श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
सर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
जम्बुद्वीपपतिं रामश्चकार स्वसुतं लवम् । लवोऽपि विजयं स्वीयसचिवं चाकरोन्मुदा ॥९३॥
नवस्वपि च वर्षेषु यातायातं पुनः पुनः। चकार विजयेनैव पुनः कार्यार्थमादरात् ॥९४॥
शत्रुघ्नो यौवराज्ये स्वे भरतेनाभिषेचितः । यौवराज्यपदे स्वेऽपि कृत्वा रामः कुशं सुतम् ॥९५।
चकार लक्ष्मणं मुख्यं सचिवेषु सुमन्त्रणम्। सप्तद्वीपपतिः श्रीमान्स्वयमासीद्रघूत्तमः ॥९६॥
स्वस्वकार्येषु सर्वे ते रामन् तत्परमानसाः । ततः सर्वांन्नृपान्पूज्य ददावाज्ञां रघूद्वहः ॥९७॥
ततस्ते राघवं न्त्वा ययुः स्वं स्व स्थलं मुदा । ततो भारतवर्षस्य परामर्शं सदा मुदा ॥९८॥
चकार भरतः श्रीमान् भरताधिपतिः प्रभुः । जम्बुद्वीपपरामर्शं च पकार लवस्तथा ॥९९॥
सप्तद्वीपपरामर्शं रामचन्द्रः कुशेन च । लक्ष्मणेन सहैवासि स्वयमेवाकरोत्प्रभुः ॥१००॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे कुशादिषड्द्वीपविजयदर्शन नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ।
दशमः सर्गः
( रामका संन्यासी, शूद्र तथा गृध्रको दण्डदान )
श्रीरामदास उवाच
एकदा राघवः सारमेयदीर्घारवं मुहुः । राजद्वाराद्बहि श्रुत्वा सभास्थो दूतमब्रवीत् ॥१॥
कथं दीर्घस्वरेणैव श्वाऽद्य क्रोशति पश्यताम् । तथेति रामदूतोऽपि गत्वा राजसभाद्बहिः ॥२॥
न्यवारयत्सारमेयं राजद्वारात्स्वधर्षणैः । रामं नत्वाऽब्रवीद्वाक्यं तूष्णीं श्वा क्रोशति प्रभो ॥३॥
मया निवारितो दूरं गतः स राक्षसान्तक । ततो द्वितीयदिवसे तच्छब्दान् राघवोऽशृणोत् ॥४॥
दूतेन पूर्ववच्चापि सारमेयो निवारितः । ततस्तृतीये दिवसे तद्रावानशृणोत्प्रभुः ॥५॥
तदाविस्मितः प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् । श्वाऽयं दिनत्रयं बन्धो कथं क्रोशति संततम् ॥६॥
लिए नियुक्त किया था, उसे दूसरे काममें लगा दिया ॥ ९२ । इसके अनन्तर अपने लव नामक वंटको जंबूद्वीपका अधिपति बनाया लवने विजय नामके उस सेवकको मंत्री बना दिया, जिसे कि रामचन्द्रजीने कुछ दिन तक भरतखण्डको देखभाल करनेके लिए नियुक्त किया था । ९३॥ उस विजयके साथ कार्यवश नवों द्वीपोंमें बराबर आवा-जाया करते थे । ९४ । भरतने अपनी जगह शत्रुघ्नका युवराजपदपर अभिषेक कर दिया । रामने कुशको युवराजके पदपर अभिषिक्त करके लक्ष्मणको अपना सर्वश्रेष्ठ मन्त्री बनाया । किन्तु सातो द्वीपोंके अधिपति राम स्वयं थे ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ ये सब लोग अपने कार्योंको बड़ी तत्परताके साथ निभाते थे। इसके अनन्तर रामने साथ आये हुए राजाओंको अपने देश जानेका आज्ञा दी ओर वे रामचन्द्रजीको प्रणाम करके अपने-अपने देशको चल गये । ९७ ॥ भारतवर्षका शासन भरतजी प्रसन्नतापूर्वक करते थे। जंबूद्वीपका शासन लव करते थे और भरत, कुश तथा लक्ष्मणसे सलाह लेकर रामचन्द्रजी सातों द्वीपोंका शासन कर रहे थे ॥ ९८-१०० ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ।
श्रीरामदास कहने लगे—एक समय रामचन्द्रजी सभामें बैठे थे । सहसा कई वार एक कुत्तेके रोनेकी आवाज सुनी तो दूतसे बोले- १ ॥ देखो तो इतने ऊंचे स्वरमें कुत्ता क्यों चिल्ला रहा है। रामके आज्ञानुसार दूत कुत्तेके पास गया । उसे धमकाकर वहाँसे हटा दिया और रामसे जाकर कहा—हे राक्षसान्तक ! उसे मैने दूर भगा दिया है, अब वह नहीं चिल्लायेगा । दूसरे दिन फिर रामने उसी प्रकार उस कुत्तेका रोदन सुना तो दूतसे भगवाया ॥२-५॥ तीसरे दिन फिर उसका रुदन सुनकर रामने लक्ष्मणसे कहा-आज तीन दिनसे
४४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०
किं दुःखं सारमेयस्य प्रष्टव्यं मत्पुरस्त्वया । तथेति लक्ष्मणो दूतानब्रवीत्सम्भ्रमान्वितः ॥७॥
समामाकारणीयः श्वा युष्माभिस्त्वथ सादरम् । तथेति रामदूतास्ते सारमेयं वचोऽब्रुवन् ॥८॥
आकारितोऽसि रामेण त्वमेहि राघवांतिकम् । त्वद्यैवं फलितं चाद्य पूर्वपुण्योदयेन हि ॥९॥
रामदूतवचः श्रुत्वा तुष्टः श्वा तान्यचोऽब्रवीत् । देवगृहे यज्ञवाटहोमशालासु वै तथा ॥१०॥
वृन्दावने सभायां च मठे पार्थिवसद्गृहे । गोष्ठे पुण्यस्थले पुण्ये तीर्थे देवालयोऽपि च ॥११॥
पाकस्थाने रतिस्थाने स्नानसंध्यास्थलादिषु । गन्तु नार्हा वयं पापयोनित्वाद् बाह्यनां प्रभुः ॥१२॥
तत्रस्ते विस्मयाविष्टास्तद्वाक्यं राममब्रवन् । राघवस्तद्वचः श्रुत्वा विहस्य सम्भ्रमेण च । १३॥
आनीयतां पादुके मे त्विति दूतान वचोऽब्रवीत् । ततस्तैरर्पिते दिव्ये पादुके कृत्य पादयोः ॥१४॥
रत्नदण्डं करे धृत्वा शनैः सर्वैः समन्वितः । मुद्रिकाग्लन्द्धारेव मणिनूपुरशिञ्जितः । १५॥
मुकुटेनावतंसेन केयूराभ्यां समन्वितः । नूपुराभ्यां कंकणाभ्यां कुण्डलाभ्यां सुशोभितः । १६॥
पदकैः शृखलाभिश्च वरवस्त्रैर्विराजितः । गजद्वाराद्वहिर्देशे श्वाभ्येवांतिकं ययौ ॥१७॥
कृत्वा दंडं त्वरुक्षेऽथ किंचिद्वक्रः स्थितः प्रभुः । कृत्वा वामं जान्वधो स्वां जंघां रामः स दक्षिणाम् ॥१८॥
अब्रवीत्सारमेयं तं किंचित्कृत्वा स्मिताननम् । मदग्रे वद किं दुःखं सारमेय तवास्ति यत् ॥१९॥
भद्रान्ये सहसा माऽस्तु दुःखं केषां कदापि च । इति रामगिरं श्रुत्वा सारमेयः पुनः पुनः ॥२०॥
नमस्कृत्या राघवेंद्रं छिन्नपादोऽब्रवीन्मुदा । मदर्थं श्रमितोऽत्र त्वं चिरं जीव दयानिधे ॥२१॥
निरपराधो यतिना प्राप्याऽत्राहं प्रताडितः । छिन्नपादोऽस्मि राजेंद्र त्वामद्य शरणं गतः । २२।
तद्वाक्यं राघवः श्रुत्वाऽऽकारयामास दण्डिनम् । राजाज्ञया यतिश्चापि विह्वलो राघव ययौ ॥२३॥
दृष्ट्वा यतिं तं श्रीरामस्तदा वचनमब्रवीत् । स्वामिन् किमर्थं युष्माभिश्छिन्नः पादोऽस्य वै शुनः॥२४॥
यह कुत्ता क्यों राजदरबारके समक्ष आकर रोता है। मेरे सामने बुलाकर पूछो कि उसे किस बातका कष्ट है। लक्ष्मणने भी घबड़ाकर दूतोंको आज्ञा दी कि जाओ और आदरपूर्वक उस कुत्तेको सामने ले आओ। "बहुत अच्छा" कहकर दूत कुत्तेके पास पहुंचे और उससे कहने लगे- ॥६-८॥ आज पूर्वसंचित पुण्योंसे तुम्हारा भाग्योदय हुआ है। चलो, श्रीरामचन्द्रजी तुम्हें बुला रहे हैं। ९॥ दूतोंकी बात सुनी तो प्रसन्न होकर कुत्ता कहने लगा- देवालय, यज्ञशाला, हवनगृह, तुलसीका बगीचा, सभा, मठ, राज-भवन, गोशाला, पवित्र तीर्थ, रसोईघर, रतिस्थान तथा स्नान-सन्ध्यादि करनेके स्थानोंपर मै जानेके अयोग्य हूँ। क्योंकि मेरा जन्म पापयोनिमें हुआ है। तुम जाकर रामसे कह दो ॥१०॥ ११॥ इतनी सुनकर वे दूत बड़े विस्मित हुए और जैसा उसने कहा था, जाकर रामको सुना दिया। राम उसकी बात सुनकर हँस पड़े और दूतोंसे कहा कि हमारी खड़ाऊँ ले आओ! दूतोंने आज्ञाका पालन किया। रामने खड़ाऊँ पहिना, एक रत्नजटित छड़ी हाथमें ली और सब लोगोंके साथ उस कुत्तेकी ओर चले। उस समय रामचन्द्रके हाथोंमे अंगुलियाँ थीं, रत्नजटित हार गलेमें था, मस्तकपर मुकुट तथा कानोमे कुण्डल झूल रहे थे, भुजाओमे बिजयठ और कङ्कण था। गलेमें हार तथा सिकडियाँ शोभित हो रही थी। इनके सिवाय और भी कई प्रकारके आभूषण और सुन्दर वस्त्र सुशोभित हो रहे थे। इस तरह सज-धजकर राम कुत्तेके पास जा पहुँचे ॥१२-१७॥ वहाँ पहुँच तो छड़ी बगलमे दबा ली और बायें घुटनेको तनिक मोड़कर कुछ तिरछे खड़े हो गये ॥१८॥ पुचकारकर राम कुत्तेसे बोले- हे सारमेय! तुम्हें जो कुछ कष्ट हो वह मुझे बताओ ॥१९॥ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरे राज्यमें किसीको किसी प्रकारका कष्ट न हो। इस तरह प्रभुकी बात सुनकर कुत्तेने रामको अनेकशः प्रणाम किया और हर्षित होकर कहने लगा- हे दयानिधे ! आपने मेरे लिए बड़ा कष्ट किया, जो यहाँ पधारे। हे महाराज ! मैने कोई अपराध नहीं किया था। फिर भी एक संन्यासीने पत्थरसे मुझे ऐसा मारा कि जिससे मेरा पैर टूट गया। इसीसे दुःखी होकर मै आप की शरणमे आया हूँ। २०॥ २१॥ २२॥ उसकी बात सुनकर रामने उस संन्यासीको बुलवाया।
सर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
तद्रामवचनं श्रुत्वा यतिः प्राह रघूत्तमम् । भिक्षार्थं भ्रमतो मार्गे भिक्षात्रं स्पृशितं मम ॥२५॥
शुनाऽनेन राघवेंद्र मध्याह्ने क्षुधितस्य च । मयाऽतः क्रोधचित्तेन शुनेऽस्मै अपराधिने ॥२६॥
अर्पितं लोष्टकं क्षिप्तेन भिन्नं पदं शुनः । तद्यतेर्वचनं श्रुत्वा पुनस्तं प्राह राघवः ॥२७॥
ज्ञानहीनः पशुश्चायं भक्ष्यं दृष्ट्वायं निर्दोष च । स्वाभाविकी तस्य दोषो नैवार्य वेद्मयहं यते ॥२८॥
स्वमेवास्यैवापराधी तद्दण्डं प्राप्तुमर्हसि । इत्युक्त्वा मारगेयं तु राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥२९॥
यदिश्रायं तैऽपराधी तत्र हस्तेऽर्पितो मया । यं त्वमिच्छसि वै कर्तुं तस्मै दण्डं सुखं कुरु ॥३०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सारमेयोऽब्रवीत् प्रभुम् । शिवालयस्याधिपत्ये च स्थापनीयो यति प्रभो ॥३१॥
तथेति रामचन्द्रोऽपि शिविकायां निवेश्य तम् । स्रग्वस्त्रचन्दनाद्यैश्च सम्पूज्याथ यतिं मुदा ॥३२॥
वाद्यघोषैर्नर्तनाद्यैर्ब्राह्मणैश्च शिवालयाम् । नीत्वा शिवालयस्याधिपत्ये संस्थापयत्प्रभुः ॥३३॥
तदाऽज्ञानाद्यतिर्देवं फलितं वेत्यमन्यत । ततो रामो जनैर्युक्तः स्वां सभां संविवेश ह ॥३४॥
तत्सर्वे कौतुकं दृष्ट्वा पौराः प्रोचु रघूत्तमम् । कथं शुनाऽद्य यतये शिक्षेत्प्रसाधिता प्रभो ॥३५॥
अन्नार्थं भ्रमतस्तस्य यनेदेशं पदं सदन् । नैतादृशारूपं सञ्जातं यतये शिक्षितं न तत् ॥३६॥
तत्पौराणां वचः श्रुत्वा राघवस्तान् वचोऽब्रवीत् । प्रष्टव्यः श्वा तु युष्माभिः सन्देहं हरिष्यति ॥३७॥
तथेति मारगेयं तं पप्रच्छुर्नागराश्च तत् । तन्त्रोवाच सारमेयः शृणुध्वं यन्मयोच्यते ॥३८॥
कुपिप्रज्ञानभार्यापत्यबलसम्मानकारिणः । शिवालयमठारामतटाकग्रामाधिकारिणः ॥३९॥
अनाथस्त्रीबालवित्तहारिणः क्रूरमानसाः । गौविप्रशिववित्तेम्ब हारिणोऽन्यासकारिणः ॥४०॥
रामके आज्ञानुसार वह संन्यासी भी सिर झुकाये रामके पास आया ॥ २३ ॥ रामने उनको प्रणाम किया और कहने लगे-कहो स्वामिंवा ! आपने किस अपराधमें इस कुत्तेका पैर तोड़ डाला ? ॥ २४ ॥ उसने उत्तर दिया कि मैं भिक्षा लिये रास्तेसे जा रहा था। तभी इसने मेरा भिक्षान्न छू दिया। वह मध्याह्नका समय था। मैं भूखा था । इसके उस अपराधपर मुझे क्रोध आ गया और इसको चमकानेकी इच्छासे मैंने एक पत्थर फेंककर मारा। वह इसके पैरमें लगा, जिससे इसका पैर टूट गया ।। यतिकी बात सुनकर राम उससे कहने लगे—॥ २५, २७ ॥ यह एक ज्ञानविहीन पशु है। यदि इसने अपना भक्ष्य पदार्थ देखकर आपको छू दिया तो मैं इसमें इसका कोई दोष नहीं समझता। यह तो इसकी स्वाभाविक प्रकृति है। इसलिए आप ही इसके अपराधी हैं। यतिके प्रति इतना कहकर कुत्तेसे कहने लगे-यह संन्यासी तुम्हारा अपराधी है। मैं इसे तुम्हे सौंपता हूँ। तुम जो दण्ड चाहो, इसे दे सकते हो ॥ २८-३० । रामकी बात सुनकर कुत्तेने कहा-इसे किसी शिवालय का महन्त बना दिया जाय। ३१॥ रामने उसकी बात स्वीकार कर ली और सुन्दर वस्त्र, चन्दन तथा माला आदिसे यतिको सुशोभित करके एक पालकीमें बिठाया और विविध प्रकारके बाजे यगान हुए उत्सवके साथ एक शिवालयमें ले गये और उसे वहाँका महन्त बना दिया ॥ ३२ ।। ३३ । उस समय अज्ञानतावश यतिने अपना भाग्योदय समझा । कुछ देर बाद रामचन्द्रजी अपने सचिवों समेत राजसभामें लौट आये ॥ ३४ ॥ इस प्रकारका कौतुक देखकर कितने ही उत्सुक नागरिकोंने रामसे कहा-हे प्रभो ! इस कुत्तेने यति- को इस प्रकारका दण्ड क्यों दिया ? यतिका तो कर्तव्य उसकी टांग तोड़ दी और जब आपने कुत्तेको उसके कियेका दण्ड देनेके लिए कहा तो उसने इतरुक स्थानपर दनिकी महन्थ बनवा दिया । ३५ ॥ ३६ ॥ इस प्रकार नागरिकोंकी बात सुनकर रामने कहा कि आप लोग इस कुत्तेसे ही पूछ लें कि उसने ऐसा क्यों किया। यह आप लोगोंकी शङ्काका भली भाँति समाधान कर देगा । ३७॥ रामके आज्ञानुसार उन लोगोंने कुत्तेसे पूछा तो उसने कहा-मै जो कुछ कहता हूँ, उसे सावधान होकर आप लोग सुनें ॥ ३८॥ मनमें उत्पन्न अन्न रखनेवाले, शिवालय, मठ, बगीचा तालाब राजग्राम इन स्थानोंके अधिपति, अनाथ स्त्री तथा बालकोंके धनका अपहरण करनेवाले, गाली-गलौज करनेवाले, गौ-विप्र तथा शिवके लिए अर्पित धनका अपहरण करनेवाले, अन्याय करनेवाले, राजाके घरपर पहुँचे हुए याचकका अपमानवान् दूसरेका धन हड़पनेवाले, प्राणभित्रके
४१४ आनन्दरामायणे [ सर्ग० १०
नृपगेहे प्रविष्टानां याचकानां निवारिणः । परद्रव्यपहर्तारः प्रत्यशिनाञ्चिकारिणः ॥४१॥
विप्रभोजनद्रव्यस्य होमद्रव्यस्य हारिणः । बहुद्रव्यापहर्त्तारश्चैते सर्व्वेऽप्यन्यन्मनि ॥४२॥
गच्छन्ति वै शुनो योनिं मत्समेतद्वचा मम । मया मठाधिपत्याञ्च लब्धा योनिः शुनः स्वयम् ॥४३॥
अतो मयाऽद्य यतये दित्सितं पदमीरितम् । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य नागरादिच्छिन्नसंशयाः ॥४४॥
ते ययुः स्वीयगेहानि यथौवाऽपि निजस्थलम् । ईदाने स यतिजीतः शुनो योनौ स्वकिल्विषत् ॥४५॥
आप्तमश्चाशुभां मुक्ति भुक्त्वाऽसौ स्वीयकिल्विषम् । न तस्योऽयं यतिः शिष्य मार्केनेऽत्र मृतस्त्विति॥४६
स्थलान्तरे मृतश्चायं शतैः कार्यार्थमान्नरः । अयोध्यायां मृतानां च पुनर्जन्म न विद्यते ॥४७॥
क्व यतिः सारमेयत्वं क्व स श्वा मुक्तिमाप्तवान् । गहना कर्मणश्चात्र गतिस्तया महात्मनः ॥४८॥
क्व यतिः सारमेयः क्व न्यायश्चेत्थं समापने । आभीक्ष्म्यतः सर्व्वचात्र नान्यायस्तन्मुखेक्षणात् ॥४९॥
अथैकदा तु साकेतवासिनो भूसुरस्य च । पञ्चत्वं पञ्चवर्षीयः पुत्रः प्राप्तः शिशुः प्रियः ॥५०॥
तदा विप्रः सपत्नीकस्तन्प्रेतमरुणोदये । राजद्वार मपानीथ रुरोदोच्चैः सुविद्रुतः ॥५१॥
अब्रवीत् पुत्रशोकेन व्यथितः क्रोधसंयुतः । सीतामालिङ्गय गजेन्द्र कथं न्वं निद्रितोऽसि हि ॥५२॥
त्वद्राज्येऽधर्मतः कस्य मृतो मे बालकः प्रियः । त्वत्तोऽप्यधमॊऽथवान्याच्च अतोऽधर्मी न संशयम्५३॥
नृपे पापििन म्रियन्ते नरा ह्यल्पायुषः भुक्तम् । यस्य राज्ये जनैः सर्व्वैरापाधर्मः क्रियते भुवि ॥५४॥
सोऽपि ज्ञेयो नृपस्यैव यत्तन्नेषां न शिक्षितम् । अस्मन्नेऽधारिणो राज्ञो राज्ये मेऽय शिशुर्मृतः ॥५५॥
उपायं चिंतयस्वाम्य जीवनेऽद्य यवान्वभूः । नोचेदावां विनिं वारोहावस्तनपेन हि ॥५६॥
स्मर वृत्तं श्रवणस्य हेतोर्यत्तनकञ्च ने जानं शापादिकं पूर्व्वं तद्वदत्रापि ते भवेत् ॥५७॥
विप्र निज धनको ग्रहण करनेवाले व ज्ञानभाजनके लिये जुटाई सामग्रीसे चोरी करनेवाले और बेईमानी करके अधिक धन इकट्ठा करनेवाले लोग मरकर दूसरे जन्ममें कुत्तेकी योनिम जन्म पाते हैं ॥३६-४२॥ इस प्रसङ्गमें मैंने जो बात कही है, व सब सत्य है। मैंने स्वयं मठाधिपत्यके कारण ही कुत्तेकी योनि पायी है ॥४३॥ इस संन्यास को उसकी करनीका फल देने के लिए मैंने उसे यह पद दिलाया है। इस प्रकार उसकी बात सुनकर सारे पुरवासिजनका स देह निवृत्त हो गया और सब लोग अपने-अपने घरको चले गये। कुत्ता भी अपने स्थानको चला गया। उस संन्यासी ने मठाधिपत्यके मदमें आकर जा पाप किये, उत्तम जन्मान्तरम उसे कुत्तेकी योनि मिली ॥४४ ।४५। वह कुत्ता जिसको रामचन्द्रजीके यहाँ दावा किया था उसे कुछ दिनो बाद शुभ गति मिली, किन्तु वह पनि जो अपने पापोसे कुत्ता हुआ था अयोध्यामे न मरकर किसी दूसरे स्थानपर मरा। इम लिए उसे मुक्ति नहीं मिला। जो लोग अयोध्यामे शरीर त्याग करत है ये जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। कर्मनी गति बड़ी विचित्र होती है। कहाँ वह कुत्ता होकर भी मुक्त हो गया और वह यति होकर भी कुत्ता हो गया ॥४६॥४७॥४८॥ कहाँ तुत्ता और कहाँ मंन्यासी । रामने उस श्वानका कितना अच्छा न्याय किया । सच तो यह है कि रामक राज्यम किसोका मुँह देखकर न्याय नहीं किया जाता था। बल्कि जा न्याय्य बात होती, वही होती थी ॥४९। एक समय अयोध्यामे एक ब्राह्मणके पंचवर्षीय बालककी मृत्यु हो गयी ॥५०॥ सबेरा होते ही वे ब्राह्मणदम्पती बच्चेके शवको लेकर राजद्वारपर आये और बड़े जोर-जारसे रोने लगे ॥५१॥ पुत्रशोकसे कुपित होकर उस ब्राह्मणने कहा हे राम! सीताको गोदमे लेकर तुम भय भाः आनन्दके साथ पड़े सो रहे हो ? ॥५२॥ तुम्हारे राज्यमे किसीके अपराधस मेरे बच्चेको मृत्यु हुई है। इसमे तुम्हारा कोई अधर्म है अथवा किसी दूसरेका। यह मै नहीं जानता ॥५३॥ मैने ऐसा सुना है कि राजक अधर्मी होनेस ही उसके राज्यम अकाल मृत्यु होती है जिस राजाक राज्यम अधर्म होता है, उसका भी कारण राजा ही होता है क्योंकि वह अपनी प्रजाका अच्छी तरह शिक्षा नहीं देता। इससे यह निश्चित है कि तुम अधर्मी हो। इसी लिए मेरे बालककी मृत्यु हुई है ॥५४॥ ५५॥ अतएव हे राजन् ! इसके लिए शीप्र ही कोई उपाय करो, नही तो हम दोनों (स्त्री-पुरुष)
सर्गः १०] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४४५
वसो विप्रप्रिया प्राह साता प्रोत्कण्ठयेव हि । कथञ्चेन्निधिनिद्रां गते मुत्रे शुभे ॥५८॥
त्वमप्यसि पुत्रवती मे दुःखं शाम्यन् कुरु । उपायं कारयाद्याद्य भर्त्राऽद्य जीवने शिशोः ॥५९॥
इति तद्दर्शनीवाक्यं श्रुत्वा सर्वे पुरीजनः । आपन्नद्रव्यनिक्षिप्तो प्रमत्तार्य मस्थिताः ॥६०॥
सीतारामावपि तयोर्वाक्यं श्रुत्वाऽतिविह्वलौ । विनिर्गतौ मणिशालाद्बहिस्तद्रुद्धहृद्दुःखितौ ॥६१॥
निवार्य वन्दिगीनानि गजद्दारं तयोः पुरः । वेगेन जग्मतुः सद्धिः सीतागमी गतभियौ ॥६२॥
दृष्ट्वा सीतां च रामं च तौ शोकं चक्रतुर्मुहुः नाद्याद्याम्य रामचन्द्रभ्बदाऽऽह गद्गदाक्षरः ॥६३॥
मा शोकं कुरुतोभोभी मद्भिरं शृणुताम्विति । कृत्योपायं हि युत्रयोः पुत्रं संजीव्यपाम्यहम् ॥६४॥
न जीवितंश्चेद्युवयोर पुत्रस्तर्पये कुशम् गिर् सत्याऽभिर्यो नोभो पश्यतस्स्विह मेऽय हि ॥६५॥
ततः सीता विप्रपत्नीम आख्याह गिरं शुभाभ् । रामेण ते प्रतिज्ञातं कुशदानेन मामिनि ॥६६॥
अहमप्यद्य ते दन्मि तव दुःखस्य शांतये । न जीविश्चेद्रामेण भयाऽय व्यधिदुः प्रियः ॥६७॥
तर्हि त्वमुद्भवोऽन्यं धर्मपेयेट् लवं प्रियम् नाभ्यां कुशलदाग्यां त्वं पुत्रदुःखं त्यजिष्यसि ॥६८॥
भजिष्यसि च धर्मौघयत्नतः शोकं कुरुष्व मा । ततः प्राह द्विजं रामस्त्वं पत्न्याऽत्र स्थितो भव ॥६९॥
मा कुरुष्व मुहुः खेदं त्वत्पुत्रं शिल्याभ्यहम् । इत्युक्त्वा लक्ष्मणैनैन तैलद्रोण्यां शव शिशोः ॥७०॥
निधाय कृमिदंग्येद्गन्धद्रुतप्रशांतये । स्वयं स्नात्वा निर्य्यादधि चाक्रानिस्त्रकशानमः ॥७१॥
ततः सभासन्धितः सन् वसिष्ठ प्राह राघवः । राज्यं शुमति धर्मेण नन्नायं वै शिशुः कथम् ॥७२॥
अपने प्रिय पुत्रके साथ चिताम जमकर भस्म हो जावेंगे ॥ ५६ । अनन्तर पूर्वोक्तका स्मरण कर जिस प्रकार तुम्हारे पिता द्वारा अपने पुत्रवधका दुःख हुआ होकर उमके मोर पण दशरथका शव देकर अपने प्राण त्याग दिये थे, वही दशा हमारा भा हागा ॥ ५७ ॥ इसके अनन्तर ब्राह्मण आराम साथ साताकी सम्भाषित करके कहा—हे शुभे ! तुम बतो पतिका आगमन करके आनन्दक साथ सा रहो हा ? तुम ता पुत्रवती हो । इस कारण मेर दुःखका भार श्यान दकर मर बच्चाका जिलानेके लिय अपन पति द्वारा काई उपाय करवाआ ॥ ५८ । ५९ ॥ इस प्रकार उस विप्रदम्पतीका गम्द सुनकर वहाँक सब पुरवासी व्याकुल हो उठे और उस शवका चारो बारस धरकर गड़ हा गय ॥ ६० ॥ इधर गम तथा साता दानों ब्राह्मणका बातांस विह्वल हांकर रतिशब्दाग बाहर निकल आये । नाच गाकर राजन वन्दानन का स्तुति तथा गान-बजानावालोंक गान-बाज गक दिय और वह सब दाड़त हुए उन दानांक पास पहुँचे । उस समय उस दुःखम सीता तथा रामका मुख धुन्धला गया था ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ महाराज राम तथा साताका दख्कर व दानो ओर भी जोर-जारसे चिल्ला चिल्लाकर रोन लग ॥ उनमा आश्वासन दत हुए गद्गद कण्ठस रामन कहा कि आप लाग इतना व्याकुल न हा, में जो कुछ कह रहा हूँ उस सुना। म काई उपाय करक तुम्हारे पुत्रको जीवित करूँगा । ६३,। ६४।। याद तुम्हार बच्चा जीवित न कर सकूँगा ता मैं अपना पुत्र कुश आपको दे दूंगा । भग वाक्यो बात समझकर आप विश्वाम कर ॥ ६५ ॥ इसके अनन्तर साताने विप्रपल्न क पास जाकर कहा—ह भामना । तुम सुन रहा हा कि रामने क्या प्रतिज्ञा की है ? तुम्हार मतोषक लिए मैं भा प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि रामचन्द्रजा आपक बच्चे का जीवित न कर सक ता मैं अपन छाट पुत्र लवका दे दूंगा । उन दोना पुत्रांक पासस तुम्हारा पुत्रशाक दूर हो जायगा । ६६-६८ ॥ अब शोक मत करा । तुम्हारे पुत्र न जिला ता अधा जा मूल में भाग रहीं हूँ, वह तुमको प्राप्त होगा । इसके अनन्तर र मने ब्राह्मणस कहा कि आप अपना पत्नाक साथ यहाँ बैठ ओर किसी प्रकारका खेद न करें मैं आपके बटक जीवित करूँगा । इतन कहकर रामन लक्ष्मास कहकर एक तैलसे भरी हुई नौका मँगवायी । जिससे शव सड़े-गले नहीं, उसमह दुर्गन्ध न निकल या कीड़े न पड़ें । इस विचारसे उस शवको उसम रखवा दिया और स्वयं खिन्न होकर सम्पूनादि निष्कण्टक करनका चल गये । इसके अनन्तर समामें बैठकर रामन अपन कुलगुरु वसिष्ठसे कहा कि जब मैं धर्मपूर्वक राज्यशासन कर रहा हूँ तब
| ४४६ | आनन्दरामायणे | [सर्गः १० |
|---|
बाल्येऽन्ते अस्यतो प्राप्तस्त्वोपायं विचिन्त्यताम् । | इति यावद्द्रुतं रामः प्रोवाच तावदम्बरात् ॥७३॥
नारदः प्रययौ वीणां रणयन् तत्सभां जयन् । | प्रत्युद्गम्याथ तं रामः परिपूज्य यथाविधि ॥७४॥
सम्भार्य्य सकलं वृत्तं पुनः पप्रच्छ तं मुनिम् । | त्वयोपायोऽत्र वक्तव्यः शिशोश्चास्य प्रजीवने ॥७५॥
पुत्राभ्यां हि प्रतिज्ञातं द्विजाय सीतया मया । | किमर्थं मम राज्येऽसौ मृतस्त्रीदृङ् न वेद्यहम् ॥७६॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा राघव प्राह नारदः । | राम स्वद्विषयेऽधर्मं न कोऽप्याचरते जनः ॥७७॥
भूम्यां सर्वत्र द्रष्टव्यं गत्वा गत्वाऽथ मद्गिरा । | यद्यप्यहं विजानामि भूम्यां वृत्तं च जानतः ॥७८॥
तथापि जनशिक्षार्थं त्वामेव प्रेषयाम्यहम् । | त्वं दृष्ट्वाऽधर्मनिरतं जनं शिक्षय सादरम् ॥७९॥
अधर्मोच्छेदनेनायं जीविष्यति वै द्विजः । | तथेति राघवश्चोक्त्वा विसर्ज्य नारदं मुनिम् ॥८०॥
सीतया नागरैः सर्वैर्भ्रातृभिर्गुरुणा सह । | पुत्राभ्यां मन्त्रिभिर्युक्तः पुष्पकं चारुरोह सः ॥८१॥
एतस्मिन्नन्तरेऽग्रेऽभून्महान्कोलाहलस्तदा । | तं श्रुत्वा चकितो रामः स ददर्श समन्ततः ॥८२॥
तावद्ददर्श पुरतः पौरैः संवेष्ठितां स्त्रियम् । | पृष्ठतोऽपरं शवमुद्वहन्तं समागतम् ॥८३॥
रामं दृष्ट्वा पुष्पकस्थं रुदती ब्राह्मणी पुरः । | दीनस्वरेण प्रोवाच हस्ताभ्यां हृदि ताड्य सा ॥८४॥
राम राम महाबाहो ते राज्ये गतमर्तृका । | अहं जाताऽस्मि त्वद्दोषान्मां दृष्ट्वा त्वं न लज्जसे ॥८५॥
मद्भर्तारं जीवयेनं नोचेच्छापं ददामि ते । | इति तस्या वचः श्रुत्वा राघवः विस्मयान्वितः ॥८६॥
स मयान्मधुरं वाक्यं ब्राह्मणीं तोषयन्मुहुः । | कोऽयं श्रमस्त्वया रम्भोरु ते भर्तारं प्रजीवये ॥८७॥
अस्यैव हेतोर्गच्छामि त्वं मद्गेहे सुखं वस । | इत्युक्त्वाऽऽश्वास्य तां रामस्तच्छवञ्चापिपूर्ववत् ॥८८॥
तैलद्रोण्यां स्थापयित्वा सुमन्त्रं वाक्यमब्रवीत् । | आगमिष्याम्यहं यावत्तावद्रक्ष्यसि मे शवम् ॥८९॥
इस ब्राह्मणके बालककी अकाल मृत्यु क्यों हुई ॥६०-२॥ इसके लिये कोई उपाय सोचना चाहिये। इस प्रकार रामने गुरु वसिष्ठसे प्रश्न किया ही था कि इतनेमें आकाशमार्गसे वीणा बजाते हुए नारदजी उस सभामण्डपमें आ पहुंचे। रामचन्द्रजीने उठकर नारदकी पूजा की और सारा वृत्तान्त कह सुनाया। इसके पश्चात् वे बोले- हे मुनिराज आप ही इस विप्रपुत्रके जीवनका कोई उपाय बतलाइये। हमने तथा सीताने यह प्रतिज्ञा की है कि यदि हम बालकको मैं जीवित न कर सका तो अपने दोनों पुत्र कुश तथा लव इस विप्रको अपर्ण कर दूंगा। मेरे राज्यम इस प्रकार अकाल मृत्यु कैसे हुई, यह मुझ मालूम नहीं हो रहा है॥७२-७६॥ इस प्रकार रामके वचन सुनकर नारदने कहा—हे राम! तुम्हारे राज्यम कोई भी मनुष्य किसी प्रकारका अधर्म नहीं करता। फिर भी मेरे कथनानुसार आपको यह उचित है कि आप गन्धर्वथरमे घूमकर देख यदि कहीं कोई किसी तरहका अधर्माचरण करता हुआ दीखे तो उसे आप दण्ड दें इस प्रकार अधर्मका मूलोच्छेद करनेपर यह ब्राह्मणबालक जीवित हो जायगा राजन आपकी सन्तुष्ट मान हैं। नारद मुनिको सादर विदा करके राम सीता, कुछ नगरवासी जना, अपने ३ ताभ्रा, गुरु वसिष्ठ दोनों पुत्रों तथा मन्त्रियोंको साथ लेकर पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुए ॥७९-८१॥ उसी समय आगेके आगम जोरोंका कोलाहल सुनाई पड़ा। उसे सुनकर राम और भी विस्मित हुए और चहु ओर निहारन लगे। तबतक उन्होने देखा कि एक स्त्रीको चारो ओरसे बहुतसे पुरवासी घेरे हुए हैं। उनके आगे पृष्टतम्पुत्रकी सडकमे एक और शव लदा हुआ आ रहा है। स्त्रीने जब रामको पुष्पक विमानपर बैठे देखा तो अपने हथोस छाती पीटकर कहने लगी-हे राम ! हे राम !! तुम्हारे राजकाल्म दिववा होकर मैं यहाँ आरी हूँ मुझ इस दशाम देखकर तुम्हे लाजे नही आती? मेरे पतिका मृत्यु तुम्हारे ही अधर्मत हुई है। इस कारण जैसे बने, वैसे मेरे पतिको जिलाओ ! नही तो मै शाप दे दूँगी। इस प्रकार उस स्त्रीकी बात सुनकर रामने विस्मितहोकर मीठी वाणीसे आश्वासन देते हुए उत्तर दिया-हे रंभोरु तुम कायका क्षन्त्यिग करके शान्त हओ। मै तुम्हारे पतिकी जिला दूँगा। मैं भी इसी कामके लिए जा रहा हूँ। तुम आनन्दके साथ मेरे भवनम चलकर रहो। इस तरह उसे समझा-बुझाकर रामने उस शवको भी पहलेके समान तैलके नौकाम रखवाया और सुमन्त्रको वचन कर दिया कि
सर्गः १०] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) १४७
तया वह्नौ ज्वालनीयं शृण्वीयं प्रयत्नतः। मर्त्तानपि नृपा भूम्यां श्राव्य दुंदुभिनिःस्वनैः॥९०॥
न कस्यापिशवं दग्धं क्वापि कार्यं जनैरिति। तथेति राघवं चोक्त्वा दूतैः संश्राव्य उद्भवः ॥९१॥
सुमंत्रः सकलान् भूस्थान् साकेते न्यवसन्सुखम्। रामोऽपि पुष्पकेनैव पश्चिमां चोत्तरां दिशम् ॥९२॥
पूर्वामपि शनैः पश्यन् दक्षिणाभिमुखो ययौ। एतस्मिन्नन्तरेऽयोध्यापुर्यां पञ्च शवानि हि ॥९३॥
समानीतानि तैलस्य द्रोण्यां तान्यपि पूर्ववत्। सुमंत्रः स्थापयामास श्रीरामस्याज्ञयाऽऽदरात् ॥९४॥
तेषु पञ्चसु चैकैकं चैकं मधुपुरि स्थितम्। क्षत्रियस्य च तज्ज्ञेयं समानीतं सुहृज्जनैः ॥९५॥
प्रयागस्य द्वितीयं च शवं वैश्यस्य तत्स्मृतम्। पूर्वं वयसि पञ्चत्वान्ममर्त्ताने हि तज्जनैः ॥९६॥
हस्तिनापुरगस्थं तत्तृतीयं शवमीरितम्। तैलकारस्य तज्ज्ञेयं समानीतं हि तज्जनैः ॥९७॥
शवं चतुर्थं तज्ज्ञेयं हरिद्राग्रस्थितं द्विज। लोहकारस्तुपायाथ समानीतं हि तज्जनैः ॥९८॥
उज्जयिन्याश्च पञ्चमं च शवं ज्ञेयं महामते। चर्मकारदुहितायाः समानीतं हि तज्जनैः ॥९९॥
एवं पञ्च शवान्यानन् पूर्वे द्वे ब्राह्मणस्य च। सप्तायोध्यापुरीमध्ये शवान्येवं स्थितानि हि ॥१००॥
रामोऽपि दण्डकं पश्यन् स बभ्राम समंततः। अथो विन्ध्याचल धीमान् रेवायाश्चापिप्लुतः। १०१।
तत्र वृक्षे लंबमानं धूमं पातुमधोमुखम्। शूद्रं निरीक्ष्य स्वर्गोच्छे न इनुं समुपस्थितः। १०२।
तदा तं राघवः प्राह भो शूद्र शृणु मद्वचः। ब्राह्मणादितिभिर्विप्रैस्तपः कार्यं न चेतरैः ॥१०३।
शूद्रेण द्विशुश्रूषा सदा कार्याऽतिभक्तितः। द्विजकृत्यं त्वया चात्र कृत पापमना अह ॥१०४॥
इदानीं त्वां हनिष्यामि जीवायिष्यामि तान्मृतान्। तुष्टोऽहं त्वां न्वनपमा वरं वरय वाञ्छितम् ॥१०५।
इति रामवचः श्रुत्वाऽधोमुखो रामपादजः। उवाच भयभीतः सन्नन्या गर्प सुदुर्मदः ॥१०६॥
राम रावणदर्पघ्न यदि तुष्टोऽसि मां प्रभो। तर्हि ते वध्यामद्य येन शुद्धगतिर्भवेत् ॥१०७॥
जबलक मैं लौट न आऊं तबतक तुम किसी भी शवका अग्निसंस्कार न करने देना ॥८२-८९। साथ ही मेरे राज्यमें यह दुंभी पिटवा दो कि जबतक मैं लौट न आऊं तबतक कोई भी शव न जलाया जाय। सुमन्त्रने रामकी आज्ञा स्वीकार करके दूतों द्वारा डिंडिम पिटवाकर रामकी यह आज्ञा सब लोगोंको सुनवा दी और आनन्दपूर्वक राज-काज देखते हुए रहने लगे। उधर रामचन्द्रजी पुष्पक विमानपर बैठकर पश्चिम तथा उत्तरकी दिशाओंको धीरे-धीरे अच्छी तरह देखते हुए दक्षिण दिशाकी ओर बढे। इसी बीच अयोध्यामें पाँच शव और आकर एकत्र हो गये। उन्हें भी सुमन्त्रने पूर्ववत् तेलकी नौकाके रखवा दिया ॥९०-९४॥ उन पांचोंमेंसे एक शव मधुपर गन्धर्व रहनेवाले एक क्षत्रियका था। जिसे उसके सुहृज्जन रामके दरबारमें ले आये थे। दूसरा शव प्रयागनिवासी एक वैश्यका था थोड़ी ही अवस्था में उसकी मृत्यु हो गयी थी। इसी लिए उसके घरवाले रामके पास ले आये। तीसरा शव हस्तिनापुरनिवासी एक तेलीका था। उसे भी उसके घरवाले रामके पास ले आये थे। चौथा शव श्रृंगवेरपुरनिवासी एक लोहारका पुत्र/मृतक था। पाँचवां शव उज्जयिनीनिवासी एक चमारकी लड़कीका था और इसके घरवाले उसे अयोध्या ले आये थे। इस प्रकार ये पांच शव तथा पूर्वके दो ब्राह्मणके शव मिलाकर अब कुल सात शव एकत्र हो गये ॥९५-१००॥ राम-चन्द्रजी भी दण्डकारण्यमें अच्छी तरह घूमकर रेवानदीमें पवित्रयुक्त विन्ध्यपर्वतकी ओर बढ़े वहाँ उन्होंने देखा कि एक शूद्र उलटा टंगा है और नीचे आगकी धूनी धधक रही है। वह शूद्र धुआँ पीता हुआ मुँह बाये लटका हुआ है। इस प्रकारकी उग्र तपस्या करके स्वर्ग चाहनेवाले उस शूद्रको राम मारनेके लिए तैयार ही गये और उसके पास आकर कहने लगे-हे शूद्र ! ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य इन तीनों वर्णोंके लिए ही तपस्या करनेका विधान है, शूद्रके लिए नहीं। तुम्हें तो सर्वदा इन तीनों वर्णोंकी सेवा करनी चाहिए। अरे नह! तुझ पापीने अपने धर्मका उल्लङ्घन करके द्विजोंके समान कर्म किया है ॥१०१-१०४॥ इस समय मैं तुझे मारकर उन लोगोंको जीवित करूँगा जो तेरे धर्मविरुद्ध आचरणसे अकालमृत्युके ग्रास बने हैं। मैं तेरी इस तपस्यासे प्रसन्न हूँ। बोल, तेरी क्या कामना है ? इस प्रकार रामकी वाणी सुनकर भयभीत हो
४५८ आनन्दरामायणे [ सर्ग १०
ममापि येन कीर्तिः स्यात्तं वरं दातुमर्हसि । इति शूद्रवचः श्रुत्वा रामस्तुष्टोऽब्रवीद्वचः ॥१०८॥
मम रामेति यन्नाम तच्छूद्रैः सर्वदैव हि जपनीयं कीर्तनीयं चिंतनीयं मुहुर्मुहुः ॥१०९॥
भविष्यति मतिस्तेषामनेन मम्परे भव तवानेनोपकारेण कीर्तिः शूद्रेषु वै भवेत् ॥११०॥
इति रामवरं श्रुत्वा पुनः शूद्रोऽब्रवीद्वचः । शूद्राः कलौ मंदधियो भविष्यन्ति रघूत्तम ॥१११॥
व्यग्रचित्ता भविष्यन्ति कृषिकर्मादिभिः प्रभो । तदा तेषां कुतो बुद्धिर्जपादिषु भविष्यति ॥११२॥
अतस्तदनुरूपोऽद्य वरो देयो विचार्य च । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा रामस्तुष्टोऽब्रवीत् पुनः ॥११३॥
परवन्दनकालेषु रामरामेति सर्वदा । शूद्रा वदंतु सर्वत्र तेन तेषां गतिर्भवेत् ॥११४॥
तवापीय कथाकीर्तिः स्मारयिष्यति मद्द्विजाः । त्वं मया निहतस्त्वद्य वैकुंठं प्रति यास्यसि ॥११५॥
पुनर्ययाचे श्रीराम वरमन्यं स्वकांक्षया । अस्मिन् क्षेत्रे सदा तिष्ठ सीतालक्ष्मणसंयुतः ॥११६॥
अंशतन्ते पूर्वमेव दर्शनं मम ये नराः । करिष्यन्ति ततः पश्चाद्ये नरास्तव दर्शनम् ॥११७॥
कुर्वन्ति सहितं भक्त्या मोक्षमेव व्रजंति ते । मदंशनं विना मन्याँस्त्वा पश्यन्त्यविचारतः ॥११८॥
तेषामुद्धरणं राम कुरु मद्द्वचनात् प्रभो । तथोवाच तदा रामो भक्ति तस्मै ददौ हरिः ॥११९॥
इति कृत्वा सुसंतुष्टं हत्वा शूद्रं रघूत्तमः । जीवयामास विप्रादीन्मम साकेतमर्थिनान् ॥१२०॥
तदारभ्यात्र शूद्रेस्तु विष्णुदासावनीतले । परवन्दनकालेषु रामरामेति कीर्त्यते ॥१२१॥
तं हत्वा रघुवीरः स परिनृत्य मुदान्वितः । सीतां नानाकौतुकानि दर्शयन्स्वपुरीं ययौ ॥१२२॥
एतस्मिन्नंतरे मार्गे गृध्रोलूकौ विरोधिनी । विवदमानौ समेत्य रामपादं द्रष्टुमागतौ ॥१२३॥
तानुवाच रघुश्रेष्ठः किमर्थे हि युवामुभौ । विवदमानौ संप्राप्तौ मां ब्रून्तन्त्वद्य विस्तरात् ॥१२४॥
और नीचा मस्तक किये हुए बार-बार प्रणाम करके उस शूद्रने कहा—हे रावणके अभिमानको दूर करनेवाले राम ! यदि वास्तवमें आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मुझे वह वरदान दीजिये कि जिससे शूद्रजातिकी भी सद्गति प्राप्त हो, साथ ही मेरा भी उद्धार हो जाय। इस तरह शूद्रकी दीनतापूर्ण बात सुनकर रामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे—। १०५-१०८ ।। 'राम' इस पवित्र नामको वे शूद्र सदा जप, कीर्तन तथा चिन्तन करते रहेंगे, उन लोगोंको सद्गति प्राप्त होगी और तुम भी इस तपस्याको छोड़कर मेरा चिन्तन करो। तुम्हारे इस उपकारसे शूद्रोंमें तुम्हारी कीर्ति होगी। इस प्रकार रामचन्द्रजीके द्वारा वर पाकर शूद्रने कहा—हे रघूत्तम ! आगे महाभ्रष्ट कलिकाल आनेवाला है। उसमें शूद्रजातिके लोग बड़े मूर्ख होंगे। वे सर्वदा अपनी खेतीबारीके काममें ही व्यस्त रहेंगे। ऐसी अवस्थामें उन्हें जप तथा कीर्तन करनेका अवसर ही कहाँ मिलेगा इन शुभ कर्मोंपर और उनकी बुद्धि कैसे जायगी। अतएव उनके अनुरूप कोई वरदान दीजिए। शूद्रकी यह बात सुनकर तो प्रसन्न होकर रामने कहा कि वे लोग एक-दूसरेको प्रणाम-वार्ता करनेके समय 'राम-राम' ऐसा कहेंगे इससे उनका उद्धार हो जाया करेगा ।। १०९-११४ ।। उस शूद्रसमाजमें तुम्हारी बड़ी कीर्ति होगी। आज तुम हमारे हाथसे मरकर वैकुण्ठधामको प्राप्त होओगे। इसके अनन्तर उसने रामसे यह वर माँगा कि आप सीता तथा लक्ष्मणके साथ सर्वदा इस दर्भनगर निवास करें ॥ ११५ ॥ ११६ ॥ जो लोग यहाँ आकर पहले मेरा दर्शन करनेके पश्चात् आपका दर्शन करें, उनको मोक्षपद प्राप्त हुआ करे। इसके सिवाय जो लोग क्रमवर्ण बिना मेरा दर्शन किये ही आपका दर्शन कर लें उनका भी उद्धार हो जाय। रामने 'तथास्तु' कहकर भक्तिका वर दिया और उसे मारकर उन अकाल मृत्युसे मरे हुए लोग को जीवित किया, जो ब्राह्मण-क्षत्रियादि सात वर्षकी अवस्थामे मर पड़े थे ॥ ११७-१२० । हे विष्णुदास ! तभीसे इस पृथ्वीतलमे शूद्रलोग आपसमें प्रणाम-आशीषके अवसरपर 'राम-राम' कहा करते हैं। शूद्रको मारकर हर्षपूर्वक रामचन्द्रजी सीताको रास्तेके अनेक मनोहर दृश्योंको दिखाते हुए अयोध्याके लिए लौट पड़े। उसी बीच एक गृध्र और उलूक परस्पर विवाद करते हुए रामके दर्शनोंके लिए उनके सम्मुख आये। रामने उन्हें देखकर