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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २ ] पूर्णकाण्डम् ७११

सर्गः २ ] पूर्णकाण्डम् ७११

तत्सर्वं राघवः श्रुत्वा परां मुदमवाप सः । विदुः सर्वे जनाश्चापि वैकुण्ठारोहणं प्रभोः ॥६१॥

इति शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये मनोहरकाण्डे
सोमवंशानूरत्नाविस्तारो नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

( रामका सोमवंशियोंसे युद्धके लिए प्रस्थान )

श्रीरामदास उवाच

अथ रामस्तदा प्राह वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् । आमन्त्र्यं त्वया तत्र मुनिभिस्तु गताह्वयम् ॥ १ ॥
तथेति स मुनिः प्राह राघवं भक्तवत्सलम् । ततः स लक्ष्मणं शीघ्रं राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
पत्राणि प्रेषयस्वाद्य कुमारान्राज्यसंस्थितान् । न्यस्यराज्ये मन्त्रिणश्च कृत्वाऽऽगम्यतां बलैः ॥ ३ ॥
एवमेव प्रलेख्यानि जम्बूद्वीपपतीन्प्रति । तथा द्वीपवर्तींश्चापि दूतास्तांस्त्वरयंतु नः ॥ ४ ॥
तथेति लक्ष्मणश्चोक्त्वा तथा चक्रे यथोदितम् । राघवेण समापृष्टे वाल्मीकिगुरुसन्निधौ ॥ ५ ॥
ततः प्राह पुनः श्रीमान् राघवो लक्ष्मणं मुदा । वासोगेहानि मेधानि बहिर्मम रघूद्वह ॥ ६ ॥
मुहूर्तो वर्तते शो भं सेनां चोदय सादरात् । आयुधान्यथ यंत्राणि जीर्णानि च बहूनि हि ॥ ७ ॥
पूर्वजैर्निहितान्येव कोशागारेषु वै सदा । तानि निष्कासनीयानि तेषां कालोऽद्य वर्तते ॥ ८ ॥
अन्तःपुराणि सर्वाणि बहिर्नेयानि मेऽग्रतः । अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य सीताऽप्यग्रेऽनुगच्छतु ॥ ९ ॥
कोशगाराणि सर्वाणि बहिर्नेयानि नाहनैः । हस्त्यश्वरथपादाता नेयाः सर्वे बहिस्त्वया ॥ १० ॥
इत्याज्ञाप्य रघुश्रेष्ठो लक्ष्मणं विनयान्वितम् । मन्त्रिणो नैगमांश्चैव वसिष्ठं चेदमब्रवीत् ॥ ११ ॥
अभिषेक्ष्यामि भरतं सप्तद्वीपपतेः पदे । लक्ष्मणे मां विना नैव भूम्यां वासं करिष्यति ॥ १२॥


के बादवाले कांतों की कथाओंको मिलजुलकर गान लगे ॥ ६० ॥ यह सब कथाय सुनकर रामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और सर्वसाधारणके लोगोंको भी भगवान्‌की स्वर्गारोहणसम्बन्धी बात ज्ञात हो गयी ॥ ६१ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते पूर्णकांडे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीरामदास बोले—इतनी कथा सुनकर रामचन्द्रजीने वाल्मीकिसे कहा कि आप भी हस्तिनापुर अवश्य आइएगा ॥ १ ॥ महर्षि वाल्मीकिने भक्तवत्सल रामसे कहा—"बहुत अच्छा"। इसके बाद राम लक्ष्मणसे कहने लगे कि सब राज्योंके सिंहासनपर बैठे हुए कुमारोंके पास पत्र लिख दो कि वे अपने-अपने मन्त्रियोंके ऊपर राज्यका भार छोड़कर अपनी सेनाके साथ यहाँ आ जायें ॥ २ ॥ ३ ॥ इसी प्रकार पत्र जम्बूद्वीपवाले तथा द्वीपान्तरनिवासी राजाओंके पास लिख दो और दूतोंको कहा कि उन शीघ्र यहाँ आनेको कहें ॥ ४ ॥ "तथास्तु" कहकर लक्ष्मणजीने भी वैसा ही किया, जैसा कि रामचन्द्रजी ने सभाके वाल्मीकि तथा गुरु वसिष्ठके सम्मुख कहा था ॥ ५ ॥ इसके बाद श्रीरामचन्द्रजीने फिर लक्ष्मणसे कहा कि हमारे तम्बू-कनात आदि सामान बाहर ले चलो ॥ ६ ॥ कल बड़ा अच्छा मुहूर्त्त है। सेनाको भी शीघ्र तैयार हो जानेकी आज्ञा दे दो। बहुतसे शस्त्र जोजीर्ण हो गये हैं, जिनको मेरे पूर्वजोंने घरोंमें बन्द कर दिये थे उनका निकाल लो। क्योंकि आज उनके उपयोगका समय आ पहुंचा है ॥ ७-८ ॥ अन्तःपुरकी जितनी स्त्रियां हैं, उनको भी बाहर ले आओ। अग्निहोत्र लेकर सीता भी मेरे साथ चलें ॥ ९ ॥ मेरे जितने खजाने हैं उनको हाथी घोड़े तथा रथकी सहायतासे बाहर ले जाओ ॥१०॥ इस तरह लक्ष्मणजीको आज्ञा देकर मन्त्रियों, विद्वानों तथा वसिष्ठजीसे कहा कि अब मैं सातों द्वीपोंके आधिपत्यके पदपर भरतजीको बिठाऊंगा ! क्योंकि मेरे बिना लक्ष्मण इस भूमण्डल-

७६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः २

एवं वदति राजेन्द्र पौरास्ते भयविह्वलाः । द्रुमा इव छिन्नमूला दुःखार्ताः पतिता भुवि ॥१३॥
मूच्छितो भरतश्चापि श्रुत्वा रामाभिभाषितम् । गर्हयामास राज्यं स प्राह दुःखार्तभृत्ततः ॥१४॥
सत्येन तु शपे नाहं त्वां विना दिवि वा भुवि । कांक्षे राज्यं रघूश्रेष्ठ शपे त्वामङ्घ्रयोः प्रभो ॥१५॥
अमुं योग्यं वरं राजन्नभिषिञ्चस्व राघव । अयोध्याशं कुशं वीरं सप्तद्वीपपतेः पदे ॥१६॥
अस्त्युत्तरकुरुष्वत्र जम्बूद्वीपपतेः पदे । छत्रोऽभिषेचितः पूर्वं स एव तेषु गच्छतु ॥१७॥
भरतेनोदितं श्रुत्वा सन्निनास्ताः समीक्ष्य च । प्रजा वै भयमन्विग्ना रामविश्लेषकातराः ॥१८॥
वसिष्ठो भगवान् राममुवाच सदयं वचः । पश्यतामङ्गणं सर्वाः पतिता भूतले प्रजाः ॥१९॥
तासां मानार्जुनं राम प्रसादं कर्तुमर्हसि । श्रुत्वा वसिष्ठवचनं ताः समुत्थाप्य पूज्य च ॥२०॥
सस्नेहो रघुनाथस्ताः किं करोमीति चाब्रवीत् । ततः प्रांजलयः प्राचुः प्रजा भक्त्या रघूद्वहम् ॥२१॥
गन्तुमिच्छसि वैकुण्ठं त्वमस्मान् नय प्रभो । यत्र गच्छसि त्वं राम त्वनुगच्छामहे वयम् ॥२२॥
अस्माकमेषः परमा प्राभिर्धर्मोऽयमक्षयः । तवानुगमने राम हृद्गता नो दृढा मतिः ॥२३॥
पुत्रदारादिभिः सार्धमनुयामोऽद्य सर्वथा । तपोवनं वा स्वर्गं वा पुरं वा रघुनन्दन ॥२४॥
ज्ञात्वा तेषां मनोदाढ्यं कारुण्याद्रघुनायकः । भक्तं पौरजनं दीनं बाढमित्यब्रवीद्वचः ॥२५॥
कृत्वैवं निश्चयं शदस्तस्मिन्नेवाहनि प्रभुः । कुशं समभिषेक्तुं वै चोदयामास लक्ष्मणम् ॥२६॥
सौमित्रिश्चापि गुरुणा विप्रैः पौरजनैस्तदा । शोभयित्वा स्वनगरीं कुशं तमभ्यषेचयत् ॥२७॥
अभिषेके कुशस्यासीन्महोत्साहो गृहे गृहे । रामावरोधे सुमहान्त्समुत्साहस्तदाऽभवत् ॥२८॥
तदा सिंहासनारूढं छत्रचामरशोभितम् । प्रजाः कुशं पतिं प्राप्य प्रणामं चक्रुरादरात् ॥२९॥


पर नहीं रह सकते ॥११॥ १२॥ श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर ये सब पुरवासी जडसे कटे हुए वृक्षोंकी भांति पृथ्वीपर गिर पड़े। रामकी बात सुनकर भरतजी भी मूर्छित ही गये। होश आनेपर उन्होंने राज्यकी भरपूर निन्दा की और दुःखित होकर उन्होंने रामचन्द्रजीसे कहा-मैं आपके चरणोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके बिना मैं पृथ्वी अथवा स्वर्गलोकका भी राज्य नहीं चाहता ॥१३-१५॥ हे राजन् ! हे राघव आप वीर कुशको इस सप्तद्वीपपतिके आसनपर बिठाल दीजिए ॥ १६॥ उत्तरकुरु नामके देशमें जम्बूद्वीपपतिके पदपर तो आपने छत्रका बहुत दिनो पहिले ही अभिषेक कर दिया है वह अपने पदपर चला जाय ॥ १७॥ इस प्रकार भरतकी बात सुनकर वहाँके जितने प्रजाजन थे, वे सब रामके वियोगरूप दुःखसे विह्वल और भयभीत हो गये ॥१८॥ उनकी यह दशा देखकर दयालु वसिष्ठजीने रामसे आदरपूर्वक कहा- हे राम ! देखिए, ये सब कितने दुःखी हैं। अतः जिस तरह इनकी सन्तोष हो सके, वही काम करिए। वसिष्ठजीकी बात सुनकर रामने उन लोगोंको उठाया, उनका सत्कार किया और पूछा कि मैं क्या करूँ, जिससे आप लोग लोग प्रसन्न हो सकेंगे। यह सुना तो सब लोग हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक रामचन्द्रजीसे कहने लगे-हे राम ! आप सब यदि वैकुण्ठलोकको जाना चाहते हों तो हमें भी अपने साथ लेते चलिए, हम सब भी आपके साथ-साथ चलेंगे ॥ १९-२२॥ इससे बढ़कर हमको और कोई लाभ नहीं होगा हम लोगोंके लिए यह अक्षय धर्मकार्य है। हे राम ! आपके साथ चलनेके लिए हमने दृढ़ निश्चय कर लिया है । २३॥ आज हम सब अपने परिवारके साथ आपके सङ्ग वैकुण्ठलोकको, तपोवनको, स्वर्गको अथवा अयोध्याको जायेंगे ॥ २४ ॥ रामचन्द्रजीने जब भक्तों और पुरजनोंकी इतनी दृढ़ता देखी तो साथ ले चलनेकी स्वीकृति दे दी। २५॥ इस तरह निश्चय करके रामने उसी दिन कुशका अभिषेक करनेके लिए लक्ष्मणसे कहा और रामके आज्ञानुसार गुरु, विप्र एवं पुरवासियोंके साथ लक्ष्मणने उसी दिन कुशका राज्याभिषेक कर दिया॥ २६॥ २७॥ कुशका अभिषेक करते समय अयोध्याके घर घरमें महान् उत्सव मनाया गया। विशेषकर रामके अन्तःपुरकी नारियोंने उत्सव मनाया ॥ २८॥ जब कि छत्र और चमर आदिसे सुसज्जित होकर कुश सिंहासनपर