श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १] सारकाण्डम् ३५
सर्गः १] सारकाण्डम् ३५
कल्पयामास विधिवन्मुनींश्चापि सपूरुषम् । गतो गाधिसमादेशेन दिशेह प्रेष्य मन्त्रिणः ॥१७२॥
समानेतुं दशरथं सप्रतीक्षां चकार सः । तेऽपि गत्वा म.ऽशश्व दृष्ट्वा दशरथं नृपम् ॥१७३॥
वृत्तं निवेद्य सकलं तं नत्वा सम्पुरःस्थिताः । वृत्तं दशरथः श्रुत्वा तुतोष नितरां तदा ॥१७४॥
सैन्येन नागरैः सर्वैः स्रिविजनैर्दलैः सह । मिथिलायामथोत्थाय तदा दशरथो नृपः ॥१७५॥
तदा महोत्सवनेनैव नृपं दशरथं पुरम् । नेतुं गजं पुरस्कृत्य जनकराः साश्विरंययौ ॥१७६॥
तदा दशरथाग्रे तौ दृष्ट्वा कैकेय्यासुतौ । श्रीरामलक्ष्मणावरजौ जनः प्राप्तौ व्यचिन्तयत् ॥१७७॥
तावद्रामलक्ष्मणाभ्यां युक्तं तं गाधिजं मुनिम् । स्वसेनायां नृपो दृष्ट्वा विस्मयं प्राप संस्थितः ॥१७८॥
ततो दशरथं नत्वा वसिष्ठं प्रणिपत्य च । गाधिजं जनकः प्राह कावेतौ रामरूपिणौ ॥१७९॥
ततस्त्वं गाधिजः प्राह रामौङ्गाद्भरतस्त्वयम् । लक्ष्मणाङ्गाच्च शत्रुघ्नः कैकेय्या नन्दनाविनौ ॥१८०॥
तच्छ्रुत्वा जनकः प्राह राजानं गाधिजं गुरुम् । सीतां रामाय दास्यामि लब्धां भूमवयोनिजाम् १८१॥
दैवज्ञोर्मिलानाम्नीं लक्ष्मणायार्पयान्यहम् । कुशध्वजस्य मे बन्धोः श्रुतकीर्तिश्च मांडवी १८२।
वर्तेते बालिके रम्ये रूपयौवनमण्डिते । सीतोर्मिलाभ्यामपि ये मया नित्यं प्रसाधिते ॥१८३॥
दास्याम्यहं भरताय मांडवीं मंडनान्विताम् । शत्रुघ्नाय श्रुतकीर्तिमर्पयान्यकमादरात् ॥१८४॥
एवं स्नुषाश्चतस्रश्च सर्वमङ्गलक पावित् । तथेति जनकं प्राह राजा दशरथो मुदा ॥१८५॥
ततो दशरथः प्राह शतानन्दं पुरोहितम् । अहल्याजठरोद्भूतं मैथिलाग्रे स्थितं मुनिम् ॥१८६॥
कथं लब्धा भुवः सीता वृत्तमेवं वक्तुमर्हसि । शतानंदस्त्वथैवंयुक्तोऽब्रवीद्दशरथं नृपम् १८७॥
शतानन्द उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया राजन् शृणुष्वैकाग्रमानसः । आसीन्नृप नृपः कश्चित्पद्माक्ष इति विश्रुतः ॥१८८॥
रामके लिये, मुनियोंके लिये तथा सब लोगके लिए सब प्रकारकी वस्तुओका यथोचित प्रबन्ध कर दिया ॥१७२॥ तदनन्तर विश्वामित्रके कहनेपर राजा जनकने अवधेश महाराज दशरथको बुलानेका निश्चय करके मन्त्रियोंको अयोध्या भेजा । तद न्पार वे राजा दशरथके पास गये और सब वृत्त.न्त निवेदन करके बाद नमस्कार करके सामने खड़े हो गए । इस वृत्तान्तको सुनकर राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए ॥१७३-१७४॥ फिर राजा दशरथ स्त्रियोंको लेनाके, नगर तथा देशके सब लोगोको साथ लेकर आनन्द-पूर्वक साथ मिथिलापुरीको चल परे ॥१७५॥ उधर राजा जनक बड़े समारोहपूर्वक बाजेगाजेके साथ एक हाथीको सजाकर सब राजाओक संग उनकी अगवानीके लिए सामने आये ॥१७६॥ महाराज दशरथके आगे कैकेयीके पुत्र भरत तथा शत्रुघ्नको देखकर राजा जनक विचारने लगे कि वे राम-लक्ष्मण यहाँ कहाँसे आ गये। तावत् जब विश्वामित्रके साथ राम-लक्ष्मणको अपनी सेनामे देखा तो आश्चर्यचकित होकर राजा जनकने महाराज दशरथ और मुनि वसिष्ठको प्रणाम करके विश्वामित्रसे पूछा कि ये दोनों राम-लक्ष्मण-के समान रूपवाले दूसरे बालक कौन हैं ? ॥१७७-१७९॥ विश्वामित्रजीने उत्तर दिया कि रामके अङ्गस्वरूप भरत तथा लक्ष्मणके अंश शत्रुघ्न ये दोनों कैकयीके पुत्र हैं ॥१८०॥ यह सुनकर राजा जनक गुरु विश्वामित्र तथा राजा दशरथसे कहने लगे कि अयोनिजा (योनिसे नहीं उत्पन्न) तथा पृथ्वीसे प्राप्त सीताको मैं रामके लिए देता हूँ तथा शरीरसे उत्पन्न उर्मिलाको लक्ष्मणके लिए दे रहा हूँ। उसे आप ग्रहण करें। मेरे भाई कुशध्वजकी श्रुतकीर्ति तथा माण्डवी नामकी सुन्दर तथा रूपयौवनसे सम्पन्न दो कन्याएँ हैं। जिनको कि सीता तथा उर्मिलाके साथ-साथ बालकर मैनें बड़ी की है ॥१८१-१८३॥ उत्तम भूषणोसे भूषित मांडवीको भरतके लिए तथा श्रुतकीर्तिको शत्रुघ्नके लिए देता हूँ, हे पार्थिव ! आप इन चारो-शुभ-वधुओको स्वीकार करें। तब राजा दशरथने सहर्ष 'तथास्तु' कहा ॥१८४॥१८५॥ तदनन्तर राजा दशरथने राजा जनकके सामने खड़े अहल्याकी कोखसे उत्पन्न पुरोहित मुनि शतानन्दसे पूछा कि सीता धरणीरस कैसे प्राप्त हुई। सो सब वृत्तान्त आप कहें। शतानन्दने 'बहुत अच्छा' कहकर बताना आरम्भ किया ॥१८६॥१८७॥
| २२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३ |
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स दृष्ट्वा सकलाँल्लोकान् लक्ष्मीकार्मुकतत्परान् । चिंतयामास मनसि लक्ष्मीं कन्यां करोम्यहम् ॥१८९॥
वयमेव निजांके तां लालयामि निरंतरम् । इति निश्चित्य स नृपस्तप्तवांस्तीव्रं महत्तपः ॥१९०॥
दृष्ट्वा प्रसन्नतामग्र तु लक्ष्मीं वचनमब्रवीत् । दुहिता मे भव त्वं हि सा प्राह नृपतिं प्रति । १९१॥
परतन्त्राऽस्म्यहं राजन् विष्णुं त्वं प्रार्थयाधुना । स चेद्दास्यति मां ते हि तर्ह्यहं दुहिता तव ॥१९२॥
भविष्यामि न संदेहोऽथैवं प्रकथ्य नृपः पुनः । तप्त्वा तीव्रं तपो विष्णुं चकार परमोन्मुखम् । १९३॥
लब्ध्वा तं नृपतिः प्राह देहि कन्यां रमां मम । तद्राजवचनं श्रुत्वा मातुलुङ्गफलं हरिः ॥१९४॥
पद्माक्षाय ददौ श्रेष्ठं स्वयमन्तर्दधे विभुः । तद्भित्त्वा नृपतिः कन्यां ददर्श कनकप्रभाम् ॥१९५॥
तां दृष्ट्वा चाभिलाषः स कन्यां मेने निजां शुभाम् । पद्माक्षनृपतेः कन्यां पद्मा लोका वदंति च । १९६॥
आह्लादयन्तीमुत्तमां रम्यां नवतिर्नर्तकं जनान् । शकले मातुलुङ्गस्य भूत्वैकत्र फलं पुनः ॥१९७॥
जातं दृष्ट्वा दधावथ स्वहस्ते नृपतेः सुता । सा व्यवर्धत नृपतेरङ्के चंद्रकला यथा ॥१९८॥
शुक्लपक्षे च तां दृष्ट्वा वयःसन्धिवितन्वतीम् । कस्मै देया मया कन्या कस्यै योग्यो वरोऽत्र कः १९९॥
ततः समंत्र्य नृपतिः स्वयंवरमथाऽग्रभीत् । स्वयंवरेऽथ पद्माया यज्ञारम्भं चकार सः ॥२००॥
स्वयंवराय यद्वाथ पत्रिकांकारयन्नृपान् । तेऽपि शृङ्गारयुक्ताश्च ययुः पद्मास्वयंवरम् ॥२०१॥
पद्मास्वयंवरं श्रुत्वा ययुस्तत्र मुनीश्वराः । ययुर्देवाः सगंधर्वा दानवा मानवाः खगाः । २०२॥
नगा नद्यः समुद्राश्च भूरुहाः कामरूपिणः । ययुर्यक्षाः किन्नराश्च राक्षसा रावणादयः ॥२०३॥
सर्वान् समागतान् दृष्ट्वा पद्माक्षः प्राह तान् प्रति । आकाशनीलवर्णेन यः स्वांगं परिलेपयेत् । २०४
ददामि तस्मै पद्मेयं सत्यं ज्ञेयं वचो मम । तद्राजवचनं श्रुत्वा दुर्घटं नृपसत्तमाः । २०५॥
शतानन्द बोले हे राजन् आपने जो वृतान्त पूछा सो बहुत अच्छा किया । मैं कहता हूँ आप ध्यानसे सुन । पूर्वकालमें पद्माक्ष नामका एक प्रसिद्ध राजा था ॥ १८८ ॥ उसने सब लोगोंको लक्ष्मीकी कामनामें तत्पर देखकर मनमें सोचा कि मैं साक्षात् लक्ष्मीको पुत्री बनाऊं और अपनी गोदमें लाडप्यार करके बड़ी करूँ । ऐसा निश्चय करके उसने लक्ष्मीको प्राप्त करनेके लिए बड़ा कठोर तप किया ॥ १८६ ॥ १९० ॥ जब प्रसन्न होकर लक्ष्मी सम्मन आ खड़ी हुईं तो उसने कहा कि तुम मेरी पुत्री बनो । यह सुनकर लक्ष्मीने राजासे कहा ॥ १६१ ॥ हे राजन् ! मैं तो विष्णुभगवानके अधीन हूँ—स्वतन्त्र नहीं हूँ । इसलिए तुम विष्णुकी प्रार्थना करो । वे यदि मुझे तुम्हें दे देंगें तो मैं तुम्हारी पुत्री होऊँगी । इसमें सन्देह नहीं है 'अच्छी बात है' कहकर राजा पद्माक्षने तीव्र तप करके विष्णुभगवान्को प्रसन्न किया । १६२ ॥ १६३ ॥ विष्णुने उसे एक श्रेष्ठ मातुलुङ्गफल (बिजोरा नीबू अथवा नारङ्गीका फल) दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये । राजा पद्माक्षने उस फलको फाड़ा तो उसमें सुवर्णके समान जगमगाती कन्याको विद्यमान देखा ॥१९४॥१९५॥ कन्याभिलाषी राजाने बालिकाको देखकर उसे अपनी कन्या ही माना । सबरू चित्तको आनन्द देनेवाली उस रमणीय कन्याको देखकर वहाँके सब लोग भी सहर्ष 'यह राजा पद्माक्षका कन्या लक्ष्मी है' ऐसा कहने लगे । तभी उस विजोरेके टुकड़ोंका मिलकर फिर समूचा फल बन गया । यह देखकर राजाकी पुत्रीने उसे अपने हाथोंमें ले लिया । वह बालिका राजाके अंक (गोद) में शुक्लपक्षकी चन्द्रकलाकी भांति बढ़ने लगी । उसे देखकर राजाके मनमें चिन्ता हुई कि 'यह कन्या मैं किसको दूँ, इसके योग्य वर कौन है' ॥ १९६–१९९ ॥ तदनन्तर राजाने विचार करके उसका स्वयंम्बर रचाया । उसी स्वयंम्बरमें उन्होंने यज्ञ भी आरम्भ कर दिया ॥ २०० ॥ स्वयंम्बर तथा यज्ञके लिए निमन्त्रणपत्र भेजकर पद्माक्षने राजाओंको बुलाया । वे लोग शृङ्गार करके बड़े ठाठ-बाटसे पद्माके स्वयंम्बरमें आकर सम्मिलित हुए । स्वयंम्बरका समाचार सुनकर बड़े-बड़े मुनीश्वर, देवता, गन्धर्व, दानव, मानव, पक्षी और वैसा रूप धारण करनेवाले नग, पर्वत, नदी, समुद्र, यक्ष, किन्नर और रावणादि राक्षस भी वहीं आ पहुंचे ॥ २०१–२०३ ॥ उन सबको आया हुआ देखकर राजाने उनसे कहा कि जो
सर्गः १]
सारकाण्डम्
२३
रूपसौन्दर्यसंभ्रान्तांस्तां हर्तुं ते समुद्यताः । तान् कन्याहरणोद्युक्तान्नृपान् दृष्ट्वा सनिर्जरान् ॥२०६॥
चकार संगरं तैः स पद्माक्षो लोमहर्षणम् । सङ्ग्रामपीडिता देवा दानवा विमुखा रणे ॥२०७॥
बभूवुस्तत्र दैत्यैश्च पद्माक्षो निहतो रणे । ततस्ते मिलिताः सर्वे तां धर्तुं द्रुतमन्वयुः ॥२०८॥
सा दृष्ट्वा धर्तुमुद्युक्तान् हुताशाग्नौ कलेवरम् । तामदृष्ट्वा नृपाद्यास्ते विचिन्वन्नगरे तदा ॥२०९॥
समभञ्जन्गेहानि भूमिं खनन्नितस्ततः । श्मशानतुल्यं नगरं जातं वै क्षणमात्रतः ॥२१०॥
पद्माक्षनृपतेर्लक्ष्मीसङ्गाज्जातेदृशी दशा । तस्मान्न मुनयो लक्ष्मीं कामयन्ति कदाचन ॥२११॥
लक्ष्माश्रितस्य चाञ्चल्यं भयशोकाद्वधोऽपि च । भवत्येव महद्दुःखं तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥२१२॥
पद्माक्षे निहते युद्धे नृपपत्न्यः सहस्रशः । भर्त्रा सहैव गमनं चक्रुस्ता भयनिर्गताः ॥२१३॥
ततस्ते दैत्यवर्याद्या ययुः स्वं स्वं स्थलं प्रति । एकदा वह्निकुण्डात्सा पद्मा शक्तिः स्थिरा हरेः ॥२१४॥
बहिर्निर्गत्य कुण्डस्य समीपे समुपार्विशत् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र पुष्पकस्थो दशाननः ॥२१५॥
विचरन् जगतीं जेतुमाकाशवर्त्मना ययौ । सारणाख्यो ददर्शाय वह्निकुण्डे बहिः स्थिताम् ॥२१६॥
सारणो दर्शयामास रावणाय वचोऽब्रवीत् । पुरा सुरमृगाक्षाद्य यां धर्तुं समुपास्थिताः ॥२१७॥
सेयं पद्माक्षनृपतेः कन्या पद्माऽग्निसन्निभा । मन्दारणवचः श्रुत्वा तां दृष्ट्वा काममोहितः ॥२१८॥
यानाज्जवाद्दूध्र्वपात्तां धर्तु माऽनलेऽक्षिपत् । तामग्नौ प्रप्रविष्टां स दृष्ट्वा हान्वाऽथ तन्स्थलम् ॥२१९॥
गतं प्राह दशग्रीवः क्व गता देवा सुरादयः । कृत्वाऽग्नौ वसतिं पूर्व भ्रमग्रन्थाः कृताः पुरा ॥२२०॥
तदद्य वासस्थानं ते मया ज्ञातं मनोरमे । पश्येऽद्यनाऽहं त्वां धर्तुं शोधयत्यनलस्थलम् ॥२२१॥
कोई अपने शरीरको आकाशके नीले रंगसे रंग लेगा अर्थात् जो ऐसा कर सकेगा) उसे ही यह अपनी पद्मा नामकी कन्या दूँगा। यह मेरी दृढ़ प्रतिज्ञा है। राजाके इस दुर्घट वचनको सुनकर वे नृपश्रेष्ठ पद्माके सौंदर्यपर मोहित होते हुए उसका हरण करनेके लिए उद्यत हो गये। देवताओ सहित उन राजाओंको कन्याहरणके लिए उद्यत देखकर राजा पद्माक्ष उनके साथ लोमहर्षण अर्थात् रोंगटे खड़े करनेवाला युद्ध किया। उनके बाणोंसे पीड़ित होकर सुर तथा दानव रणसे भागने लगे। परन्तु अन्तमें दैत्योंके द्वारा राजा पद्माक्ष रणमें मारा गया। तदनन्तर वे सब मिलकर पद्माको पकड़नेके लिए बड़े वेगसे दौड़े। उनको पकड़नेके लिए आते देखकर पद्मा अग्निमें कूद पड़ी। उसको न देखकर राजाओंने उस सारे नगरमें ढूँढ़ना आरम्भ किया। राजमहल तोड़कर गिरा दिया और बहुत-सी इधर उधरकी जमीन खोद डाली। क्षणभरमें सारा नगर श्मशान बन गया ॥२०४-२१०॥ लक्ष्मीके सम्पर्कसे राजा पद्माक्षकी ऐसी दशा हुई। इसलिये मुनि लोग लक्ष्मीको कभी नहीं चाहते ॥२११॥ लक्ष्मीसे चित्तकी चंचलता बढ़ती है भय बढ़ता है शोक बढ़ता है, मनुष्य मारा जाता है और बड़ा भारी दुःख पाता है। इस वास्ते लक्ष्मीसे दूर रहना चाहिये ॥२१२॥ युद्धमें राजा पद्माक्षके मारे जानेपर राजाकी हजारों स्त्रिये भयभीत होकर राजाके साथ ही सती हो गयी ॥२१३॥ बादमें वे सब दैत्य भी अपने अपने स्थानको चले गये। एक समय श्रीहरिकी स्थिरशक्तिरूपा लक्ष्मी अग्निकुण्डसे बाहर निकलकर कुण्डके समीप बैठी थी। इतनेमें रावण पुष्पक विमानपर बैठकर विचरता हुआ जगत्को जीतनेके लिए आकाशमार्गसे उधर ही निकला। उस रावणका मंत्री सारण पद्माको अग्निकुण्डके बाहर बैठी देख रावणको दिखलाकर कहने लगा कि पूर्वकालमें जिस राजा पद्माक्षकी कन्याके लिए देवताओं और असुरोंका राजाके साथ युद्ध करना पड़ा था, वही कन्या अग्निकुण्डके पास बैठी है। सारणके इस वचनको सुन तथा पद्माको देख कामसे मोहित होकर रावण ज्यों ही वेगसे उसको पकड़नेके लिए नीचे कूदा, त्यों ही वह फिर अग्निमें प्रवेश कर गयी। उसको अग्निमें प्रवेश करती गया उस स्थानको देखकर रावण कहने लगा-॥२१४-२१९॥ हे पद्मे ! तुमने पहिले भी अग्निमें प्रवेश करके राजाओं तथा देवताओंको बड़ा भारी दुःख दिया है। हे मनोरमे ! तुम्हारा निवास-स्थान आज मैंने देख लिया है। अब मैं तुमको खोजनेके लिये सारा अग्निकुण्ड छान डालूँगा
२४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
इत्युक्त्वा जलकुम्भेऽथ विषेणाग्निं दशाननः । यावत्प्रक्षिप्यति कस्यायां तावत्तत्र ददर्श ह ॥२२२॥
पञ्च रत्नानि दिव्यानि गृहान्त्रा तानि रावणः । करण्डिकायां संस्थाप्य विमानेन ययौ पुरीम् ॥२२३॥
करण्डिकां देवगेहे संस्थाप्य रावणस्तदा । रात्रौ मंदोदरीं प्राह मंचकस्थां रहःस्थितः । २२४॥
हे मंदोदरि रत्नानि मया स्वल्पोपदानि हि । समानीतानि यत्नेन त्वदर्थं सुसमानि ॥२२५॥
करण्डिकायां वर्तन्ते गच्छ गृहाण तानि हि । तद्रहस्यवचः श्रुत्वा सा ययौ देवमन्दिरम् ॥२२६॥
करण्डिकां तत्र दृष्ट्वा तां नेतुं यत्नमन्वितं । यावदुच्चालयामास न चचाल तदा भुवः ॥२२७॥
तदा सा लज्जिता गत्वा रावणाय न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वा स प्रहस्याथ स्वयं नेतुं ययौ तदा ॥२२८॥
तां माऽप्युच्चालयामास न चचाल करण्डिका । यदा त्रिंशद्भुजैर्भूभ्यां न चचाल करण्डिका ॥२२९॥
तदा स विस्मयाविष्टो भयं मेने दशाननः । तत्रैवोद्घाटयामास रावणस्तां करण्डिकाम् ॥२३०॥
तावद्ददर्श तस्यां स कन्यां सूर्यप्रभोपमाम् । तत्तेजोहतनेत्रस्त्वन्यामश्वत्पि रखायाम् ॥२३१॥
तां द्रष्टुं बालिकामस्या ययुः सुहृद्गणादयः । तदा मंदोदरीं प्राह तस्या वृत्तं रणोद्भवम् ॥२३२॥
पद्मवाक्कुञ्जतात्यादि सर्वं वृत्तं दशाननः । क्रोधान्मन्दोदरी प्राह भयभीता दशाननम् ॥२३३॥
इयं कुन्था प्रविष्टा च कुलविध्वंसकारिणी । लंकां किमर्थमानीता दृष्ट्वा ज्ञात्वाऽपि चेष्टितम् ॥२३४॥
दृष्टा स्ववशपाताय श्मशाने मन्दरे वने बाल्येऽपीदृशी गुर्वी तारुण्ये किं करिष्यति । २३५॥
वधोऽस्यास्तव जानेऽहं मृत्युश्चैव भविष्यति । स्थापनीया न लङ्कायामियमग्रेऽथ रावण । २३६॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा सत्यं मेने दशाननः । मन्त्रिभिश्चाथ सम्मन्त्र्य दूतानाज्ञापयत्तदा । २३७
करण्डिकेयं नीत्वाऽद्य विमाने स्थाप्य यत्नतः । त्यक्तव्या मय वाक्यात्तु वने गच्छत वेगतः ॥२३८॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे सम्भूय पुष्पकेऽथ ताम् । करण्डिकां तु संस्थाप्य निर्ययुराकाशवर्त्मना । २३९
॥ २२२-२२३ ॥ ऐसा कहकर दशानन ने उस घटमें अग्निको बुझा दिया और ज्यों ही उसमें देखने लगा, त्यों ही उसमें उस दिव्य पाँच रत्न दिखाया दिया। २२२॥ रावणने उन पाँचों रत्नोंको उठा लिया और उस मन्थन रस तथा विमानपर चढ़कर अपनी नगरीको चला गया ॥२२३॥ वहाँ जाकर रावणने उस सन्दूकको देवगृहमें रखकर रात्रिके समय एकान्तमें पलंगपर बैठी हुई मन्दोदरी से कहा - ॥ २२४॥ हे मन्दोदरि ! जिन्हें देखकर तुम सन्तुष्ट हो जाओगी, ऐसे कुछ रत्न मैं बड़े परिश्रमसे तुम्हारे लिये ले आया हूँ। वे देवालयमें सन्दूकके भीतर रक्खे हैं, जाकर ले आओ। रावणका वचन सुनकर वह देवालयमें गयी ॥ २२५॥ २२६॥ सन्दूकको देख उसे पतिगृहके पास ले जानेके लिये उठाया तो वह जमीनसे तनिक भी नहीं उठी, तब उसने लज्जित होकर रावणसे सब हाल कहा। यह सुनता हुआ हँसकर रावण स्वयं उसे लानेके लिये गया और उसे उठाया, किन्तु वह टससे मस नहीं हुआ ॥ २२८॥ २२९॥ इससे रावण बड़ा विस्मित हुआ और डर गया। फिर उसने वहीं उस सन्दूकको खोला ॥२३० तब उस समय सूर्यके समान कान्तिवाली एक कन्या दिखायी दी। उसके तेजसे अन्धा होकर सहसा आँख बंद करने लगा । २३१॥ उस मनोहर बालिकाको देखनेके लिये उसके मित्र तथा गुरु आदि आने लगे। उस समय रावणने मन्दोदरीको युद्धका तथा जैसे वह राजा पद्माक्षके कुञ्जमें उत्पन्न हुई थी, वह सब वृत्तान्त कह सुनाया। मन्दोदरी भयभीत होकर क्रोधपूर्वक दशाननसे कहने लगी- ॥२३२ । २३३ । इस कुमथना, कुलविध्वंसकारिणी तथा प्रचण्डाके कर्मोंको जानते हुए भी तुम इसको लंकामें क्यों ले आय ? ॥ २३४॥ यह दुष्टा तुम्हारे कुलका नाश करनेवाली है। इसको शीघ्र वनमें छुड़वा दो । बचपनमें ही यह इतनी भारी है तो जवानीमें न जाने क्या करेगी ॥ २३५॥ इससे तुम्हारी मृत्यु होगी। ऐसा मुझे जान पड़ता है। इसको लंकामें घड़ी भर भी नहीं रखना चाहिये । २३६ । रावणने मन्दोदरीकी बात सत्य समझा तथा मन्त्रियोंसे मन्त्रणा करके दूतोंको आज्ञा दी—॥२३७॥ इस सन्दूकको यत्नपूर्वक शीघ्र विमानमें रखकर आज ही मेरे कथनानुसार वनमें छोड़ आओ। २३८॥ पश्चात् वे सब राक्षस इकट्ठे हो तथा उस संन्दूकको विमानमें रखकर आकाशमार्गसे चले ॥ २३९॥ उस समय