श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् ११५
सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् ११५
नवमः सर्गः
( रामादिके बालकोंका उपनयन-संस्कार )
श्रीरामदास उवाच
अथोर्मिला मांडवी च श्रुतकीर्त्तिः सहैव ताः । बभूवुर्गर्भिण्यश्चिद्दनैर्गम्यो महोदराः ॥ १ ॥
तासां चकार श्रीरामः कौतुकानि च चादरम् । तासां पुंसवनादीनि विधिवत्तानि रघूत्तमः ॥ २ ॥
आहूय पत्या जनकं कुशध्वजं च बन्धुभिः । दौहित्रान् पूरयामासुस्तासां पौरसुहृत्त्रियः ॥ ३ ॥
तासां मन्थान् समुत्सङ्गे कृत्वा नृत्तमः । वस्त्रालङ्कारभूषाभिस्तोषयामास ताः मुदास् ॥ ४ ॥
अथोर्मिला सा तनयं सुषुवे चात्मोदयम् । ततः सा मण्डवी पुत्रं सुषुवे परमे दिने ॥ ५ ॥
ततः सा श्रुतकीर्त्तिश्च सुषुवे यमलौ सुतौ । अन्यां रक्षोभिसाया द्वितीयस्तनयोऽभवत् ॥ ६ ॥
तथाऽपरस्तु मांडव्याः पुत्रः कायादजायत । जनकश्चोदितान् सर्वान् कुमारांस्तोषयन् पृथक् ॥ ७ ॥
चकार गुरुणा विधीन्सोन्मादं परां मुदा । ज्येष्ठमङ्गदाख्यं ज्येष्ठं चित्रकेतुं कनिष्ठकम् ॥ ८ ॥
मांडव्याः पुत्रयोर्ज्येष्ठः पुष्कलस्तदनन्तरम् । बाहुं चाप्यनुजं तूपकेतुं यः स्मृतः ॥ ९ ॥
एवं कुमारांस्तेषां च गुरुणा विधिवत्कृताः । नामकरणं दत्वानां काले काले क्रमेण च ॥ १० ॥
तेषामेव मया प्रोक्तः संक्षेपेणैकमात्रतः । तेषां जन्मकालेषु सुराः सर्वे मुदान्विताः ॥ ११ ॥
वादयामासुर्वाद्यानि ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः । मातरोः पितृभिर्युक्तान् बालकान् सूर्यसन्निभान् ॥ १२ ॥
राजद्वारे महानासीदुत्सवश्च नृपाज्ञया । निनेदुर्नववाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ १३ ॥
शंसयन्ति स्म नृपतिं स्तुववन्दितमागधाः । नगरीं शोभयामासुः पताकाध्वजतोरणैः ॥ १४ ॥
सुहृदः पार्थिवाः सर्वे रामादीनां च पूजनम् । वस्त्रैराभरणाद्यैश्च चक्रिरे ते पृथक् पृथक् ॥ १५ ॥
ददुर्जानानि विप्रेभ्यो राम श्या भ्रातृवश्च ते । ब्राह्मणान् भोजयामासुः श्राद्धानि चकुरादरात् ॥ १६ ॥
श्रीरामदास बोले-कुछ काल बाद उर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकीर्तिने साथ-साथ गर्भ धारण किया ॥ १ ॥
श्रीराम ने इस समयपर बड़ा स्वागतादि की और रदन विधिपूर्वक पुंसवनादि संस्कार किये ॥ २ ॥ इस संस्कारके समय जनक तथा कुशध्वजको भी रामने बुलवा लिया और उन्हींके द्वारा यह कार्य सम्पन्न हुआ । पुरवासिनी स्त्रियोंने उर्मिलादिकी जो इच्छा हुई, सो पूर्ण किया ॥ ३ ॥ रामने इस प्रकार उत्सव करके अनेक तरहके वस्त्र और आभूषण दिये ॥ ४ ॥ इसके बाद समय पूरा होनेपर उर्मिलान एक परम तेजस्वी पुत्र उत्पन्न किया और दूसरे दिन माण्डवी को एक पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ ॥ ५ ॥ इसके अनन्तर श्रुतकीर्तिने एक साथ दो पुत्र उत्पन्न किये। कुछ दिनों बाद उर्मिलाने एक दूसरा पुत्र और उत्पन्न किया ॥ ६ ॥ इसी प्रकार कालान्तरमें माण्डवी के भी एक और पुत्र हुआ । रामने अपने कुलगुरु वसिष्ठके द्वारा उन पुत्रोंका जातकर्मादि संस्कार किया । लक्ष्मणके ज्येष्ठ पुत्रका नाम अङ्गद और दूसरे बेटेका नाम चित्रकेतु पड़ा ॥ ७ ॥ ८ ॥
माण्डवीके ज्येष्ठ पुत्रका नाम पुष्कर तथा कनिष्ठका तक्ष नाम पड़ा । इसी तरह श्रुतकीर्तिके ज्येष्ठ पुत्रका नाम सुबाहु तथा कनिष्ठ बेटेका नाम यूपकेतु पड़ा ॥ ९ ॥ १० ॥ गुरु वसिष्ठने विधिपूर्वक सबका नामकरणादि संस्कार किया । हे शिष्य ! यहाँपर मैंने तुम्हें संक्षेपमें एक ही एक पुत्रका नाम बतलाया है। इनके सिवाय भी बहुतसे पुत्र हुए। प्रत्येक पुत्रके जन्मसमयपर देवतागण हर्षपूर्वक अपने बाजे बजाते और उनपर तथा उनके माता-पितापर पुष्पोंकी वृष्टि किया करते थे । रामचन्द्रजीके आज्ञानुसार राजद्वारपर बड़े-बड़े उत्सव रचाये जाते, नये-नये बाजे बजते और वेश्याएँ नृत्य करती थीं । वन्दीजन तथा सूत मागध आ-आकर विविध प्रकारकी स्तुतियाँ किया करते थे । पताका-ध्वजा तथा तोरणादिकोंसे अयोध्या नगरीका शृङ्गार किया गया था। रामके मित्र समस्त राजे अनेक प्रकारके वस्त्राभूषणोंको देखकर उनका पूजन करते थे ॥ ११-१५ ॥
राम-लक्ष्मण आदि चारो भ्राता भी ब्राह्मणों को दान देते उन्हें भोजन कराते एवं नान्दीशाखादि कृत्योंको
११६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
एवमष्टौ कुमारास्ते रामादीनां मनोरमाः । ववृधुश्चन्द्रवदना मातृभिर्लालिताः सुखम् ॥१७॥
शृङ्खलावद्धरत्नौघनिर्मितेषु वरेषु च । प्रखेषु हि कुमारास्ते विरेजू रत्नभूषिताः ॥१८॥
भाले स्वर्णमयाश्वत्थपर्णाभ्यतिमहान्ति च । मुक्ताफलाग्रलम्बीनि शोभयन्ति स्म बालकान् ॥१९॥
कण्ठे रत्नमणीवानमध्यगौपन्नखाञ्चिताः । कर्णयोः स्वर्णसंपन्नरत्नाज्जुनसुतालकाः ॥२०॥
सिंजानमणिमंजीरकट्सूत्रार्गदैर्युताः । स्निग्धवक्त्र लपदशना इंद्रनीलमणिप्रभाः ॥२१॥
मंगणे रिंगमाणाश्च मस्कारैः मण्डनाः शुभाः । ते पितॄन् रञ्जयामासुर्भाताश्चापि विशेषतः ॥२२॥
नाना शिशु क्रीडनैश्चैव प्रमंग्मुखचुम्बनैः । बालकविभ्रमैर्मुग्धैर्गमनैर्मधुरैरितैः ॥२३॥
ततस्ते बालकाः सर्व्वे वस्त्रालङ्कारभूषिताः । सभायां राघवं नत्वा तस्थुः सिंहासनेोपरि । २४।
एकदा राघवः प्राह वसिष्ठं सदसि स्थितम् । अवलोक्य बालानां त्वं चिह्नानि यथाक्रमम् । २५।
तच्छ्रुत्वा रामवचनं वसिष्ठो भूसुरैः सह । आदौ कुशं समाहूय दृष्ट्वा रामं वचोऽब्रवीत् ॥२६॥
वसिष्ठ उवाच
पंचसूक्ष्मः पंचदीर्घः सप्तरक्तः षडुन्नतः त्रिषुयुक्तंषुगंभीरो द्वात्रिंशल्लक्षणव्ययम् ॥२७॥
पंच दीर्घाणि शस्तानि यथा दीर्घायुरोऽत्र च । भुजौ नेत्रं हनुर्जान् नासा च तनयस्य ते ॥२८॥
ग्रीवा जंघा मेढ़नैश्च त्रिभिर्ह्रस्वोऽयर्मडितः । स्वरेण सत्त्वनाभिभ्यां त्रिगंभीरः शिशुः शुभः । २९॥
त्वक्केशंगुलिदशनाः पत्रांण्यङ्गुलिजान्यपि । तथाऽम्य पंच सूक्ष्माणि सूचयन्ति परां श्रियम् ॥३०॥
पाण्र्यङ्घ्रितलनेत्रांते तालुजिह्वाधरोष्ठकम् सप्तरूष्ण च सनममस्मिन् राज्यसुखप्रदम् ॥३१॥
वक्षः कुक्ष्वालिकस्कन्धकरवक्त्रं षडुन्नतम् । तथाऽत्र दृश्यते बाले महदैश्वर्य्यभोगभाक् ॥३२॥
किया करते थे इस तरह रामादि चारों भ्राताओंके आठो कुमार—जिनका चन्द्रमाके समान मुखमण्डल था—माताओसे लालित होकर बढ़न आत थे। सोनेके जंजीरोंसे बधे हुए एवं तरह-तरहके रत्नोंसे सुसज्जित पालनोंपर ये आनन्दकी किलकारियां भरा करत थे । १६ , उन बच्चोंका कितने ही प्रकारके स्वर्णमय आभूषण पहनाये जाते और माथेपर पीपलके पत्तेकी नई सुवर्णका पत्ता बनाकर लगाया जाता था। जिसमें छोटे छोटे मोतियोंके गुच्छ लटकते हुए बड़े भले लगते थे । १७ ।। १८ । गलेमें रत्नों और मणियोंके समूहके बीचमें व्याघ्रका नख शोभायमान हो रहा था। कानामे सुवर्णक कुण्डल झूलते रहते थे और उनमें लगा हुआ हीरा प्रकाशित हो रहा था । १९ ।। २० ।। रुनझुन करती हुई मणियोंकी करधनी पड़ी थी । हाथोंमें कङ्कण तथा विजायत अपना असाधारण निखार दिखा रहा था। जिस समय वे बच्चे तनिक मुस्करा देते तो इन्द्रनीलमणिके समान उनके छोटे छोटे दांत दीखने लगत थे । हाथ और पैरके सहारे आँगनमें रंगते हुए वे बालक नाना प्रकारके बालविनोद तरह तरहके बाल, मुखचुम्बन, बालकीय कृत्रिम युद्ध ओर मोडामोंड़ा बोलोंसे अपने-अपने माता-पिताको आनन्दित करते रहते थे। कुछ दिनों बाद वे अच्छे अच्छे वस्त्रालभूषण पहिनकर राजसभाम जाते और वहाँ नियमत रामचन्द्रको प्रणाम करके अपने आसनपर बैठ जाते थे ॥ २१-२४॥
एक दिन राजसभाम बैठे हुए वसिष्ठजीसे रामन कहा—आप कृपया इन बालकोंका शुभाशुभ लक्षण देखकर हमें बतलाइए । यह बात सुनकर वसिष्ठने सबसे पहले कुशको अपने सामने बुलाया और रामसे कहने लगे—॥ २५ ॥ २६ ॥ पाँच प्रकारके लक्षण सूक्ष्म, पाँच ही तरहके दीर्घ, सात रक्त, छः उन्नत, तीन विस्तृत, तीन ही सांग लघु तथा तीन गंभीर सब मिलाकर ३२ प्रकारके लक्षण होते हैं ॥ २७॥ जैसे कि इस चिरंजीवी कुशके हाथ, नेत्र, बाहु घुटने, नाक ये पाँच दीर्घ हैं। अतएव ये बहुत अच्छे हैं। ग्रीवा, जंघा और लिंग इन तीनोंके छोटे होनेसे इसके तीन ह्रस्व हैं। ये भी अच्छे हैं। शब्द, बल तथा नाभि ये तीन गंभीर हैं। इसकी त्वचा, केश उँगलियां, दाँत, शरीरकी संधियां तथा नख ये पाँच सूक्ष्म इसकी श्रीकी सूचना दे रहे हैं। हाथ, पैर, तलवे, नेत्रके आस-पासवाले भाग तथा तालु, जिह्वा, अधरोष्ठ और नख ये रक्तवर्णके होनेसे राज्यसुख देनेवाले हैं ॥ २८-३१॥ छाती, पेट, कन्धा,
सर्गः ९] जन्मकाण्डम् ३३७
ललाटकटिवक्षोभिस्त्रिभिर्विस्तीर्णैः यथा ह्यसौ। सर्वतेजो महैश्वर्यं तथा प्राप्स्यति नान्यथा ॥३३॥
अविच्छिन्नां तर्जनीं प्राप्य तथा रेखाऽस्य दृश्यते। कनिष्ठामूलनिर्याता दीर्घायुष्यं यया भवेत् ॥३४॥
कमठपृष्ठकठिनावूर्ध्वकण्ठौ करौ। राज्यहेतू शिरोऽस्य पादौ चाप्यति कोमलौ ॥३५॥
पादौ समामलौ रक्तौ समौ सूक्ष्मौ सुशोभनौ। समगूढ...म्वशब्देन स्निग्धार्थदर्शनैस्तथा ॥३६॥
स्कन्धाभिः कररेखाभिश्चारुकाभिः सदा सुखी। लिंग... कूहस्वनेन राज्ञां राजा भविष्यति ॥३७॥
उन्नतशमनगुल्फस्निग्धनाभिस्तथापि च। जंघा राजन वर्तुलस्या महदैश्वर्यसूचकम् ॥३८॥
धारैका मूत्रके यस्य दक्षिणावर्तनी यदि। मद्यश्च मानमधुनोर्यदि वीर्यं तदा नृपः ॥३९॥
विस्तीर्णा पीवरी स्निग्धी भुजावस्य सुखोचितौ। वामावर्ती सप्रसक्तौ भुजौ भूरथगोचितौ ॥४०॥
श्रीवत्सवज्रचक्राब्जमत्स्यकोदण्डदण्डभृत् । तथाऽस्य कण्ठगा रेखा यथा स्यात्त्रिदिवम्पतिः ॥४१॥
द्वात्रिंशल्लक्षणधायं वरंबुद्धिगोचरः। कोचदुदुमिहंसास्वरः सर्वैश्चाधिकः ॥४२॥
मधुपिंगलनेत्रोऽसौ नैनं श्रीन्त्यजति क्वचित्। पंचरेखाललाटस्थु तथा सिंहोदरः शुभः ॥४३॥
ऊर्ध्वरेखांकितपदो निःश्वसनपद्मगन्धवान्। आंक्षाद्रघ्राणिः सुसमो महालक्षणवानयम् ॥४४॥
एवं कुशं निरीक्ष्याथ सर्वान् दृष्ट्वा क्रमेण सः। लवादीनां मचिह्नानि पूर्ववत्प्राह राघवम् ॥४५॥
ततः प्रीतमना रामः पूजयामास तं गुरुम्। वस्त्रैराभरणैश्चैव ययौ हर्षात्ततो गृहम् ॥४६॥
एतस्मिन्नंतरे सीता भूमिदत्त्यवरामने। संस्थिता चामरैर्दर्पदर्शनीभिः परिवीजिता ॥४७॥
सखीभिः सेविता रम्या श्वेताभांसोपवस्त्रगा। मुहुर् म्वं निरक्षन्ती मुखं चन्द्रनिभं वरम् ॥४८॥
हाथ, पसलियां और मुंड यः छः उन्नत दृश्यते हैं, नासिका, नख और कर्ण ये रक्त दाता हैं ॥३२॥ मस्तक, कमर और छाती ये तीन विस्तीर्ण हैं, जो सब ऐश्वर्य देने वाले हैं इसमें कोई सन्देह नहीं है। ३३॥ हाथकी एक रेखा ठीक तर्जनी पर्यन्त चला गया है कनिष्ठाङ्गुलीपर्यन्त । ३४ । कछुएकी पीठके समान कड़े-कड़े इसके हाथ राज्यप्राप्तिकी सूचना दे रहे हैं, इसके कपोल, वृत्ताकार, लाल, पतले, सुन्दर और बराबर एंडीवाले पैर भी इसके राज्यप्राप्तिकी सूचना दे रहे हैं ॥ ३५ ॥ इसके कंधे और सरल सुन्दर रेखाएं यह बतलाती हैं कि यह सदा सुखी रहेगा। इसका लिंग पतला और गोल है। इससे यह जाना जाता है कि यह बच्चा भविष्यमें राजाओंका भी राजा होगा। इसका नितम्ब तथा गुल्फ मजबूत है और नाभि गहरी तथा दक्षिणावर्त होकर लाल रङ्गुली है ये सब भी महान् ऐश्वर्यकी सूचना देते हैं। लक्षणशास्त्रमें कहा गया है कि मूत्रत्यागके समय जिसके लिंगसे मूत्रकी केवल एक धार दक्षिणावर्त हो और उसके वीर्यसे मछली तथा शहदके समान गन्ध निकले तो वह मनुष्य राजा होता है ॥ ३६-३९ ॥ इसके बड़े मोटे और चिकनी भुजाएं सुख भोगने लायक हैं। लम्बी और वामावर्त बाहुदण्ड पृथिवीका राज्य भुगताने वाले हैं ॥ ४० ॥ इसके हाथमें वज्र, चक्र, कमल, मत्स्य, धनुष तथा दण्ड आदिके आकारकी ऐसी रेखाएं दृष्टिगोचर होती हैं जिससे ज्ञात होता है कि यह देवताओंका भी राजा होगा ॥ ४१ ॥ इसके मुखमें बत्तीस लक्षण हैं। शंखके समान सुन्दर इसकी ग्रीवा है। ग्रीव पक्षी, क्रौञ्च, हंस तथा मेघके समान गम्भीर इसका स्वर है। इससे जान पड़ता है कि यह संसारके समस्त राजाओंसे बढ़कर होगा ॥ ४२ ॥ मधु (शहद) के समान पिंगल वर्ण इसकी आंखें हैं, इसके ललाटमें पांच रेखाएं हैं, सिंहके समान उदर है, इसके पैरोंकी रेखाएं ऊपरको गयी हैं, इसके श्वाससे कमलकी गन्ध आती है और सुन्दर-सी नासिका है इन सब लक्षणोंसे ज्ञात होता है कि यह असाधारण लक्षणसम्पन्न बालक है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ इस प्रकार कुशके लक्षणोंको बतलाकर वशिष्ठने बाकी लव आदि बालकोंके भी लक्षण बतलाये। तदनन्तर रामने अनेक प्रकारके वस्त्रों और आभूषणोंसे वसिष्ठकी पूजा की और उनकी आज्ञा लेकर रामचन्द्रजी अपने महलमें चले गये ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ वहां सीताजी पृथ्वीके दिये हुए सुन्दर सिंहासनपर बैठी थी। कितनी ही सखियां चंवर पंखे आदि झल रही थीं। बहुत सी सखियें तरह-तरहका सेवामें लगी थीं। उस समय सीताजी पीछे तकिया लगाकर बैठी हुई दर्पणमें अपना मुख देख रही थीं। सब उन्होंने सुना कि
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रामस्यागमनं श्रुत्वा सचचालासनाज्जवात् । ततो ददर्श श्रीरामं बालकैः परिवेष्टितम् ॥४९॥
स्वकक्ष्यां यूपकेतुं च दधानमपरं शिशुम् । तथैव दक्षिणे हस्ते दधानं चाङ्गदं शुभम् ॥५०॥
कुशं लवं पुरस्कृत्य सभायां तं शनैः शनैः । तत्पृष्ठे सा ददर्शाथ लक्ष्मणं बालकान्वितम् ॥५१॥
तक्षं कक्ष्यां पुष्करं च दधानं दक्षिणे करे । तत्पृष्ठे भरतं सीता ददर्श हरितानना ॥५२॥
चित्रकेतुं शिशुं कक्ष्यां दधानं रुक्ममण्डितम् । तथैव दक्षिणे हस्ते सुबाहुं पङ्कजेक्षणम् ॥५३॥
तत्पृष्ठे सा ददर्शाथ शत्रुघ्नं जनकात्मजा । रामशस्त्राणि विभ्रतं सभायांतं शनैः शनैः ॥५४॥
एवं सा राघवं दृष्ट्वा सीता प्रत्युज्जगाम तम् । शिञ्जन्मणीन्द्रकञ्चना पीतकौशेयधारिणी ॥५५॥
कराभ्यां पुरतो यांतं लवं धृत्वा चुचुंब सा । निधाय तं लवं कक्ष्यां धृत्वा हस्तेन हं कुशम् ॥५६॥
ययौ शनैः सा रामेण वदती स्वस्थलं पुरः । सखीभिर्वेष्टिता मंद्रा रञ्जयन्तीव राघवम् ॥५७॥
अथ रामोऽपि सीतायाः स्थित्वा सिंहासनोपरि । अङ्कयोः पुरतश्चापि बालकान्सन्निधाय सः ॥५८॥
सीतायै दर्शयन् प्रीत्या लालयामास सादरम् । सीतायै राघवः प्राह सभायां गुरुणा पुरा ॥५९॥
यान्युक्तानि सुलक्षणानि शिशूनां तानि विस्तरात् । श्रुत्वा राममुखात्तानि माता तोषं परं ययौ । ६०॥
राघवः प्राह वैदेहीमूर्भिलापार्श्वराजिताम् । सीतेऽङ्गदं चित्रकेतुं लक्ष्मणांके निवेशय । ६१॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता शीघ्रं शिशून् ययौ । तावदुत्थाय सौमित्रिर्लज्जया गंतुमुद्यतः ॥६२॥
तं गन्तुकामरामोऽपि दृष्ट्वा तौ मांडवीं तथा । श्रुतकीर्तिं कञ्जनयनाऽबोधयत्तदा । ६३॥
ताभ्यां धृतोऽथ सौमित्रिः स्मितास्याभ्यामुपाविशत्। तावत्तदङ्कयोः सीता तत्पुत्रौ सन्न्यवेशयत् ॥६४॥
तद्वच्च भरतस्यांके निवेश्य तद्वत्पुत्रकौ । शत्रुघ्नस्यांके सुबाहुं च यूपकेतुं न्यवेशयत् ॥६५॥
ततः सीतां पुनः प्राह स्मितास्यः स रघूद्वहः । राजयन्त्वूर्मिलाद्याश्च स्व स्व स्वामिनमादरात् । ६६॥
राम आ रहे हैं तो आसनसे उठ खड़ी हुई। उधरसे राम भी बालकोंके साथ सीताके समक्ष आगये । ४७-४९। उस समय वे अपनी बायीं गोदमे यूपकेतु तथा दाहिनी गोदमे अंगदको लिये हुए थे और सब कुश आगे-आगे चल रहे थे। उनके पीछे बालकोंको लिए लक्ष्मणको भी आते हुए सीताने देखा ॥ ५० ॥ ५१ ॥ लक्ष्मण तक्षकको गोदमें लिय थे और पुष्करका अपने दहिने हाथकी उँगली पकडाये चल आ रहे थे। उनके बाद सीताने भरतको आते देखा ॥ ५२ ॥ वे भी चित्रकेतु नामक बच्चेको बायीं गोदमें लिये और दाहिना बांहमें कमलकी नाईं आँखोंवाले सुबाहु नामक बेटेको लिये हुए थे । ५३ ॥ उनके पीछे सीताने शत्रुघ्नको देखा। वे रामजीके शस्त्रोंको लिये धीरे धीरे मण्डपोंकी ओर आ रहे थे ॥ ५४ ॥ इस प्रकार उन्हें आते देखकर सीता रामकी ओर बढ़ीं। कमरकी करधनी अहैर क्षुद्रघंटिका अपनी झनझुनाकी ध्वनि कर रही थी और शरीरपर रेशमी पीताम्बर सुशोभित हो रहा था ॥ ५५ ॥ उन्होंने रामके पास पहुंचते ही लवका मुख चूमा । फिर गोदमे उठा लिया और कुशकी दाहिने हाथकी उंगली पकड़ाकर रामस बात करती हुई चलीं। उस समय भी चारों ओरसे कितनी ही सखियाँ घेरकर सीता सण रामको प्रसन्न करतो हुई चल रही थीं ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजी सीताके सिंहासनपर बैठ गये और बच्चोंको गोदमें लेकर खेलाने लगे। कुछ देर बाद रामचन्द्रजीने सीताकी बहिनके सुने हुए बालकोंके शुभ लक्षण कह सुनाये। जिन्हें सुनकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं । ५८-६० । उर्मिला सीताके ऊपर पंखा झल रही थीं। इसी समय रामने सीतासे कहा कि अङ्गद और चित्रकेतुको ले जाकर लक्ष्मणकी गोदमें बिठा दो ॥ ६१ ॥ रामकी यह बात सुनकर सीता झटपट बच्चोंके पास पहुंची और उन्हें लक्ष्मणकी गोदमें बिठाना ही चाहती थीं कि लक्ष्मण लज्जाके मारे चलनेको तैयार हो गये ॥ ६२ ॥ लक्ष्मणकी बात देखकर रामने आँखसे संकेत कर दिया, जिससे श्रुतकीर्त्ति और माण्डवीने लक्ष्मणको पकड़ लिया। तभी सीताने उन दोनों बच्चोंको लक्ष्मणकी गोदमे बिठा दिया । ६३ ॥ ६४ ॥ उसी प्रकार भरतकी गोदमें तक्ष और पुष्कर तथा शत्रुघ्नकी गोदमें सुबाहु ओर यूपकेतुको बिठलवाया ॥ ६५ ॥ इसके बाद मुस्कराते हुए रामचन्द्रने