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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ५ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४१५

सर्गः ५ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४१५

यदा वीरान्न मे मृत्युर्भवेदिति पुरा मम । अनेन याचितं राम तपोन्तेऽङ्गीकृतं मया ॥१३३॥
अतोऽस्य पुरुषान्मृत्युर्न भविष्यति राघव । स्त्रीहस्तान्मरणं चास्य विद्धि त्वं रघुनन्दन ॥१३४।
अन्यत् किञ्चित् प्रवक्ष्यामि कारणं मरणेऽस्य हि । एकदा शोकयुक्तेन पुराऽनेन द्विजाग्रतः ॥१३५।
सीताचंडीनिमित्तेन जातो मे हि कुलक्षयः । इति यन्निष्ठुरं वाक्यमुक्तं तन्मुनिभिः श्रुतम् ॥ १३६॥
तेष्वेकस्तं मुनिः क्रोधाद्ददौ शापं हि राक्षसम् । या चंडीति त्वयोक्ताऽद्यैव त्वां मारयिष्यति ॥१३७॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा तं जघान स राक्षसः तद्भीत्या मुनयः सर्वे तूष्णींभूताः स्थिताःपुरा ॥१३८॥
तस्मान्मुनिवाक्येन ममापि वरदानतः । सीताहस्तान्मृतिश्चास्य भविष्यति न संशयः ॥१३९।
अतः सीतां समानीय तयैनं जहि राक्षस्रम् । इत्युक्त्वा राममामंत्र्य ययौ वेधा निजं पदम् ॥१४०॥
रामोऽपि ब्रह्मवचनं श्रुत्वा प्राह विभीषणम् । मूलकासुरहोमाय न कार्यं विघ्नमद्य हि ॥१४१॥
सीतायामत्र यातायां विघ्नं कार्यं प्लवंगमैः । इत्युक्त्वा गरुडं प्राह रामः पुष्पकसंस्थितः ॥१४२।
अयोध्यां गच्छ शीघ्रं त्वं वायुपुत्रेण मद्गिरा । तामानाय वैदेहीं स्वपृष्ठे तां निवेश्य च ॥१४३।
समन्ततो दुष्टेभ्यः पथि रक्षतु मारुतिः ।
तथेति रामवचनमुररीकृत्य सादरम् । तावुभौ राघवं नत्वाऽयोध्यां शीघ्रं प्रजग्मतुः ॥१४४॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे शतनारीवरप्रदानं मूलकासुराख्यानं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

( राम-सीताविरह )

श्रीरामदास उवाच

अथ भूमिसुताऽयोध्यापुर्यां सा हृदि राघवम् । स्मरन्त्यासीत्तद्विरहाद्वयाकुला नाप शं क्षणम् ॥ १ ॥


ब्रह्माजी वहाँ आ गये ॥ १२९-१३१ ॥ रामने उनकी प्रणाम करके विधिवत् पूजन किया । थोडी देर बाद ब्रह्माने रामसे कहा-हे रघुनन्दन ! बहुत दिनोंका बात है मूलकासुर घोर तपस्या कर रहा था । अन्तमें प्रसन्न होकर मैंने उसे यह वरदान दिया था कि तुम किसी वीरके मारनेसे नहीं मरोगे ।१३२-१३३।। अतएव पुरुषके हाथसे इसकी मृत्यु न होगी । यह किसी स्त्रीके हाथों मारा जा सकेगा । १३४ । एक कारण यह भी है कि एक बार शोकाकुल होकर मूलकासुरने एक ब्राह्मणमण्डलीके समक्ष कहा था कि चंडी सीताके कारण ही मेरे कुलका नाश हुआ है । इस निष्ठुर बातको सुनकर एक ऋषिने उसको शाप दे दिया कि जिस सती-साध्वी सीताके लिए तू ऐसे अपमानजनक शब्दोंका प्रयोग कर रहा है, वही सीता तुझे भी शीघ्र ही मारेगी ॥ १३५-१३७ ॥ मुनिका शाप सुनकर मूलकासुरने उसे तुरन्त मार डाला । फिर उसके डरसे शेष ऋषि चुपचाप बैठे रह गये । मेरे कहनेका मतलब यह है कि उस ऋषिके शाप तथा मेरे वरदानसे सीताके हाथों ही इस अधमकी मृत्यु होगी । इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १३८-१४० ॥ रामने ब्रह्माकी बातें सुनकर विभीषणसे कहा कि आज मूलकासुरके यज्ञमें विघ्न डालनेकी कोई आवश्यकता नहीं है । जब सीता यहाँ आ जायँ, तब वानरोंको उसके यज्ञमें विघ्न डालनेकी आज्ञा दी जायगी । फिर राम गरुडसे कहने लगे—तुम जाओ और सीताको अपनी पीठपर बिठाकर यहाँ ले आओ ॥ १४१-१४३ ॥ चलते समय रास्तेमें हनुमानजी दुष्टोंसे उनकी रक्षा करते रहेंगे । रामचन्द्रकी आज्ञाको सादर स्वीकार करके वे दोनों वहाँसे अयोध्याके लिए चल पड़े । १४४ । इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते राज्यकांडे पूर्वार्द्धे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

श्रीरामदासने कहा—उधर रामचन्द्रजीके चले जानेपर सीता अयोध्यामें श्रीरामका स्मरण करती हुई उनके वियोगसे व्याकुल रहा करती थीं । क्षण भरके लिए भी उनके हृदयको चैन नहीं मिलती थी ॥ १ ॥

४१६आनन्दरामायणे[ सर्गः ५

प्रासादे सा कदा तस्थौ कदा प्रासादमूर्धनि । कदा द्राक्षामण्डपधः कदा स्रस्तविभूषणा ॥ २ ॥
वारांगनां कदा नृत्यं ददर्श जनकात्मजा । कदा जयार्थं रामस्य कार्त्तवीर्यमपूजयत् ॥ ३ ॥
कदाऽकरोच्च तुलसीशिवाश्वत्थान प्रदक्षिणाः । मन्युसूक्तानि विप्रैश्च पाठयामास जानकी ॥ ४ ॥
गोमयेनांजनेयं सा कुड्यां कृत्वाऽर्च्य जानकी अक्रेग्रन्थ्यहं पुच्छवृद्धिं स्वांगुलिमाग्रतः ॥ ५ ॥
शतरुद्रीयसूक्तस्य जयार्थं राघवस्य सा । दुर्गायाः पूजनं नित्यं चकार नियतव्रता ॥ ६ ॥
गणेशं मारुतिं शम्भुं स्थण्डिले स्थाप्य प्रेमतः चक्रऽरुणदृशा द्वाराणि गवाक्षं सेव्यञ्जलम् । ७ ॥
कार्त्तवीर्यस्य यंत्राणि स्थापयामास जानकी । मञ्चके राघवेंद्रस्य पूजयामास सर्वदा ॥ ८ ॥
कदा सखीमध्यगा सा त्यक्तालङ्कारमण्डना । जलशय्यांतिके निद्रां नाप सद्विरहाग्निना ॥ ९ ॥
कदा निरीक्ष्य प्रासादे काकमाह विदेहजा । यदि शीघ्रं राघवस्य दर्शनं मे भविष्यति ॥ १०॥
तर्हि त्वं गच्छ वेगेन नो चेदत्र स्थिरो भव । तन्मात वचनं श्रुत्वा काकस्तूड्डीय वेगतः ॥११॥
तेन किंचिन्ममाश्वस्ता पवनं प्राह जानकी । पृष्ट्वा त्वं राघवांगानि मां स्पृशं कर्तुमर्हसि ॥१२॥
कदा चंद्रं निशि प्राह त्व स्पृष्ट्वा शीतलैः करैः । श्रीरामं मां स्पृशस्याद्य स्वकरैः सुखकारकैः ॥१३ ।
शुक्लपक्षे द्वितीयायां संताऽलङ्कारमण्डिता । स्नात्वा प्रासाद मायानत्सखीभिः परिवेष्टिता ॥ १४ ॥
अपश्यच्छश्विनं दृष्ट्वेदं रामोऽय पश्यति । अन्तरैवाद्य रामस्य संयोगो मां भवेदिति ॥१५॥
रामे गते कदा सीता हरिद्राकज्जलदिकं । नात्मानं भूषयामास प्रतिपन्त्यपिनं विना ॥१६॥
चंदनं पुष्पमालाश्च पुष्पशय्यां विदेहजा । नांगीचकार श्रीरामविरहानलपीडिता ॥१७।
शकुनान सा ददर्शथ श्रीरामदर्शनेच्छया । तुष्टाऽभूच्छकुनैः श्रुत्वा शीघ्र रामसमागम्ः ॥१८॥

वे कभी अटारीपर कभी छतपर और कभी अंगूरोंकी झाडीमें अपने वस्त्राभूषण उतारकर बैठी रहतीं थीं ॥ २ ॥ कभी वेश्याओंके नृत्य देखकर जी बहलाना चाहती और कभी रामचन्द्रकी विजयकामनास कार्त्तवीर्य भगवान्का पूजन करती थी । ३ । तुलसी पिप्पल आदिके वृक्षोंको प्रदक्षिणा करती थीं ब्राह्मण द्वारा मन्यु-सूक्तका पाठ करवाती थी । कभी पृथ्वीपर गोबरसे हनुमानजीकी प्रतिमा बनाकर पूजन करना और हर रोज एक अंगुल उनकी पूंछ बढ़ाया करती थी ॥ ४ ॥ ५ ॥ रामचन्द्रकी जयके लिए ब्राह्मण द्वारा ही सौ रुद्राका पाठ करवाती और दुर्गाजीकी पूजा करती थी ॥ ६ ॥ गणेश, मारुति तथा शंभु इनको अलग बिठाकर दरवाजे बन्द कर लेती । फिर खिड़कीसे उनपर जलधारा डाला करती थीं ॥ ७॥ रामचन्द्रजीके मंचपर कार्त्तवीर्य्यक यंत्र स्थापित करके सदा सर्वदा उनका पूजन करतीं थी । ८ ॥ कभी सहेलियोंम बैठी बैठी अपन अलंकारोंको फेंक देतीं और सखियों उन्हें फौहारेके पास ले जाकर सुलानेकी चेष्टा करतीं, फिर भी निद्रा नहीं आती थी । ९ ॥ कभी अटारीपर बैठे हुए कौएको देखकर सीता कहने लगतीं—'यदि मुझे शीघ्र रामचन्द्रके दर्शन होनेवाले हों तो ऐ कौए ! तू यहाँसे उड़ जा, नहीं तो बैठ' सीताकी बात सुनकर कौआ उड़ जाता। उससे सीताके हृदयको बहुत कुछ ढाढ़स बँध जाया करता था। १० । ११ ॥ इसके बाद सीता पवनसे कहतीं—'हे पवन ! तुम पहले रामचन्द्रजीका स्पर्श करके मुझे स्पर्श करो तो बड़ा उपकार हो' १२ ॥ रात्रिके समय कभी-कभी चन्द्रम से विनय करती—हे चन्द्रदेव ! तुम अपनी ठंढी किरणोंसे रामचन्द्रके शरीरका स्पर्श करके उन सुखदायिनी किरणोंको मरेपर डालो ।। १३ ।। शुक्लपक्षकी द्वितीयाको सीता विविध प्रकारके वस्त्र और आभूषणोंको पहनकर सखियोंके साथ प्रासादके ऊपर जाती और इस भावनासे चन्द्रदेवका दर्शन करती कि राम आज जहाँ कहीं भी होंगे, चन्द्रमाका दर्शन अवश्य करेंगे। ईश्वर चाहेगे तो शीघ्र ही हमारा और उनका मिलन होगा ॥ १४ ॥ १५ ॥ जबसे रामचन्द्रजी गये थे, तबसे उन्होंने अपने शरीरमें न हल्दी लगायी, न आँखम काजळ दिया और न किसी प्रकारके वस्त्राभूषण पहने ॥ १६ ॥ श्रीरामचन्द्रके विरहानलसे पीडित सीताने चन्दन, पुष्प, फूलकी मालाएँ, फूलकी शय्या आदि कुछ भी नहीं अङ्गीकार किया ॥ १७ ॥ रामके दर्शनोंकी इच्छासे वे सदा शकुन उठाया करती थीं । यदि