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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४८१

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४८१

व्याधजन्मान्तरे जाते कण्वः पुत्रस्त्वहं ततः । पश्चाज्जातोग्रहं भूतस्त्वभवं रघुनन्दन ॥१२०॥
अहं पुन किरातेषु किरातैः सह वर्द्धितः । जन्ममात्रं द्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ॥१२१॥
शूद्रायां बहवः पुत्राश्चोत्पन्ना मेऽजितात्मनः । ततश्चौरैश्च सङ्गम्य चौरोऽहमभवं पुनः ॥१२२॥
धनुर्वाणधरो नित्यं जीवानामतकप्रमः । एकदा मुनयः सप्त दृष्टा महति कानने ॥१२३॥
स्वतेजसा प्रकाशन्ते ज्वलनाकैसमप्रभाः । तानन्वधावं लोभेन तेषां सर्वपरिच्छदान् ॥१२४॥
गृहीतुकामस्तत्राहं तिष्ठतां तिष्ठतामिति । अत्रवन् मुनयोऽपृच्छन् किमायासि द्विजाधम ॥१२५॥
अहं तानब्रुवं किञ्चिद्दात मुनिसत्तमाः । पुत्रदारादयः सन्ति बहवो मे बुभुक्षिताः ॥१२६॥
तेषां संरक्षणार्थाय चरामि गिरिकानने । ततो मामब्रुवन्सप्त्याः पृच्छगत्वा कुटुम्बकम् ॥१२७॥
यो यो मया प्रतिदिनं क्रियते पापसञ्चयः । यूयं तद्भागिनः किं वा नेति नेति पृथक् पृथक् ॥१२८॥
वयं स्थास्यामहे यावदागमिष्यसि निश्चयात् । यत्पापं ब्रह्महत्यायां यत्पापं मद्यपाततः ॥१२९॥
तेन पापेन लिम्पामो यदि गच्छामहे वयम् । यत्पापं हेमतीर्येण गुरुतल्पगमाच्च यत् ॥१३०॥
तेन पापेन लिंपामो त्वामपृष्ट्वा वनेचर । चेद्व्रजामो वयं भद्रे द्रक्ष्यसे शृण्वतो यदिः ॥१३१॥
संसर्गजनितं पापं ब्राह्मणस्वहरणाच्च यत् । तेन पापेन लिप्तामो यदि गच्छामहे वयम् ॥१३२॥
एवं तच्छपथैर्नानाविधैः प्रत्ययमागतः । तथेत्युक्त्वा गृहं गत्वा मुनिभिर्यदुदीरितम् ॥१३३॥
अपृच्छं पुत्रदारादींस्तैरुक्तोऽहं रघूत्तम । पापं तथैव मन्मत्रे वयं तु फलभागिनः ॥१३४॥
तच्छ्रुत्वा जातनिर्वेदो विचार्य पुनरागतः । मुनयो यत्र तिष्ठन्ति करुणापूर्णमानसाः ॥१३५॥
मुनीनां दर्शनादेव शुद्धान्तःकरणोऽभवम् । धनुरादि परित्यज्य दण्डवत्पतितोऽभवम् ॥१३६॥

निभाया । व्याधका जीवन बितानेके पश्चात् मैं पत्नीकी निस तृणका पुत्र होकर जन्मा । मै उस समय किरातों ही में बढ़ा और उन्हींके साथ रहन लगा । केवल जन्म मेरा ब्राह्मणके वीर्य्यसे हुआ था। किन्तु कर्म मेरा सर्वथा शूद्रोचित था ॥ १२०-१२१ ॥ एक शूद्रासे मेरा विवाह हुआ और उससे कई पुत्र उत्पन्न हुए। कुछ दिनों बाद मै चोरोंस जा मिला और धनुष-वाण धारण करके संसारी जीव के लिए यमराज सदृश भयान्तक चोर हो गया । एक बार मैंने एक विकराल जङ्गलमे सप्त ऋपियोंका देखा ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ जलती हुई अग्नि तथा सूर्यके समान इनका प्रकाश था । उसे देखकर हा उनके कपड़े लने छींननेके लिए मै जोरोंसे दौड़ पड़ा और "ठहरो ठहरो" कहकर चिल्लाने लगा । तव ऋषियोंने कहा-अरे द्विजाधम ! क्यों दौड़ा आ रहा है ? । १२४ । १२५॥ मैन उनर दिया कि आपमे कुछ भोजन दिग्ये। क्योंकि मेरे परिवारके सब लोग भूखे बैठे हैं। उसीका पालन-पोषण करनेके लिए मैं वन वन घूम रहा हूँ। तब सप्तर्षियोंने हमसे कहा-अपने कुटुम्बियोंसे जाकर पूछो कि मैं जो नित्य यह पापकी कमाई कर रहा हूँ। तुम लोग अलग-अलग बतलाओ कि उस पापका फल भी भोगोगे या नहीं ? ॥ १२६-१२८ ॥ यह विश्वास रक्खो कि जबतक तुम लौटकर नहीं आओगे तब तक मै यहाँ ही रहूँगा। जो पाप ब्रह्महत्या करनेमें और जो पाप मद्य पीनेमे लगता है, हमलोग उन्हीं पापोंके भागी हों, जो बिना तुम्हारे आय यहाँसे जावें। जो पाप मोना चुराने या गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेमे होता है, हमलोग उन पापोंके भागी हों, यदि तुमसे बिना पूंछे यहाँस जाये ॥ १२९-१३१ ॥ संसर्गजनित अथवा ब्राह्मणका धन हरण लेनेसे जो पातक लगता हो हम सब उस पापके भागी हों, यदि यहाँसे पीठ पीछे हटें ॥ १३२ ॥ इस तरह उनके विविध प्रकारकी कसम खानेपर मुझे विश्वास हुआ और अपने घर गया । वहाँ जैसा उन ऋषियोंने कहा था, उसी तरह करक लोगोंको इकट्ठा करके मैने पुत्र-स्त्री आदिसे पूछा । उन्होंने उत्तर दिया कि तुम जो पाप कर रहे हो उससे हमें कोई मतलब नहीं। हम तो केवल फल चाहते हैं ॥ १३३ ॥ १३४॥ उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ और मै लौटकर फिर वहीं आया, जहाँ दयासे परिपूर्ण हृदयवाले वे सप्तर्षि बैठे मेरा रास्ता देख रहे थे ॥ १३५ ॥ उन मुनियोंके दर्शन ही से मेरा हृदय पवित्र हो गया । तुरन्त धनुष-बाण आदि शस्त्रास्त्र फेंककर मैं उनके चरणोंम दण्डवत् लोट गया ॥ १३६॥

४८२आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

रक्षोध्न मां मुनिश्रेष्ठाः पतितं नरकार्णवे । इत्यग्रे पतितं दृष्ट्वा मामूचुर्मुनिसत्तमाः ॥१३७॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते सफलः सङ्गमोऽयमः । उपदेश्यामहे तुभ्यं किञ्चित्तेनैव मोक्ष्यसे ॥१३८।
परस्परं समालोक्य दुर्वृत्तोऽयं द्विजाधमः । उपदेश्य एव सद्भिस्तथापि शरणं गतः ॥१३९।
रक्षणीयः प्रयत्नेन मोक्षमार्गोपदिशतः । इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूर्वकम् । १४०।
मुनयो मामूपदिदिशुन्मत्कृपारूध्वेमानसाः । एकाग्रमनसाऽत्रैव मरेति जप सर्वदा ॥ १४१.।
आगच्छामः पुनर्यावन्तावत्त्वं सदा जप इत्युक्त्वा प्रत्यूः सर्वे मुनयो दिव्यदर्शनाः ॥१४२॥
अहं यथोपदिष्टन्तैस्तथाऽकरवमञ्जसा । अपलेकाग्रमनसा चाद्य विस्मृतवानहम् ।। १४३॥
साक्ष्यथं तपमस्तत्र दण्डोऽग्रे स्थापितो मया एवं बहुतिथे काले गते निश्चलरूपिणः ।। १४४।
सर्वस्वङ्गेकिटीनस्य वल्मीकोऽभून्ममोपरि । दण्डाग्रे च नगो रम्यो बभूव मत्तपोबलात् ॥ १४५।
ततो युगसहस्रान्ते ऋषयः पुनरागमन् । मामूचुर्गमगमस्वेति तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थितः ॥१४६॥
वल्मीकान्निर्गतेवाहं नीहारादिव भास्करः । मामप्याहर्मुनिगणा द्वाल्मीकिस्त्वं मुनीश्वरः । १४७।
वल्मीकात्सम्भवो यस्माद्द्वितीयं जन्म तेऽभवत् । इत्युक्त्वा ते ययुर्दिव्यां गतिं रघुकुलात्तम ।। १४८।
अहं ते रामनाम्नश्च प्रभावादीदृशोऽभवम् । एकदा शम्भुवचसाऽथ विधिः श्रुतवाँस्तव । १४९।
चरितं वेदवाक्यैश्च कैलासेऽग्ने शुभे । अनेन विधिना तच्च कथितं नारदाय हि ॥ १५०।
नारदः कथयामास वेदवाक्यैर्यथा तथा । ततः क्रौञ्च हतं दृष्ट्वा व्याधेन तमसातटे ॥ १५१॥
शोचन्तीं सान्त्वयन्क्रौञ्चीं ममास्यान्निर्गता तदा । द्वात्रिंशदक्षरः प्रोक्तः श्लोकः श्लोकत्वमागतः । १५२।

और कहने लगा-हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं नरकके महासमुद्रम गिर गया हूँ मेरा रक्षा करिए ॥ १३७॥ इस तरह मुझे आगे पड़ा देखकर उन्होंने कहा - "उठो ! उठो ! आज हम लोगोंका समागम तुम्हारे लिये बड़ा ही कल्याण-कारी हुआ। हम तुम्हें कोई ऐसा उपदेश देंगे, जिससे सब सब पापसे छूट जाओगे।' इसके बाद उन लोगों-ने परस्पर मंत्रणा करके कहा - नियम तो यह है कि सज्जन तो मनुष्योंको ही उपदेश देना चाहिये । यह ब्राह्मणाधम एक असाधारण दुराचारी है। फिर भी इससमयकी शरण आया है। इसलिये इसे कोई उपदेश देकर इसकी रक्षा करनी चाहिये। इस प्रकार निश्चय करके हे राम ! उन्होंने आपके उल्टे अक्षरोंके नाम (मरा) का उपदेश दिया और हमसे कहा कि तुम एकाग्र मनसे 'मरा' नामका जप करते रहो जब तक हमलोग उधरसे लौटकर न आय, तब तक तुम बराबर इस नामका जप करते रहना ऐसा कहकर वे दिव्यदृष्टि ऋषिगण वहाँसे चले गये ॥ १३८-१४२॥ जैसा उन्होंने बतलाया था, ठीक उसी तरह मैं एकाग्र मनसे जप करने लगा। मेरा मन उस जपमें इतना रम गया कि मुझे अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रही ॥ १४३॥ साक्षीके लिए मैंने अपने सामने एक दण्ड गाड़ दिया था, इस तरह निश्चल भावसे भजन करते-करते बहुत दिन बीत गये और वल्मीकों (दीमकों) ने मेरे शरीरपर मिट्टीका ढेर लगा दिया। मेरे तपोबलसे वह सामनेका गड़ा हुआ दण्ड एक सुन्दर वृक्ष बन गया । १४४॥ १४५ । एक हजार युग बीतनेके बाद वे सप्तऋषिगण फिर लौटे और मेरे विमौटके समीप खड़े होकर उन्होंने पुकारा और कहा कि "निकलगे" । उसे सुनकर मैं तुरन्त उठ खड़ा हुआ। उस समय विमौटके भीतरसे मैं निकला, उस समय मेरी शोभा वैसी ही थी, जैसी कि कुहरेके भीतरसे निकले हुए सूर्यभगवान्की होती है। तब मुझसे मुनियोंने कहा कि वल्मीक (बिमौटे) से तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ है। इसलिए तुम मुनीश्वर वाल्मीकि हो गये हो ।। १४६-१४८॥ इतना कहकर वे ऋषि दिव्य (आकाश) मार्गसे चले गये आपके रामनामके प्रभावसे मैं ऐसा ऋषि हो गया। एक बार ओषधिव्रजके मुखसे इन ब्रह्माजीने वेदसे सचकर लिखेहुए आपके चरित्रको सुना था ! १४९ ॥ तब इन्हीं (ब्रह्मा) ने उसे अपने बेटे नारदजी द्वारा और उन्होंने वह सारा चरित्र हमें सुनाया। कुछ समय बाद एक व्याधि द्वारा मारे गये क्रौञ्चके दुःखसे दुःखिता क्रौञ्चीको देखकर मुझे जो शोक हुआ, वही शोक बत्तीस अक्षरोंवाले श्लोकके रूपमें मेरे मुखग निकल पड़ा (श्लोक यह है-मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः