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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७५

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सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७५

जयो जातो रावणोऽथ कुम्भकर्णस्तदापरः । जातो विजयनामा हि रामेनानेन तौ हतौ ॥२२॥
तावश्विनीसुतौ हि एक ऐरावण स्मृतः । मैरावणश्च त्वपरं पत्र तौ जनितावभौ ॥२३॥
पाताले वरदानाच्च रामहस्तान्मृतिं गतौ । अग्रे जयः शिशुपालो भविष्यति न संशयः ॥२४॥
विजयो दन्तवक्त्रश्च भविष्यत्यर्द्धनातले । द्वापरे कृष्णरूपेण शिशुपालं हरिः स्वयम् ॥२५॥
भविष्यति दन्तवक्त्रं तथैव मुनिसत्तम । एवं जन्मत्रय शापाद्भुक्त्वा तौ भगवद्गणौ ॥२६॥
जयविजयनामानौ पूर्ववत् स्यास्यतः सुधी । कृतदेशेऽथ वै विष्णोर्वैकुण्ठे दुःखवर्जिते ॥२७॥
तावश्विनौ देववैद्यौ पूर्ववदिति तौ स्थितौ । एवं मुने त्वया पृष्टं तन्मया परिकीर्तितम् ॥२८॥
भगवद्गणयोः शापकारणं च पुरातनम् । एव राघव चाग्रे त्वं द्वापरे वरमे शुभे ॥२९॥
जरासंधादिवीरैश्च कंसार्थैरपि भूतले । क्षिप्रं दृष्ट्वाऽत्रावतीर्य कृष्णरूपेण लीलया ॥३०॥
सर्वान्हत्वा तोषयुक्तं करिष्यसि महीतलम् । तान् बौद्धांबुदरूपेण कलावग्रे विजेष्यसि ॥३१॥
वर्णसंकरमाक्ष्य कलेरन्ते रघूत्तम । कल्किरूपेण सकलान्संहारष्यसि लीलया ॥३२॥
एवं दशावताराश्च तथान्येऽपि सहस्रशः । त्वया हितार्थमस्माकं धृताश्चाग्रे धरिष्यसि ॥३३॥

श्रीरामदास उवाच

एवं स्तुवन् ब्रह्माथ समालिङ्गय रघूत्तमः । मन्निदेश्यामने प्राह स्वदर्थं च मुनेर्गिरा ॥३४॥
हास्यमाशास्ति किं येऽनाः कुर्वतु ते सुखम् यथा वाल्मीकिना प्रोक्तं तथा चा रिस्तथास्तु वं ॥३५॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा महा हृष्टाः सुरोदयाः । प्रपच्छ च वाल्मीकिं सभायां रघुनन्दनः ॥३६॥
ममावतारतः पूर्वं त्वया मच्चरितं कृतम् । कथं ज्ञातं त्वया पूर्वं केन त्वामुपदेशितम् ॥३७॥
पूर्वजन्मनि कस्त्वं हि किं पुण्यं हि त्वया कृतम् । तन्मवं विस्तरेणैव कथयस्वाद्य मां प्रति ॥३८॥

'वे दोनों रावण और कुम्भकर्ण होकर जन्म और भगवानने रामका रूप धारण करके उन्हें मारा ॥ २१ ॥ २२ ॥
दोनों अश्विनीकुमारोंमेंसे एक ऐरावण एवं दूसरा मैरावणके रूपसे धरतीपर आया और पाताललोकमें रामके
हाथों उन दोनोंकी मृत्यु हुई । अगले जन्ममें जय शिशुपाल तथा विजय दन्तवक्त्रके नामसे जन्मेगा । द्वापरमें
भगवान् कृष्णरूपमें उन दोनोंका संहार करेंगे । इस तरह आपसके शाप भोगके वे लोग तीन जन्ममें अपनी
करनीका फल भोगकर फिर पहलेकी तरह जय विजयके नामसे भगवान्‌के द्वारपाल हो जायेंगे, तब उन्हें
फिर कोई क्लेश नहीं होगा ॥ २३-२७ ॥ तबसे अश्विनीकुमार भी आनन्दके साथ स्वर्गलोकमें निवास
करेंगे । हे मुनिराज ! आपने हमसे जो कुछ पूछा, वह मैंने बतलाया। इसका सारांश यह निकला कि उन
दोनों भगवद्गणोंके लिए एक प्राचीन शाप कारण था। उसमें कोई नयी बात नहीं थी। हे राघव ! आगे
द्वापर युगमें भी पृथ्वी जब कंस तथा जरासंध आदि दुष्टोंके अत्याचारोंसे घबड़ा जायगी, तब आप कृष्ण अवतार
लेकर दुष्टोंका संहार करते हुए पृथ्वीका भार उतारेंगे। उसी प्रकार कलियुगमें बुद्धका रूप धारण करके
आप बौद्धोंको पराजित करेंगे ॥ २८-३१ ॥ हे रघूत्तम कलियुगके अन्तमें जब समस्त संसार वर्णसंकर हो
जायगा, तब आप कल्किरूप धारण करके सबका संहार करेंगे। इस तरह दस क्या, हजारो अवतार आपने
हम लोगोंके कल्याणके लिये लिये हैं और भविष्यमें भी लेंगे ॥ ३२ ॥ ३३॥ श्रीरामदास बोले—इस तरह स्तुति
करते हुए ब्रह्माको राघवन हृदयसे लगा लिया और अपनी बगलमें बिठाकर कहा कि वाल्मीकिके कथनानुसार
मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम्हारे सुखके लिये लोग हँसें या जो कुछ करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। वाल्मीकिने
जो कहा है, उसके अनुसार मेरी प्रजाके लोग काम करेंगे ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ रामकी इस बातको सुनकर जितने देवत
थे, वे सब प्रसन्न हो गये । इसके पश्चात् रामने वाल्मीकिसे कहा कि मेरे अवतारसे पहले ही आपने मेरा चरित्र
रामायण बना डाला है । सो भविष्यकी बात आपको कैसे मालूम हुई ? उन्हें किसने बतायी थी ? । ३६ ॥ ३७ ॥
पूर्वजन्ममें आप कौन थे और आपने कौनसे पुण्यकार्य किये थे, सो मुझसे कहिए। इस प्रकार रामके प्रश्न

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४७१ आनन्दरामायणे [ सर्गः १४


तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः । सभायां राघवार्थं सर्वं वक्तुं समुपचक्रमे ॥३९॥
वाल्मीकिरुवाच
सम्यक्पृष्टं त्वया राम सावधानमनाः शृणु । राम स्वनाममहिमा वर्ण्यते केन वा कथम् ॥४०॥
यत्प्रभावादहं राम ब्रह्मर्षित्वमवाप्तवान् । शृणु राघव मत्सत्यं कथां मे पूर्वजन्मनः ॥४१॥
पंपातीरे द्विजः कश्चिच्छंखो नाम महायशाः । गुरोः सिद्धिं गमश्चागाद्नदीं गोदावरीं प्रति ॥४२॥
तीर्त्वा भीमरथीं पुण्यां कान्तारे कंटकाविले । निर्जले विजने घोरे वैशाखे तापकंपितः ॥४३॥
शनै चोपाविशन्मार्गे मध्याह्नसमये द्विजः । तदा कश्चिद्दुराचारी व्याधश्चापशरः शठः ॥४४॥
निर्दयः सर्वभूतेषु कालांतक इवापरः । तं कुण्डलधरं विप्रं दीक्षितं भास्करोपमम् ॥४५॥
खङ्गेन भीषयित्वा तु जग्राह कुंडलादिकम् उपानहौ तच्छत्रं च वस्त्राणि च कमण्डलुम् ॥
पश्चाद्व्याधश्च तं विप्रं गच्छेत्याह स मूढधीः ॥४६॥
तथा स मूल्छन्पथि शर्कराविले सूर्यशुतप्ते अनवर्जिते खरे ।
संतप्तपादस्तृणगोपिते स्थले क्वचित्क्व वस्त्रोपरि संस्थितोऽभवत् ॥४७॥
स वै द्रुतं तापतप्तोऽपि विप्रन्दाहेति वादी प्रजगाम विप्रः ।
दृष्ट्वा मुनिं तं बहुविह्वलन्तन्प मध्यं गते पूष्णि यदाऽतितीव्रे ॥४८॥
व्याधस्य जाता मतिरीदृशी वै तस्मै ददामीति च पादरक्षे ।
चौर्येन धर्मम् तु तस्करो न वने गृहीव सकल चतन्मे ॥४९॥
चौर्येण च स्वधर्मेण यद्गृहीतं वनान्तरे । तदीयमेव तन्मत्वं व्याधानां धर्मनिर्णयः ।५०।
तस्मादुपानहौ दास्ये मुहुर्दुःखापनुत्तये । तेन श्रेयो भवेद्यच्च तद्द्वन्मेऽस्तु पापिनः ॥५१॥
जीर्णे नोपानहावेतौ ह्रस्वौ स्तश्च पदोर्मम । न चाभ्यामस्ति मे कार्यं तस्मात्तस्मै ददाम्यहम् ॥५२॥

करनेपर वाल्मीकिजीने बतलाना प्रारम्भ किया । उन्होंने कहा—आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सावधान चित्त होकर सुनिये । हे राम ! आपके नामकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है, जिसके प्रभावसे आज मै ब्रह्मर्षिपदपर बैठा हूँ । अच्छा, पहले अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त ही बतलाता हूँ । पम्पा सरोवरके पास कोई एक महान् यशस्वी शङ्ख नामका ब्राह्मण रहता था। उसने गुरुके पाससे सिद्धि प्राप्त की और कुछ दिनों बाद गोदावरी नदीपर गया । उसे पार करके भीमरथी नदी पार किया और एक ऐसे निर्जन वनमें पहुंचा, जहाँ जलतक मिलना कठिन था । वह वैशाखका महीना था । मारे गर्मीके उसका जी बेचैन था । दोपहरके समय थककर वह उसी वनमे बैठ गया । उसी समय धनुष-बाण लिये एक दुष्ट व्याध उसके पास आ पहुंचा । ३९-४४ । वह दूसरे यमराजके समान भयानक और निर्दयी था। उसने उस सूर्यके समान तेजस्वी ब्राह्मणको तलवारसे भयभीत करके उसके कुण्डलादि आभूषण, जूते, छतरी, वस्त्र तथा कमण्डलु आदि छीन लिये । इसके बाद उसने "जाओ" कहकर छोड़ दिया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ बेचारा ब्राह्मण कङ्कड़-पत्थर तथा सूर्यके तापसे जलती हुई बालुकाव्याप्त मार्गसे चलने लगा । जब उसके पैर ज्यादा जलने लगते तो किसी तृण आदिवर पैर ठंडा करके आगे बढ़ता था । चलते-चलते जब पैर बहुत जलने लगे तो वह कपड़ा बिछाकर एक स्थानपर बैठ गया ॥ ४७ ॥ थोड़ी देर बाद उठकर उस कड़ाकेकी धूपमें पैरके जलनेसे हाहाकार करता हुआ वह फिर आगे बढ़ा । उस ब्राह्मणको जलती दुपहरीमें इस तरह दुःखित देखकर व्याधके मनमें आया कि मैने इसकी सारी वस्तुएँ तो छीन ली हैं। न हो, इसे इसके जूते लौटा दूँ । इसकी सब चीजें छीनकर मैंने अपने धर्मका पालन किया ही है। हे राम ! वनमें आने जानेवाले पथिकोंके सामान छीन लेना, उन लोगोंके धर्ममें सम्मिलित है। उस चौरने सोचा कि इसके जूते इसे दे डालूँ तो इसका क्लेश दूर हो जायगा और उससे जो पुण्य होगा, सो मुझे

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सर्गः १९ ] स्कन्दपुराणम् (उत्तरार्द्धम्) ४७७


इति निश्चित्य मनसि तूर्णं गत्वा ददौ च तौ । घर्मेण तप्तं तं दृष्ट्वा व्रजन्तं पथि संकटे ॥ ५३ ॥
उपानहौ गृहीत्वासौ निर्वृतिं च परां ययौ । मुदा प्रहर्षितो भूत्वा विप्रः शम्भुः पुनरब्रवीत् ॥ ५४ ॥
पूर्वपुण्येन ते जाता शुभा बुद्धिरनन्तर, यया दत्ते त्वया वैशाखे पादत्राणे दुरत्यये ॥ ५५ ॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा विप्रं व्याधोऽथ सोऽब्रवीत् । किं मयाऽऽचरितं पूर्वं पुण्यं तन्मे वद प्रभो ॥ ५६ ॥

आतपो बाधते घोरो नात्र छाया न वै जलम् । तस्मात्स्थान्तरं गत्वा यत्र छायाम्बु वर्तते ॥ ५७ ॥
तत्र गत्वा जलं पीत्वा सुखछायामाश्रित्य च । ततो मे सुकृतं पूर्वं सविस्तारं वदाम्यहम् ॥ ५८ ॥
इत्युक्तो मुनिना तेन व्याधः प्राह कृताञ्जलिः । इतोऽविदूरे सलिलं वर्तते च सरोवरे ॥ ५९ ॥
कपित्थास्तत्र वै सन्ति फलभारैश्च पीडिताः । गच्छामस्तत्र संतुष्टिर्भविता नात्र संशयः ॥ ६० ॥
व्याधेनैव समादिष्टस्तेन साकं ययौ मुनिः । कियद्दूरं ततो गत्वा ददर्शाश्चर्यं सरोवरम् ॥ ६१ ॥
स्नात्वा मध्याह्नवेलायां तस्मिन्सरसि निर्मले । आचम्योपस्पृश्याथ कृत्वा माध्याह्निकीः क्रियाः ॥ ६२ ॥
देवपूजां तथा कृत्वा फलमूलमनोरमैः । व्याधेनोपनीतं सुस्वादु कपित्थं भक्षयारि च ॥ ६३ ॥
भुक्त्वोः सुखं जलं पीत्वा सुच्छायां च समाश्रितः । सुखोपविष्टस्तं प्राह पूर्वपुण्यं वदामि ते ॥ ६४ ॥
शाकले नगरे पूर्वं द्विजन्मा वेदपारगः । स्तम्भो नाम महापापी तथा श्रावस्तगोत्रजः ॥ ६५ ॥
तवेष्टा गणिका काचिन्नाम्ना नीचगणेशिका । त्यक्तनित्यक्रियो नित्यं शूद्रवन्मूर्त्तितोऽप्यभूत् ॥ ६६ ॥
शून्याचारस्य मूढस्य पाखण्डस्याप्रियस्य च । ब्राह्मणी ते तदाऽऽचार्याऽऽया शोभनमयी तथा ॥ ६७ ॥
सा त्वां पर्यचरत्सुभ्रूः समेवञ्च प्रातजाधवम् । अन्योन्यं क्षालयन्ती च पादौ स्वांप्रयकाङ्क्षया ॥ ६८ ॥
उभयोरप्यधः शौचे उभयोर्वचने रता । ईक्षया बाधमाणाऽपि दिनकार्ये द्वयोः स्थिता ॥ ६९ ॥


पापीके पासमें अच्छा ही होगा ॥४८-५२॥ जूतोंकी पद्धत और छोटी है। इसलिए मेरे पैरमें न आयेंगे। सब इसे दे ही डालूँ। इस प्रकार निश्चय करके दौड़ता हुआ उस धूप तथा कण्ठियोंके झमेले दुःखी ब्राह्मणके पास पहुंचा और उसने वह जूता दे दिया ॥५३-५५॥ जूता मिलनेपर उसे बड़ा आनन्द मिला और ब्राह्मणने कहा-तुम सुखी होओ। हे वनचर ! तुम्हारे किस पुण्यसे तुम्हारी ऐसी बुद्धि हुई है। जिससे तुमने वैशाख महीनेमें इस जूतेका दान दिया है ॥५४॥ ५५ । इस प्रकार ब्राह्मणकी बात सुनकर व्याधने कहा कि पूर्वजन्ममें मैंने कौनसा पुण्य किया था। महाराज विस्तारपूर्वक मुझे बतलाइये ॥५६॥ ब्राह्मणने कहा कि इस समय मुझे घाम ज्यादा लग रहा है। इस जंगलमें न तो पानी है न छाया ही है। इसलिए किसी एक स्थान-पर चलो, जहाँ कि छाया और पानी मिल सके। सुखी होनेपर तुम्हें तुम्हारे पूर्वजन्मका वृत्तांत सुनाऊँगा ॥५७॥५८॥ इस प्रकार ब्राह्मणकी बात सुनी तो हाथ जोड़कर व्याधने कहा कि पास ही सरोवरमें पानी है और उसके आस-पास बहुतसे कैथके वृक्ष फलसे लदे हुए विद्यमान हैं। वहाँपर चलनेसे आप सन्तुष्ट हो जायेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ५९ । ६० ॥ व्याधके उसी कहनानुसार ब्राह्मण उसके साथ चलकर उस सरो-वरके पास पहुंचा। दोपहरके समय उसने स्नान किया, बदन पोंछने और मध्याह्नकालकी क्रियायें पूरी कीं। फिर देवताका पूजन करके व्याधके लाये हुए कैथके फल खाये, सरोवरका ठंडा पानी पिया और छायामें सुखसे बैठकर विप्र बोला-अब मैं तुम्हारे पूर्वजन्मके पुण्य बतलाता हूँ ॥६१-६४॥ पूर्वजन्ममें शाकल नामकी नगरीमें तुम वेदपारगा स्तम्भ नामके ब्राह्मण थे। श्रावस्त गोत्रमें तुम्हारा जन्म हुआथा, किन्तु तुम बड़े भारी पापी थे। दुःसङ्गके दण्डवश तुम एक वेश्यापर मुग्ध हो गये। तुमने अपनी सारी नित्य क्रियायें छोड़ दीं और शूद्रके समान मूर्त्तिमें सर्वेश्वर बनने लगे। तुम जैसे मूर्ख तथा आचार विहीन ब्राह्मण-के घरमें एक अति रूपवती ब्राह्मणी पत्नी भार्या थी। वह उस वेश्याकी तथा तुम्हारी खूब सेवा करती थी तुम्हें प्रसन्न रखनेकी इच्छासे वह तुम दोनोंके पैर धोती थी । ६५-६८। तुम दोनोंका अपेक्षा नीची शय्यापर

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५७८ आनन्दरामायणे [सर्गः १४

एवं शुश्रूषयन्त्या हि भर्तारं वेश्यया सह। जगाम सुमहान्कालो दुःखिताया महीतले ॥७०॥
अपरास्मिन्दिने भर्ता माहिषं मूलकाञ्चितम्। अभक्षयत्सुतक्राक्तं निष्पावांस्तैलमिश्रितान् ॥७१॥
तमपथ्यमशित्वा तु वमथुंश्च समेरयत्। अथान्तःदारुणो रोगो व्यजायत भगंदरः ॥७२॥
स दह्यमानो रोगेण दिवारात्रं तु भूरिशः। यावदास्ते गृहे वित्तं तावद्वेश्या च संस्थिता ॥७३॥
गृहीत्वा सकलं वित्तं पश्चात्तस्य मन्दिरे। अन्यस्य पार्श्वमासाद्य तस्थौ घोराऽतिनिर्घृणा ॥७४॥
ततः स दीनबदनो व्याधिबाधामृषा हतः। उरुवाष्पमुखो भार्यां रुजा व्याकुलमानसः ॥७५॥
परिपालय मां देवि वेश्यासक्तं सुनिष्ठुरम्। न मयोपकृतं किञ्चित्तव सुन्दरि पावनि ॥७६॥
यो भार्यां प्रणतां पापो नानुमन्येत मूर्खधीः। स विड्भो भवनीचासु दश जन्मानि सप्त च ॥७७॥
दिवारात्रं महाभागे निन्दितः साधुभिर्जनैः। पापयोनिमवाप्स्यामि त्वां साध्वीमवमन्य वै। ७८॥
अहं कापेन दग्धोऽस्मि सदा निष्ठुरभाषणः। एवं ब्रुवाणं भर्तारं कृताञ्जलिपुटाऽब्रवीत् ॥७९॥
न दैन्यं भजतां कार्ये न व्रीडां कुरु मां प्रति। न चापि त्वयि मे क्रोधो वर्तते सुमनागपि ॥८०॥
पुरा कृतानि पापानि दुःखानि भवति हि। तानि यः क्षमते साध्वी पुरुषो वा स उत्तमः ॥८१॥
यन्मया पापया पापं कृतं वै पूर्वजन्मनि। तद्दुःखजन्यया न मे दुःखं न विषादः कथंचन ॥८२॥
इत्येवमुक्त्वा भर्तारं सा सुश्रूषन्त्यपालयत्। आनीय जनकाद्वित्तं बन्धुभ्यो वरवर्णिनी ॥८३॥
क्षीरोदवासिनं विष्णुं भर्तृदेहे व्यचिन्तयत्। शोधयन्ती दिवारात्रौ पुरीषं मूत्रमेव च ॥८४॥
नखेन कर्षती भर्तुः कृमीन्देहाच्छनैः शनैः। न सा स्वपिति रात्रौ तु दिवा वा वरवर्णिनी ॥८५॥
भर्तुर्दुःखेन संतप्ता दुःखितेदमथाब्रवीत्। देवाश्च पांतु भर्तारं पितरो ये च विश्रुताः ॥८६॥
कुर्वन्तु रोगहीनं मे भर्तारं हृतकल्मषम्। चंडिकायै प्रदास्यामि रक्तं मांसं सुखोद्भवम् ॥८७॥

होती और दोनोंकी आज्ञाका पालन करता रहता थ। यद्यपि वेश्या उसे अपनी सेवा करनेसे रोकती, फिर भी वह न मानती ओर तुम दोनोंकी परिचर्याम गत दिन लगी रहता थी। इस तरह सेवा करते करते उस दुखियाके बहुत दिन बीत गये। एक दिन उसकेपतिने कुछ ऐसी चीज खा ली, जिससे के दस्त होग यता और कुछ दिनों बाद उसके अतिदारुण भगन्दर रोगका रूप धारण कर लिया॥६९-७२॥ उस रोगके स्वरूप रात-दिन जलने लगा। जब तक उसपर रुपैये थे, तब तक वेश्या रही। बादम घरकी रही-सही पूँजी फूरकर निकल भागी और किसी दूसरेके घर जा बैठी। ऐसी अवस्थाम रोता हुआ मनुष्य अपनी स्त्री-से कहने लगा-॥७३-७५॥ हे देवि! मुझ वेश्यासक्त तथा निष्ठुर पुरुषकी रक्षा करो। हे सुन्दरि! हे पावनि! मैंने जीवनभरमें तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया है। शास्त्र कहता है कि जो दोषी शीलवन्ती भार्या-का निरादर करता है, वह सत्तर जन्म तक नपुंसक होकर जन्म लेता है। अच्छे पुरुष ऐसे मनुष्योंकी रात-दिन निन्दा करते हैं। तुम जैसी सती-साध्वी नारीका अपमान करके मुझे किस नीच योनिम जाना पड़ेगा ॥७६-७८। क्योंकि मैं सदा तुम्हारे ऊपर कुपित रहता और रूखी बात बोला करता था। इस प्रकार दीनभावसे प्रार्थना करते हुए पतिको स्त्रोने हाथ जोड़कर कहा-हे कान्त! आप किसी प्रकार दुःखी न हों और उन बीती बातोंके लिए पश्चात्ताप न करें। मुझ तुम्हारेपर उनके लिए कोई विम्बा या क्रोध नहीं है ॥७९॥८०॥ अपने पूर्वजन्मके किये हुए पाप ही दुःखरूप प्राप्त होते हैं। जो स्त्री या पुरुष उन दुःखोंको सह लेता है, वे उत्तम हैं। मुझ पापिनाने पूर्वजन्ममें जो पाप किये थे, उनको भोगते हुए मुझे किसी तरह का दुःख या विषाद नहीं है॥८१॥८२॥ इतना कहकर उसने अपने पतिका ढाढ़स बंधाया और पिता तथा चाचाओँके पाससे धन माँग लाकर सेवा करने लगा। वह उस गंधी पतिके शरीरमें क्षीरसागरनिवासी विष्णुभगवान्‌का निवास मानती हुई रात दिन मल-मूत्र उठाकर सेवा करती रही ॥८३॥८४॥ पतिके शरीरमें पड़े हुए कीड़ों को नाखुनसे निकालती रहती थी। इस प्रकार सेवा करनेसे रात-दिन कभी उसे सोनेतक की छुट्टी नही मिलती थी। स्वामीके दुःखसे दुःखित होकर वह देवताओंको मनाती, पितरोंसे विनती करती