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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ११ ] राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धम् । ४५१

सर्गः ११ ] राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धम् । ४५१

नार्यो विलोकयामासुः सर्वाः सांगुष्ठसायकान् । कराकृष्टधनुर्दण्डान्खड्गहस्तान्निशितैरसिभिः ॥४०॥
हयारूढान्नरवेषेण सर्वासां पुरतः स्थितान् । समुत्तस्थुर्जवेनैव दृष्ट्वा कञ्जलोचनाः ॥४१॥
अतिविस्मयमापन्नास्तदाऽपृच्छन्पृथक् पृथक् । के यूयं क्व गमिष्यध्वं कुतः खलु समागताः ॥४२॥
यूयं देवा दानवा वा सम्यग्ने स्वाधुना पुरः । ब्रूतानृतं वचः सर्वं यद्वै नः प्रतिभासते ॥४३॥
अस्माकं दुःशरीराणि कमनीयानि वै कथम् । जानीथ यद्यसौ दुष्टो दुन्दुभिर्जीवति वा मृतः ॥४४॥
इति तासां वचः श्रुत्वा राघवस्ता वचोऽब्रवीत् । अहं सूर्यकुले जातो रामो नाम्ना न संशयः ॥४५॥
सम्राडधिपतिः श्रीमान् सूर्यवंशसमुद्भवः । मृगयार्थमिहायातः केशरी निहतो वने ॥४६॥
धनुष्कोट्या शिलां स्पृष्ट्वा क्षिप्त्वा चोपरिभागतः । त्यक्त्वा त्वं निःशनैर्गत्वा गुहायान्निर्गताः स्म हि ॥४७॥
मया कृतानि युष्माकं गात्राणि सुदृढान्यतः । स मया निहतो वाली रावणस्थानकारकः ॥४८॥
समाश्विता वरान्दातुं यूयं नेत्रा भयाऽद्य हि । नात्रोऽस्ति मम कार्यं हि परस्वर्ग्यं पुरीं व्रजे ॥४९॥
यत्पृष्टं तन्मया चोक्तं का यूयं कथ्यतां मम । किमर्थं दुन्दुभिः पृष्टः का वांछा प्रियतां वरान् ॥५०॥
तद्राघववचः श्रुत्वा दुन्दुभिर्निहतोऽभवत् । शिलां निष्कास्यतां चापि सर्वास्तु प्रमदा ययुः ॥५१॥
ऊचुः सर्वास्तदा राममानन्दोत्फुल्ललोचनाः । वयं ब्राह्मणपुत्र्यश्च चत्वारस्त्वथ पाठकाः ॥५२॥
सहस्राणि नृपाणां च कन्यानां कश्यपात्पुरः । समानीता बलाइव तेन दुन्दुभिना प्रभो ॥५३॥
लक्ष्म्यामितिविवाहार्थं सप्तानां कदिने सहन् । कृशोऽस्मीति मन्यमानः श्रीरन्वान्ने नहार सः ॥५४॥
यानि यानि जहार स्त्रीरत्नानि रघुनन्दन । अस्यां द्रोण्यां स्थापयित्वा दत्त्वा द्वारं शिलावगम् ॥५५॥
अचलां स्थण्डिलान्यैश्च क्षीरः समानेतुमनादरम् । पुनःशरं गतो दैत्यो वयमत्रैव संस्थिताः ॥५६॥

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हो रहे थे और धनुष-बाण तथा तलवार लिये हुए थे । ३९ ॥ ४० ॥ वे मनुष्यका वेश धारण करके घोड़ेपर सवार होकर एकाएक स्वच्छन्द उन बाणोंके सम्मुख लड़े थे और उन सब स्त्रियोंका भी समान स्वरूप था और एक ही तरहकी वेष-भूषा थी । ऐसे रामको देखकर उन स्त्रियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे कहने लगीं— "आप लोग कौन हैं ? घोड़ेपर सवार होकर कहाँसे आप आ रहे हैं ? आप सब देवता हैं या दानव ? आप कहाँ जायेंगे ? कृपया हम यह भी बतलाइये कि आप हमसे क्यों बात करना चाहते हैं ? हम लोगोंका यह हीन-शीर्ण शरीर इस प्रकार सुन्दर कैसे हो गया ? वह दुष्ट दुन्दुभि जीवित है या मर गया ?" ॥ ४१-४४ ॥ इस प्रकार उनका बात सुनकर रामने उन सबसे कहा 'सूर्यवंशमें उत्पन्न और सीता डोपके अधिपति हम राम नामका मैं एक राजा हूँ । इस समय अपने एक ही रूपको चार भागों में विभक्त करके तुम सबके सम्मुख उपस्थित हुआ हूँ । मैं यहाँ जङ्गलमें शिकार करने आया था और उसी कन्दरामें मैंने एक सिंहको मारा है । फिर तुम्हारे गुफा द्वारपर एक लम्बा-चौड़ी शिला देखा । उसे अपने धनुषका अग्रसे दूर हटाकर तुम्हारे समीप आया और अपने हाथके स्पर्शसे तुम्हारे जर्जर अंगों शरीरोंको पवित्र तथा सुन्दर बना दिया है । दुन्दुभी राक्षसको बालिने मार डाला । रावणका विनाश करनेके निमित्त मैंने उस बालिको भी मार डाला है ॥ ४५-४८ ॥ केवल तुम्हें वरदान देनेकी इच्छासे मैंने तुमसे संभाषण किया है । अब यहाँसे आगे जानेका हमारा कोई कार्यक्रम नहीं है । इससे अपनी अयोध्या नगरीको लौट जाऊँगा । तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, मैंने उसका उत्तर दे दिया । अब यह बताओ कि तुम कौन हो ? दुन्दुभीको तुमने क्यों पूछा ? तुम्हारा क्या कामना है ? इच्छित वर मुझसे माँग लो ।" जब उन सबने रामके मुखसे यह सुना कि दुन्दुभी मार डाला गया और हमारे द्वारपर लगी हुई शिला भी हट गयी है तो वे बहुत प्रसन्न हुईं और आनन्दमें प्रफुल्लित होकर उन्होंने कहा हे नाथ ! बहुत दिन हुए वह दुन्दुर्भ राक्षस हम चार ब्राह्मणकी पुत्रियों तथा सोलह हजार क्षत्रियों तथा वैश्योंकी कन्याओंको हर लाया था । उसकी यह हार्दिक इच्छा थी कि मैं एक ही दिनमें एक लाख स्त्रियोंके साथ विवाह करूँगा । इसी विचारसे वह अच्छे-अच्छे कन्याओंका अपहरण किया करता था ॥ ४९-५४ ॥ हे रघुनन्दन वह जिन सुन्दरियोंको लाता था, उन्हें इसी कन्दरामें डालकर दरवाज़ेपर एक इतनी बड़ी शिला लगा दिया करता

४५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

वसन्तेऽग्रे नृपाणां च वैश्यानां बालिकाः प्रभो । वायुपर्णाशनाः सर्वाः श्रीविष्ण्वर्पितमानसाः ॥५७॥
तत्तासां वचनं श्रुत्वा भिन्नरूपैः पुनः प्रभुः । ता उवाच स्त्रियः सोऽहं विष्णुरेव न संशयः ॥५८॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा पुनस्ता भपमब्रुवन् । दर्शयस्व निजं विष्णुरूपं चेन्मन्यवागसि ॥५९॥
ततस्ता दर्शयामास विष्णुरूपं निजं प्रभुः । तानि चत्वारि रूपाणि पगवर्थ्य रघूत्तमः ॥६०॥
ततस्ताः पुरतो विष्णुं दृष्ट्वा नेमुः स्वमस्तकैः । ततो विष्णुः स ताः प्राह वः संदेहो गतो न वा ॥६१॥
ता ऊचुर्दर्शनात्तेऽद्य भवक्लेशा गता हि नः । कियत्किंतु तत्र संदेहस्त्वज्ञानाजजनितः प्रभो ॥६२॥
ततः पुनः क्षणाद्रामो रूपं ता दर्शयन्मुदा । एकमेव हि सर्वासां मध्ये जनकजापतिः ॥६३॥
ततो रामोऽब्रवीत्ताः स वरं वरयतामिति । ता ऊचुः कामबाणेन पीडिता राघवं मुदा ॥६४॥
भव भर्ता त्वमेवाद्य गांधर्वविधिना वने ।
अस्माभिश्च कुरुष्वात्र सुखं क्रीडां चिरं प्रभो ॥६५॥
ततो नय पुरीं स्वीयां नस्त्वं भाव्यद्यद्विचितप । तत्तासां वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥६६॥
एकपत्नीव्रतं मेऽस्ति न शक्नोम्यत्र वै मृषा । ततस्ता विह्वला भूत्वा निपेतुर्जगतीतले ॥६७॥
पुनस्ताः प्राह रामः स शृणुध्वं वचनं मम । द्वापरे कृष्णरूपेण यूयं क्रीडां भजिष्यथ ॥६८॥
मित्रविंदा नाग्नजिती भद्राऽन्या लक्ष्मणाव्हया एवं नामानि युष्माकं भविष्यंति तदा मया ॥६९॥
भविष्यंति विवाहाश्च सर्वासां नात्र संशयः । तदा नानाविधान् भोगान् भजध्वं वै मया सह ॥७०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा किंचित्तुष्टमनाः स्त्रियः । रामं प्रोचुः पुनर्वोक्यं त्वमग्रे गन्तुमर्हसि ॥७१॥
ताभिः शनैस्ततो रामो ययौ तुरगमस्थितः । योजनोपरि सः सर्वाः सहस्रं षोडशाः शुभाः ॥७२॥

था कि जिस आपके सिवाय किसी अन्य व्यक्तिम हटनेका सामर्थ्य नहीं था, वह हम लोगोंका इस कन्दराम डालकर कहीं चला गया है। तदनन्तर हम ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंकी कन्याएं यहां पड़ी हुई हैं। वायु तथा वृक्षोंका पत्तियां हमारा भाजन है और श्रीविष्णुभगवान्‌के चरणाम हमन अपने मन लगा दिया है। इस प्रकार उनकी बात सुनकर सबके समक्ष एक-एक स्वरूपसे खड़े श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि जिस विष्णुम तुमने अपना मन लगा रखा है, वह मैं ही हूं। रामका बात सुनकर उन स्त्रियोने कहा कि यदि तुम यह सच कह रहे हो तो अपना विष्णुरूप हम दिखाओ, इसके अनन्तर भगवान्‌ने अपने उन चारों स्वरूपोंको अपनम समट लिया और विष्णुरूपसे सबका दर्शन दिया। जब उन्होंने विष्णुभगवान्‌को अपन सम्मुख देखा तो मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। विष्णुभगवान्‌ने उनसे पूछा कि अब तो तुम्हारा सन्देह निवृत्त हुआ? उन्हान कहा कि आपके इन पुनीत दर्शनास मग सब क्लेश दूर हा गया तो फिर अज्ञानसे जायमान सन्देहक विषयम क्या कहना है ॥ ५५-६२ ॥ क्षणभरके बाद में फिर रामके स्वरूपस उनके सम्मुख खड़े दिखाई दिये और उनसे बाल कि तुम लागोकी जा इच्छा हो, वह वर मांगो। तब कामबाणस पीडित होकर उन स्त्रियान कहा कि यदि आप हमारे ऊपर प्रसन्न हैं तो हम लागांक साथ गान्धर्व विवाह करके हमारे पति बनिये और अधिक समयतक आनन्दपूर्वक इस कन्दराम हम लागोंके साथ विहार कीजिए। उनके यह प्रार्थना सुनकर रामन कहा कि ऐसा ता नहीं हा सकता। क्योंक मे एकपत्नीव्रतवचारी हूं। मै कभी झूठ नहीं बाल्ता, तुमस सच कह रहा हूं यह बात सुनते ही व स्त्रियां मूछित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ६३-६७ ॥ ऐसी दशाम राम उनका समझाते हुए कहन लगा- इस प्रकार अधीर न होकर मेरी बात सुनो । अभो तो नहीं द्वापर युगमें कृष्णरूपसे मैं तुम लोगोंक साथ विहार करूंगा। मित्रविन्दा, नाग्नजिती, भद्रा तथा लक्ष्मणा इस प्रकार तुम लाग का नाम पड़ेगा और उस समय तुम सबका विवाह मेरे साथ होगा। इसम कोई सन्देह नहीं है। उस समय तुम सद मेरे साथ नाना प्रकारके सुख भोगना। रामकी बातोंको सुनकर उनका मन कुछ सन्तुष्ट हुआ और कहा कि अब आप चाहे तो जा सकते हैं। राम उन चारों कन्याओंके साथ धीरे-धीरे आगे बढ़। एक योजन आगे जाकर गण्डका नदाक किनार एक झाड में

सर्गः ११ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४६५


ददर्श गण्डकीतीरे वृक्षषण्डे रघूद्वहः। निमीलिताक्षः शुष्काङ्गतपसा ह्यर्धयौवनाः ॥ ७३॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्धे
द्विजकन्याचतुष्टयवरदानं नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥


द्वादशः सर्गः

( सोलह हजार ललनाओं तथा कालिन्दी आदि चार स्त्रियोंको रामका वरदान )

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः शनैः सर्वाः स्पृष्ट्वा निजकरेण ताः । कृत्वा तारुण्यपूर्णाश्चपूरिताः प्राह सादरम् ॥ १ ॥
पूर्ववत्सकलं वृत्तं सर्वाः सथाऽथ विस्तरात् । वरं वरयतां शीघ्रमित्युक्त्वा च रघूत्तमः ॥ २ ॥
हतं तं दुन्दुभिं श्रुत्वा दर्पोत्फुल्लानना स्त्रियः। पूर्ववद्विष्णुरूपाणि सहस्राणि हि षोडश ॥ ३ ॥
सन्दर्शितानि रामेण तावंति च स्थितानि हि । रामरूपाणि ता दृष्ट्वा ज्ञात्वा विष्णुं परात्परम् ॥ ४ ॥
तं वरान्द्वरयामासुस्त्वन्नो भर्ता भव प्रभो । ततो राममुवाचाऽऽत्मन्येकपत्नीव्रतस्थितम् ॥ ५ ॥
परस्परं ताः सम्मन्त्र्य प्रोचुः भर्ता मृगीदृशः । मया वृतस्त्वया चायं त्वया वृतस्तथा मया ॥ ६ ॥
एवं तासु च सर्वासु वदन्तीषु रघूत्तमः । श्रुत्वा तद्वचनं शिष्य तदा चित्तेऽव्यचारयत् ॥ ७ ॥
इमा वदंति किं सर्वा मां ज्ञात्वाऽपि व्रतस्थितम् । बलात्कारेण मां भोक्तुं मन्त्रयन्ति परस्परम् ॥ ८ ॥
ब्रह्मरुद्रमघवादयः सुरा ये च सिद्धमुनयः पुरातनाः ।
तेऽपि योगबलिनो विमोहिताः लीलया तदबलाभिरद्भुतम् ॥ ९ ॥
योषितां नयनतीक्ष्णसायकैर्धनुर्लतासमुद्धृतापनिर्गतैः ।
धन्विना मकरकेतुना हतः कस्य नो पतितो मनोमृगः ॥ १० ॥
तावदेव दृढचित्तता नृणां तावदेव गणना कुलस्य च ।
तावदेव तपसः प्रगल्भता तावदेव नियमव्रतादयः ॥ ११ ॥


उस सोलह हजार स्त्रियोंको देखा। वे सब आंखें मूंदे थीं, तपस्यासे उनका शरीर सूख गया था और यौवन नष्ट हो चला था ॥ ६८-७३ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय सं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे एकादश सर्गः ॥ ११ ॥

श्रीरामदास बोले—इसके अनन्तर रामने ज्ञान हाथके स्पर्शसे उन सबको यौवनसम्पूर्ण कर दिया तो वे भी पहलेवाली चारों स्त्रियोंके समान अपना वृत्तान्त बता गयीं । रामने उनसे कहा कि तुम्हारो जो इच्छा हो, वह वरदान मुझसे मांग लो । उन्होंने भी जब दुन्दुभीके मरनेका समाचार सुना तो बहुत प्रसन्न हुईं। इसके अनन्तर रामने उन्हें भी अपना विष्णुरूप दिखा तथा सोलह हजार रामरूप धरकर प्रत्येक स्त्रीको अलग-अलग दर्शन दिया । स्त्रियोंने इस प्रकार रामरूपको देखकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ विष्णुभगवान् जाना । १-४ ॥ उन्होंने भी पहलेवालियोंकी तरह रामसे प्रार्थना की कि आप मेरे पति बनें। जब उनको रामने अपनेको एकपत्नीव्रती बतलाया तो वे आपसमें सलाह करके कहने लगीं कि जैसे मैने इनको पसन्द किया है, उसी तरह तुमने भी तो किया है। सब आओ, हम सब मिलकर कोई ऐसा प्रयत्न करें कि जिसमे हमारी कामना पूर्ण हो जाय । इस प्रकार जब रामने उनकी सलाह सुनी तो अपने हृदयमे विचार करने लगे कि एकपत्नीव्रतमें स्थित देखकर भी ये स्त्रियां बरबस मेरे साथ संभोग करना चाहती हैं ॥ ५-८ ॥ ब्रह्मा रुद्र, इन्द्रादिक देवता एवं जितने पुरातन सिद्ध-मुनि हो गये हैं, वे सब योगी होकर भी कामिनियोंकी बदभुत लीलासे मुग्ध हो गये थे ॥ ९ ॥ स्त्रियोंके नेत्ररूपी सायकको धनुर्धारी कामदेव जिसके ऊपर छोड़ता है तो किसका मनरूपी

४५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२


यावद्देवं गतिर्नास्त्यवसंवने मद्यति द्रुतमदेन पूरुषः ।
मोहयंतु मदयन्तु रागिणं योषितः स्वचरितैर्मनश्शरैः ॥ १२॥
मोहयन्ति मदयन्ति मामिमा धर्मलक्षणवरं हि कैर्गुणैः ।
मांसरक्तमलमूत्रपूरितं योषितां वपुरिह निर्गुणेऽशुचौ ॥१३॥
कामिनस्तु परिकल्प्य चारुतामारभन्ति सुविमूढचेतसः ।
दारुणः परिक्लान्तिदाऽनामनिनिधिविमलबुद्धिर्वानभिः ॥१४॥
यावद्देव न मत्समीपमागतास्तावदेव हि व्रजाम्यदृश्यताम् ।
तर्हि में व्रतमित्दं सुनिर्मलं नान्यथा कथमहं करोम्यदह ॥१५॥
अथवा किं करिष्यन्ति मामेकदयिताप्रियम् । इति निश्चिय श्रीरामश्चन्द्र तूष्णीं स्थितोऽभवत् ॥१६॥
एतस्मिन्नन्तरे सर्वास्तास्तं प्रोचुर्नृपात्मजम् । वृत्तञ्च वृत्तसम्भाविनात्र कार्या विचारणा । १७॥
एकपत्नीव्रतं किं ते पार्थिवस्य श्रुतम् । अस्ति चेत्संगता प्राप्तं फलं भोक्तुमर्हसि ॥१८॥
इत्युक्त्वा तास्तदा सर्वा गत्वा तन्मन्निधिं जवात् । सङ्गालभ्यन्दनैश्च भुजपाशान् प्रचक्रिरे ॥१९॥
तद्दृष्ट्वा राघवः प्राह शृणुध्वं वचनं मम । युष्माभिरुक्ते सद्गमनुकूलं प्रियं वचः । २०॥
यतिनस्तन्न योग्यं मे मा खेदं गन्तुमर्हथ आकर्ण्य रामवाक्यानि तमूचुस्ताः समन्ततः ॥२१॥
सकामध्वनिनोत्कण्ठाः कोकिला इव माधवे ।
गोपसाम्प्रदायिक ऊचु
धर्मादर्थोऽर्थतः काम कामाद्धर्मफलोदयः ॥२२॥
इत्येवं निश्चय शास्त्रे वर्णयन्ति विपश्चितः । स कामो अतबाहुल्यात्पुरस्ते समुपस्थितः । २३॥
सेव्यतां विविधैर्भोगैः स्वर्गभूर्मार्गण मनः । अन्वा तडच्न नागां गमन्ताः प्राह सम्मितः , २४॥


मृग उस वाणसे घायल नहीं हो जाता ॥ १० ॥ मनुष्यका चित्त तभी तक वश रहता है, तभी तक कुलकी मर्यादा रहती है, तथा तब तक याग मन त्याग है तभी तक नियम व्रत आदि होते हैं, जबतक स्त्रियोंके चञ्चल कटाक्षोंसे पुरुषका मन मतवाला नहीं हो जाता और जबतक स्त्रियाँ उनपर मोहिनी डालकर अपने मनोहारी हाव-भावोंसे मोहित नहीं बना देतीं ॥ ११ । १२ ॥ ... पुरुष अपना धर्मकाम तत्पर जानकर भी अपने गुणोंसे मुग्ध करना चाहता है । मांस रक्त और मल-मूत्रसे परिपूर्ण स्त्रियोंकी अपवित्र देहपर कामी पुरुष सौन्दर्यकी कल्पना करके आनन्द लूटते हैं । भयं सम्भवता तो केवल दुःखदायक है । क्योंकि विमल बुद्धिवाले लोगोंका कहना तो यह है कि स्त्रियोंका संग बड़ा ही दारुण पश्चात्तापका हेतु होता है । अच्छा, जबतक ये मेरे समीप नहीं आ जातीं, इसके पहले ही मैं अन्तर्धान होऊँ तो अच्छा है, मेरा व्रत निर्मल रह जाय । इसके सिवाय और कोई उपाय भी तो नहीं दीखता । १३-१५ । अच्छा, यह भी देख लूँ कि ये मेरे साथ क्या करती हैं, यह निश्चय करके रामचन्द्रजी चुपचाप बैठ गये । १६ । इतनेमें ही वे सब स्त्रियांने एक स्वरसे कहा कि हम लोगोने आपको अपना पति मान लिया है । अब आप इस प्रकारका विचार मत करिये ॥ १७ ॥ हे राम क्या आपने एकपत्नीव्रत धारण किया है ? यदि ऐसा है तो अब उससे प्राप्त फलका उपभोग कीजिए ॥ १८ ॥ ऐसा कहकर वे सब उनके पास पहुँची और दौड़ती-दौड़ती दोनों भुजाओंसे रामको अपने भुजपाशमें बांधनेकी चेष्टा करने लगीं । १९ ॥ ऐसी अवस्था में रामने उनसे कहा कि आप सब जो कुछ कह रही हैं, वह ठीक ही है। किन्तु हमारे जैसे वानप्रस्थियोंके लिए वह उचित नहीं है। इसलिए तुम सब किसी प्रकारका खेद न करके पुनः दुर्योधनके यहां जाओ । इधर तो वे सब रामके वचनोंको सुनकर बड़े आदरसे सब कहने लगीं । उस समय वास्तवमें उनके कण्ठकी ध्वनि वसन्त ऋतुके कोकिलके समान मधुर सुनाई देती थी ॥ २०-२१ । सोलह हजार स्त्रियां बोलीं—धर्मसे अर्थकी प्राप्ति होती है, अर्थसे काम प्राप्त होता है और कामसे धर्मफल मिलता है । विद्वान् लोग शास्त्रोका यही निर्णय बतलाते हैं । वही काम आपके

सर्ग १२] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४१०


श्रीरामचन्द्र उवाच

वरान् दास्यामि युष्माकं नान्यं श्रोष्यामि किंचन । इत्युक्ताः पुनरूचुस्ताः किं त्वं वदसि राघव ॥२५॥

ता ऊचुः

दिव्यौषधं ब्रह्मविद्यो रसायनं सिद्धिनिधिः साधुकुला वरांगनाः ।
मन्त्रस्तथा ऽन्नजले च धर्मतो नेमे निषेध्याः सुधिया मयागताः । २६॥
कार्यं तु देवाद्यदि सिद्धिमभ्येतं तस्मिन्नुपेक्षां न च यान्ति नीतिगाः ।
यस्मादुपेक्षा न पुनः फलप्रदा तस्मान्न दीर्धीकरणं प्रशस्यते ॥२७
स्नेहानुगताः सुजनजन्मनिर्मलाः स्नेहार्द्रचित्ताः सुगिरः स्वयङ्गताः ।
कान्ताः सुरूपाः परिपूर्णयौवना धन्या लभन्तेऽत्र नरास्तु नेतरे ॥२८।
क्व वयं भूमिपादेयंः क्वैकपत्नीव्रतं तव । तस्मादस्मानिदानीं त्वं न निराकर्तुमर्हसि ॥२९॥
गान्धर्वेण विवाहेन नान्यथा भोऽस्तु जीवितम् । श्रुत्वा वाक्यं तु तासानां राघवः प्राह ताः पुनः ॥३०॥
भो मृगाक्ष्यः कथं त्यक्त्यो धर्मो धर्मविचक्षणैः । धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चैतत्चतुष्टयम् ॥३१॥
यथोक्तं सकलं ज्ञेयं विपरीतं तु निष्फलम् । तस्मान्मयोक्तं यत् पूर्वमेकपत्नीव्रतं निजम् ॥३२॥
अस्मिन् जन्मनि तन्नाहं त्यक्तुमिच्छामि भोः स्त्रियः ।
एवं श्रुत्वाऽऽशयं तस्य ताः सर्वाश्च परस्परम् ॥३३॥
करात्कराम् प्रमुच्याथ जगृहुर्धरि ततःपदाः । अन्येष्वपि तथारभ्य हुती तु जगृहुश्च ताः ॥३४॥
एवं तैर्विनिवार्यमात्मानं वीक्ष्य राघवः । अन्तर्धानमगात्तत्र तासां मध्ये क्रमात् प्रभुः । ३५॥
किं कुर्वन्ति स्त्रियः सर्वा हन्तर्धाने गते मयि । एवं रामा कौतुकं हि गुरुपुत्रे ददर्श कः ॥३६॥


इसकी प्रबलतासे स्वयं प्राप्त हुआ । २२ ।। २३ ।। विविध प्रकारके भोगोंका उपभोग करेंगे तो इसमें सन्देह नहीं है कि वह मर्त्यलोक ही आपके लिये स्वर्ग बन जायगा । उनकी बात सुनकर घबराये हुए रामचन्द्रजी कहने लगे कि सिवाय वर मांगनेके मैं तुम्हारा एक बात भी नहीं सुनूँगा । रामके ऐसा कहनेपर उन स्त्रियोंने कहा— हे राघव ! आप यह क्या कह रहे हैं ? ॥२४।२५॥ दिव्य औषधि, ब्रह्मको जाननेके सम्बन्ध रखनेवाली वाणी, रसायन, सिद्धिके खजाने, निधियां, अच्छी कलायें, अच्छी स्त्री और अन्न-जल पाकर सज्जनजन कभी नहीं छोड़ते ॥ २६ ॥ जो कोई कार्य दैवात् सिद्ध हो सकता है तो नीतिज्ञ जन उसकी कभी उपेक्षा नहीं करते । फिर उसकी उपेक्षा करनेसे कोई लाभ नहीं हो तो उसकी उपेक्षा ही क्यों की जाय । अथवा आडम्बर बढ़ानेकी क्या आवश्यकता ? ॥ २७॥ बड़े प्रेमयुक्त, अच्छे कुलमें उत्पन्न, जिनका चित्त स्नेहस आर्द्र हो गया हो, जो अच्छी-अच्छी बातें करती हों, जो वरके पास स्वयं आ पहुँची हों, जिनका सुन्दर स्वरूप हो और जिनका यौवन भी पूरी तरह उमड़ आया हो। ऐसे स्त्रियोंको जो लोग पाते हैं, वे धन्य हैं। साधारण श्रेणीके लोग ऐसी स्त्रियोंको नहीं पाते ॥ २८ ॥ कहाँ हम जैसी सुन्दरी स्त्रियां और कहाँ आपका एकपत्नीव्रत । इस कारण हम फिर भी कहती हैं कि आप हमारा निरादर न कीजिए ॥ २९ ॥ बिना आपके साथ गन्धर्व विवाह किये हम लोग नहीं जी सकेंगी । उनका बात सुनकर रामने कहा। श्रीराम बोले— हे मृगके समान नेत्रोंवाली स्त्रियो ! तुम- कैसे यह कह रही हो कि कामको मुख्य देखकर धर्मका परित्याग कर दो। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पदार्थ हैं। यदि एकके बाद एकका अच्छी तरह साधन किया जाता है तो वह सफल होता है। अन्यथा निष्फल हो जाता है अथवा विपरीत फल देनेवाला होता है । अतः जो मैंने अपने एकपत्नीव्रतका कारण बतलाया है, उसका परित्याग नहीं कर सकता। इस प्रकार रामका आशय जानकर वे आपसमें एक दूसरेका मुँह देखने लगीं ॥ ३०-३३ ॥ तदनन्तर हाथ छोड़कर स्त्रियोंने रामका पैर पकड़ लिया, किन्तु कुछ स्थिति होने भी पकड़ न पा ॥ ३४ ॥ इस तरह उन लोगोंसे अपनीको घिरा हुआ देखकर राम वहाँ ही अन्तर्धान हो गये ।

१५८आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

अदृष्ट्वा राघवं सर्वास्ताः शृण्वन्नप्रमदोत्तमाः । दृष्ट्वा तदद्भुतं कर्म विस्मयाविष्टमानसाः ॥३७॥
वित्रस्तहृदयाः सर्वाः कुरंग्य इव कातराः । संभ्रांतनयना दीना इत्यूचुस्ताः परस्परम् ॥३८॥
व्याप्तं च हृदयं तासां तदैव विरहाग्निना । ज्वलज्ज्वालानलेनैव मूर्च्छिन्नं सार्द्रकाननम् ॥३९॥
त्यजैन्द्रजालिकां मायां कांत दर्शय मन्वरम् । स्यान्मानं नर्पणा युक्तं प्राग्ग्रासे मक्षिकाऽपतत् ॥४०॥

स्त्रिय ऊचु
हा कष्टं दर्शितः कस्माद्वाञ्छा किं रचितं त्विदम् ।
ज्ञातं महत्तमं तापं दातुं नस्त्वं समागतः ॥४१॥
कच्चित्त्वं निर्दयं चेतः कच्चिदस्मान् परीक्षसि ।
कच्चित्तुष्टोऽसि हे कांत कच्चिन्मुष्णासि नो मनः ॥४२॥
कच्चिन्नो प्रत्ययोऽस्मासु कच्चिदस्मासु नो रतिः
कच्चिद्विनोदयसि नः कच्चिन्मायाविशारदः ॥४३॥
कच्चिच्चित्ते प्रवेष्टुं त्वं वेत्सि विज्ञानलाघवम् । कच्चिद्विनापराधं हि त्वमस्मासु प्रकुप्यसि । ४४॥
कच्चिद्दुःखं न जानासि परेषां विप्रलंभजम् । स्वदर्शनं बिना नूनं हृदयेधर सांप्रतम् ॥४५॥
न जीवामोऽथ जीवामः पुनस्त्वद्दर्शनाशया । अस्मांस्त्वं नय त्वं हि यत्र नाथ गतो ह्यसि ।४६।
सर्वथा दर्शनं देहि कारुण्यं भज सर्वथा । पश्यन्तं न हि पश्यति कस्यचिन्मृजता जनाः ॥४७॥
इत्थं विलप्य ताः सर्वाः प्रतीक्ष्य च बहुक्षणम् ।
रामं द्रष्टुं वने सर्वा बभ्रमुस्ता इतस्ततः ॥४८॥
वृक्षान् वनेचरान् रामो दृष्टोऽस्माकं पतिर्न वा ।
एवं सर्वांस्तु पप्रच्छु रामविश्लेषमज्वराः ॥४९।
रे रे पिप्पल वृक्षाणामधिपस्त्वं ब्रवीहि नः । रामो दृष्टोऽथ वा नैव वयं त्वां शरणं गताः । ५०॥

फिर भी वे क्या करती हैं, यह देखनेके लिए राम गुप्तकूपसे वहाँ खड़े-खड़े देख रहे थे ॥ ३७ । ३८ ॥ क्षणभरमें रामको अलक्षित देखकर वे बहुत चकरायीं । फिर व्याकुल होकर हरिणियों के नाई चञ्चल नेत्रोंसे इधर-उधर देखती हुई आपसमें कहन लगीं । ३७ । ३८ । उस समय उनका हृदय विरहाग्निमे पूर्ण हो गया था । उनकी उस विरहाग्निकी ज्वालासे उस जङ्गलमें भी थोड़ी देरके लिए तृणोंको धारा बदल गयी ॥ ३९ ॥ वे बोलीं— हे कान्त इस ऐन्द्रजाल (ठगहारी) मायाका परित्याग करके हमें शीघ्र दर्शन दीजिए । हमने आपसे हँसी की और पहले ही ग्रासमें मक्खी गिरनेके समान इतना बड़ा विघ्न आकर उपस्थित हो गया ॥ ४० । कितने दुःखकी बात है। हे विधातृ ! तुम्हारी क्या इच्छा है ? हे विश्वंभर ! ज्ञात पड़ता है कि तुम हम सबको सन्ताप देनेके लिए ही यहाँ आये थे । ४१ ॥ तुम्हारा हृदय ही निष्ठुर है या हम लोगोंकी परीक्षा ले रहे हो । हमसे नाराज़ हो या हमारा चित्त चुरा रहे हो ? । ४२ ॥ क्या हमारे ऊपर तुम्हारा विश्वास नहीं है ? क्या हमसे प्रेम नहीं करते हो ? हम लोगोंके साथ ठठोली तो नहीं कर रहे हो ? क्योंकि तुम मायाजाल फैलानेमें भी बड़े निपुण हो ॥ ४३ ॥ तुम किसीके चित्तमें घुसनेका कोई वैज्ञानिक एवं सूक्ष्म साधन जानते हो । बिना किसी अपराधके हमसे इतने क्यों रूठ गये हो ? । ४४ ॥ दूसरेको धोखा देनेसे जो दुःख होता है, क्या तुम उसे नहीं जानते ? बिना तुम्हारा दर्शन पाये हम लोग नहीं जी सकेंगी और यदि जियेंगी भी तो तुम्हारे दर्शनोंकी ही इच्छासे, अन्यथा नहीं । हे नाथ ! हमें भी वहीं ले चलिये, जहाँ आप गये हों ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ दया करके हमें दर्शन दीजिए। सज्जनजन कभी किसीका दुःख नहीं देख सकते ॥ ४७ ॥ इस तरह बहुत देरतक विलाप करके उन्होंने उनके आनेकी प्रतीक्षा की । तब भी जब वे नहीं आये तब वे उनको ढूँढ़नेके लिये वनमें इधर-उधर घूमने लगीं ॥ ४८ ॥ रास्तेके प्रत्येक वृक्ष और वनके पशुओंसे वे रामविरहिणियां यह