गङ्गाके प्रवाहम् डालने और उस काँवरको वही छोड़कर दूसरी काँवरके द्वारा गंगाजल लाकर उससे रामेश्वरका अभिषेक करेंगे ॥ १८४ ॥ १८५ ॥ वहाँ उस काँवरको को समुद्रमें फेंककर निःसंदेह सायुज्यपदको प्राप्त होगे । जबतक दृढ़ संकल्प न होगा, तब तक रामेश्वर आना न होगा ॥ १८६ ॥ कदाचित् कोई आगया तो यही मानना चाहिए कि उसके पूर्वजन्मका संकल्प था । मेरे कहनेसे आप इस बातमें तनिक भी संदेह न करें ॥ १८७ ॥ इस प्रकार राम जब अनेक वर दे रहे थे, तभी वहीं कुम्भजन्मा (अगस्त्य) मुनि आ पहुंचे ॥ १८८ ॥ उन्होंने वहाँ आकर शिव तथा रामको प्रणाम किया । तब रामने भी मुनिको प्रणाम किया । अगस्त्य मुनिने रामसे कहा— हे राघव ! आपके अनुग्रहसे मुझे आज बहुत दिनके बाद विश्वनाथका दर्शन प्राप्त हुआ है। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। इसलिए मैं भी यहाँ एक लिंग स्थापित करता हूँ ॥ १८९ ॥ १९० ॥ इतना कहकर अगस्त्य मुनिने भी अपने नामसे एक उत्तम

सर्गः १०] सारकाण्डम् १११


पूजयामास तल्लिङ्गमगस्त्येश्वरनामकम् । नत्वा स्तुत्वा विश्वनाथं शम्भुं रामेश्वरं तथा ॥१९२॥
दृष्ट्वा पुरातनं लिङ्गं गंधमादननामकम् । ययौ स्वीयाश्रमं तुष्टः कुंभजन्मा मुनीश्वरः ॥१९३॥
सेतौ रामेश्वरस्यैव देवि देवालये शुभे । दिश्याग्नेय्यामगस्ती शमीशान्यां गंधमादनम् ॥१९४॥
वर्तेतेऽद्यापि द्वे लिङ्गे कश्चिज्जानाति वा न वा । प्रसिद्धोऽभूच्च रामेशः स्वर्गमृत्युरसातले ॥१९५॥
ततो रामाज्ञया सेतुं नलः कर्तुं मनो दधे । किंचिद्गर्वसमाविष्टस्तज्ज्ञातं राघवेण हि ॥१९६॥
यावदेकां शिलां त्यक्त्वा नलोऽन्यां प्रक्षिपञ्जले ।
तावत्तरंगकल्लोलैः सागरस्य इतस्ततः ॥१९७॥
गच्छन्तिस्म शिलाः सर्वास्ता दृष्ट्वा खिन्नमानसः । गलगर्वस्तदा रामं नलो वृत्तं न्यवेदयत् ॥१९८॥
रामः श्रुत्वा नलं प्राह रामेति द्वेऽक्षरे मम । द्वयोः संधिसिद्ध्यर्थं पृथग्विलिखतां द्वयोः ॥१९९॥
सर्वत्रैव लिखित्वा हि दृढः संधिर्भविष्यति । तथेति रामवचनात्तथा चक्रे नलस्तदा ॥२००॥
कृतः पंचदिनैः सेतुः शतयोजनमुत्तमः । कृतानि प्रथमेनाह्ना योजनानि चतुर्दश ॥२०१॥
द्वितीयेन तथा चाह्ना योजनानां च विंशतिः । तृतीयेन तथा चाह्ना योजनान्येकविंशतिः ॥२०२॥
चतुर्थेन तथा चाह्ना द्वाविंशतिरिति श्रुतम् । पंचमेन त्रयोविंशद्योजनानां कृतं त्विति ॥२०३॥
विस्तृतो द्वादश प्रोक्तो योजनानि दृढन्वयः । एवं बबंध सेतुं स नलो वानरसत्तमः ॥२०४॥
ये मज्जंति निमज्जयंति च परान् ते प्रस्तरा दुस्तरे वार्धौ येन तरंति वानरभटान् संतारयंतेऽपि च ।
नैते ग्रावगुणा न वारिधिगुणा नो वानराणां गुणाः श्रीमद्राघवधेः प्रतापमहिमा सोऽयं समुज्जृम्भते ॥२०५॥
तेनैव जग्मुः कपयो योजनानां शतं द्रुतम् । आरुह्य मारुतिं रामो लक्ष्मणोऽप्यंगदं तथा ॥२०६॥
जगाम वायुवल्लङ्कासंनिधिं सेनया पुरः । असंख्याताः सुवेलाद्रिं रुरुहुः प्लवगोत्तमाः ॥२०७॥


तक स्थापित किया। मुनिने अगस्त्यके साथ रामेश्वरके अग्निकोणमें उसका स्थापना की ॥ १९१ ॥ इस प्रकार मुनिने अगस्त्येश्वर नामक लिङ्गका पूजा करके विश्वनाथ, रामेश्वर एवं गौरीश्वरकी स्तुति तथा प्रणाम करनेके अनन्तर पुरातन गन्धमादन लिङ्गका दर्शन किया और प्रसन्न होकर अपने आश्रमको चले गये । १९२ ॥ १९३ ॥
हे देवि ! सेतुबंध रामेश्वरके देवालयमें ही आग्नेयकोणमें अगस्त्येश्वर तथा ईशानकोणमें गन्धमादनेश्वरका लिङ्ग अभी भी विद्यमान है। उन्हें कोई इन नामोंसे जानता है और कोई नहीं भी जानता । रामेश्वरका लिंग स्वर्ग, पाताल तथा मृत्यु इन तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हो गया ॥ १९४ ॥ तदनन्तर रामकी आज्ञासे नलने कुछ गर्वयुक्त होकर पुल बाँधना आरम्भ कर दिया । रामको इस गर्वका पता लग गया ॥ १९५ ॥ १९६ ॥ इसके बाद नलने जलमें एक पत्थर डालकर दूसरा ज्यों ही डाला, त्यों ही समुद्रकी तरंगित लहरियोंसे सब शिलाएं इधर-उधर फिसलने लगीं । यह दशा ही खिन्नमन हो तथा गर्व त्यागकर नल रामके पास गये और सब वृत्तान्त निवेदन किया । १९७ ॥ १९८ ॥ यह सुनकर रामने नलसे कहा कि मेरे नामके 'रा म' ये दो अक्षर पत्थरोंको एक साथ मिलानेके लिये दोनों शिलाओकी बगलमें लिख दो । १९९ ॥ ऐसा लिख देनेसे सब एक दूसरेके साथ दृढ़तासे जुड़ जायेंगे और संधि (जोड़) न टूटेगी । नलने भी 'तथास्तु' कहकर रामके कथनानुसार ही किया ॥ २०० ॥ ऐसा करनेपर पाँच दिनमें सौ योजन लम्बा, सुन्दर और दृढ़ सेतु बन गया । पहिले दिन चौदह योजन, दूसरे दिन बीस, तीसरे दिन इक्कीस, चौथे दिन बाईस और पाँचवें दिन तेईस योजन पुल बाँधा । इस प्रकार सौ योजन पूरे हो गये । २०१-२०३ ॥ उसमें भी बारह योजन एकमात्र पत्थर-का ही पक्का पुल बनाया गया । इस तरह वानरोत्तम नलने सेतु बाँधकर तैयार किया ॥ २०४ ॥ जो पत्थर स्वयं डूबते और दूसरोंको डुबाते हैं, वे ही दुस्तर समुद्रमें स्वयं तैरने तथा दूसरोंको तारने लग गये । यह गुण न पत्थरका है, न समुद्रका और न बानरोंका । परन्तु यह गुण तो केवल दशरथतनय रामका ही है । जिनकी महिमा सर्वत्र व्याप्त हो रही है ॥ २०५ ॥ उस पुलके द्वारा वानरगण सौ योजन सागर शीघ्र ही पार कर गये । राम हनुमान्के कंधे तथा लक्ष्मण अङ्गदके कंधेपर चढ़कर वायुवेगसे सेनाके साथ लंकाके पास

११२ आनन्दरमायणे [ सर्गः १०


ततः सैन्ययुतो रामः सुवेलाद्रिं ययौ मुदा दिदृक्षू रावणो लङ्कामध्यारोहाद्रि शुभम् ॥२०८॥
सुवेलाद्रिं महारम्यं तरुवल्लिर्विराजितम् । ददर्श लङ्कां विस्तीर्णां रामश्चित्रध्वजाकुलाम् ॥२०९॥
चित्रप्रासादमध्वां स्वर्णप्राकारतोरणाम् । परिखाभिः शतघ्नीभिः सक्रमैश्च विराजिताम् ॥२१०॥
प्रासादोपरि विस्तीर्णप्रदेशे दशकन्धरम् । पश्यंत कपिसैन्यं तं सन्ददर्श रघूद्वहः ॥२११॥
ततो रामेण मुक्तः स शुको गत्वा दशाननम् । कपिसैन्यं दर्शयंस्त बोधयामास रावणम् ॥२१२॥
सीतां प्रयच्छ रामाय लङ्काराज्ये विभीषणम् । कृत्वा तं शरणं याहि नो चेद्रामान्न मोक्ष्यसे ॥२१३॥
तच्छ्रुत्वा रावणः क्रोधाच्छुकं धिक्कृत्य वै मुहुः । दूतैर्गेहाद्वहिः कृत्वा रामसेनां व्यलोकयत् ॥२१४॥
शुकोऽपि ब्राह्मणः पूर्वं वसिष्ठो मन्त्रवित्तमः अयजन् क्रतुभिर्देवान् विरोधो राक्षसैर्भूत् ॥२१५॥
वज्रदंष्ट्र इति ख्यातस्तदैको राक्षसो महान् मांसाद्य याचितं दृष्ट्वा मुनिना कुम्भजन्मना ॥२१६॥
शुकभार्यावपुर्धृत्वा नृमांसं समर्पयत् । तदा क्रुद्धः शुकस्तेन त्वं रक्षो भव मा चिरम् ॥२१७॥
रक्षःकृतं पुनर्ध्यात्वाज्ञात्वा तन्प्रार्थितोऽब्रवीत् । रामस्य दर्शनं कृत्वा बोधयित्वा दशाननम् ॥२१८॥
त्वं प्राप्स्यसि निजं रूपं तस्माज्जातः शुको द्विजः। सुवेलशिखरे संस्थः समऽय कपिसन्ततः ॥२१९॥
सूचनार्थं रिपुं रामोऽङ्गदं लङ्कामचोदयत् सोऽपि रामाज्ञया गन्त्वा नानानीत्युक्त्वैरस्तदा ॥२२०॥
रावणं बोधयामास सभायां लांगुलासने । संस्थितोऽभीतवद्वालितनयः स्वस्थमानसः ॥२२१ ।
शृणु रावण मद्वाक्यं हितं ते प्रवदाम्यहम् । सीतां सस्कृत्य सधनां प्रयच्छ राघव जवात् ॥२२२ ।
मयं नारायणं विद्धि विदेह्यं स्यञ्च भद्रवे । यत्पादपोतमाश्रित्य ज्ञानिनो भवसागरम् ॥२२३॥
तरन्ति भक्तिपूतास्ते दत्तो रामो न मानुषः । मद्वाक्यं कुरु राजेन्द्र कुलकौशलहेतवे ॥२२४॥

आ पहुंचे। वानरोम उत्तम असख्य वानर सुवेल पर्वतपर जा चढ़े ॥ २०६ ॥ २०७ ॥ उनके पीछे राम भी अपनी सेनाके साथ सहर्ष सुवेलागिरिपर गये। वहाँ जाकर राम लंकाको देखनेके लिए उसके एक सुन्दर शिखरपर चढ़े ॥ २०८ ॥ वह पर्वत बड़े मन हर वृक्षों तथा लताओंसे मंडित था । वहाँ रामने बड़ा विस्तृत, रंग बिरंगी ध्वजाओंसे व्याप्त, अनेक प्रकारके भवनोंसे सघन, स्वर्णके गड़ तथा तोरण युक्त खाई, बुग्गों तथा सोपानोंसे विराजित लंकाको देखा ॥ २०९ ॥ २१० ॥ वहींसे रामने एक प्रासाद ( महल ) के ऊपर विस्तीर्ण प्रदेशमें बैठकर कपिसेनाको देखते हुए दशकन्धर रावणको देखा ॥ २११ ॥ तदनन्तर रामने कैद किये हुए शुकको छुड़वा दिया उसने जाकर रावणको वानर सेना दिखायी और समझाया - ॥२१२। तुम सीता रामको दे दो, लङ्काका राज्य विभीषणको दे दो और रामकी शरणमें चल जाओ। नहीं तो राम तुमको जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥ २१३ ॥ यह सुनकर क्रोधसे पागल रावणने शुकको बार-बार धिक्कारा और दूतोंसे बाहर निकलवाकर रामकी सेना देखने लगा ॥ २१४ ॥ शुक पहिले एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था । उसने यज्ञ द्वारा देवताओंको प्रसन्न किया था इस कारण राक्षसों से उसका विरोध हो गया । २१५ । तदनन्तर एक दिन वज्रदंष्ट्र नामक राक्षसने अगस्त्य मुनिको शुकसे मामांस माँगते देखकर शुककी स्त्रीका रूप धरण करके मनुष्यका मांस पकाकर मुनिको परास दिया, तब मुनिने क्रुद्ध होकर शुकको शाप दे दिया कि जा, तू शीघ्र राक्षस हो जा । २१६ ॥ २१७ ॥ पुनः शुकके प्रार्थना करनेपर मुनिने ध्यान धरके देखा तो मालूम हुआ कि यह तो एक राक्षसका कृत्य है। तब मुनिने कहा-हे शुक ! तू रामका दर्शन करके और रावणको समझाकर फिरसे अपने स्वरूपको प्राप्त हो जायगा। इसी कारण अब वह शुक पुनः ब्राह्मण हो गया । इधर रामने सुवेल पर्वतके शिखरपर बैठकर बानरोंको आमन्त्रित किया और शत्रुको सूचना देनेके लिए अङ्गदको लंका भेजा। उसने जाकर रामकी आज्ञासे अनेक नीतिवाक्यों द्वारा रावणको समझाया । २१८- २२० ॥ सभामें अपनी पूँछका मोड़ा बनाकर उसपर बैठे हुए अंगदने निर्भय होकर स्वस्थ मनसे रावणको समझाते हुए कहा - ॥ २२१ ॥ हे रावण ! मैं तुमको हितका उपदेश देता हूँ, सुनो । मेरी सलाह मानो और धनसे सीताका सत्कार करके झटपट रामको दे आओ ॥ २२२ ॥ रामको साक्षात् नारायण समझो

सर्गः १०] सारकाण्डम् १९३

एवं नानाविधैर्वाक्यैरंगदेनातिबोधितः सोऽथ नीतिपुनर्वाक्यमप्यशृणोद्रानवस्य च ॥२२५॥
उवाच क्रोधसंयुक्तो वानरं स दशाननः । भीषयसेऽद्य किं मां त्वं रावणं लोकरावणम् ॥२२६॥
येन सर्वे जिता देवाः कैलासः कम्पितो मया । तस्य मेऽग्रे मर्कट त्वं कत्थसे किं मुधाऽद्य हि ॥२२७॥
क्षणेन राघवौ हन्त्वा हन्त्वा सुग्रीवमारुती । हन्त्वा विभीषणं त्वां च वानरान् भक्षयाम्यहम् ॥२२८॥
रावणस्य वचश्चैवं श्रुत्वा प्राहांगदस्त्वहम् । जानाम्यहं पौरुषं ते बलिपातालनिर्गत ॥२२९॥
शिवपादांगुष्ठ भारनम्रकैलासपीडित । सहस्रार्जुनदीर्घत्तमभवत्क्रीडनमृग ॥२३०॥
श्वेतद्वीपस्थप्रमदाकराताडितमन्मथ । विष्णोःपुत्रोऽभवद् ब्रह्मा मरीचिस्तत्सुतः स्मृतः ॥२३१॥
तत्सुतः कश्यपस्तस्य पुत्रोऽभूदिन्द्रनामकः । तेनैवं वृद्धकाले तु बद्ध्वा कारागृहेस्थित ॥२३२॥
पर्यंङ्कोपरि सबद्धन्मूत्रक्षालितानन । इति तद्वाक्यशराघातानर्जितः स दशाननः ॥२३३॥
दशानाज्ञापयामास ताडनी यो मुखे त्वरम् । तथेत्युक्त्वा राक्षसास्ते शस्त्रहस्ताः सहस्रशः ॥२३४॥
अंगदं दुद्रुवुः शीघ्रं तान् दृष्ट्वा वानरोत्तमः । मर्दयामास पुच्छेन तान्सर्वान् क्षणमात्रतः ॥२३५॥
रावणस्येषु समासाद्य स्वकराभ्यां मुहुर्मुहुः । तद्धस्तपादौ पुच्छेन पूर्वं बद्ध्वा सविस्तरम् ॥२३६॥
ततश्चोत्प्लुत्य वेगेन ययौ प्रासादमस्तकः । सुवेलाद्रौ राघवेंद्रं तारेयः स विहायसा ॥२३७॥
अंगदं राघवो दृष्ट्वा प्रासादान्वितमस्तकम् । उवाच किं कृतं वत्स प्रासादोऽयं त्वया कथम् ॥२३८॥
मयानीतोऽत्र लंकायां मित्रायैषा पुरी मया । अर्पिताऽस्ति ततो मित्रद्रविम्वेदं न स्पृशाम्यहम् ॥२३९॥
तद्राघववचः श्रुत्वा चकितः स तदांगदः । प्रासादं मस्तके दृष्ट्वाऽऽक्षिप्यागाड राघवम् । २४०॥


और उनसे द्वेष करना छोड़ दो। जिनके चरणकमलरूपी जहाजका आश्रय लेकर ज्ञानी लोग गतिसे पवित्र मन होकर इस संसाररूपी समुद्रको अनायास पार कर जाते हैं, वे राम मनुष्यमात्र नहीं हैं। हे राजन् ! यदि अपने कुलकी कुशलता चाहते होओ तो यह कहा करो ॥ २२३, २२४ ॥ इस प्रकार विविध वाक्योंसे अंगदने उसे बहुत समझाया, परन्तु उसने अङ्गदका एक भी नीतिपूर्ण वाक्य नहीं सुना ॥ २२५ ॥ प्रत्युत क्रुद्ध होकर रावण अङ्गदसे कहा—'अरे नीच ! तू आज सब लोकोंको रुलानेवाले मुझ रावणको डराने आया है ? ॥ २२६ ॥ अरे ! मैंने सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर कैलास तकको कंपा दिया है। ऐसे मुझ वीरके सामने अरे मर्कट ! तू क्यों व्यर्थ बकवाद कर रहा है ॥ २२७ ॥ मैं क्षणभरमें राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनूमान्, विभीषण तुझे और सब वानरोंको मारकर खा सकता हूँ ॥ २२८ ॥ इस प्रकार रावणका गर्वरूपी वाक्य सुनकर अङ्गदने कहा हे बलिपातालसे विनिर्गत ! हे शिवपादांगुष्ठसे मानम्र कैलाससे पीड़ित ! हे सहस्रार्जुनके क्रीड़ामृग ! हे श्वेतद्वीपके स्त्रियोंके हाथसे ताड़ित मुखवाले रावण ! मैं तेरे बलको जानता हूँ। यह मुझे मालूम है कि विष्णुके पुत्र ब्रह्मा, ब्रह्माके पुत्र मरीचि, मरीचिके पुत्र कश्यप, कश्यपके पुत्र इन्द्र और इन्द्रके पुत्र बालिने तुझको वृद्धके समय बाँधकर कारागारमें डाल रक्खा था। वहाँ तुम्हारा मुख चारपाईमें बँधनेके कारण भरे मूत्रसे भर जाता था। अङ्गदके इस वाक्यरूपी बाणोंसे विद्ध होकर रावण लज्जित हो उठा ॥ २२९-२३३ ॥ उसने दूतोंको आज्ञा दी कि मार मारकर इसका मुंह लाल कर दो। तब 'तथास्तु' कहकर हजारो राक्षस हाथमे शस्त्र लेकर अङ्गदकी ओर झपटे। उन्हें देखकर वानरोत्तम अङ्गदने अपनी पूँछकी मारसे उन सबको क्षणभरमें धराशायी कर दिया ॥ २३४ ॥ २३५ ॥ तदनन्तर पूँछसे रावणके हाथ पाँव अच्छी भाँति बाँधकर अंगदने उसके मुखपर खूब तमाचे लगाये ॥ २३६ ॥ तत्पश्चात् वहाँसे उड़कर अङ्गद आकाशमार्गसे सुवेल पर्वतपर रामके पास लौट गया। उड़ते समय रावणका मुकुट भी उनके सिरपर बैठकर चला आया ॥ २३७ ॥ रामने अंगदको मस्तकपर महल लिये आते देखकर कहा- हे बलिपुत्र ! तुम इस महलको क्यों उठा लाये ? । २३८ ॥ मैने लंकापुरी मित्र विभीषणको अर्पण कर दी है। इसलिए मै तो मित्रकी इस वस्तुको छू भी नहीं सकता ॥ २३९ ॥ रामकी यह बात सुनकर अंगद चकित हो गये जब अङ्गदने ऊपरकी ओर आंखें की तो अपने सिरपर मकान देखकर रामके

११८ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०

न ज्ञातोऽयं मया राम प्रासादो मस्तकेन मे । उत्पाटितश्च लंकायाः समानीतस्तवांतिकम् ॥ २४१॥
पुनर्नीत्वाऽद्य लंकायामेनं संस्थापयाम्यहम् । इत्युक्त्वा परिगृह्याथ राघवस्याज्ञयाऽगदः ॥२४२॥
प्रासादं पूर्ववत्स्थाप्य लङ्कायां स ययौ पुनः । सुवेलाद्री राघवेन्द्रं नत्वा वृत्तं न्यवेदयत् ॥ २४३॥
यद्यत्कृतं तु लङ्कायां संवादं रावणस्य च । रामोऽपि श्रुत्वा तन्मवं स्निन्वा तं परिषस्वजे ॥ २४४॥
अथ श्रीगमचन्द्रोऽपि सुवेलाद्री स्थितस्तदा । लीलया चापमादाय मुमोच चोत्तमं शरम् ॥ २४५॥
तेन छत्रसहस्राणि किरीटदशकं तथा । लङ्कायां राक्षसेन्द्रस्य प्रासादे संस्थितस्य च ॥ २४६॥
चिच्छेद निमिषार्धेन कपिनां पश्यतां प्रभुः । एतस्मिन्नंतरे तत्र रामाग्रे संस्थितो महान् ॥ २४७॥
न दत्तं जानकीं श्रुत्वा रावणेनांगदाग्रतः । क्रोधेन महताविष्टः सुग्रीवः प्लवगाग्रणीः ॥२४८॥
ययावुड्डीय लङ्कायां दशार्यं राक्षसैर्वृतम् । प्रासादमध्यस्थं छत्रहीनं प्रन्यदसारमम् ॥ २४९॥
सुग्रीवो रावणं गत्वा जघान दृढमुष्टिना । पातयामास भूम्यां तं वराभिद्यमनागदः ॥ २५०॥
चक्रतुस्तौ बाहुयुद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । उच्चांघ्रिकग्पृष्ठस्तैः कर्णाक्षशलतोरुभिः ॥२५१॥
तदासीज्जर्जरोगंङ्गः स रावणः कपिघाततः । दुद्रुवे बाहुयुद्धं हन्त्यक्त्वा गेहं विलज्जितः ॥ २५२॥
तदाऽऽच्छिद्य तन्मुकुटं ययौ रामं कपीश्वरः । नत्वा राघवं भक्त्या वृत्तं सर्वं न्यवेदयत् ॥ २५३॥
तं समालिङ्ग्य रामोऽपि सुग्रीवं प्राह सादरम् । मामपृष्ट्वा कथं बन्धो गतस्त्वय दशाननम् ॥ २५४॥
त्वज्जीवितं विपन्नं चेत्तर्हि किं सीतया मम । भविष्यति न सौख्यं हि मंद्रशं साहसं कुरु ॥ २५५॥
ततो भेरीमृदंगार्धैर्वाद्यंस्ते वानरोत्तमाः । लङ्कां व्येष्टयामासुश्चतुर्दारिषु संस्थिताः ॥ २५६॥
तदा तं मुकुटं रामोऽङ्गदाय रावणस्य च । ददौ तुष्टो दशेशाय लङ्कां रोद्धुं प्रनोदयन् ॥ २५७॥

बोले-॥ २४० ॥ हे राम ! मुझे तो इस बातका पता भी नहीं था कि मेरे मस्तकपर मकान है और लंकासे
उखड़कर यहाँ आपके पास तक चला आया है ॥ २४१ ॥ मैं इसको फिरसे जाकर लङ्कामें रख आता हूँ ।
इतना कह और रामको आज्ञा पाकर अंगद तुरन्त लौटे ॥ २४२ ॥ वे उस प्रसादको पूर्ववत् लङ्कामें रखकर
पुनः रामके पास आ गये और नमस्कार करके सब वृत्तान्त निवेदन किया ॥ २४३ ॥ लङ्कामें जाकर उन्होंने जो
कुछ किया था और रावणके साथ जो संवाद हुआ था, वह सब रामसे कहा। सो सुनकर रामने उनको हृदय-
से लगा लिया ॥ २४४ ॥ तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने मुवेलाद्रिपर खड़े होकर लाघवपूर्वक एक उत्तम बाण
धनुषपर चढ़ाकर छोड़ा ॥ २४५ ॥ उससे लंकाके महलपर स्थित राक्षसेश्वर रावणके दसों मुकुट तथा हजारों
छत्र कटकर क्षणभरमें वानरोंके समक्ष आ गिरे। इतनेमें रामके आगे खड़े सुग्रीवने जब अंगदके मुखसे
यह सुना कि रावण सीताको देनेके लिये तैयार नहीं है। तब अत्यन्त कुपित होकर वानरोमें अग्रणी
सुग्रीव उड़कर लंकामें वहाँ जा पहुँचे, जहाँ कि महलपर छत्र तथा किरीटोंरहित अत्यन्त व्यग्र मनसे रावण
बैठा था ॥ २४६-२४९ ॥ वहाँ जाकर सुग्रीवने रावणको जोरसे एक मुक्का मारा। जिससे दशानन सिंहासनसे
जमीनपर गिर पड़ा ॥ २५० ॥ तदनन्तर कपीश सुग्रीव तथा राक्षसेश्वर रावणका आपसमें घोर मल्लयुद्ध होने
लगा। वे एक दूसरेको उठा-उठाकर चित-पट करने लगे। जिससे कि उनके हाथ-पाँव तथा छाती शृंग
निर्मम प्रहारके कारण बड़ी चोट लगती थी ॥ २५१ ॥ अन्तमें सुग्रीवकी मारसे रावणके सब अंग जर्जरित
हो गये । तब रावण बाहुयुद्ध करके लज्जाके मारे घरमें भाग गया ॥ २५२ ॥ उस समय उसका मुकुट छीनकर
कपीश्वर सुग्रीव रामके पास आ गये और भक्तिपूर्वक नमस्कार करके सब समाचार कहा ॥ २५३ ॥ रामने
आदरके साथ सुग्रीवका आलिंगन किया और कहा- हे बन्धो ! तुम मुझसे बिना कहे चुपकेसे रावणके साथ
युद्ध करने क्यों चले गये ? ॥२५४॥ कहीं तुम्हारे प्राण संकटमें पड़ जाते तो हम सीताको पा करक भी कौनसा सुख
भोगते ? अबसे कभी ऐसा साहस नहीं करना ॥ २५५ ॥ बादमें नगाड़ा मृदंग तथा तुरही आदि बाजे
बजाते हुए सब वानरयोद्धाओंने लंकाको घेर लिया और चारों दरवाजोंको रोककर खड़े हो गये ॥ २५६ ॥
सत्यवान् रामने वह रावणका मुकुट प्रसन्न होकर सेनापति अंगदको दे दिया और लंकाको घेरनेके लिये