श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५८२
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५८२
मुकुटं कुण्डले रम्ये मुद्रिकाः कङ्कणे तथा। नूपुरे रत्नजालानाः केयूरे रत्नमण्डिते ॥१८४॥
इत्यादीन्नामभूषांश्च दिव्यस्वर्णमयान्यविभो। त्वदर्थं च मयानीतानलङ्कारान् गृहाण भोः ॥१८४॥
छत्रं सव्यजनं रम्यं चामरद्वयसंयुतम्। त्वदर्थं च मयाऽऽनीतं गृहाण विपुलोदन ॥१८५॥
सुगन्धं चन्दनं दिव्यं कस्तूरीमिश्रितं तथा। रक्तचन्दनसंयुक्तं गृहाण त्वं मयाऽर्पितम् ॥१८६॥
अक्षतांश्च वरान् दिव्यान्मुक्ताफलविनिर्मितान्। कर्पूराद्रान्द्रुमेशान्चान् गृहाण परमेश्वर ॥१८७॥
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो। मयाऽहृतानि पूजार्थं गृहाण रघुपायक ॥१८८॥
वनस्पतिरसोद्भूतं गन्धयुक्तं सुशोभनम्। आघ्रेयं सर्वदेवानां धूपं गृहाण राघव ॥१८९॥
आज्यं त्रिवर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण भो राम त्रैलोक्यतिमिरपह ॥१९०॥
अन्नमन्नरसं सम्यक् पायसंघृतमिश्रितम्। शर्करामधुसंयुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥१९१॥
आम्रादीनि सुपक्वानि फलानि विविधानि च। समर्पितानि ते राम गृहाण रघुनन्दन ॥१९२॥
पूगीफलसमायुक्तं नागवल्लीदलैर्युतम्। कर्पूरैलायुतं ताम्बूलं स्वीकुरु प्रभो ॥१९३॥
हिरण्यं ब्रह्मसम्भूतं वह्नितेजःसमुद्भवम्। दीयते दक्षिणार्थे ते गृहाण रघुनन्दन ॥१९४॥
एवं मया षोडशोपचाराः सविस्तरं ते कथिताः विशाम्पते।
आवाहनाद्यश्च हि दक्षिणांतः शेषा अप्यंशं सकलां हि दृश्ये ॥१९५॥
पञ्चवर्तिमसंयुक्तं कपिलाऽऽज्यविमिश्रितम्। वह्निना योजितं रम्यं गृहाण त्वं निराजनम् ॥१९६॥
जाती चंपककन्दारौ केतकी तुलसी तथा। दमनो मुनिकुन्दैश्च ददामि स्वामिनं तव ॥१९७॥
एभिर्नवविधैः पुष्पैर्मन्त्रपुष्पाणि राघव। मयाऽर्पितानि गृहाण प्रसीद परमेश्वर ॥१९८॥
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे ॥१९९॥
२८४ नवोर सूत्रसे बना तथा सुवर्णसंयुक्त यज्ञसूत्र मैं आपको देता हूँ, इसे आप स्वीकार करिये ॥ १८२ । मुकुट, रत्न कुण्डल, मुद्रिका, कंकण, नूपुर स्वर्णनिर्मित जंजीरका माला, रत्नमण्डित केयूर इत्यादि परम रम्य, दिव्य, स्वर्ण और बाणमय दन अलंकार मैं आपके लिए लाया हूँ। इन आप ग्रहण करिए ॥ १८४ ॥ १८४.५ ॥ व्यजन और चमर संयुक्त छत्र मैं आपके लिए लाया हूँ। हे रघुनन्दन, इसे आप स्वीकार करिए ॥ १८५ ॥ सुन्दर गन्धयुक्त, दिव्य कस्तूरी अमिश्रित तथा लाल चन्दन (घिसा चन्दन) मैं आपके लिए लाया हूँ सो आप ग्रहण कीजिए ॥ १८६ । पाजाके टुकड़ासे बनाया हुआ कर्पूरा और दुमट्ममिश्रित अक्षत मैं आपको समर्पण करता हूँ, इसे आप ग्रहण करें ॥ १८७ ॥ मालती आदि सुगन्धित कुशस बनी माला मैं आपको पूजाके निमित्त लाया हूँ, हे रघुपायक ! इन आप ग्रहण कीजिए ॥ १८८ ॥ वनस्पतिकारस उत्पन्न, गन्ध-युक्त, उत्तम सूंघनेवाला और सब देवताओंके सूँघने योग्य धूप आपके लिए लाया हूँ इसे ग्रहण कीजिए ॥ १८९ ॥ घीसे भीगी तीन बत्तियोंवाले दीपकको लाया हूँ। हे तीनों लोकोंका अन्धकार दूर करनेवाले राम ! इसे आप ग्रहण करिए ॥ १९० ॥ साने योग्य अन्न, दूध घी, चामर तथा मधुमिश्रित नैवेद्य मैं आपको अर्पण करता हूँ, इसे ग्रहण करिए ॥ १९१ ॥ आम्र आदिक खूब पके अच्छे अच्छे फल मैं आपको अर्पण करता हूँ, इसे ग्रहण करें ॥ १९२ ॥ सुपारी युक्त पानके पत्तोंस झाड़ा हुआ और अनेक मसालों युक्त ताम्बूल आप ग्रहण करें । १९३ ॥ हे रघुनन्दन ! ब्रह्मस उत्पन्न तथा अग्निके तेजसे आयमान सुवर्ण मैं दक्षिणाके लिए आपको देता हूँ, उसे आप स्वीकार करें ॥ १९४ ॥ हे वत्स ! इस तरह मैंने विस्तारपूर्वक आवाह्नसे दक्षिणा तकके षोडश उपचायोंको कह सुनाया। शेष पूजनादि आगे बतलाता हूँ ॥ १९५ ॥ पाँच वत्तियोंसे युक्त, कपिला गौके घृतसे मिश्रित एवं अग्निसे संयोजित रम्य नीराजन मैं आपको अर्पण करता हूँ सो स्वीकार करिए ॥ १९६ ॥ जूही, चम्पा, कन्दार, केतकी, तुलसी दमनक, अगस्त और दो प्रकारके मुनिकुन्द इन नौ फूलोंका मन्त्रपुष्प मैं आपको देता हूँ। हे परमेश्वर ! इसे स्वीकार करिए और मेरेपर प्रसन्न होइए । १९७ ॥ १९८ ॥ जन्मान्तरमें भी मैने जिस किन्हीं पापोंको किया हो, वे नष्ट हो जायें।
५८२ आनन्दरामायणे [सर्गः ३
उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।
पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां साष्टांगश्च नमोऽस्तु ते ॥२००॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर ॥२०१।
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं रघूत्तम ।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥२०२॥
एवं श्रीरामचन्द्रस्य भक्त्या कार्यं प्रपूजनम् ।
निरन्तरं तथा कार्यं नवम्यां च विशेषतः ॥२०३॥
विष्णुदास उवाच
गुरो नवविधैः पुष्पैस्त्वया पुष्पांजलिः कथम् ।
निवेदितोऽत्र रामस्य पूजने तद्वदस्व माम् ॥२०४।
त्वत्तो नानाविधाः पूजाः सुरणां च मया श्रुताः ।
एवं तन्मे श्रुतो नैव नवपुष्पांजलिः कदा ॥२०५॥
श्रीरामचन्द्र उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु ।
आसीत्पुरा द्विजवरः कावेर्या उत्तरे तटे ॥२०६।
रामनाथपुरे कश्चित्सुन्दरश्चाऽतिभक्तिमान् ।
तस्याऽभवन् पुत्राश्च रामचिंतनतत्पराः ॥२०७॥
चन्द्रोऽथचन्द्रश्चन्द्राभश्चन्द्रायश्चंद्रशेखरः ।
चन्द्रांशुर्जितचन्द्रश्च चन्द्रचूड़ोऽष्टमः स्मृतः ॥२०८॥
रामचन्द्रांशतः नव गृहाप्ताश्च नव स्मृताः ।
एकदा ते त्रयोऽोध्यायां रामं भक्तकृपाकरम् ॥२०९॥
द्रष्टुं मधुचैत्रमासे तस्थुस्ते सरयूतटे
तावत्तत्र समायाता नानादेशान्तरस्थिताः । २१०॥
जनानां कोटयश्च नानावाहनसंस्थिताः ।
सरय्यां शमतीर्थे हि चैत्रस्नानमादरात् ॥२११।
तेषां समागतानां हि समर्द्दस्तत्र वै बभूत् ।
समर्दाद्रामचन्द्रस्य तेषां नाभूच्च दर्शनम् ॥२१२॥
तदा ते मंत्रयामासुर्नव विप्राः परस्परम् ।
कथं श्रीरामवभ्रयात्र समर्दे दर्शनं भवेत् ॥२१३.।
खेजातं त्वतियत्नेन तर्हि यत्किं न दर्शनम्
यावत्सम्येन मनसा राघवो न निरीक्षितः । २१४।
तावत्तद्दर्शनं नैव तृप्तिं नो जनयिष्यति ।
तदा चन्द्रोऽब्रवीज्ज्येष्ठस्त्वत्रैव शमदर्शनम् ॥२१५।
एक-एक पग चलकर मैं आपकी प्रदक्षिणा करता हूँ ॥१९९॥ हृदयसे, मस्तकसे, दृष्टिसे, मनसे, वचनसे, हाथोंसे, पैरोंसे और घुटनोंसे मैं साष्टांग प्रणाम करता हूँ ॥२००॥ हे परमेश्वर ! न मैं आवाहन करना जानता हूँ, न विसर्जन करना आता है। पूजन करना भी मैं नहीं जानता। यदि कुछ भ्रम हुआ हो तो आप क्षमा करें ॥२०१॥ हे रघूत्तम ! मंत्रसे, क्रियासे और भक्तिसे हीन मैने जो कुछ पूजा की है हे देव ! वह सब परिपूर्ण हो जाय । २०२। इस तरह निरन्तर भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए और नवमीको विशेष करके ऐसा करना उचित है ॥२०३॥ विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! इस पूजनके प्रसङ्गमें आपने नौ प्रकारके फूलोंसे पुष्पाञ्जलि देनेकी विधि क्यों बतलाई है ? सो आप हमसे कहिये ॥२०४॥ अबतक आपने मुझे बहुतसे देवताओंका विविध पूजन बताया, किन्तु उनमें नवपुष्पाञ्जलि आपने कहीं नहीं बतलायी ॥२०५॥ श्रीरामदासने कहा- हे शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सो सावधान मन होकर सुनो। बहुत दिनों-की बात है, कावेरी नदी के उत्तर तटपर रामनाथपुरम अति भक्तिमान् सुन्दर नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह रामका ध्यान करता था। रामका ध्यान करनेवाले उस भक्तके नौ बेटे थे ॥२०६॥२०७॥ चन्द्र, अति-चन्द्र, चन्द्राभ, चन्द्राय, चन्द्रशेखर, चन्द्रांशु, जितचन्द्र, चन्द्रचूड़ और गूढ़ाम रामचन्द्र ये उन लड़कोंके नाम थे। एक बार चैत्रके महीनेमें वे नवों लड़के भगवान् रामचन्द्रका दर्शन करनेके लिये अयोध्या गये। वहीं पहुंचकर वे सरयूके तटपर पहुंचे। तब तक अनेक देशोंके रहनेवाले करोड़ों मनुष्य चैत्रमास स्नानके लिये अनेक प्रकारकी सवारियोंपर चढ़कर वहाँ आ पहुंचे ॥२०८-२११॥ उन आये हुए लोगोंकी भारी भीड़के कारण वे नवों ब्राह्मणकुमार रामचन्द्रजी का दर्शन नहीं पा सके ॥ २१२॥ उस समय उन्होंने परस्पर मंत्रणा की कि इस प्रकारका भीड़में रामचन्द्रजीका दर्शन कैसे हो ॥२१३॥ बहुत प्रयत्न करनेपर यदि थोड़ा-सादर्शन हो भी जाय तो जबतक अच्छी तरह उन्हें न देख सकूँ तो दर्शनसे लाभ ही क्या ? ॥२१४॥ उस क्षणिक दर्शनसे हमें सन्तोष नहीं होगा। उनमेंसे ज्येष्ठ भ्राता चन्द्र बोला कि हमलोग तीव्र तपस्या करके यहीं ही रामचन्द्रजीका
सर्गः १] मनोहरकाण्डम् ५८३
वयं क्षेणेण तपसा प्राप्स्यामस्तत्फलं हरः। तच्चन्द्रवचनं श्रुत्वा पुनः प्रोचुर्द्विजोत्तमाः ॥११६॥
एककाले तु सर्वेषां वक्ष्यामस्त्वन्तरेण हि। कस्यादौ रामचन्द्रश्च दास्यत्यत्र प्रहर्शनम् ॥११७॥
कस्य दास्यति पश्चाच्च विदितं तद्भविष्यति। कस्यास्मासु दृढा भक्तिर्विदिता सा भविष्यति ॥११८॥
एवं परस्परं चोक्त्वा ते सर्वे द्विजसूनवः। त्यक्तादाश बाष्पुमञ्चार्थकान्ते तत्परेण हि ॥११९॥
गत्वाऽतिदूरं संमर्दात्सेदुः सर्वे तपो महत्। तत्सर्वं राघवौ ज्ञात्वा सर्वसाक्षी जगत्प्रभुः ॥१२०॥
तेषां स्वदर्शनं दातुं नवमे दिवसे मुदा। संवादामास श्रीरामः सर्ग चिन्ते समास्थितः ॥१२१॥
एककाले तु सर्वेषां यदि दास्यामि दर्शनम्। तर्ह्येष तुष्टिः सर्वेषां भविष्यति न चेतरहि ॥१२२॥
अतोऽद्याहं करिष्यामि नव रूपाणि निश्चयात्। एवं संमन्त्र्य श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह सादरम् ॥१२३॥
शिविकामानयस्वाद्य बहिर्गच्छाम्यहं मुदा। तथेति राघववाक्येन शिविकां लक्ष्मणाऽथवा ॥१२४॥
आनयामास दूतैः स राघवाय न्यवेदयत्। तदा सिंहासनाद्रामश्चोत्थार्य शिविकास्थितः ॥१२५॥
बन्धुमित्रैर्विवृत्तैश्च सुहृन्मित्रादिभिर्युतः। वाहैः शनैश्चयोध्याया ययौ रामो मुदान्वितः ॥१२६॥
ततस्तं जनसंमर्दं समतिक्रम्य राघवः। चकार नव रूपाणि ह्यात्मनः परमेश्वरः ॥१२७॥
शिविकाः सुहृदो भ्रातॄन्तान्मित्रान्भ्रातृन्वाहनान्। चकार नवधा राघवेन्द्रा म क्षणमात्रतः ॥१२८॥
निरीक्षितुं समायाता नास्यान तान् जनानापि। चकार नवधा रामस्तद हुतमिवाभवत् ॥१२९॥
ततस्तैस्तैर्जनैर्मित्रैर्हूतैर्बन्धुजनैः सह। नवानां भूसुराणां हि ययावग्रे रघूत्तमः ॥१३०॥
ततस्ते भूसुराः सर्वे तदेकसमये प्रभुम्। आत्मनः पुरतो रामं ददृशुस्तं पृथक् पृथक् ॥१३१॥
तुष्टुष्टमनसः सर्वे प्रणेमू रघुनन्दनम्। शिविकाभ्योऽवततारामस्तवुरुढ्वा पृथक् पृथक् ॥१३२॥
नवरूपधराः सर्वांन्विप्रानालिंग्य सादरम्। ऊचुर्मधुरया वाचा प्रसन्नमुखपङ्कजाः ॥१३३॥
दर्शन पा लेंगे। चन्द्रकी इस बातको सुनकर वे सब बोल उठे कि यदि हम सब भाई एक साथ तपस्या करने लग जायें तो रामचन्द्रजी किसको पहिले दर्शन देंगे ॥ ११५-११७॥ और किसको सबसे पीछे? इससे यह बात भी ज्ञात हो जायगी कि हममेंसे किसकी भक्ति दृढ है ॥११८॥ इस तरह परस्पर बातचीत करके वे सब ब्राह्मणबालक उस भीड़से दूर जा बैठे और भोजन त्यागकर केवल जप पंन्त हुए एकाग्र मनसे तपस्या करने लगे। सारे संसारके साक्षी तथा निमित्त जाननेके प्रभु रामचन्द्रसे यह बात छिपी नहीं रही ॥ ११९॥ १२०॥ नवें दिन उन्होंने अपनी सभामें उनको दर्शन देनेके विषयमं मन्त्रणा की ॥ १२१॥ इसके बाद क्षण भर अपने मनमें विचार किया कि यदि उनको एक ही समयमें दर्शन न दूंगा तो वे सन्तुष्ट नहीं होंगे ॥ १२२॥ इस कारण आज मैं नौ रूप धारण करूँगा। ऐसा निश्चय करके उन्होंने लक्ष्मणसे सादरपूर्वक कहा- ॥ १२३॥
हे लक्ष्मण ! पालकी मँगाओ। आज मैं बाहर घूमने जाऊँगा बहुत अच्छा कह तथा दूतों द्वारा लक्ष्मणने पालकी मँगवाकर रामचन्द्रजीको इसकी खबर दी तब सिंहासनसे उतरकर राम पालकी में बैठे और भाईयों, मन्त्रियों, सम्बन्धियों तथा मित्रोंके साथ धीरे धीरे अयोध्यासे बाहर निकले ॥ १२४-१२६ ॥ उस विशाल भीडको पार करके रामचन्द्रने नौ रूप धारण किया ॥ १२७॥ क्षण भरके भीतर रामने पालकी, सम्बन्धों, सब भाई, दूत तथा वाहन समेत सब मित्रोंको नौ रूपमें परिणत कर दिया ॥ १२८॥ केवल अपने तथा अपने साथियों ही की उन्होंने नौ संख्या नहीं बनायी, बल्कि जो लोग वहाँ दर्शन करने आये थे, उनको भी उन्होंने नौ संख्यामें विभक्त कर दिया। यह एक विचित्र बात हुई। १२९ ॥ इसके अनन्तर उन बन्धुओं, मित्रो दूतों, बन्धुजनों तथा ब्राह्मणोंसे आगे-आगे रामचन्द्रजी चलने लगे। १३० । फिर क्या था, उन नवों ब्राह्मणोंने एक ही समयमें प्रभुको अपने-अपने आगे खड़े देखा ॥ १३१ ॥ इससे प्रसन्न होकर उन्होंने रामको प्रणाम किया। इसके बाद वे नवों राम अपनी-अपनी पालकियोंसे उतरे और उन ब्राह्मणोंको गलेसे लगाया। फिर मीठी-मीठी वाणीमें उनसे बोले ॥ १३२ ॥ १३३ ॥ उन्होंने कहा-हे ब्राह्मणों ! आप लोगोंने बड़ा कष्ट किया है।
५८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
भो विप्राः श्रमित्वा यूयं युष्माकं कृतनिश्चयम्। बुद्ध्वा वयं पृथक् रूपैर्जाताः स्मो नवधाऽद्य हि ॥२३४॥
एकाकालेऽत्र तपसां सर्वेषां दर्शनं निजम्। कस्य देयं तु पूर्वं हि पश्चात्कस्य प्रदीयताम् ॥२३५॥
इति सम्मन्त्र्य हृदयेन स्वयंकसमयेन हि। युष्माकं दर्शनं दत्तं वरप्यर्थं वरानितः ॥२३६॥
रामाणां वचनं श्रुत्वा ते प्रोचुर्भूसुरोत्तमाः। येनास्माकं भवेत्कीर्तिः स वरो दीयतां तु नः ॥२३७।
तेषां वचनं श्रुत्वा रामाः प्रोचुर्द्विजान्पुनः। युष्माकं दर्शनार्थं हि नवरूपधरा वयम् ॥२३८॥
अद्य जाता यतस्तस्माद्युष्माकं नामभिः सदा। नव रामाः परा ख्यातिं गमिष्यन्त्यवनीतले ॥२३९॥
अस्माकं नव यत्किञ्चित्प्रियं हि भविष्यति। ते तेषां तु रामाणां वाक्यं श्रुत्वा द्विजोत्तमाः ॥२४०॥
सन्तुष्टस्ते नता नेमुः स्वं स्वं रामं मुहुर्मुहुः। तदा सर्वे जना रामान् लक्ष्मणान् भरतादिकान्॥२४१।
आत्मानं नवधा जातान्दृष्ट्वा विस्मयमागताः। ततो रामाः शिविकासु स्थित्वा पृष्ट्वा द्विजोत्तमान्॥२४२॥
पश्यान्त्य ययुः सर्वे मार्गे त्वेकोऽभवन्पुनः। सर्वे जातास्त्वेकदापस्तथा ते विस्मयं ययुः । २४३ ।
ततो रामो बन्धुभिश्च पूर्ववन्नगरीं ययौ। गत्वा गेहे तु सीतायै सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥२४४।
अतस्ते नव विप्राणां नामभिर्जगतीतले । ख्यातिं रामा यपुस्तत्र नव यच्च तप्रियम्।२४५॥
यथार्का द्वादश प्रोक्ता एकविंशद्गणाधिपः। रुद्रा एकादश प्रोक्ता यथाष्ट भैरवाः स्मृताः ॥२४६।
नव दुर्गा यथा त्वत्र तथा रामा नव स्मृताः। प्रियं द्वादश सूर्याय एकादश शिवप्रियम् ॥२४७॥
एकविंशत्प्रियं यद्गगणेशाय महात्मने। प्रियमष्ट भैरवाय दुर्गायै तु नव प्रियम् ॥२४८॥
यथा यथाऽत्र रामाय नव शिष्य प्रियं सदा। तस्मान्नवविधेः पुष्पैर्गङ्गलिस्तत्प्रियो मतः ॥२४९॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे मनोहरकांडे रामपूजावृत्तविस्तारो नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
आपके कष्टको देखकर ही मैं अलग-अलग रूप धारण करके एक ही समयमें सबके समक्ष आया हूँ ॥ २३४ ॥ मैंने अपने मनमें सोचा कि ये सब भाई एक साथ एक ही समयमें तपस्या करने वाले हैं, ऐसी अवस्थामें मैं किसे पहले दर्शन दूँ और किसे पीछे ॥ २३५ ॥ यह विचारकर मैंने आज एक ही समय तुम लोगोंको दर्शन दिया है। अब अपने इच्छानुसार वर भी मांग लो । २३६। उनकी वाणी सुनकर ब्राह्मणोंने कहा—हे प्रभो ! जिससे संसारमें हमारी कीर्ति हो, हमें आप वही वरदान दीजिये ॥ २३७। इस तरह उनकी बात सुनकर रामने उन ब्राह्मणोंसे कहा कि आप लोगोंको दर्शन देनेके लिये मैंने नौ रूप धारण किया है। अतएव आप लोगोंके नामसे ही मैं नौ रामके नामसे विख्यात होऊँगा । २३८ ॥ २३९ ॥ जो कोई भी नौ चीजें मुझे देगा, वे हमें अतिशय प्रिय होंगी। इस तरह उनका बात सुनकर प्रसन्न मनसे उन ब्राह्मणोंने बार-बार रामको प्रणाम किया । उधर रामके साथवाले लक्ष्मण भरत आदि लोग अपनेको नौ रूपवाले देखकर बड़े चकराये । तदनन्तर वे सब राम पालकियोंमें बैठे और उन ब्राह्मणोंसे पूछकर अयोध्याके लिये लौट पड़े । २४०-२४२ । रास्तेमें रामने उन नवों रामोंका रूप समट लिया और फिर ज्योंके त्यों एक राम हो गये। यह घटना देखकर भी लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २४३ ॥ इस तरह राम अपने बान्धवोंके साथ नगरीको गये। घर पहुंचकर उन्होंने सीताको उस दिनका सारा समाचार कह सुनाया ॥२४४॥ हे शिष्या ! इसी कारण राम उन नौ नामोंसे विख्यात हुए और जो-जो चीजें नौ संख्याकी दी जाती हैं, वे उन्हें विशेष प्रिय हुआ करती हैं। २४५ ॥ जैसे बारह आदित्य माने गये हैं इक्कीस गणेशजी, ग्यारह रुद्र, आठ भैरव तथा नौ दुर्गायें मानी गयी हैं, उसी तरह राम भी नौ माने जाते हैं ॥ २४६ ॥ बारह सङ्ख्याकी चीजें सूर्यको, एक इससङ्ख्यक रुद्रको, इक्कीस गणेशजीको, आठ भैरवको और नौ वस्तुयें दुर्गाको प्रिय होती हैं ॥ २४७ ॥ २४८॥, इसी तरह जो चीजें नौ होंगी, रामको अत्यंत प्रिय हुआ करेंगी। इसलिये नौ प्रकारके फूलोंसे अञ्जलीदानका विधान मैंने बतलाया है ॥ २४९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे ज्योत्स्ना भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥