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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७३

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७३

चण्डिकासुमतिपाणिग्रहणार्थं पुरातनम् । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे श्वशुरस्य जिघांसवः ॥ ८ ॥
सप्तदीपाधिपस्याथ ययुः कान्तिपुरीं प्रति । अथ तां कम्बुकण्ठस्य कन्यां मदनसुन्दरीम् ॥ ९ ॥
प्रासादसंस्थितां दृष्ट्वा नारदः खात्समेययौ । सखीभिः सा मुनिं पूज्य विनयात्पुरतः स्थिता ॥ १० ॥
पप्रच्छ नारदं भक्त्या विनयानम्रा शनैः । कुतः समागतः स्वामिन् गम्यते क्वाधुना वद ॥ ११ ॥
भवतां दर्शनेनाद्य पवित्राऽहं परं गता, इति तस्या वचः श्रुत्वा किञ्चित् स्मित्वा मुनिस्तदा ॥ १२ ॥
तामाह बाले स्वलोकादागतोऽस्म्यधुना त्वहम् । अयोध्यायां गतश्चाद्य पुत्राणां तु पृथक् पृथक् ॥ १३ ॥
गेहे संभोक्तुकामोऽद्य निमन्त्रोऽस्मि विहायसा । एतस्मिन्नन्तरे कान्तिपुर्याः सैन्यानि वै बहि ॥ १४ ॥
दृष्ट्वा केषां हि सैन्यानि सन्तीति हृदि चिन्तितम् । ततः पाथमुखाच्छ्रुत्वा तत्र चात्र स्वयम्बरम् ॥ १५ ॥
तदा विनिश्चितं चित्ते मया रामः स्वयंवरे । अत्रैवास्ति ह्यागतश्च तत् पश्याम सबालकम् ॥ १६ ॥
नैवास्ति ह्यागतश्चेत् तर्हि यास्याम्यतः परम् । स्वयंवरे विना रामं न भविष्यति सान्द्रजम् ॥ १७ ॥
पश्याम्यथैवं तं राम वृथाऽग्रे गमनं मम । निश्चित्येत्थं समायातस्ततोऽदृष्ट्वा रघूत्तमम् ॥ १८ ॥
कथं रामो नागतोऽत्र चेति पृष्टा नृपा मया । नृपाभिप्रायमाकर्ण्य तदा खिन्नं मनो मम ॥ १९ ॥
सप्तद्वीपाधिपतिं रामं वधूबालकसंयुतम् । स्वयम्बरमनाहूय त्वत्पित्रा निश्चितं नृपैः ॥ २० ॥
अधुनाऽहं प्रगच्छामि साकेतञ्च रघूत्तमम् । मन्दभाग्याऽसि बाले त्वं स्नुषा राघवभूपतेः ॥ २१ ॥
यतो जाताऽसि नैवात्र विचित्रा कर्मणो गतिः । इत्युक्त्वा बालिकां पृष्ट्वा नारदो गन्तुमुद्यतः ॥ २२ ॥
ततः संप्राथयामास नारदं बालिका मुहुः । खिन्नचित्ताऽश्रुपूर्णाक्षी म्लानस्या स्फुरिताधरा ॥ २३ ॥
रोमांचिततनूर्मुग्धा गतार्थागद्गदस्वरा । येनाहं मुनिवर्यात्र स्नुषा धीराघवस्य च ॥ २४ ॥
भविष्यामि तथा कार्यं न्यथा त्वां शरणं गता । इत्युक्त्वा मुनिवर्यस्य पादयोः स्थाप्य सा शिरः ॥ २५ ॥
चकार करुणं बाला तदा तां मुनिरब्रवीत् । मा चिन्तां कुरु रम्भारु समुत्तिष्ठस्व बालिके ॥ २६ ॥

सबस वैर कर लिया ॥ ५-७ ॥ इसके अनन्तर जब सब राजाओने यह सुन लिया कि राम नहीं आयेंगे, तब वे कम्बुकण्ठके यहाँ पहुंचे । उधर कम्बुकण्ठकी कन्या मदनसुन्दरीको अट्टारीपर देखकर नारदजी आकाश-मार्गसे उतर आये । मदनसुन्दरीने सखियों के साथ आकर नारदकी पूजा की और उन मुनिके सामने जा बैठी ॥ ८-१० ॥ फिर भक्तिपूर्वक नारदसे पूछने लगा—स्वामिन् ! आप इस समय कहाँसे आ रहे हैं और अब कहाँ जायेंगे सो बताइए ॥ ११ ॥ आपके दर्शनसे मैं आज परम पवित्र हो गयी । इस प्रकार उसकी बात सुनी तो थोड़ा मुसकराकर नारद कहने लगे—हे बाले ! इस समय मैं स्वर्गलोकसे आ रहा हूँ और रामके सब पुत्रांके यहाँ अलग-अलग भोजन करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ। आते समय मैंने कान्तिपुरी नगर के बाहर सेना देखी उसे देखकर मुझे बड़ा कौतूहल हुआ। रास्तेमें एक पथिकसे पूछनेपर ज्ञात हुआ कि यहाँ तुम्हारा स्वयंम्बर है तो यह सोचा कि जहाँ तक है, रामचन्द्रजी अपने बालकों समेत यहाँ अवश्य आये होंगे । चलो, वहीं ही दर्शन कर लूं। यह निश्चय करके मै यहाँ आया, किन्तु रामचन्द्रजीको नहीं देखा तो राजाओंस पूछा कि राम क्यों नहीं आये ? उन लोगोंने जो कारण बतलाया, उससे मेरा मन बहुत खिन्न हुआ ॥ १२-१९ ॥ सप्तद्वीपके अधिपति राम तथा उनके लड़कोंका न बुला सकनेका निश्चय करके ही तुम्हारे पिताने और-और राजाओंको बुलाया है ॥ २० ॥ अच्छा, अब मैं अयोध्यामें रामचन्द्रजीके पास जा रहा हूँ। हे बाले ! तुम अभागी हो, जो रामचन्द्रजी जैसे राजाकी पतोहू नहीं बन रही हो। कर्मकी भी बड़ी विचित्र गति होती है। ऐसा कह और कन्यासे पूछकर नारदजी जाने लगे। तब वह कन्या मदनसुन्दरी खिन्न मन, अन्सु भरी आँखों, म्लानमुख, काँपते हुए अधरो तथा रोमाञ्चित शरीर होकर गद्गद बाणीसे इस प्रकार विनय करती हुई कहने लगी—आप कोई ऐसी युक्ति करिए कि जिससे मैं उनकी ही पतोहू बनू । मैं आपकी शरणमें हूँ। ऐसा कहकर उसने अपना मस्तक मुनिराजके चरणोंमें रख दिया और रोने लगा। तब नारद मुनिने कहा-

३७४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

भविष्यसि त्वं रामस्य स्नुषा यत्नं करोम्यहम् । इत्युक्त्वा तां समाश्वास्य खमार्गेण मुनिर्ययौ ॥२७॥
एतस्मिन्नन्तरेऽथाऽऽयात्स्यन्दनं भूरिकेतनः । यूपकेतुर्नि... पश्यन्तमवतीर्याऽथायौ ॥२८॥
किञ्चित्सैन्ययुतो बालस्तमटव्यां दिदृक्षुः सः । यावन्सन्ध्याटिकं कर्तुमृषिविष्टस्तदा मुनिम् ॥२९॥
ददर्श नारदं नत्वा पूजयामास सादरम् । ततः पप्रच्छ मुनये यूपकेतुः पुरःस्थितः ॥३०॥
कुतः समागतं चेति सन्तुल्या नारदो मुनिः । सर्वं वृत्तं सविस्तारं कथयामास बालकम् ॥३१॥
तच्छ्रुत्वा सकलं वृत्तं नत्वा तं नारदं मुनिम् । अत्रायं क्रोलको वाक्यं सक्रोधः संभ्रमान्वितः ॥३२॥
मुने नृपाणां सर्वेषां द्वेषबुद्धिञ्च राघवे । वा अज्ञा माऽद्य सर्वेषां कुंभाण्डमयंकेणे जवात् ॥३३॥
कमुकटादिभूपानां सारं पश्याक्यहं रणे । मुने त्वत्कृपया सर्वान् जित्वानापामयाक्यहम् । ३४॥
इत्युच्यन्वा स ययौ कान्ति पञ्चमेऽहनि सेनया । नारदोऽपि ययौ रामं द्रष्टु प्रीतमनाम्तदा ॥३५॥
रामेण पूजितः प्रेम्णा भोजनार्थं निमन्त्रितः । अथ भोजनवेलायां यूपकेतुं रघूत्तमः ॥३६॥
अदृष्ट्वा लक्ष्मणं प्राह यूपकेतुर्न दृश्यते । बालेषु च भोजनार्थे लक्ष्मणात्र समाह्वय । ३७॥
तदा समालतीं गत्वा पप्रच्छ लक्ष्मणो जवात् । सा प्राह वनमध्येऽद्य किञ्चित्सैन्ययुतो गतः । ३८॥
श्रुत्वैतद्यथावत्स गत्वा रामं जगाद ह । अथ रामो भोजनादि सपाद्य मुनिना मुदा ॥३९॥
ययौ सभागयासीनस्तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् । पञ्चप्रकृतिनान्यत्र स्थेयं मद्वचनान्मया ॥४०॥
तथेति नारदः प्राह सभायां संस्थितः सुखम् । अथ रात्रौ यूपकेतुमदृष्ट्वा रघुनन्दनः ॥४१॥
उपाहारं कृतुकामः पुनर्लक्ष्मणमब्रवीत् । आकारय यूपकेतुं मायं दृष्टो मया शिशुः ॥४२॥
तथेति रामवचनात्पुनर्गत्वा तु मालतीम् । पप्रच्छ यूपकेतुं म सा प्राह नागतस्त्विति ॥४३॥
स्वतः स विह्वलो भूत्वा रामं वृत्तं न्यवेदयत् । रामोऽपि नागतं श्रुत्वा बभूवार्त्ता विह्वलोऽभवत् ॥४४॥

हे ... ! तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो, उठो ॥ २१-२७ ॥ तुम अवश्य रामकी पतोहू
बनोगी । मैं इसके लिए उद्योग करूँगा - ऐसा कह और उसे इस तरह बंधाकर नारदजी आकाशमार्गसे चल
दिये ॥ २७ ॥ इसी समय यूपकेतु रथपर बैठकर अटवी में निन्द्रेय और राहुल के पत्तोंको देखते हुए तमसा नदीके
किनारे पहुंचे । २८ ॥ उस समय यावत्-पो सन् उन्मत्त मद्य थे । उसके साथ भृत्योंने तालाबमे स्नान किया
और सन्ध्यावन्दन करनेको बैठे थे कि वि. नारदजी को देखा । तब उनको प्रणाम करके सादर पूजन किया ।
इसके बाद नारद मुनिने विस्तारपूर्वक उस कन्या मदनमुग्धा का सारा वृत्तान्त कहा। उसे सुनकर क्रोध और
घबराहटसे पूर्ण होकर यूपकेतुने कहा - "हे देवर्षि मुने ! इस समय जो सब राजे रामसे द्वेषबुद्धि
रखते हैं, वह उनके लिए अगोचरिणी विड होगी । ३३ ॥ कम्बुकण्ठ आदि राजाओका बल में संग्रामभूमिम
पहुँचकर देखता हूँ। हे मुनिवर ! मैं आपकी कृपासे उन सबको बांधकर मदोन्मत्तीको लिये आता हूँ । ३४ ॥
ऐसा कहकर यूपकेतु अपनी सेनाके साथ पांचवें दिन कान्तिपुरीमें पहुंचे और नारदजी प्रसन्नतापूर्वक रामका
दर्शन करनेके लिए अयोध्या चले गये । ३५ ॥ वहाँ पहुँचनेपर रामने प्रेमसे नारदजीका पूजन करके भोजनका
निमन्त्रण दिया । जब भोजनका समय हुआ, तब यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा कि इस समय
यूपकेतु नहीं दिखायी देता । हे लक्ष्मण ! और-और बालकोंके साथ उसे भी भोजन करनेके लिए बुलाओ
॥ ३६ ॥ ३७ ॥ रामके आज्ञानुसार लक्ष्मण मालतीके पास पहुंचे और यूपकेतुको पूछा । उसने
कहा कि वे अपने साथ थोड़ी-सी सेना लेकर वनको गये हैं ॥ ३८ ॥ यह वृत्तान्त लक्ष्मणने जाकर
रामको सुना दिया । तत्पश्चात् मुनिके साथ राम भोजन आदि करके अपने सभाभवनमें गये और
वहाँ बैठकर नारद मुनिसे कहने लगे कि आप मेरे कहनेसे पाँच-सात दिन यहीं ही ठहर जाइये । 'तथास्तु'
कहकर नारदजी भी ठहर गये । तदनन्तर भोजनके समय रात्रिमें भी यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे
कहा- यूपकेतुको बुलाओ। आज मैंने दिनभर उस बच्चेको नहीं देख पाया है । ३६-४२ ॥ 'बहुत अच्छा'
कहकर लक्ष्मण फिर मालतीके पास गये और यूपकेतुको पूछा उसने कहा कि वे अभी तक

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७५


हतः सा जानकी श्रुत्वा विह्वला क्षिप्तमानसा । दुद्राव राघवप्रेग्ने मा मद्ये तूष्णीं कथं स्थिताः ॥४५॥
इति तान् प्राह वैदेही तदा सर्वेऽनितिष्ठिताः । त्यक्त्वोपादाशनं वेगेन मन्तोद्यर्थे ममूद्यताः । ४६।
तदा तान्विह्वलान्दृष्ट्वा नारदः प्राह राधवम् कांतिश्च यूपकेतोः प्रयाणादिप्रसादरात् ॥४७॥
हास्यं राघवः धृत्वा किञ्चित्प्रत्ययमाददा लक्ष्मणं प्राह वेगेन शत्रुघ्नोऽथैः मऋतु । ४८
सेनया चतुरङ्गिण्या उवन्कांतिं द्रुतादिभिः मथेति लक्ष्मणाथोत्क्त्वा याग्राहागनिपाय सः॥ ४९॥
सेनया बालकंवंगारुहलूनं प्रैषयन्निति । शर्म नन्त्राऽथ शत्रुघ्नः शीघ्रं स्यन्दनमस्थितः ॥५०।
ययौ कांतिसमीपं स षष्ठेऽहनि मुदान्वितः एतस्मिन्नन्तरे कांतिपुर्यां तत्र स्वयंवरे । ५१॥
सभायां राजशार्दूलाः मस्थितास्ते मुदान्विताः । अथ सा शिविकामारु ह्यययौ मदनसुन्दरी । ५२॥
किञ्चिन्म्लानमुखी दुःखामस्मरन्ती नारदेरितम् । वृद्धोघवाता तां सर्वान् दर्शयामास पार्थिवान् ॥५३॥
यूपकेतुस्तदा वेगाद्गत्वा तूणीं सभांगणम् । मोहन स्त्रं विमुच्याथ मोहयामास तां सभाम् ॥५४॥
मोहितैर्मोहनास्त्रेण न्यस्तां तद्वाहकैर्भुवि । रथेन शिविकां गत्वा धृत्वा मदनसुन्दरीम् ॥५५॥
निजाभिधानं मथाऽथ तां तुष्टासकंगमद । अथ सा त्रपयामास वीर मदनसुन्दरी । ५६।
सुमोच मालो तन्कण्ठे नवरत्नमयीं शुभाम् । ततः स यूपकेतुहि रथे मदनमन्दरीम् ५७॥
निवेश्य कांतिपुर्याः सच वेगेन्यो स्थितोऽभवत् । नापाह द्य.तंतं वीरसुन्दरीं त्वं भयं त्यज । ५८।
जित्वा सर्वान्नृपानद्य मया गच्छाम्यहं पुरि तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सा प्राह वचनं तदा । ५९।
वहवः सन्ति राजानस्त्वमेकः स्वल्पसेनया । असंख्यव्रातानि सैन्यानि तेषां पश्य समन्ततः ॥६०॥
कथ युद्धं भवेत्तत्र मा कुरुष्वद्य मंगरम् शीघ्रं मां नय स.फेन ततो रामेण सेनया । ६१।


गङ्गीलौटे ॥ ४३ ॥ यह सुन लक्ष्मण हँसकर हाथ थामकर वचन कहा। जब रामने यह सुना तो ज्ञातानों के साथ-साथ वे भी विह्वल हो उठे ॥ ४४ ॥ जानकीने सुन सा०ह्रै भी विह्वल तथा क्षिप्त होकर दौड़ती हुई रामके पास पहुंची और कहा कि आप लोग यूपकेतुका अशुभिन्वत देखकर भी चुपचाप बैठे हैं ? ॥ ४५ ॥ यह सुनकर सब लोग घबड़ा उठे और भोजन त्यागकर तुरंत उसका तैयारी कर दिये ॥ ४६ ॥ इस प्रकार सबको व्याकुल देखकर नारदजन रदन सहितराक्षस वृत्त यंत बतलाया और यूपकेतुके प्रस्थानकी भी बात कह सुनाई ॥ ४७ ॥ यह हास्य सुना ता रामको थोरा सन्तान हुआ और तुरंत लक्ष्मणको आज्ञा दी कि सग चतुरङ्गिणी सेना लेकर शत्रुघ्न अभी कांतिपुरी जायं । "बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मणने भोजन आदि करवाकर राजन ह् सेना और कुछ अरि वीर बालकोंके साथ शत्रुघ्नको कांतिपुरी भेजा रामको प्रणाम करके शत्रुघ्न रथपर सवार हुए और प्रसन्नता पूर्वक प्रस्थान कर दिये ॥ ४८-५० ॥ इस तरह अयोध्यासे चलकर छठे दिन शत्रुघ्न कांतिपुरीके पास पहुंच गये उधर कांतिपुरीमें स्वयंवर हो रहा था ॥ ५१ ॥ सभा मण्डपमें बहुतस राज हर्षपूर्वक बठे हुए थे। इतनेम मदनसुन्दरी पालकीमं बैठी हुई सभामें आयी ॥ ५२ । उस समय वह दुःखस नारदका वानीका स्मरण कर रही थीं। इस कारण उसका मुख कुम्हलाया हुआ था। सभामें पहुंचकर वृद्धा वार्या न सब राजाओंको दिखलाया ॥ ५३ ॥ इसी समय वेगके साथ यूपकेतु सभाभवनमें पहुंचे और मोहनास्त्रका प्रयोग करके उन्होंने सारी सभाको मूच्छित कर दिया । ५४ ॥ महनास्त्रसे मोहित होकर शिविकावाहकोने भी शिविका जमीनपर रख दी । इतनेम रथपर बैठे हुए यूपकेतु शिविकाके पास पहुंचे और मदनसुन्दरीका हाथ पकड़कर अपना नाम बताया, जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई और वीर यूपकेतु-के वरकर उसन उनके गलयं वह नवरत्नमयी वरमाळा डाल दी। सब प्रसन्न होकर यूपकेतुने मदनसुन्दरीको रथमें बिठा लिया ॥ ५५-५७ ॥ तब कान्तिपुरीसे बाहर निकलकर वे एक स्थानपर रुक गये । वहाँपर उन्होंने मदनसुन्दरीसे कहा कि अब तुम किसी प्रकारका भय न करो, ॥ ५८ ॥ मैं सब राजाओंको जीतकर तुम्हारे साथ अयोध्यापुरी चलूंगा । यूपकेतुकी बात सुनकर उसने कहा - ॥ ५९ ॥ ये राज बहुतसे हैं और युद्ध अकेले हें, तुम्हारे साथ सेना भी थोड़ी सी है और देखों न उनकी असंख्य सेना चारों ओर दबी हुई हैं ॥ ६० ॥

३७६आनन्दरामायणे[ सर्ग ८

युद्धं कुरु नृपैर्घोरैः शृणु मद्वचनं प्रभो । मा साहसं कुरुष्वात्रार्थये त्वां मुहुर्मुहुः ॥६२॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा तामाश्वास्य पुनः पुनः । उपसंहारयामास मोहनास्त्रं स लीलया ॥६३॥
तदा ते पार्थिवाः सर्वे श्रुत्वान्योन्यं वधू छलन् । शत्रुघ्नतनयेनेति क्षोभात्स्वैः स्यन्दने स्थिताः ॥६४॥
निर्ययुः कोटिशो योद्धुं स्वस्वसेनायुता जवात् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च पूर्ववैरेण दर्पिताः ॥६५॥
दृष्ट्वैनेमिमार्गेण ददृशुस्तं रथस्थितम् । युक्तं मदनसुन्दर्या बिभ्रतं मालिकां हृदि ॥६६॥
ततस्तं मुमुचुः सर्वे नानास्त्राणि सैनिकाः । यूपकेतुस्तदा वेगाद्गुणकृत्य महद्धनुः ॥६७॥
वायव्यास्त्रेण तत्सर्वानुद्धूय दशदिक्षु सः । प्रक्षिपत्पार्थिवान् सैन्यान्वाहनाग्र्यस्थितान् ॥६८॥
तदा स कंबुकण्ठोऽपि पूर्ववैरमनुस्मरन् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च स्वयंवरसमुद्भवम् ॥६९॥
निमेषान्निजकन्याया वैभ्तो हरणं बलात् । महाक्रोधान्वितर्यद्यौ स स्वसैन्येन परिवेष्टितः ॥७०॥
कुर्वन् दुंदुभिनिर्घोषं युद्धार्थं यूपकेतुना । यूपकेतुरपि श्रुत्वा दुन्दुभीनां महन्स्वनम् ॥७१॥
कान्तिपुर्यूताद्द्वारपुरतः प्रस्थितो रथी । टङ्कृत्य महच्चापं सन्दधे शरमुत्तमम् ॥७२॥
ये ये वीराः पुरद्वारान्निर्गताश्च वहिः क्षणे । तान् जघान क्षणादेव प्रेतदुर्गं रुगोधमः ॥७३॥
तं दृष्ट्वा यूपकेतोश्च कंबुकण्ठः पराक्रमम् । ययौ स्वयं स्यन्दनेन प्रेतसंधं विदार्य च ॥७४॥
छेपसैन्येन संयुक्तो यूपकेतुं रुधा जगाद तदऽहं यूपकेतं म प्रथा म्वं मङ्गर कुरु ॥७५॥
किमेतान्मशकान् हत्वा पौरुषं मन्यसे जड । इत्युक्त्वा सप्तभिशार्यूपकेतुं जघान सः ॥७६॥
तान्बाणानागतान् दृष्ट्वा यूपकेतुर्निजैः शरैः । संछिन्त्वा नवबाणैस्तच्चापं सारथिनं ध्वजम् ॥७७॥
कवचं मुकुटं छित्वा जघान तुरगानपि पद्भ्यां तदा कंबुकण्ठो गदामादाय दुद्रुवे ॥७८॥

ऐसी अवस्था में युद्ध कैसे कराओगे ? आज तुम संग्राम न करो । मुझे शीघ्र अयोध्या पहुँचा दो और वहाँ से राम-चन्द्रजी की विशाल सेना लेकर आओ, तब युद्ध करो हे प्रभो ! ऐसा साहस इस समय करना ठीक नहीं है। मैं बार-बार यही विनती करती हूँ ॥६१। ६२। इस प्रकार मदनसुन्दरी का वचन सुनकर उन्होंने उसे आश्वासन दिया और मोहनास्त्र का संवरण कर लिया । ६३ ॥ जब उन राजाओं ने किसी के मुख से सुना कि शत्रुघ्न-के पुत्र यूपकेतुने मदनसुन्दरी का हरण किया है तो अपने-अपने रथों पर सवार हो-होकर बड़ी-बड़ी सेना लिये उसके साथ व लड़ने को निकल पड़े। एक तो चण्डेश और मन्त्रणाक्ष का ही वैर उन लोगों के मन में था, दूसरे अब मदनसुन्दरी के हरण से उनका क्रोध और भी अधिक हो गया ॥६४। ६५। फिर रथ या, शत्रु के रथके पहियाका रास्ता देखते हुए वे चले और थोड़ी ही दूर जाकर उन्होंने देखा कि यूपकेतु मदन-सुन्दरी के साथ बैठा है और उसके गले में वरमाला पड़ी हुई है ॥ ६६ ॥ देखते ही सब राजाओं ने एक साथ उस वीर बालक पर कितने ही शस्त्रोंका प्रहार कर दिया । तब यूपकेतु ने वेग के साथ अपने धनुष को टंकार किया । ६७ ॥ और वायव्य अस्त्र का प्रयोग करके इन सब राजाओं को रथ, वाहन तथा सेना समेत उठाकर दूर फेंक दिया ॥ ६८ । महाराज कम्बुकण्ठ भी पूर्वस्नेह को स्मरण करके विशेषकर उस समय चण्डिका अपनी कन्या का हरण देखकर अपनी सेना के साथ दुन्दुभिका युद्ध बजवाते हुए दुन्दुभी का घोष करते हुए निकले ॥६९। यूपकेतु ने भी जब दुंदुभीकी गर्जना सुनी तो कान्तीपुरके उनके द्वारपर पहुँचे और अपने धनुषका टंकार करके उसपर एक उत्तम बाणका संधान किया ॥ ६९-७२ । उस पुरद्वार से जो-जो योद्धा निकलते, उनको अपने बाणोंसे यूपकेतु बराबर मारते जाते थे । इतने थोड़े ही देर में वह द्वार मृतकों से भर गया । ७३ । इस तरह यूपकेतुका पराक्रम देखकर राजा कम्बुकण्ठ स्वयं अपने रथ पर सवार होकर उन शवों को चीरते हुए बड़ी वृद्ध सेना के साथ यूपकेतु के सामने जा पहुंचे और क्रोध में भरकर उन्होंने कहा-अब तू मेरे साथ संग्राम कर । ७४॥ ॥७५॥ अरे जड ! इन मच्छडोंको मारकर क्या तू अपने पौरुषको पौरुष मानता है ? ऐसा कहकर कम्बुकण्ठने सात बाणों से यूपकेतु पर प्रहार किया । ७६ ॥ उन बाणों को अपनी ओर आते देखकर यूपकेतुने अपने नौ बाणों से कम्बुकण्ठके बाणों, धनुष, सारथी, ध्वजा, कवच और मुकुट को काट डाला और घोड़ों को भी मार दिया । तब

सर्गः ८]
विवाहकाण्डम्
३७७


तावन्महस्रधा बाणैर्यूपकेतुश्चकार ताम् । ततो बदध्वा दृढां मुष्टिं कम्बुकण्ठस्त्वरान्वितः ॥७९॥
हृदये यूपकेतोश्च जघानाचलसन्निभाम् । तदा स यूपकेतुस्त्वं श्वशुरं स्यन्दनोपरि । ८०।।
ध्वजे बबन्ध वेगेन खङ्गं जग्राह सम्भ्रमात् । कंबुकण्ठशिरश्छेदं कर्तुं तं समुपस्थितम् ॥ ८१॥
दृष्ट्वा धृत्वा करो तस्य सखड्गं सम्भ्रमान्विता । तमाह नत्वा माश्वश्रीमं तदा मदनसुन्दरी ॥८२॥
विह्वला विगतोत्साहा वेपती अश्रुलोचना । मम तातं कंबुकण्ठमंतं हंसि कथं प्रभो ॥८३॥
मक्षिकापतनं पूर्वं ग्रासे एतच्चया कृतम् । शुभारम्भे पूर्वमेव दुःस्वप्नंमिवलम्बिनम् ॥८४।
मद्वाक्याञ्चैव हंतव्यस्तन्ममत्वां प्रार्थयाम्यहम् । एवं मदनसुन्दर्या वचः श्रुत्वा विहस्य सः ॥८५॥
कराद्विमुच्य तं खङ्गं स्वसूतं चोदयन्मुदा । सेनया स ययौ यावत्त्वथाऽयोध्यां पुरीं प्रति ॥८६॥
तावद्दुन्दुभिनिर्घोषानग्रे शुश्राव सेनया । पुनश्चाथ दृढीकृप्य यूपकेतुस्तदा पथि ॥८७॥
कस्येयं वाहिनी चेति चिंतयामास चेतसि । ततः शरं सुमोचैकं निजनामांकितं वलात् ॥८८॥
योजनांतरसेनायां शरः शत्रुघ्नसन्निधौ । पपान तत्पदाग्रे तं दृष्ट्वा स चकितस्तदा ॥८९॥
शरपुच्छे यूपकेतोर्नाम दृष्ट्वाथ शत्रुहा । निश्चितवान्यूपकेतुर्मागेऽग्रे वर्तते ध्रुवम् ॥९०॥
ततश्चापे स शत्रुघ्नः स्वनाम कितमुत्तमम् शरं संधाय विमुञ्च यूपकेतुं सुमोच ह ॥९१॥
स शरो यूपकेतोश्च मम्नकादूर्ध्वतस्तदा । अपतत्पृष्ठभागे स तं ददर्श पितुः शरम् ॥९२॥
तदा हृष्टो यूपकेतुः कुर्वन्दुंदुभि निःस्वान् । गत्वा वेगेन शत्रुघ्नं दृष्ट्वोत्प्लुत्य रथादधः । ९३॥
ननाम पितरं पत्न्या कंबुकंठं प्रदर्शयन् । तदा तं सुहृद ज्ञात्वा मोचयामास शत्रुहा ॥९४॥
कंबुकंठमुखाच्छ्रुत्वा सर्वं वृत्तं सविस्तरम् । शत्रुघ्नः प्रापिनस्तेन सुहृदा तत्पुरो ययौ ॥९५॥


कम्बुकण्ठ पैदल ही गदा लेकर दौड़ पड़ा ॥ ७७ । ७८ ॥ यूपकेतुने अपने बाणोंसे उनकी गदाके भी हजार टुकड़े कर दिये । इसके बाद वह गदा फेंककर कटार घूंसा मारा । तब यूपकेतुने अपने ससुर कम्बुकण्ठको रथकी ध्वजामें बान्ध दिया और सिर काटनेके लिए वेगके साथ तलवार उठायी ॥ ७९-८१ ॥ इस तरह सिर काटना उद्यत एवं हाथमें खड्ग लिए यूपकेतुको देखकर मदनसुन्दरीने प्रणाम किया और आँखोंमें आँसू भरकर कहा - ॥ ८२ । हे प्रभो ! मेरे पिता कम्बुकण्ठको आप क्यों मारना चाहते हैं ? पहले ही ग्रासमें मक्खी गिर पड़नेके समान आपने शुभके स्थानमें इस दुःखदायी कर्मको क्यों अपनाया है ? ॥ ८३ ॥ ८४ । अतः मेरी बात मानकर इन्हें मत मारिए । मैं आपसे यही प्रार्थना करती हूँ। यह कहती हुई मदनसुन्दरी विह्वल हो गयी, उसका उन्माद नष्ट हो गया वा वह कांप रही थी और नेत्रोंमें आँसूकी धाराएँ बहाती जा रही थी । इस प्रकार मदनसुन्दरीकी बात सुनकर यूपकेतु मुसकराये और खड्ग फेंककर अपने सारथीको रथ चलानेका संकेत किया, वे अपनी सेनाके साथ अयोध्यापुरीकी ओर चले ही थे ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ इतनेमें आगेसे दुन्दुभीका घोष सुनाई पड़ा । अब अपना धनुष सम्हालकर सोचने लगे कि आगेसे यह किसकी सेना आ रही है। यह सोचकर उन्होंने अपने नामसे अंकित एक बाण वेगपूर्वक छोड़ा ॥ ८७ ॥ ८८ ॥ वह बाण उड़ता हुआ एक योजन तक गया और जहाँ सेना पड़ी हुई थी, वहाँ पहुंचकर शत्रुघ्नके चरणोंके आगे गिरा । उस बाणको देखकर शत्रुघ्न चकित हो गये । ८९ ॥ फिर बाणके पुच्छमें यूपकेतुका नाम देखकर शत्रुघ्नने निश्चय किया कि यूपकेतु आगे रास्ते में ही हैं ॥ ९० ॥ तदनन्तर शत्रुघ्नने भी अपने नामसे अंकित एक बाण उठाकर यूपकेतुकी ओर छोड़ दिया ॥ ९१ ॥ वह बाण यूपकेतुके ऊपरसे होता हुआ पीछे जा गिरा । यूपकेतु-ने अपने पिताका बाण देखा ॥ ९२ । तब प्रसन्न होकर दुन्दुभि जैसा गर्जन करते हुए वेगके साथ शत्रुघ्न-के पास पहुंचे । वहाँ पिताको देखते ही वे रथसे कूद पड़े और अपनी स्त्री मदनसुन्दरीके साथ जाकर शत्रुघ्न-को प्रणाम किया और ध्वजामें बँधे हुए कम्बुकण्ठको दिखाया । शत्रुघ्नने उन्हें अपना सम्बन्धी समझकर छुड़ा दिया ॥९३॥९४। फिर शत्रुघ्नने कम्बुकण्ठके मुखसे ही विस्तारके साथ समस्त वृत्तान्त सुना । इसके बाद कम्बुकण्ठके

३७८आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

कांतिपुर्यां बहिः स्थित्वा कंबुकंठमतेन सः । आकारणार्थं रामाय रामं दूतान्प्रचोदयत् ॥५६॥
तदा ते कंबुकंठस्य शत्रुघ्नस्यापि वेगतः आकारणार्थं श्रीराम ययुर्द्ता मुदान्विताः ॥५७॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे मदनसुन्दरीहरणं नामाष्टमः सर्गः । ८ ॥


नवमः सर्गः

(रामका वंशविस्तार)

श्रीरामदास उवाच
गत्वाऽयोध्यापुरीं दूता रामं वृत्तं न्यवेदयन् । रामोऽपि श्रुत्वा तद्वृत्तं सीतायै संन्यवेदयत् ॥ १ ॥
ततो मुहूर्ते श्रीरामः सावरोधोऽनुजैः सह । पौरैर्जानपदैः सर्वैः सुहृद्भिः सेनया सह ॥ २ ॥
नारदेन ययौ कान्तिमार्यां मुक्तिपुरीं प्रति । ततः श्रुत्वा कंबुकंठः शीघ्रं गन्धर्वमागतम् ॥ ३ ॥
स प्रत्युद्गम्य विनयान्नत्वा संपूज्यत्समुदा । यूपकेतुं ततः पूज्य वरञ्चाध्वं पुरीं शनैः ॥ ४ ॥
वारस्त्रीनृत्यगीतैश्च तूर्यघोषैर्निनाय सः । ततः कान्तिपुरीस्थान्नाः स्त्रियः प्रासादमस्थिताः ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा रामं यूपकेतुं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । ततो रामः शनैर्हस्त्युं कन्पिनं गृहमुत्तमम् ॥ ६ ॥
गत्वा दृष्ट्वा मुहूर्ते तु पूर्वोक्तकौतुकैः सुखम् । यूपकेतोर्विवाहं स चकार महोत्सवैः ॥ ७ ॥
ततो विवाहं निर्वर्त्य कंबुकंठन पूजिताः । हस्त्यश्वरथपादातदासदासीजनादिभिः ॥ ८ ॥
ययौ मदनसुन्दर्या रामोऽयोध्यापुरीं विजाप् । ततो विवेश नागरी नेदुर्वादित्राणि वै तदा ॥ ९ ॥
मङ्गलुवारनार्यश्च तुष्टुवुर्मागधादयः । प्रासादस्थाः स्त्रियो रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ १० ॥
मार्गे नीराजितः स्त्रीभिर्विवेश निजमन्दिरम् । कारयित्वा रमापूजां ददौ दानान्यनेकशः ॥ ११ ॥
सुहृदः पूजयमास राघवो वस्त्रादिभिः । ततो विसर्जयामास सर्वान्वस्वस्थल प्रति ॥ १२ ॥


प्रार्थना करनेपर उनके साथ ही कांतिपुरी गये ॥ ५५ ॥ वहाँ कम्बुकण्ठकी सलाहसे शत्रुघ्न नगरके बाहर ही ठहरे और रामको बुलानेके लिए दूतोंको भेजा ॥ ५६ ॥ उसी समय शत्रुघ्न तथा कम्बुकण्ठके दूत श्रीरामको बुलानेके लिए प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े ॥ ५७ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदास कहने लगे वे दूत अयोध्यापुरीमें पहुंचे और रामको कान्तिपुरीका सब हाल कह सुनाया। सो सुनकर रामने सीतासे कहा ॥ १ ॥ इसके पश्चात् अच्छे मुहूर्त्तमें राम अपने अन्तःपुरकी नारियों, पुरवासियों, जनपदवासियों, समस्त सम्बन्धियों, नारद तथा सेनाके साथ आदिकुन्तिपुरी अर्थात् कांतिपुरीको चल पड़े। जब कम्बुकण्ठने सुना कि रामचन्द्र पुरके निकट आ पहुंचे हैं, तब आदरपूर्वक स्वागत करने गये। यहाँ पहुंचकर सविनय प्रणाम किया। इसके अनन्तर राम तथा यूपकेतुका पूजन करके हाथीपर बिठाकर धीरे-धीरे पुरोको चले ॥ २-४ ॥ रास्तेमें वेश्याएँ नाचती गाती थीं और दुन्दुभी आदि विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे। उधर जब नगरकी स्त्रियोंने आते देखा तो राम और यूपकेतुपर पुष्पवृष्टि करने लगीं। तत्पश्चात् राम जनवासेमें पहुंचे ॥ ५-६ ॥ वहाँ अच्छा मुहूर्त्त देखकर पूर्वोक्त कौतुकोंके साथ बड़े उत्साहसे यूपकेतुका विवाह किया ॥ ७ ॥ विवाहकी सब रीतियाँ पूरी हो जानेपर कम्बुकण्ठसे पूजित होकर कितने ही हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सेना, दास-दासी आदिके साथ मदनसुन्दरीको लेकर अपनी अयोध्यापुरीको चल दिये। सन्तोषकाक पार पहुंचकर व अपनी नगरी में घुसे तो विविध प्रकारके बाजे बजने लगे ॥ ८ ॥ ९ ॥ वेश्याएँ नाचने लगीं और मागध बन्दीजन स्तुति करने लगे। नगरवासिनी महिलाएँ अट्टालिकाओंपर चढ़-चढ़कर रामपर फूल बरसाने लगीं और कुछ स्त्रियाँ मार्गमें आरती उतारने लगीं। इस उत्साहसे राम अपने महल गये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मीकी पूजा की और अनेक प्रकारके दान दिये ॥ १० ॥ ११ ॥ इसके अनंतर निमंत्रणमें आये हुए