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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ८ ] सारकाण्डम् ७१

सर्गः ८ ] सारकाण्डम् ७१


तिष्ठन्त्यग्रे मतंगादिमुनीनां परिचारिकाः । शबरीदर्शनार्थं त्वं तत्र याहि रघूत्तम ॥ १६०॥
कथयिष्यति सा सीताशुद्धिं ते रघुनंदन । इत्युक्त्वा राघवं नत्वा स्तुत्वा स्वर्गं ययौ मुदा ॥ १६१॥
ततो रामो लक्ष्मणेन शबरीसंनिधिं ययौ । साऽपि संपूज्य श्रीरामं विकैशैर्वनसंभवैः ॥१६२।
चितामारोढुमुद्युक्ता राघवं प्राह हर्षिता । ऋष्यमूकगिरावग्रे सुग्रीवो मंत्रिभिः सह ॥१६३।
वर्तते तस्य सख्येन सीताशुद्धिं लभिष्यसि । गच्छ राम इतस्त्वमद्य पंपानाम सरोवरम् ॥१६४।
तत्तटाके तु वृक्षाणां फलानि विविधानि च । भक्षस्व त्वं जलं पीत्वा याहि सुग्रीवसंनिधिम् ॥१६५॥
इत्युक्त्वा शबरी रामं नत्वा वह्निं विवेश सा । रामसंदर्शनान्मुक्तिं प्राप्ता वैकुण्ठमाययौ ॥ १६६।
ततो रामः शनैर्भ्रात्रा ययौ पंपासरोवरम् । फलानि भक्षयामास पीत्वा तज्जलमुत्तमम् ॥ १६७॥
ततः शनैर्ययौ मार्गे ऋष्यमूकाचलं प्रति । पश्यन्वनानि सर्वत्र चिंतयामास जानकीम् ॥१६८।
एवं गिरिंद्रजे प्रोक्तमारण्यं चरितं मया । श्रीरामस्य ससीतस्य लक्ष्मणेन युतस्य च ॥१६९॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे कबन्धवधो नाम सप्तमः सर्ग ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( राम-सुग्रीवमैत्री और बालिवध )

श्रीशिव उवाच

अथ रामो लक्ष्मणेन ऋष्यमूकाचलं प्रति । ययौ धृतधनुर्बाणो नेत्रे सर्वत्र चालयन् ॥ १ ॥
ऋष्यमूकगिरेः पार्श्वं गच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ । सुग्रीवेणाथ तौ दृष्टौ ऋष्यमूकस्थितेन हि ॥ २ ॥
सुग्रीवस्तो तदा दृष्ट्वा चतुर्भिर्मंत्रिभिर्वृतः । संमंत्र्य मारुतिं प्राह वालिना प्रेषितावुभौ ॥ ३ ।

शीघ्र ही तेरे हाथ भी गाजन-रोशन भर लम्बे हो जायेंगे । तबसे मैं जो कुछ इन हाथोके बीच आ जाता है, खा लेता हूँ ॥ १५९ । यहाँसे आगे मतङ्ग आदि मुनियोंकी परिचारिकायें रहती हैं । हे रघूत्तम ! आप वहाँ जाकर शबरीसे मिलें । १६० । हे रघुनन्दन ! वह आपको सीताका पता बतायेगी । इतना कहकर उसने रामकी स्तुति की और नमस्कार करके वह सानन्द स्वर्गको चला गया ॥ १६१ ॥ तदनन्तर राम लक्ष्मणको लेकर शबरीके पास गये । शबरीने वनके अच्छे-अच्छे पुष्पों तथा फलोंसे उनका पूजन-सत्कार किया ॥१६२॥ बादमें चितारोहण करते समय हर्षपूर्वक वह रामसे बोली कि आगे ऋष्यमूक पर्वतके शिखरपर मन्त्रियोंके साथ सुग्रीव रहता है । १६३ ॥ उसकी मित्रता प्राप्त करनेसे आपको सीताका पता मिल जायगा । हे राम ! आप यहाँसे चलकर पंपासरोवर जायें ॥ १६४ । उसके किनारेपर लगे हुए वृक्षोंके विविध फल खा तथा जलपान करके आप सुग्रीवके पास जाइएगा ॥ १६५ ॥ इतना कहकर शबरीने रामको प्रणाम किया और अग्निमें प्रवेश कर गयी । इस प्रकार रामके दर्शनमात्रसे मुक्त होकर वह वैकुण्ठधाम सिधारी । १६६॥ तदनन्तर राम भाई लक्ष्मणके साथ पंपासरोवर गये । वहाँके सुन्दर फल खाकर सरोवरका निर्मल जल पिया ॥ १६७ ॥ पश्चात् धीरे-धीरे ऋष्यमूक पर्वतकी ओर चले । रास्तेमें चारों ओर हरे-भरे वनोंकी शोभा देखकर राम बारम्बार जानकीका स्मरण करने लगे, १६८। हे गिरीन्द्रजे ! यह मैने तुमको सीता लक्ष्मण तथा श्रीरामका किया हुआ चरित्र कह सुनाया । १६९ ॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

श्रीशिवजी बोले—हे प्रिये ! इस तरह राम हाथमें धनुष बाण लिये और नेत्रोंसे चारों ओर देखते हुए लक्ष्मणके साथ ऋष्यमूक पर्वतके पास पहुँचे । १ ॥ वहाँ शिखरपर बैठे सुग्रीवने पर्वतके पास आते हुए राम-लक्ष्मणको देख लिया । २ ॥ उन्हें देखकर सुग्रीवने अपने चारों मन्त्रियोंको बुलवाया और उनसे मन्त्रणा

७२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

मां हन्तुं धृतकोदण्डौ वलगुशौरो नराकृती । इतोऽस्माभिः प्रगन्तव्यं मन्त्रं शृणु मयोच्यते ॥४॥
गच्छ जानीहि भद्रं ते वटुरूपेण द्विजाकृतिः । ताभ्यां संभाषणं कृत्वा जानीहि हृदयं तयोः ॥५॥
यदि तौ दुष्टहृदयौ संज्ञां कुरु कराग्रतः । साधुत्वे स्मितवक्त्रोऽभूरथ जानीहि निश्चयम् ॥६॥
तथेति वटुरूपेण गत्वा नत्वा रघूत्तमम् । कौ युवां पुरुषव्याघ्राविति पप्रच्छ मारुतिः ॥७॥
तदन्तं लक्ष्मणः प्राह पूर्ववृत्तं सचिस्तरम् । शबर्यानयनाद्रामः सख्यं कर्तुं समागतः ॥८॥
सुग्रीवनाथ तच्छ्रुत्वा स्वरूपं मारुतिस्तदा । चकार नैजं प्रकटं स्वीयं वृत्तं न्यवेदयत् ॥९॥
मत्स्कन्धमधिरूढ्वाद्य पर्वतं गन्तुमर्हथः । तथेति मारुतेः स्कन्धे मध्विनौ तौ बभूवतुः ॥१०॥
उपत्यात गिरेर्मूर्द्धिन क्षणादेव महाकपिः । वृक्षच्छायां समाश्रित्य तौ स्थितौ रामलक्ष्मणौ ॥११॥
सुग्रीवं मारुतिर्गत्वा रामवृत्तं न्यवेदयत् । ततः प्रज्वाल्य वह्निं स सुग्रीवो राघवेण हि ॥१२॥
चकार सख्यं येनेन समालिङ्ग्य परस्परम् । वृक्षशाखां स्वयं छित्त्वा विष्टरार्थं ददौ कपिः ॥१३॥
हर्षण महताविष्टाः सर्व एवावतस्थिरे । लक्ष्मणस्त्वब्रवीत्सर्वं सुग्रीवं वृत्तमन्दमनः ॥१४॥
तच्छ्रुत्वा सकलं वृत्तं सुग्रीवः स्वं न्यवेदयत् । मखे गणय्व मे वृत्तं वालिना यत्कृतं पुरा ॥१५॥
मयपुत्रो दुर्मदश्च किष्किन्धामेकदा गतः । कृत्वा स दीर्घशब्दं तु वालिनं समुपाद्वयत् ॥१६॥
तं श्रुत्वा निर्ययौ वाली जघान दृढमुष्टिना । दुद्राव तेन संविद्गो जगाम स्वगुहां प्रति । १७।
अनुद्रुद्राव तं वाली वालिपृष्ठे त्वहं गतः । बालो ममाह तिष्ठ त्वं बर्हिगच्छाक्यहं गुहाम् । १८।
हन्तुमन्त्राऽऽविश्य मगुहां मासमेकं न निर्ययौ। गुहाद्दान्गन्मया रक्तं निर्गतं सभिगीक्ष्य च । १९।

करके हनुमानसे कहा कि इन दोनोंको वालीने भेजा है, ऐसा ज्ञात होता है ॥ ३ ॥ ये दोनों नररूप धारण कर धनुष बाण हाथ लेकर मुझे मारने आ रहे हैं। इस कारण हम लोगोंको यहाँसे कहीं अन्यत्र भाग जाना चाहिये। अथवा तुम मेरा बात मानो और ब्राह्मणका रूप धारण करके ब्रह्मचारी बनकर उनके पास जाओ और उनके साथ बातचीत करके उनके हृदयका अभिप्राय जान लो ॥ ४ ॥ यदि उनके हृदयका विचार दूषित हो तो पहले हाथके इशारेसे संकेत करना और यदि उनका विचार उत्तम हो तो हँसकर मेरी ओर निहारना । बस यही संकेत निश्चित है, याद रखना ॥ ५ ॥ ६ ॥ तदनुसार हनुमान् 'बहुत अच्छा' कह और ब्रह्मचारीका रूप धारण करके रामके पास गये और नमस्कार करके कहा-'पुरुषोंमें सिंहके समान आप लोग दोनों कौन हैं ?' तब लक्ष्मणने उनसे अपना सम्पूर्ण वृत्तांत कह सुनाया और कहा कि शबरीके कहनेसे हम सुग्रीवके साथ मित्रता करनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ ७ ॥ ८ ॥ यह सुनकर हनुमान्ने अपना असली स्वरूप प्रकट किया और अपना भी सब हाल कह सुनाया ॥ ९ ॥ साथ ही यह भी कहा कि आप दोनों मेरे कन्धेपर बैठकर पर्वतपर चलें । 'तथास्तु' कहकर वे दोनों मारुतिके कन्धेपर चढ़ गये । १० ॥ महाकपि हनुमान्जी कूदकर क्षणभरमें पर्वतके शिखरपर आ गये वहाँ राम-लक्ष्मण एक वृक्षकी छायामें बैठे ॥ ११ ॥ हनुमान्ने जाकर रामका सब समाचार सुग्रीवको कह सुनाया । पश्चात् सुग्रीवने अग्नि जलायी और उसे साक्षी बनाकर रामके साथ शीघ्र मित्रता कर ली और परस्पर वे दोनों गले मिले तब स्वयं सुग्रीवने अपने हाथोंसे वृक्षकी शाखा तोड़कर रामको बिछानेके लिये दे दी। तब सब लोग प्रसन्न हुए और बैठ गये। लक्ष्मणने अपना सब वृत्तान्त सुग्रीवको सुनाया ॥ १२-१४ ॥ वह सुनकर सुग्रीवने भी अपना सब हाल बताते हुए कहा-हे सखे ! पूर्वमें वालिने मेरे साथ जो कुछ किया है, वह सब आप सुन लें ॥ १५ ॥ एक समय मय दानवका पुत्र दुर्मद किष्किन्धा नगरीमे गया। वहाँ जाकर वह जोरसे चिल्लाया और बालिको युद्धके लिये ललकारा ॥ १६ ॥ सो सुनकर बालि बाहर आया और दुमदका बहुत जोरों एक मुक्का मारा। इससे घबराकर वह अपनी गुफाकी ओर भागा ॥ १७ ॥ उसके पीछे बालि और बालिके पीछे मैं भी भागा। वहाँ जाकर बालिने मुझसे कहा कि तुम बाहर खड़े रहो, मैं गुफाके भीतर जाता हूँ ॥ १८ ॥ यदि एक महीनेमें मैं बाहर न आऊँ तो मुझे मरा समझ लेना। ऐसा कहकर वह गुफामें चला गया। उसके कथनानुसार एक महीना बीत गया,