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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६८५

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६८५

तत्क्षेत्र्यैः स्वान्ध्रधौ स्नानादयोध्यायाः सुरोत्तमाः पुत्र वै साधुवीरे रावणं लोकरावणम् ॥२१।
हत्वा तत्पापशांत्यर्थं करिष्यामि क्रतुं शुभम् । यत्र यागमहासिद्धिर्भविष्यति सुरोत्तमाः २२।
तत्तीर्थं मम नाम्ना हि ख्यातिं श्रेष्ठांगमिष्यति । अयोध्यायां सर्वतीर्थं मामुञ्जलप्रथग्यगे ॥२३॥
चैत्रस्नानं प्रकुर्वाणास्ते नरा मोक्षभागिनः । यथा माघे प्रयागे हि स्नातव्यः सुखमिच्छता॥२४॥
कार्तिकोऽपि यथा काश्यां पञ्चगंगाजलेऽसृत् । द्वारकायां यथा प्रोक्तो वैशाखो माधवप्रियः ॥२५'
अयोध्यायां सर्वतीर्थं तथा चैत्रो भविष्यति । सर्वेषामेव मासानानादौ श्रेष्ठो भविष्यति ।२६॥
चैत्रमासे तु संप्राप्ते सर्वे देवाः सवासवाः, बर्हिर्जले समाश्रित्य तिष्ठध्वं हि ममाज्ञया । २७॥
एवं हरिरुतान् मध्वादोन्दान् सुरानुक्त्वा सूर्यश्चैव नमस्कृतो ययौ ।
वृषेंद्रमारुह्य शिवो निजं स्थलं ययौ सुरास्तेऽपि ययुर्निजं स्थलम् ॥२८॥
तस्मात्सर्वेषु मासेषु मुख्यश्चैत्रः प्रकीर्त्यते । मासादो प्रथमः सर्वैः प्रोच्यते हि वराद्धरेः ॥२९॥
एवं शिष्य यथा पृष्ट तथा ते विनिवेदितम् । कल्पं चैत्रमासस्य रामचंद्रवरादिकम् । ३०॥

शिष्यपुत्र उवाच
स्वामिन् गुरो त्वया चैत्रस्नानं पुण्यतमं स्मृतम् । तत्केनाचरितं पूर्वं का सिद्धिरस्तत्प्रभावतः ॥३१॥
तत्सर्वं विस्तरेणैव ममात्र त्वं निवेदय ।

अगस्त्य उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स शृणु म्वं रत्नार्थवन्मते ॥३२॥
मम तातो नृसिंहारख्यः शुभद्रामीदु द्विजोत्तमः । प्रत्यहं नियमञ्चाण प्रत्रहं भृगुगेत्तमम् ३३॥
एकमप्यन्नक्षेत्रस्थं द्विजमभ्याथितं नृप भूरान्नापुत्रवनदशमंदानादिभियुक्तम् ॥३ ।

और सोमवाससे जिस फलकी प्राप्ति होती है, उस फलकी प्राप्ति उस चैत्रमासके स्नानमात्रसे ही जाया करेगी । कुरुक्षेत्रमें सूर्यग्रहणके समय स्नान दानका जो फल होता है ॥ २१-२४ ॥, वह सब अयोध्याधाम अथवा व्यासाश्रम स्नान करनेसे प्राप्त होगा । इस शरीरमें रावणादि महाबलवान् राक्षसोंको मारकर ब्रह्महत्याके पाप- की शांतिके लिए मैं शुभ यज्ञ करूंगा । हे सुरगण ! जिस स्थानपर वह यज्ञ सम्पन्न होगा, वह स्थान मम नामसे विख्यात होगा । अपितु अयोध्याके सब तीर्थोंका जो स्नान करेगा, वह मनुष्य मोक्षभागी होगा । जिस तरह सुखकी इच्छा रखनेवालोंको माघमें प्रयाग स्नान करना आवश्यक हुआ है ॥ २१-२४ ॥ जिस तरह कार्तिकमें काश्यांके पंचगंगामें स्नान करना उचित है और जिस तरह वैशाख द्वारकामें माधवका परम प्रिय माना गया है, उसी तरह अयोध्या में चैत्रमासका स्नान सर्वश्रेष्ठ होगा । यह मास सब मासोंके आदिम और सबसे श्रेष्ठ माना जायगा ॥ २५-२६ ॥ चैत्रमासके आनेपर इन्द्रसमेत समस्त देवता यहाँ आकर निवास करें । यह मेरा आज्ञा है, ॥ २७ ॥ विष्णुभगवान्‌ने इन्द्र आदि देवताओंसे ऐसा कहा और देवताओंने उनका प्रणाम किया । जिससे मनुष्यताका एक असाधारण कान्ति चमक उठा । तद- नन्तर शिवजी नन्दीपर सवार होकर अपने स्थानको चल पड़े । अन्य देवता भी अपने-अपने स्थानको चल पड़े ॥ २८ ॥ इसी कारण चैत्रमास सब मासोंमें श्रेष्ठ माना जाता है और भगवान्के वरसे सब मासोंके आदि- में गिना जाता है ॥ २९ ॥ इस प्रकार हे शिष्य ! जैसा तुमने पूछा, वह रामचंद्रजीके वरदान आदिका वृत्तान्त मैंने कह सुनाया ॥ ३० ॥ शिष्यपुत्रने कहा हे स्वामिन् ! हे गुरु ! आपने पवित्र चैत्रस्नानका विधान बतलाया । अब यह बताइए कि इस व्रतको किसने किया था और इससे उसे कौन-सी सिद्धि प्राप्त हुई या ॥ ३१ ॥ यह सब विस्तारपूर्वक आप हमें बतलाइए । श्रीअगस्त्यने कहा-तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है । अब मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनो ॥३२॥ मेरे पिता नृसिंहका एक नियम था । वे कमलगुडसेवनोंमें एक ब्राह्मणको पुत्र-कलत्र एवं दास-दासी समेत बुलाकर सार कुटुम्बका भोजन कराते और अच्छी तरह आदर-सत्कार करते थे ।

६४६आनन्दरामायणे[ सर्गः ११

कुटुम्बभोजं हर्म्ये स ऽस्थापयामास । लक्ष्म्याऽत्मानौ तु मन्याना तावुभौ रामतत्परौ ॥३५॥
पुत्राभावमदृष्ट्वा तौ वृद्धौ पुत्रार्थमुद्यतौ । रूपदोषपरिहारार्थमुपायं कर्तुमुद्यतौ ॥३६॥
निदासाख्ये पुरे गत्वा देवीं मातङ्गीं शुभाग् । स्वायेष्टदेवतामम्बां प्रवरातीरवासिनीम् ॥३७॥
दृष्ट्वा दम्पत्य तौ सेवां नित्यं तत्र प्रचक्रतुः । गते बहुतिथे काले वादा या महालया ॥३८॥
प्रत्यक्षात द्विजं भूत्वा प्राह तदावशांतये । हे नृसिंह महाबुद्ध गच्छाथोध्यापुरीं प्रति ॥३९॥
तत्र वै सायुताये रामतीर्थे महामये । चैत्र मासि वसंतर्तो यदा स्यान्मीनगो रविः ॥४०॥
चैत्रस्नानं मासमेकं कुरु तत्र द्विजोत्तम । पातकं सकलं त्यक्त्वा पुत्र प्राप्स्यस्यसंशयम् ॥४१॥
इति देव्या वचः श्रुत्वा द्विर्जावत्तारवस्तदा । ययौ मार्गे हृदि ध्यायन्नयोध्याख्यां पुरीं शुभाम् ॥४२॥
चिंतया परया व्याप्तः कथं गतुं हि शक्यते । मयाऽयोध्यापुरी दूरमिता कष्टं च जीवितम् ॥४३॥
इति चिंतायुतो मार्गे क्वचित्तिष्ठन्क्वचित्स्खलन् । भार्यायाश्च करे धृत्वा वृद्धश्चैव ययौ द्विजः ॥४४॥
एवं गोदावरीतीरं गत्वा स्नात्वा द्विजोत्तमः । राममूर्त्ति पुरः स्थाप्य पूजयामास भक्तितः ॥४५॥
तावन्तमे प्रसन्नोऽभूद्रामो देव्याः प्रमादतः । द्विजं प्राह नृश्रेष्ठो भो नृसिंह द्विजोत्तम ॥४६॥
माऽयोध्यां त्वमितो गच्छ शृणु मे वचनं शुभम् । इतः पूर्वं षड्वि हि याजनद्वयसम्मतम् ॥४७॥
प्रतिष्ठानाभिधं क्षेत्रं गोदाया उत्तरे तटे । तत्रास्ति रामतीर्थ हि मन्नाम्ना च मया कृतम् ॥४८॥
तत्रन्त्वं गच्छ विप्रेंद्र स्नात्वा तीर्थे हि भार्यया । चैत्रमासे वसंततौं यदा स्यान्मीनगो रविः ॥४९॥
तदा कुरु विधिश्रेण पूजांन्चिन्ता च मा शुभम् । रापत्तयः पुत्रलाभो भविष्यति न संशयः ॥५०॥
इत्युक्त्वा रघुवास्तु तत्रैवांतरधायत । यत्र शृंगाद्दद रामः प्रसन्नोऽभूद्द्विजाय हि ॥५१॥
तस्मात्स वै रामह्रदो नाम्ना सर्वत्र गीयते । तद्रामवचनपद्विप्रः प्रतिष्ठानपुरं ययौ ॥५२॥
मासमेकं च वै स्थित्वा चैत्रस्नानं चकार ह । सूर्योदये समुत्थाय कृतशौचादिक्रियः ॥५३॥


रुकमानाम्नी भर, माता और पिता ये दोनों असाधारण रामभक्त थे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ किन्तु वृद्धावस्था पर्यन्त पुत्रका अभाव देखकर उन्होंने अपना दोष शान्त करनेके लिए उपाय करना प्रारम्भ किया ॥ ३५ ॥ इसके लिए वे प्रवराके तीरपर रहनेवाली अपनी इष्टदेवी अम्बा मातङ्गीके पास गये ॥ ३६ ॥ उनका दर्शन करके उन्होंने बहुत दिनों तक देवीकी आराधना की कुछ दिनों बाद देवी प्रत्यक्ष होकर कहने लगी—हे महाबुद्धिमान् नृसिंह ! तुम यहाँसे अयोध्यापुरी जाओ । वहाँके महातीर्थ सरयूतीरके जलमें जब वसन्त ऋतुके समय सूर्य मीनराशिपर आयें, तब एक महीना चैत्रस्नान करो । ऐसा करनेसे तुम्हारे सब पातक नष्ट हो जायँगे और तुम्हे पुत्रकी प्राप्ति होगी ॥ ३७-४१ ॥ देवीकी यह बात सुनकर वे अयोध्यापुरीका ध्यान करते हुए चले । उन्हें यह बडा चिन्ता थी कि अयोध्यापुरी तो यहाँसे बहुत दूर है और मुझे अपना जीवन भी भारी हो रहा है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ ऐसा सोचते हुए वे कभी बैठ जाते, कभी गिर पडते और कभी अपनी स्त्रीका हाथ पकडकर वे मेरे वृद्ध पिता चले थे ॥ ४४ ॥ इस तरह किसी प्रकार वे गोदावरी के तटतक पहुंचे। वहाँ उन्होंने स्नान किया और सामने रामकी मूर्ति रखकर भक्तिपूर्वक पूजन करने लगे ॥ ४५ ॥ तबतक देवीके आशीर्वाद्से रामचन्द्रजी प्रसन्न होकर सामने आये और कहने लगे—हे द्विजोत्तम नृसिंह ! अब तुम अयोध्या मत जाओ ! यहाँसे केवल तीन योजन दूर गोदावरीके उत्तर तटपर प्रतिष्ठान नामक क्षेत्र है। वहाँ मेरे नामसे प्रसिद्ध रामतीर्थ है। मैंने ही उसकी स्थापना की है ॥ ४६-४८ ॥ तुम वहाँ जाओ और चैत्रमासमें जब सूर्य मीन राशिपर आयें, तब भार्याके साथ स्नान करके मेरा विधिवत् पूजन करो । ऐसा करनेसे तुम्हारे सब पातक नष्ट हो जायेंगे और तुम्हे पुत्रकी प्राप्ति होगी। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ४९ ॥ ५० ॥ ऐसा कहकर रामचन्द्रजी वहीं ही अन्तर्धान हो गये। जिस शृङ्गानामक सरोवरके तटपर राम प्रसन्न हुए थे, वह स्थान रामह्रदके नामसे विख्यात हुआ। रामके कथनानुसार व वृद्धदम्पती अपनी भार्याके साथ उस प्रतिष्ठानतीर्थको गये

सर्गः ११] मनोहरकाण्डम् ६८७


स्नात्वा तस्मिन् रम्यतीर्थे सरयूसङ्गमन्विते । रामचन्द्रं स्वर्णगिरौ पूजयामास भक्तितः ॥५४॥
प्रदक्षिणाः स्वर्णगिरेश्चकार नव प्रत्यहम् । नवपुष्पैश्च नैवेद्यैः पूजयामास राघवम् ॥५५॥
चैत्रशुक्लतृतीयाया यावद्वैशाखसंभवः । तृतीया शीतला गौरी स्नानं चक्रे च भार्यया ॥५६॥
एवं मासं व्रतं कृत्वा स द्विजस्तृप्तमानसः । प्रत्यर्कं प्रति मार्गेण ययौ लक्ष्म्या समन्वितः ॥५७॥
यावन्मार्गे द्विजोऽगच्छत्तावद्दृष्टास्त्रयो नराः । पिशाचाः क्षुत्प्रक्रान्तेस्नानुद्धार्य सभार्यया ॥५८॥
ययौ स्वनगरं रम्यं गोदानाभिर्विराजितम् । चैत्रस्नानप्रभावेण जातस्तन्मानुषस्त्वदम् ॥५९॥
तस्मान्मया ते कथित वर हि स्नानं मधौ ते सरयूज़ले वै ।
साकेतपुर्यां नराप्रतीर्थे भुक्तिप्रदं मोक्षदसुन्दम् च ॥६०॥

विष्णुदास उवाच
कथ पिशाचयोन्यास्ते मुक्ता विप्रेण वै त्रयः । कस्मात्पापाच्च ते सर्वे पैशाचीं योनिमाश्रिताः ॥६१॥
तन्मर्वं विस्तरेणैव श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुखात् ।

श्रीरामदास उवाच
शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि रम्भानाम्नी वराऽप्सराः ॥६२॥
चैत्रे स्नात्वा चरायोद्ध्याम्रयूनिर्मले जले । आर्द्रवस्त्रवृता चारुहास्यालंकारमण्डिता ॥६३॥
गृहीत्वा सरयूतोयं रत्नकांचननिर्मिते । पात्रे रामेश्वरं सेतुं द्रष्टुं मौनेन सा जगात् ॥६४॥
ययावाकाशमार्गेण पिशाचा यत्र ते त्रयः । तदार्द्रवस्त्रचांचल्यत्किंबिन्दुभिः प्रोक्षिताश्च ते ॥६५॥
क्रूरस्वभावमुत्सृज्य चाश्चर्यं परमं ययुः । पूर्वजन्मानुस्मरणमभूत्तेषां तदा नृप ॥६६॥
विस्मयाविष्टचित्तास्ते तां दृष्ट्वाप्सरसं दिवि । बहुधा प्रार्थनामासुस्त्वन्मा पप्रच्छ संस्रया ॥६७॥


॥ ५१ ॥ ५२ ॥ वहाँ रहकर उन्होंने एक मास पर्यन्त चैत्रस्नान किया। उनका यह नियम था कि प्रतिदिन सूर्योदयमें पहले होकर उठ जात और नित्यकृत्यसे निबटकर सरयूसङ्गमपर विद्यमान तीर्थमें स्नान करते और भक्तिपूर्वक स्वर्णगिरिपर रामचन्द्रजीको पूजा किया करते थे ॥ ५३, ५४ ॥ प्रतिदिन वे उस स्वर्णगिरिकी नौ परिक्रमा करते और नौ पुष्पों और विविध प्रकारके नैवेद्योस रामका पूजन करते थे। वह व्रत उनका तबतक चलता रहा, जबतक वैशाखके शुक्लपक्षका तृतीया नहीं आयी। तृतीयाके आनेपर उन्होंने तृतालागौरी नामक स्नान किया ॥ ५५ ॥ ५६ । इस तरह एक मास तक व्रत करके प्रसन्न चित्तसे वे ब्राह्मणदेवता अपनी पत्नीके साथ कमलपुरको चले ॥ ५७ ॥ जाते-जाते रास्तेम उनको तीन पिशाच मिले। वे तीनो बडे भूखे थे मेरे पिता-माताने उनका उद्धार किया और अपने नगरको गये। उसी चैत्रस्नानके प्रभावसे वे उनका पुत्र होकर जन्मा ॥ ५८ ॥ ५९ ॥ इसलिए मैने चैत्रमासमे अयोध्याके पवित्रतीर्थम मुक्ति-मुक्तिप्रद सरयूजलमे स्नानका विधान बतलाया है ॥ ६० ॥ विष्णुदासने कहा-वे तीनों पिशाच किस तरह उस पिशाचयोनिसे छूटे और किस पापसे वे पिशाचयोनिमें पड़े थे। यह वृत्तान्त भो विस्तारपूर्वक मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। श्रीरामदास कहने लगे-हे शिष्य ! सुनो, यह कथानक भी मै कहता हूँ। रम्भा नामकी एक सुन्दरी अप्सरा थी ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ उसने चैत्रमासमें अयोध्याके सरयूजलमें स्नान किया। उसक कपड़े भींग गये थे मन्द मुस्कान उसके होठोपर खेल रही थी और उसके अंगमें पड़े हुए विविध प्रकारके आभूषण अपनी असाधारण शोभा दिखा रहे थे ॥ ६३ ॥ स्नानके अनन्तर उसने रत्न और कांचनसे बने हुए पात्रमें रामेश्वर शिवको स्नान करानेके लिये सरयूजल भरा और मौन होकर आकाशमार्गसे रामेश्वरको चल पड़ी। जाते-जाते वह उस स्थानपर पहुंची, जहाँ वे तीनों पिशाच रहते थे। रम्भाक भीगे वस्त्रसे पानीकी कई बूंदें गिरकर इन पिशाचोँपर पड़ीं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ इससे उनका क्रूर स्वभाव छूट गया और उन्हे पूर्वजन्मकी सब बात याद आ गयीं ॥ ६६ ॥ तदनन्तर वे तीनों विस्मित होकर बहुत तरहस प्रार्थना करने लगे। रम्भाने संत्रसमें उनसे पूछा- ॥ ६७ ॥

६८८ आनन्दरामायणे [सर्ग ११

कस्माद्ययं पिशाचा हि जातास्तत्कथ्यतां मम। इति तत्करुणसंतापेरितास्ते ऽब्रवन्स्तदा। ६८॥
तेषु द्वौ वदन्मातौ हि कथयामासतुश्च ताम् । शृणु भामिनि वार्ता हि पूर्वजन्मनि भूसुरात् । ६९।
विरजायां समुत्पन्नौ श्रोत्रियाद्धरशर्मणः । उपाध्यायन कर्तुं कञ्चिन्नारायणाह्वयम् । ७०॥
शुश्रूषया तोषयित्वा गुरुं तत्रैव मध्यतुः । नारायणसुतां चारुहासां चन्द्रनिभाननाम् ॥७१॥
दृष्ट्वा ऽऽभ्यां मैथुनं दृष्ट्वा प्रार्थ्य तां स्त्रियम । आवाभ्यां च दिना मुक्ता तज्ज नं गुरुणा चिरात् ७२।
आवाभ्यां च ददौ शापं तस्यै चाप्यशरुत्क्रुधा । युवां चापि कुमार्य्य विशाचत्वं गमिष्यथ । ७३॥
ततोऽस्माभिस्तिभिस्तं तु मुनिं नत्वा पुन पुनः । शापस्यान्तस्तो लब्धस्तच्छृणु मनागये । ७४॥
चैत्रमासे नृसिंहारख्यः कश्चिद्विप्रश्च कानने ददाति स्नानजं पुण्यं तदोद्धारो भविष्यति ॥७५॥
एवं जाता पिशाचा हि वयं व्यङ्गाङ्गिबुद्धिभिः। प्रोक्षिताः स्मोऽद्य तेऽङ्गैर पूर्वजन्मस्मृतिः शुभा ७६॥
तत्तंषां वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा शापस्य मोक्षणम् । मान्वोथन्त्य कारणेन शीघ्रं म नृहरिः प्रिया ॥७७॥
आगमिष्यति मा चिंतां कुरुतेति वरांगना । ययौ रामेश्वरं शीघ्र पूजयित्वा गता दिवम् । ७८॥
चैत्रमासे संतिक्रांते संगतः नृहरिद्विजः । भार्यया सहितो दृष्ट्वा पिशाचैस्तैः पिता मम ॥७९॥
स्थित्वा दूर च ते सर्वे तमूचुर्नृहरिं द्विजम् । नैजं वृत्तं समस्तं हि शापस्यापि विम क्षणम् , ८०।
तच्छ्रुत्वा नृहरिर्विप्रस्तानूवाच मुदान्वितः । मा मेष्टव्यं पिशाचा अद्यथा शम्भुद्विजेन सः । ८१॥
राक्षसो मोचितः पूर्वं मोचयिष्याम्यहं तथा ।

पिशाच उवाच

कः शम्भुश्च कदा मुक्तो राक्षसः कः सविस्तरम् ॥८२॥


तुमलोग इस पिशाचयोनिको क्यों प्राप्त हुए हो सो कहो। इस प्रकार रम्भाके सुधोक्त संकेत पाकर उन तीनोंमेंसे दो बोले-हे भामिनी ! सुनो पूर्वजन्मम हम दोनों विरजा नाम्नी स्त्री द्वारा हर शर्मा नामक ब्राह्मणसे उत्पन्न हुए थे। अवस्थानुसार हम दोनों विद्या पढ़नेके लिए नारायण नामक एक गुरुके यहाँ गये वहाँ उनकी सेवा करते हुए रहने लगे । गुरुजीकी एक सुन्दरी कन्या थी । उसको मनोहारिणी मुसकान थी और चन्द्रमा के समान मुख था ।। ६८-७१ । उस देखकर हम दोनोंने उससे मित्रता कर ली और समय पाकर बहुत अनुनय विनय करके हम दोनोंने उसके साथ भोग किया। बहुत दिनों बाद यह बात गुरुजीको ज्ञात हो गयी ॥ ७२ । उन्होंने कुपित होकर हम तथा उस कन्याको शाप देते हुए कहा कि इस कुमारीके साथ तुम दोनों पिशाच हो जाओ । ७३ ।। इसके बाद हम तीनोंने उन मुनीश्वरको बार-बार प्रणाम करके किसी तरह शापके अन्तका वचन पाया सो भो सुन लो ॥ ७४ । उन्होंने कहा कि चैत्रमासमें कोई नृसिंह नामका ब्राह्मण इस वनमें आयेगा और वह अपने नैत्यस्नानका पुण्य तुम्हे प्रदान करेगा तब तुम्हारा उद्धार होगा । ७५ ।। इस तरह हमलोगोंको यह पिशाचयोनि मिली । अहोहम आपके अमृतरससे प्रोक्षित हो गये। इस कारण हमें पूर्वजन्मकी सब बातें याद आ गयीं ॥ ७६ । इस प्रकार उनकी बात सुनकर रम्भाने संशयहीन हो कहा कि तुम लोग धैर्य रखो । अब शीघ्र ही नृसिंह ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ इस वनमें आनेवाले हैं ॥ ७७ ॥ तुमलोग किसी प्रकारकी चिन्ता मत करो। इतना कहकर रम्भा रामेश्वर चली गयी। वहाँ उसने शिवजीका पूजन किया और आकाशमार्गमें होकर अपने स्थानको चली गयी ॥ ७८ ॥ चैत्रमास वनन्तर नृसिंह अपनी भार्याके साथ उस वनमें पहुंचे और उन पिशाचोंको देखा । ७९ ।। वे तीनों पिशाच नृसिंहके पास न आकर थोड़े दूरपर खड़े हो गये और अपन पूर्वजन्मका वृत्तान्त एवं शापसे मुक्ति पानेका उपाय कह सुनाया ॥ ८० ॥ उनकी बात सुनकर मेरे पिताजीने कहा-तुम लोग घबड़ाओ नहीं । जिस प्रकार शम्भुनामक ब्राह्मणने उस राक्षसको पिशाचयोनि से मुक्त किया था उसी तरह मैं भी तुम लोगोंको इस योनिसे मुक्त कर दूंगा उनकी बात काटकर पिशाचों-मसे एकने कहा कि शम्भु विप्र कौन थे और वह राक्षस कौन था ? यह वृत्तान्त विस्तारपूर्वक आप हमें